सोमवार, 20 अप्रैल 2015

कहानी लहरों की बांसुरी

प्रिय पाठक एक अनुरोध कि कहानी को आधी अधूरी पढ़ कर मेरे या कहानी के बारे में कोई राय न बनायें।

 लहरों की बांसुरी

 अभी वाशरूम में हूँ कि मोबाइल की घंटी बजी है। सुबह-सुबह कौन हो सकता है। सोचता हूँ और घंटी बजने देता हूँ। पता है जब तक तौलिया बाँध कर बाहर निकलूंगा, घंटी बजनी बंद हो जायेगी। घंटी दूसरी बार बज रही है, तीसरी बार, चौथी बार। बजने देता हूं। बाद में भी देखा जा सकता है, किसका फोन है। बाहर आकर देखता हूँ अंजलि का फ़ोन है। कमाल है, अंजलि और वह भी सुबह-सुबह। उनसे तो बोलचाल ही बंद हुए महीना भर होने को आया। फोन मिलाता हूँ – हैलो, आज सुबह-सुबह, सब ठीक तो है ना? मेरी हैलो सुने बिना सीधे सवाल दागा जाता है – इतनी देर से फोन क्‍यों नहीं उठा रहे? बताता हूं - नहा रहा था भई और मैं नहाते समय अपना मोबाइल बाथरूम में नहीं ले जाता। - डोमेस्टिक एयरपोर्ट पहुँचने में आपको कितनी देर लगेगी? मैं हैरान होता हूं। अंजलि और मुंबई एयरपोर्ट पर? मैं कारण चाहता हूँ लेकिन वही सवाल दोहराया जाता है - डोमेस्टिक एयरपोर्ट आने में आपको कितनी देर में लगेगी? मैं बताता हूँ – ट्रैफिक न मिले तो पन्द्रह मिनट, नहीं तो आधा घंटा। - हमम, तो आप एक काम कीजिए। तीन दिन के लिए कैजुअल से कपड़े एक बैग में डालिये, गाड़ी निकालिये और मुझे आधे घंटे बाद डोमेस्टिक एयरपोर्ट ए वन के अराइवल गेट पर मिलिये। अभी फ्लाइट लैंड हुई है, तब तक मैं भी बाहर आ ही जाऊंगी। मैं हैरान होता हूँ - आप सुबह-सुबह बंबई में कैसे? मेरी बात नहीं सुनी जाती। अंजलि अपनी बात दोहराती हैं - मैं वेट करूंगी। मैं सोच में पड़ गया हूं - अंजलि बंबई आयी हैं। अभी फ्लाइट से उतरी भी नहीं हैं। मुझे एयरपोर्ट पर ही बुलाया है और तीन दिन के लिए कैजुअल कपड़े भी डालने के लिए कह रही हैं। पता नहीं क्‍या है उनके मन में। याद करता हूँ, कल ऑफिस की एक ज़रूरी मीटिंग में मेरा होना बेहद ज़रूरी है। देखें, ये तो अंजलि से मिलने के बाद ही पता चलेगा कि वे क्‍या चाहती हैं। मैं फटाफट तैयार होता हूँ। सफ़र के लिए ज़रूरी सामान और कपड़े बैग में डालता हूँ। ब्रेकफास्‍ट का टाइम नहीं है। गाड़ी निकालता हूँ। अभी गेट से बाहर निकला ही हूं कि फिर अंजलि का फोन है। गाड़ी एक तरफ खड़ी करके पूछता हूँ - अब क्या है? वे पूछती हैं - कहाँ तक पहुंचे? मैं बताता हूँ - अभी गेट से बाहर निकल ही रहा हूँ। एक और आदेश थमाया जाता है - तकलीफ तो होगी, ज़रा वापिस जा कर अपना लैपटॉप लेते आओ। वजह मत पूछना प्‍लीज़। मैं पूछना चाहता हूँ - ये सब क्या हो रहा है, लेकिन उन्‍होंने इतने प्यार से कहा है कि कुछ कहते नहीं बना। वापिस जा कर लैपटॉप लेकर आता हूँ। घर से निकालने में ही दस मिनट हो गए हैं। सुबह हर मिनट के बढ़ने के साथ पर ट्रैफिक दुगना होता चलता है। सुबह का ट्रैफिक कभी वक्त पर कहीं पहुंचने नहीं देता। मेरी किस्‍मत अच्‍छी है कि बहुत ज्‍यादा ट्रैफिक नहीं है। घड़ी देखता हूं - सात पचपन। इसका मतलब अंजलि ने सुबह 6 बजे या उससे भी पहले की फ्लाइट ली होगी। लेकिन वे तो मेरठ रहती हैं। इसका मतलब कल रात से सफ़र में होंगी या रात को ही दिल्‍ली आ गयी होंगी। मेरी फेसबुक फ्रेंड हैं अंजलि। उनसे पहली बार मिल रहा हूँ। उनकी तस्वीर भी नहीं देखी है। पहचानूंगा कैसे। सारा झगड़ा ही तो फेसबुक पर तस्‍वीर लगाने को हुआ था और इस चक्‍कर में हममें महीने भर से अबोला चल रहा था। जाने दो। वे खुद ही पहचानेंगी मुझे। अभी एयरपोर्ट पहुंचने ही वाला हूं कि उनका मैसेज आ गया है - वेटिंग नीयर डीकोस्‍टा कॉफी शॉप। मैं मुस्‍कुराता हूं। पहचानने की समस्‍या उन्‍होंने खुद ही सुलझा दी है। गाड़ी धीरे-धीरे अराइवल गेट के पास बने कॉफी शॉप की तरफ ले जाता हूँ। दूर से ही नज़र आ गयी हैं। बेहद खूबसूरत। नीली टी-शर्ट नीली और ब्लैक ट्राउज़र में। वे ही होंगी। उनके पास गाड़ी रोकता हूं। वे मुझे देखते ही हाथ हिलाती हैं। गाड़ी बंद करता हूँ और उनकी तरफ बढ़ता हूं। वे तपाक से मेरी तरफ बढ़ती हैं। हंसते हुए कहती हैं - वाव, डैशिंग। और उन्होंने मुझे हौले से हग किया है। मैं मुस्‍कुरा कर उनके दोनों हाथ दबाता हूं - वेलकम अंजलि। वे हंसते हुए मेरे हाथ देर तक थामे रहती हैं। मैं इस रस्म अदायगी के बाद उनका बैग डिकी में रखता हूँ और उनके लिए कार का दरवाजा खोलता हूं। वे बैठती हैं। मैं गाड़ी स्‍टार्ट करते समय पूछता हूं - अंजलि, माय फेसबुक फ्रेंड नाउ टर्न्‍ड इनटू रीयल फ्रेंड। बतायेंगी, हम कहां जा रहे हैं? वे मुस्‍कुरा कर कहती हैं - हम सीधे दमन जा रहे हैं। मैं एतराज़ कहना चाहता हूँ कि कल एक मीटिंग है जिसमें मेरा रहना बेहद ज़रूरी है लेकिन कुछ नहीं कहता। मीटिंग्‍स रोज़ चलती रहती हैं। मीटिंग में मेरे न रहने से आसमान नहीं टूट पड़ेगा। किसी भी मीटिंग से ज्यादा ज़रूरी तो फेसबुक फ्रेंड से एक्‍चुअल मीटिंग है। इस मीटिंग के बीच में कोई मीटिंग नहीं आनी चाहिये। जवाब में मैं मुस्‍कुराता हूँ। कहता हूँ - जैसी आज्ञा महाराज। वे मुस्‍कुराती हैं - अच्‍छे बच्चे की तरह गाड़ी चलाइये। जवाब में मैं मुस्‍कुराता हूँ। पूछता हूँ - अचानक इस तरह मुंबई में सुबह-सुबह। अगर मैं न मिलता या शहर में न होता तो आप क्या करतीं लेकिन वे मेरे किसी सवाल का जवाब नहीं देतीं। वे गुनगुना रही हैं, बाहर का नज़ारा देख रही हैं या अपने मोबाइल से खेल रही हैं। बात करने की नीयत से मैं पूछता हूँ - ब्रेकफास्ट लिया है? वे बताती हैं - नहीं, सिर्फ कॉफी ली थी। ब्रेकफास्ट आपके साथ ही लेना है। हाइवे पर कहीं ढाबे पर करेंगे। मैं पूछ ही लेता हूं - अचानक मुंबई आना और एयरपोर्ट से ही दमन की तरफ चल देना। कोई खास बात? वे मुझे देखती हैं - कोई और बात करो। आप इस बारे में मुझसे कोई सवाल नहीं पूछेंगे। बस ये जान लीजिये कि इन तीन दिनों में आप मेरे मेहमान हैं और मेहमान ज्‍यादा सवाल पूछते अच्‍छे नहीं लगते। मैं मुस्‍कुराता हूं। कुछ नहीं कहता। जानता हूं मेरे किसी भी सवाल का जवाब ऐसे ही मिलना है। मुझे भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिये। हम तीन दिन एक साथ हैं ही। खुद ही बतायेंगी। नहीं भी बतायें तो मुझे क्‍या। मेरे साथ एक बेहद खूबसूरत दोस्‍त हैं जो पहली बार मिल रही हैं और अपने साथ तीन दिन दमन जैसी खूबसूरत जगह पर बिताने का न्‍यौता दे रही हैं। सबसे बड़ा सच तो यही है जो सामने है। हम विरार पार चुके हैं। साढ़े नौ बज रहे हैं। हाइवे का ट्रैफिक दोनों तरफ अपनी गति से चल रहा है। तभी अंजलि ने मुझसे कहा है - मैं एक ऐसा काम करने जा रही हूं जो मेरे जैसी शरीफ लड़की को इस तरह से नहीं करना चाहिये। आप थोड़ी देर के लिए मेरी तरफ मत देखना और अपना सारा ध्यान ड्राइविंग पर लगाना। मैं इशारे से कुछ पूछना चाहता हूँ लेकिन वे बनावटी गुस्‍से में मेरी तरफ देखती हैं - मैं बहुत अन्‍कम्‍फर्टेबल महसूस कर रही हूं। कुछ चेंज करना है। मैं फिर पूछना चाहता हूं, वे घुड़क देती हैं - कितने सवाल पूछते हैं आप। मैं सॉरी कहता हूं अपना सारा ध्यान ड्राइविंग पर लगाता हूँ। मैं कपड़ों की सरसराहट महसूस कर रहा हूं। मैं चाहते हुए भी उनकी तरफ नहीं देखता। दो तीन मिनट बाद मैं महसूस करता हूँ कि उनका बैग खुला है और कुछ रख कर बंद किया गया है। उनकी खिलखिलाहट सुनायी दी है - श्रीमान जी, अब आप इस तरफ देख सकते हैं। मैं इशारों ही इशारों में पूछता हूँ - क्या किया है। वे नकार देती हैं। मैं मुंह बिचकाता हूं - मत बताओ। थोड़ी देर बाद वे खुद ही बताती हैं – कुछ खास नहीं। सब ऑनलाइन शॉपिंग की करामात है। कल ही अंडरक्‍लोथ्‍स आये थे। चेक करने का मौका नहीं मिला। सुबह साढ़े तीन बजे तैयार हो कर घर से निकली थी और तब से सांस अटकी हुई थी। अब जा कर उससे मुक्‍ति पायी है तो जान में जान आयी है। मैं हैरान होता हूं - तो अभी टी-शर्ट भी उतारी थी क्‍या? वे मासूमियत से जवाब देती हैं - आप बुद्धू हैं, उसके बिना वो कैसे उतारती? मैं बनावटी गुस्‍से से कहता हूं - कमाल करती हैं आप भी। हाइवे पर चलती गाड़ी में आगे की सीट पर बैठे हुए इस तरह से ड्रेस चेंज करना। आप कैसे कर पायीं? वे हंसती हैं - वेरी सिंपल। पहली बात, आपसे पूछ के किया। दूसरे, हमारी गाड़ी इस समय कम से कम 100 की स्‍पीड से चल रही है। किसी गाड़ी ने हमें ओवरटेक नहीं किया और किसी ने नहीं देखा। तीसरे, सामने से जो गाड़ियां आ रही हैं, उनमें बैठे लोगों को सेकेंड का दसवाँ हिस्सा मिला होगा यह देखने के लिए कि मैंने अपनी टी-शर्ट उतार कर फिर पहनी है। वे गाड़ी वाले वापिस आ कर एक्‍शन रिप्‍ले देखने से रहे। यहां मामला कब का निपट चुका है। यहाँ तक कि आप जो कि मेरे पास इतने नजदीक बैठे हैं, कहाँ देख पाए कि मैंने क्या किया है। मैं न बताती तो...। मैं हैरान होता हूँ कि मेरठ जैसे परंपरागत शहर में रहने वाली अंजलि इतनी बोल्‍ड हो सकती हैं। जानता हूँ मेरे अगले सवाल का जवाब भी दुधारी तलवार की तरह ही दिया जायेगा। बात खत्‍म हो जाने दे देता हूं। तभी अंजलि ने मुझे गाड़ी किनारे करके रोकने के लिए कहा है। मैं इशारे से पूछता हूँ - क्या है अब। वे झिड़कती हैं - कहा ना, गाड़ी रोकें। मैंने गाड़ी किनारे लगायी है। वे बाहर निकली हैं। मुझे भी बाहर आने के लिए कहा है। हम आमने सामने हैं। उन्‍होंने मुझे तपाक से गले लगाया है। मैं इस अचानक प्‍यार भरे हमले से घबरा गया हूं। समझ नहीं पा रहा हूँ ये क्या दीवानापन है। कुछ तो सोचें, कहाँ क्या कर रही हैं, कहां कर रही हैं और क्‍यों रही हैं। अजब पागलपन है इस महिला में। सारे अंदाज़ निराले। वे तर्क देती हैं - इतनी तेजी से आती-जाती गाड़ियों में बैठे लोगों को क्या परवाह और किसकी परवाह कि कौन क्‍या कर रहा है। मेरा मन था कि जब हम मिलें, तपाक से गले मिल कर मिलें। एयरपोर्ट पर हो नहीं पाया तो यहीं सही। इस बार भी मेरे पास उनकी बात का कोई जवाब नहीं। तभी वे ड्राइविंग सीट की तरफ बढ़ी हैं और मुझे पैसेंजर सीट पर बैठने का इशारा किया है - तो ये चाल थी मदाम की मुझसे ड्राइविंग सीट हथियाने की। वैसे ही कह दिया होता। मना थोड़े ही करता। वे बहुत संयम से गाड़ी चला रही हैं। उन्‍होंने म्‍यूजिक ऑन किया है और फिर उसे एकदम धीमे करते हुए कहना शुरू किया है - मुझे पता है इस समय मुझे ले कर आपके मन में बहुत से सवाल जमा हो गए होंगे और आप डर भी रहे होंगे कि मैं आपके अगले सवाल का जवाब भी गोलमाल ही दूंगी। क्‍यों है ना ऐसा? पूछा है उन्‍होंने। मैंने इतनी देर में पहली बार उनकी तरफ ध्‍यान से देखा है। वैसे भी ड्राइविंग करते समय साथ वाले को इतने ध्‍यान से देखने का मौका ही कहां मिल पाता है। बेहद खूबसूरत अंडाकार चेहरा। कंधे तक लहराते खुले बाल, कंधे एक दम तने हुए जो आत्‍म विश्‍वास से ही ऐसे हो सकते हैं। शानदार सुगठित देहयष्‍ठि जिसे बार-बार मुड़ कर देखने को जी चाहे। सही कहा गया है कि महिलाएं पुरुषों की निगाहों के बारे में अतिरिक्‍त रूप से सजग होती हैं। सामने सड़क पर देखते हुए भी उन्‍होंने इस तरह से मेरा देखना ताड़ लिया है। झट से पूछ भी लिया है - क्‍या देख रहे हैं इतनी देर से। आपकी नीयत तो ठीक है जनाब। मैं इतनी देर में पहली बार खुल के हंसा हूं - मेरी नीयत को क्‍या होना जी। हम तो आपके मेहमान ठहरे। जो भी रूखा-सूखा मिलेगा, गुज़ारा कर लेंगे। हंसी हैं अंजलि - बड़े आये रूखे सूखे खाने वाले। अब सबसे पहले तो कहीं नाश्‍ते का इंतज़ाम किया जाये। अभी उन्‍होंने कहा ही है कि दूसरी तरफ वाली सड़क पर कई बार एंड रेस्‍तरां के बोर्ड नज़र आने शुरू हो गये हैं। वे खुश हो गयी हैं - लो जी बन गया आपका काम। रूखे सूखे खाने वाले जी। और उन्‍होंने गाड़ी यू ट्रेन करके एक अच्‍छे से बार एंड रेस्‍तरां के सामने खड़ी कर दी है और मुझे इशारा किया है - आइये मेहमान जी। वे मेरा हाथ पकड़ कर अंदर जाने के लिए आगे बढ़ी हैं तो मैंने कहा है - ये बार है। रेस्‍तरां साथ वाला है। वे बिना कुछ बोले मुझे भीतर घसीट लायी हैं। वेटर के आते ही उन्‍होंने बिना मीनू कार्ड देखे स्‍ट्रांग बीयर का ऑर्डर दिया है और कहा है कि नाश्‍ते में कुछ भी जो भी एकदम गर्म और ताज़ा हो ले आओ। फटाफट। पहले एक बीयर लाना। मैं अंजलि के चेहरे की तरफ देख रहा हूं। किस धरती की प्राणी हैं ये। कुछ तो नार्मल भी करें। इतने बरसों से पीते हुए मैंने कभी नाश्‍ते में बीयर नहीं पी और ये मेरठ की रानी तो मुझसे दस कदम आगे हैं। मैं उन्‍हें देख कर मुस्‍कुरा रहा हूं। उन्‍होंने बीयर का गिलास उठाया है और मुझे इशारा किया है - बीयर्स। - सुनिये, वे जैसे मेहरबान हो गयी हैं - मैं आपको सारी बातें बताऊंगी। जैसे-जैसे प्रसंग आयेगा। अभी लखनऊ से आ रही हूं। मेरठ से कल आ गयी थी। एरिया लेवल की मीटिंग थी कल। आज सुबह की गोवा की फ्लाइट थी। एयरपोर्ट आकर पता चला कि गोवा की फ्लाइट कैंसिल हो गयी है। दूसरी फ्लाइट शाम को ही मिलेगी। मेरे पास तीन-चार च्‍वाइस थे। पहला कि टिकट कैंसिल करा के मेरठ वापिस जाती। दूसरी च्‍वाइस कि होटल वापस जाती, दोबारा चेक इन करती, और शाम की फ्लाइट लेती। उसका कोई मतलब नहीं था क्‍योंकि गोवा में आज ही पूरे दिन हमारी कंपनी का एनुअल डे फंक्‍शन चल रहा है और शाम की फ्लाइट ले कर मैं डिनर के लिए मुश्‍किल से पहुंच पाती। तीसरी च्‍वाइस ये थी कि मैं कोई भी फ्लाइट ले कर किसी ऐसी जगह जाऊं मैं तीन दिन अपने तरीके से, अपने खर्चे पर और अपनी पसंद के किसी नये दोस्त के साथ गुज़ार सकूं। पता किया तो मुंबई फ्लाइट तैयार थी। मैंने यही ऑप्‍शन दिया और अब तुम्‍हारे सामने हूँ। वैसे मैं मुंबई होते हुए भी गोवा जा सकती थी। लेकिन तुमसे मिलना लिखा था मेरे हिस्‍से में तो तुम्‍हारे सामने हूं। अब इसमें मैं क्‍या करूं कि सारे दोस्‍तों में सिर्फ तुम्‍हारा ही नम्‍बर मेरे पास था। बाकी सब फेसबुक तक ही सीमित हैं। - मुझे पता है समीर, मेरे तौर तरीकों से और मेरे खुलेपन से तुम्‍हें अजीब लग रहा होगा और तकलीफ़ भी हो रही होगी लेकिन सच बताऊं, ज़िंदगी में पहली बार, शायद पहली बार अपनी तरह से अपने तरीके से ये तीन दिन गुज़़ारने वाली हूँ इसलिए ज़रूरी लगा कि इस सब की शुरुआत ऐसे तरीके से करूँ कि वापिस मुड़ कर देखने की, याद करने की ज़रूरत न पड़े। और कोई अफसोस भी न रहे। - एक बात तुमसे और शेयर करती हूं और तुम्‍हें यह जान कर खुशी होगी समीर कि लगातार तीसरे बरस का कंपनी का बेस्ट परफॉर्मर का एवार्ड तुम्‍हारी इस मित्र अंजलि को ही मिला है और मैं यह एवार्ड लेने ही गोवा जा रही थी। हंसी आ रही है, पैसे मिलते गोवा में और मैं खर्च कर रही हूँ दमन में। बस एक ही बात है, बेशक समंदर वहां भी होता, तुम न होते। अचानक अंजलि रुकी हैं - और फिर तुमसे अपने खराब व्‍यवहार के लिए माफी भी तो मांगनी थी। - किस बात की माफी? मैं हैरान होता हूं। - जिस बात के लिए हमारा अबोला हुआ था। फेसबुक पर प्रोफाइल पिक्चर को ले कर। - अरे वो तो मैं कब का भूल चुका। - लेकिन मैं कैसे भूलती। बहुत खराब लग रहा था कि मैंने ये क्‍या कर डाला है लेकिन कोई तरीका नहीं मिल रहा था पैच अप का। आज जब मुंबई की फ्लाइट का मौका मिला तो मुझे लगा ये सही मौका है। मैं सिर्फ मुस्‍कुरा कर रह गया हूं। मामूली सी बात थी। फेसबुक पर वैसे भी किसी पोस्‍ट की उम्र कुछ घंटे होती है और किसी मुद्दे की उम्र बहुत हुआ तो दो दिन। बात इतनी सी थी कि एक महीना पहले मैंने अपनी फेसबुक वॉल पर लिखा था कि आज एक दुर्घटना जैसी हो गयी। रोज़ाना पाँच-सात मैत्री अनुरोध आते हैं। कई बार तो नर और नारी का ही पता नहीं चल पाता। तस्वीर की जगह फूल पत्ती, भगवान या पाकिस्तानी नायिकाएं। कुछ लोग हंसिका मोटवानी की तस्वीर लगा कर उस पर अहसान कर देते हैं। ये मैत्री प्रस्ताव किसी पार्टी के बैनर वाला था। बिना जांच पड़ताल के दोस्त बनाने के दिन लद गये। उनसे पहचान के लिए पूछा तो उन्होंने ताना मारा कि आपकी फ्रेंड लिस्ट में कई ऐसे लोग शामिल हैं जिन्होंने अपनी तस्वीर नहीं लगा रखी है तो हमीं पे ये शर्त क्यों। बात सही थी। आगे लिखा था मैंने कि तब पहला काम यही किया कि बिना प्रोफाइल पिक्चर के कई दोस्त विदा किये। इस अभियान में परिचित लेकिन फूल पत्ती लगाये कई दोस्त शहीद हो गए। अभी ये काम बाकी है। वे दोस्त बेशक फेसबुक से विदा हुए, मेरे जीवन में बने रहेंगे। इसी चक्‍कर में मैंने अंजलि को भी अनफ्रेंड कर दिया था। बेशक सिर्फ उन्‍हीं के इनबॉक्‍स में लिखा था कि आपके गुलाब के फूल को भी मेरी सूची से हटना पड़ना रहा है ताकि कोई मुझे ये न कहे कि अनफ्रेंड करने में भी भेदभाव बरता है। लिखा था मैंने कि आप मेरी दोस्‍त थीं, हैं और बनी रहेंगी। अब तक वे मेरी बेहतरीन फेसबुक फ्रेंड थी। बेशक हमने कभी एक दूसरे के बारे में न तो ज्‍यादा जानने और न ही बताने की ज़रूरत ही नहीं समझी थी। इतने दिनों में मैंने कभी नहीं पूछा कि वे किस कंपनी में हैं और क्‍या काम करती हैं। हम बरस भर से फेसबुक मित्र थे और अक्‍सर चैट करते रहते थे और एक दूसरे के सुख दुःख के बारे में पूछते रहते थे। हम जब भी बात करते थे, दुनिया जहान की बात करते थे। मेरी पोस्‍ट अंजलि बहुत ध्‍यान से पढ़ती थीं और उस पर अक्‍सर चलने वाली बहसों में हिस्‍सा लेती थीं। हम दोनों ने कभी मोबाइल नम्‍बर एक्सचेंज नहीं किये थे। इस मुद्दे के बाद पता नहीं कहां से उन्‍होंने मेरा मोबाइल नम्‍बर खोजा था और मेरी अच्‍छी खासी लानत मलामत कर दी थी। मेरी एक नहीं सुनी थी और दोबारा भेजी गयी मेरी फ्रेंडशिप की रिक्‍वेस्‍ट को भी ठुकरा दिया था। सारा मामला वहीं खत्‍म हो गया था। मैंने एक अच्‍छी दोस्‍त को खो दिया था। सम्‍पर्क का कोई ज़रिया नहीं रह गया था। धीरे धीरे मैं उनके बारे में भूल भी चुका था। और अब वे ही दोस्‍त न केवल मेरे सामने बैठी हैं बल्‍कि उस बात की भरपाई करने के लिए इतना शानदार न्‍यौता ले कर आयी हैं। नाश्‍ता करने के बाद जब हम बाहर निकले हैं तो हमें फिर से यू टर्न ले कर गुजरात की तरफ जाने वाली सड़क पर जाना है। पूछ ही लिया है उन्‍होंने कि ऐसा क्‍यों है कि सारे बार सड़क के इस तरफ ही हैं। मैंने बताया है - बहुत आसान सी बात है। ये सड़क गुजरात की तरफ से आ रही है। गुजरात ड्राइ स्‍टेट है। वहां से आने वाली गाड़ियों के ड्राइवर और पैसेंजर जैसे सदियों से प्यासे होते हैं। ये सब इंतज़ाम उन प्यासों की ज़रूरत के लिए है और हमारी तरफ वाली सड़क चूंकि गुजरात जा रही है तो ड्राइ स्‍टेट में पी कर जाने का रिस्‍क लेने वाले कम होते हैं इसलिए उस तरफ बार भी नहीं हैं। अंजलि ने सलाम में हाथ उठाया है - मान गये उस्‍ताद। बलिहारी है पीने वालों की। • गाड़ी अंजलि ही चला रही हैं। मैं अचानक सोच पड़ गया हूं। अंजलि की तरफ देख रहा हूं। लगातार तनाव में हूँ। मेरे साथ एक युवा, बिंदास और अपनी तरह से भरपूर ज़िंदगी जीने वाली महिला हैं जो तीन दिन की छुट्टी मनाने के लिए अपने साथ मुझे ले कर आयी हैं। हम बेशक फेसबुक पर एक दूसरे को जानते रहे हैं लेकिन आज अचानक पहली बार मिल रही हैं। महीने भर से चल रहे अबोले को खत्‍म करने चली आयी है। समझ नहीं आ रहा है कि अंजलि में क्या सोच कर अपनी इस यादगार ट्रिप के लिए मुझे चुना है। तीन घंटे पहले तय किया और बिना सोचे समझे चली आयीं। मैं न मिलता या मुंबई में ही न होता तो। ये तो और वो तो.........। तो.........। एक साथ तीन दिन और तीन रात रहना। जब नाश्‍ता ही बीयर से हो रहा है तो दमन में तो वक्‍त बेवक्त चलेगी। पता नहीं अंजलि जी के मन में क्‍या हो। हम नानी दमन पहुंच गये हैं। कई बरस के बाद आ रहा हूं तो पता नहीं इस बीच कौन-कौन से नये होटल खुल गये हैं। चेक करने के लिए मोबाइल निकालता हूं लेकिन अंजलि जैसे अपनी ही धुन में कार चला रही हैं। कुछ ही देर में हम जजीरा होटल की लॉबी में हैं। कार वेलेट पार्किंग के हवाले करके हम रिसेप्शन पर आये हैं। अंजलि ने मुझे बैठने के इशारा किया है। पूछा है मैंने - इस होटल के बारे में कैसे पता था? पहले कभी आयी हैं? - जी नहीं, हम आज यहां पहली बार आये हैं और तुमसे मिलने के बाद तुम्‍हारी कार में बैठे हुए ही मैंने ऑनलाइन बुकिंग की थी। मैंने राहत की सांस ली है। अंजलि की पसंद और सिस्‍टम से काम करने के लिए उनकी तरफ तारीफ भरी निगाह से देखता हूं। कमरे में ही जा कर पता चला है कि अंजलि में कमरा न बुक कराके डीलक्‍स सुइट बुक कराया है। रूम सर्विस स्‍टाफ के जाते ही अंजलि में फिर से मुझे हग किया है और मेरे गाल चुटकियों में भरते हुए कहा है - ये पोर्शन मेरा और मास्‍टर बेडरूम आपका ताकि हम पास रहते हुए भी दूर रहें और दूर रहते हुए भी पास रहें। मैं भोलेपन से पूछता हूं - जरा समझायेंगी इस दूर पास का मतलब? - सिंपल। अगर तुम कमज़ोर पड़ गये तो मैं तुम्‍हें संभालूंगी और कमज़ोर नहीं पड़ने दूंगी और अगर कहीं मैं कमज़ोर पड़ गयी तो तुम मुझे संभाल लेना। तभी मैंने अंजलि को दोनों कंधों से थामा है और उनकी आंखों में आंखें डाल कर पूछा है- और अगर हम दोनों ही कमज़ोर पड़ गये तो? अंजलि ने जवाब में मेरे कंधे दबाये हैं - मर्द हो ना, कमज़ोर होने की ही बात करोगे। ये क्‍यों नहीं कहते कि हम दोनों ही मज़बूत बने रहे तो कितनी बड़ी बात होगी। वे मेरा हाथ थामे मुझे सोफे तक लायी हैं। हम बैठ गये हैं। मेरे हाथ अभी भी उनके हाथों में हैं। वे मेरी आंखों में आंखें डाल कर कह रही हैं - समीर, मैं यहां कमज़ोर हो कर या कमज़ोर होने नहीं आयी हूं। मेरी पूरी फ्रेंडलिस्‍ट में अकेले तुम्हीं रहे जिसने कभी भी कोई लिमिट क्रास नहीं की वरना इस प्‍लेटफार्म पर ऐसे लोग भी भरे पड़े हैं जिनका बस चले तो फेसबुक पर ही पहले अपने और फिर सामने वाले के कपड़े उतारने में एक मिनट की देरी न करें। वे रुकी हैं। मैं उनके चेहरे की तरफ देख रहा हूं। कहता हूं - कहती चलें। वे आगे कह रही हैं - बस मुझे और कुछ नहीं कहना। आओ देखें खिड़की से समंदर का नज़ारा कैसा दिखता है। हमें आये हुए इतनी देर हो गयी और अब तक हमने समंदर से मुलाकात नहीं की। तभी दरवाजे पर नॉक हुई है। दरवाजा खोलता हूं। तीन वेटर हैं। ढेर सारा सामान लिये। फ्रूट, बिस्‍किट, चॉकलेट्स, कुकीज और दो वाइन बॉटल्‍स। एक आइस बकेट में और एक रूम टेम्‍परेचर पर। होटल की तरफ से कम्‍पलीमेंटरी। बॉटल्‍स देखते ही अंजलि ने मुझे आँख मारी है। हम दोनों कमरा देखते हैं। दो तरफ की दीवार पर पूरी खिड़की है। सामने हरहराता समंदर देख कर अंजलि की खुशी के मारे उनकी चीख निकल गयी है। सामने ठाठें मारता अनंत जल विस्‍तार है। होटल के गार्डन की दीवार से टकराती ऊंची ऊंची लहरें। हाइ टाइड होना चाहिये। अंजलि ने एक बार फिर मुझे अपने से सटा लिया है - हम कितने सही वक्‍त पर आये हैं ना। हाइ टाइड हमारी अगवानी कर रही है - लेट्स सेलिब्रेट। और बिना एक पल भी गंवाये वे वाइन के गिलास भर लायी हैं। वे खिड़की के सामने से एक पल के लिए भी नहीं हटना चाहतीं। समंदर को इतना पास और इतना खुश देख कर छोटी बच्‍ची बन गयी हैं। फटाफट वाइन खत्‍म की है। अब वे हड़बड़ाने लगी हैं – चलो, चलो जल्‍दी करो। अब नीचे चलते हैं। बाकी बातें बाद में। वे पूछ रही हैं - स्‍विमिंग कॉस्‍टयूम लाये हैं ना? मैं झल्‍लाता हूं - अंजलि जी, कपड़े रखने के लिए कहते समय आपने कहां कहा था कि हम कहां जा रहे हैं। लेकिन डोंट वरी। आप वाशरूम में जा कर चेंज करो। मैं हंसता हूं - मर्दों के लिए स्‍विमिंग कॉस्‍टयूम कहां होते हैं। वे अपना कास्‍ट्यूम पहन कर उस पर बाथ रोब डाल कर तैयार हैं। वे छोटी बच्‍ची जैसी चपल हो रही हैं समंदर से मिलने जाने के लिए। • अंजलि ने बहुत एन्‍जाय किया है। दो घंटे हो गये हैं, पानी से बाहर आने का उनका मन ही नहीं है। उजला फेनिल जल जब वापिस लौटने लगा है तब भी वे वहीं रहना चाहती हैं। मेरा हाथ थाम कर वे पानी से खूब अठखेलियां कर रही हैं। मेरे लिए भी आज का अनुभव एकदम नया और दिल के बेहद करीब है। हम दोनों पानी में जितनी मस्‍ती रहे हैं, लगता ही नहीं कि हम आज चार घंटे पहले ही ज़िंदगी में पहली बार मिले हैं। हमने तय किया है कि खाना भी वहीं समंदर के किनारे गार्डन में ही खा लेंगे। नहाने की बाद में सोची जायेगी। बस एक बार दोनों ही फ्रेश वाटर का शावर ले कर आ गये हैं। हम दोनों अभी भी बाथ रोब में ही हैं। बाथरूम में शावर ले कर आते समय अंजलि बेहद खुश लग रही हैं। उनका चेहरा धूप से, नमकीन पानी की दमक से और यहां आने की, समंदर में नहाने की खुशी के मिले-जुले असर से इंद्रधनुष हो रहा है। इस बार मैं पहल करता हूं और दिन दहाड़े, सबके सामने और अरब महासागर को साक्षी बनाते हुए उन्‍हें गले से लगा लिया है मैंने। उनके गाल चूम लिये हैं। मन को तसल्‍ली दे लेता हूं कि इतने भर से हम दोनों कमज़ोर नहीं हो जायेंगे। वे इतरायी हैं। मेरी छाती पर मुक्का मारते हुए बोली हैं - यू नॉटी बाय। लंच में अंजलि ने फिर से बीयर का ऑर्डर दिया है। जानता हूं, जब तक यहां हूं, पीने और समंदर से मुलाकातें करने का कोई हिसाब नहीं रखा जायेगा। जब हम कमरे में आये हैं तो दोपहर के चार बजे हैं। बाथ लेने और चेंज करने के बाद मैं अंजलि से कहता हूं कि वे बेडरूम में सो जायें। इससे पहले कि वे अपना इरादा मुझ पर लादें, मैं पहले वाले रूम में सोफा कम बेड पर पसर गया हूं। लेकिन अंजलि ने मेरी एक नहीं मानी है और मेरा हाथ पकड़ कर मुझे बेडरूम में ले आयी हैं और बिस्‍तर पर धकेल दिया है - मिस्‍टर गेस्‍ट, ये आपके लिए है। मैं बाहर लेट रही हूं। और वे बाहर वाले कमरे में चली गयी हैं। • अचानक कुछ सरसराहट से मेरी नींद खुली है। देखता हूं अंजलि डबल बेड पर एकदम मेरे पास अधलेटी लैपटॉप में तस्‍वीरें देख रही हैं। कमरे में बत्तियां जल रही हैं। टाइम देखता हूं - आठ बजे हैं। मैं उठ बैठता हूं - तो इसका मतलब मैं चार घंटे तक सोता ही रहा। मुझे जागा देख कर अंजलि मुस्‍कुरायी हैं और मेरे हाथ पर हाथ रख कर बेहद प्‍यार से पूछती हैं - चाय या कॉफी? यहीं बनाऊं या रूम सर्विस से मंगाऊं? - आपको कौन सी पसंद है? मैं पूछता हूं। - देखो समीर, ये हो क्‍या रहा है। मैं सुबह से तुम्‍हें तुम कह रही हूं और तुम आप आप की रट लगाये हुए हो। हम इतने फार्मल नहीं रहे हैं दोस्‍त। मुझे नाम से पुकारो। अच्‍छा लगेगा। मैं अचकचाया हूं – नहीं, वो क्‍या है अंजलि कि आपकी पर्सनैलिटी के साथ तुम शब्‍द फिट ही नहीं हो रहा। सुबह से कहना चाह रहा हूं लेकिन हर बार ज़बान तक आते-आते तुम अपने आप आप में बदल जाता है। - ओके नो प्रॉब्लम। हम तुम्‍हारी मदद करते हैं। उन्‍होंने मेरा हाथ थामा है और कह रही हैं, मेरे साथ-साथ बोलो - अंजलि, चाय की तलब लगी है, चाय पिलाओ ना। मैं हंसता हूं। अंजलि को छू कर पूछता हूं - अंजलि, तेरी चाय पीने की इच्‍छा है क्‍या, बोल, कौन-सी वाली पीयेगी। और ये कहते हुए मैं सचमुच चाय बनाने के लिए उठ खड़ा हुआ हूं। मेरी इस हरकत से अंजलि बहुत खुश हो गयी हैं - चल समीर, आज की पहली चाय तेरी पसंद की। अंजलि अभी भी लैपटॉप में उलझी हैं। अपनी चाय ले कर मैं भी अंजलि के पास सरक आया हूं और तस्‍वीरें देखने लगा हूं। वे पिकासा में तस्‍वीरें देख रही हैं। स्‍लाइड शो चल रहा है। वे लैपटॉप मेरी तरफ मोड़ देती हैं। तस्‍वीरें कुछ जानी पहचानी लग रही हैं। ध्‍यान से देखता हूं - अरे ये तो मेरी ही तस्‍वीरें हैं। अब मैं लैपटॉप को ध्‍यान से देखता हूं। ये मेरा ही तो लैपटॉप है। अंजलि हंसती हैं - समीर, मैं 6 बजे ही जाग गयी थी। तुम गहरी नींद में थे। कुछ सूझा ही नहीं कि क्‍या करूं। पहले खिड़की के पास खड़ी रही। समंदर लो टाइड के कारण बहुत पीछे चल गया था। अच्‍छा नहीं लगा। फिर याद आया कि तुम्‍हें लैपटॉप लाने के लिए कहा था। बाकी सामान के साथ लैपटॉप भी कमरे में आ गया था। खोला तो पासवर्ड नहीं था। - हमम, अकेले रहने वाले किसके लिए पासवर्ड रखेंगे। कौन से मुझे इस लैपटॉप से स्‍विस बैंक के खाते मैनेज करने हैं। - हां ये तो है। मैंने इस बीच तुम्‍हारे म्‍यूजिक का, फिल्‍मों का और पिक्‍चर्स का सारा कलेक्‍शन देख लिया। म्‍यूजिक का कलेक्‍शन तुम्‍हारा बहुत अच्‍छा है। मैंने मार्क कर लिया है कि कौन-कौन सा लेना है। कुछ फिल्‍में भी। बेशक देखने सुनने का समय न मिल पाये लेकिन अहसास रहेगा कि तुमसे लिया है और मेरे पास है। ये कहते हुए अंजलि ने अपने पास ही मेरे लिए दो तीन तकिये रख दिये हैं। आओ समीर, अब जरा बताते चलो अपनी कहानी तस्‍वीरों की ज़ुबानी। मैं भी बेड की टेक लगा कर लैपटॉप के सामने हो गया हूं। हम दोनों बेहद नज़दीक हैं। इतने कि एक दूसरे की सांसों की आवाज़ तक सुनायी दे। उनके खुले बालों से तो महक आ ही रही है, उनके बदन से उठती खुशबू की अनदेखी नहीं कर सकता। किसी तरह खुद पर कंट्रोल करके हर तस्‍वीर के बारे में उन्‍हें बता रहा हूं। एक अच्‍छी बात ये हो गयी है कि उन्‍होंने लगभग सारी तस्‍वीरें पहले से देख रखी हैं। पिकासा में हर फोल्‍डर पर नाम लिखा है और फोटो लेने या सेव करने का महीना और वर्ष लिखा है। वे पूरी लगन से तस्‍वीरों में खोयी हुई हैं और मुझे उनके बदन की नज़दीकी परेशान कर रही है। अधलेटे होने की वजह से उनके कपड़े अस्‍त व्‍यस्त हो रहे हैं जिनके कारण खुद पर कंट्रोल करना मेरे लिए मुश्‍किल होता जा रहा है। मेरी कोई भी हरकत इस बेहतरीन रिश्‍ते को खत्‍म कर सकती है। मेरी ज़रा-सी जल्दबाजी मेरी सारी इज्‍ज़त मिट्टी में मिला देगी। नहीं, कमज़ोर नहीं पड़ना है। उठ कर पानी पीता हूं। बाथरूम जाता हूं। हाथ मुंह धो कर कुछ हालत संभली है। घड़ी देखता हूं। पौने दस। अंजलि से कहता हूं - क्‍या ख्याल है अंजलि, काफी आराम कर लिया है हमने। नीचे चलें क्‍या? - हां चलते हैं। बस एक मिनट। मैं चेंज करने के बाद पहले वाले पोर्शन में चला आया हूं ताकि अंजलि तैयार हो सकें। अंजलि तैयार हो कर आ गयी हैं। मैं देखता हूं अब उन्‍होंने बेहद ही खूबसूरत डिज़ाइनर टॉप और उतना ही खूबसूरत रैप अप डाला है। बेहद हलका मेकअप। मैं उनकी तरफ तारीफ भरी निगाह से देखता हूं तो उन्‍होंने मुस्‍कुरा कर नज़ाकत से अपना हाथ मेरी तरफ बढ़ा दिया है। हाथ चूमने के लिए। मैंने उनका हाथ चूमा है। हम दोनों नीचे आ गये हैं। अंजलि ने मेरा हाथ थामा हुआ है। स्‍टाफ मुस्‍कुरा कर हमारा स्‍वागत करते हैं। हम चलते हुए गार्डन से होते हुए बीच की तरफ आ गये हैं। वीक डे होने के कारण बहुत ज्‍यादा लोग नहीं हैं। समंदर अपनी पूरी मस्‍ती में है। दो तीन घंटे बाद फिर हाइ टाइड होगी और फिर समंदर पूरे उफान पर होगा। पूछा है अंजलि ने - क्‍या ख्याल है, बार में बैठें, गार्डन में या सीधे ही रेत पर? मैंने हंस कर कहा है - बार और गार्डन बार तुम्‍हारे शहर में भी होंगे और मेरे शहर में भी हैं। रेत पर बैठ कर ही हम शाम गुजारें तो कैसा रहे। बेशक हवा चल रही है। समंदर के किनारे बितायी गयी शाम हमेशा याद रहेगी। इतने में रेस्‍तरां मैनेजर ने आकर सलाम किया है। अंजलि से उससे ही पूछा है - अगर हम रेत पर ही बैठें तो खाने पीने का इंतजाम हो जायेगा क्‍या? उसने मुस्‍कुरा कर कहा है - श्‍योर मैडम। हम आपके लिए रेत पर ही आराम कुर्सियां लगा देते हैं। पीने का और खाने का इंतज़ाम हो जायेगा। हम आपके लिए फुट रेस्‍ट भी ले आयेंगे ताकि जब हाइ टाइड आये तो भी आप वहीं बैठे एन्‍जाय कर सके। दैट विल दी रीयल फन। बस दो मिनट आप दीजिये, मैं सारा इंतज़ाम कर दूंगा। वह रुका है - बाय द वे, आज की शाम आप कैसे सेलिब्रेट करना चाहेंगे? अंजलि ने मेरी तरफ देखा है। मैंने बताया है आप दिन में दो बीयर और हाफ वाइन पी चुकी हैं। - शट अप। ये शट अप मेरे लिए है। रेस्‍तरां मैनेजर से उन्‍होंने कहा है कि हम आज स्‍कॉच लेंगे। ग्‍लेनलिवेट है ना आपके पास? - यस मैम। वी हैव दिस ब्रैंड। - तो फिर आप तैयारी कीजिये, हम पाँच मिनट में टहल कर आते हैं। मैं हैरान हूं। विश्‍वास नहीं हो रहा कि अंजलि मेरठ जैसे कस्‍बायी शहर से आयी हैं। रहा नहीं जाता, पूछ ही लेता हूं - यार, गज़ब है तुम्‍हारी नॉलेज। तुम्‍हें ये भी पता है कि होटल के स्‍टॉक में कौन सी इम्‍पोर्टेड स्‍कॉच है। पहले सबसे अच्‍छा होटल ऑनलाइन बुक कराया, अब उनके बार की भी पूरी खबर....। - यार, निरे बुद्धू हो तुम। तुम जब सो रहे थे तो मैंने अपना सुइट ध्‍यान से देखा था। वहां एक मिनी बार भी है। वहीं रखी देखी थी मैंने ये स्‍कॉच और दूसरी कई वाइन बॉटल्‍स। फ्रिज भी भरा पड़ा था। जब सामने है तो चख कर देख भी ली जाये। फिर ये शाम कहां और हम तुम कहां? हम रेत पर नंगे पाँव टहल रहे हैं। कुल मिला कर बीच पर अँधेरा ही है। एक तरफ समंदर है और दूसरी तरफ होटलों की कतार। वहीं से जो रौशनी आ रही है, उसमें पानी पर रौशनी के कतरे अपनी चित्रकारी कर रहे हैं। बेहद रोमांटिक माहौल। मैं माहौल की तारीफ करना चाहता हूं लेकिन चुप हूं। जानता हूं कुछ भी कहूंगा तो अंजलि अभी ग्‍यारह टन का कोई बम मेरे सिर पर दे मारेंगी। मेरी उंगलियां अभी भी उनके हाथ में हैं। समंदर के किनारे हम दोनों के लिए महफिल सजा दी गयी है। चारों तरफ के घने अंधेरे का मुकाबला करने के लिए एक चिमनी में मोमबत्ती जला दी गयी है। हजारों मील लम्‍बे समंदर के आँगन वाला हमारा कैंडिल लाइट बार तैयार है। बेहद पुरसुकून शाम है ये। पीछे कहीं बजता मध्यम संगीत, सामने पानी में पीछे जलती रौशनियों की झिलमिलाती परछाइयां। अब पानी सरकते सरकते हमारे नज़दीक आने लगा है। अंजलि और मैं जैसे किसी ट्रांस में हैं। सूझ ही नहीं रहा कि इस पूरे माहौल को पूरी तरह से अपने भीतर कैसे उतारें। अंजलि ने अपनी कुर्सी खिसका कर मेरे करीब कर ली है ताकि फुसफुसा कर भी बात की जा सके। ये शाम मेरी ज़िंदगी की सबसे हसीन शाम है। स्‍कॉच अपना रंग दिखा रही है और इस रोमांटिक माहौल का नशा उस स्‍कॉच के नशे में जैसे घुल रहा है। हवा में खुनकी बढ़ गयी है और एक वेटर अंजलि को शॉल ओढ़ा गया है। मैंने अंजलि का हाथ थाम रखा है। उन्‍होंने कुछ नहीं कहा है। हम दोनों ही एक दूसरी दुनिया में हैं। हमने बहुत कम बातें की हैं। बस, एक दूसरे की मौजूदगी को महसूस किया है। स्‍कॉच थोड़ी सी ही बची है और खाना लगा दिया गया है। मैंने बहुत कम खाया है। ऐसे माहौल में खाना खाने की सुध ही किसे है। हम हैं और हमारी तरफ हाथ बढ़ाती अनगिनत लहरें हैं जो हर बार और नज़दीक आकर हमारे पाँव थपथपा रही हैं, मानो कह रही हों, इट्स वंस इन लाइफ एक्‍सपीरिंयस। बाट्म्‍स अप एंड एन्‍जाय अपटू द लास्‍ट ड्राप। रात के साढ़े बारह बज चुके हैं। थोड़ी देर में लहरें अपना सर उठाने लगेंगी और हमें या तो उनके लिए जगह खाली करनी होगी या फिर ...। अचानक अंजलि उठी हैं। ये मैं क्‍या देख रहा हूं। अंजलि ने कैंडल बुझा दी है। अब तब जो थोड़ी बहुत रौशनी थी, वह भी दम तोड़ गयी है। हम जहां पर बैठे हैं, घुप्‍प अंधेरा हो गया है, फिर भी मैं अंदाजा लगा पा रहा हूं कि अंजलि अपने कपड़े उतार रही हैं। इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाऊं या पूछ पाऊं, वे पूरी तरह से न्‍यूड हो कर सामने समंदर में समा गयी हैं। मैं थरथरा रहा हूं। ये मैं क्‍या देख रहा हूं। पानी में अंजलि का होना मैं महसूस कर पा रहा हूं। उससे ज्‍यादा कुछ नहीं। वे जैसे लहरों से मोर्चा ले रही हैं। उठना चाहता हूं, सोचना चाहता हूं लेकिन दोनों ही काम नहीं कर पाता। आंखें बंद कर लेता हूं। जैसे मैं एक लम्‍बी दौड़ पूरी करके आया हूं और कुर्सी पर निढाल पड़ गया हूं। उठने की हिम्‍मत ही नहीं रही है। पीछे मुड़ कर देखने की कोशिश करता हूं कि होटल का कोई स्‍टाफ तो नहीं देख रहा लेकिन नहीं देख पाता। और कितने रंग दिखायेगी ये मायावी अंजलि। सुबह से ही एक के बाद एक जादू दिखा रही हैं। अभी तो दो दिन बाकी हैं। अभी तो रात बाकी है। मेरे गले में जैसे कांटे उग आये हैं। गिलास की सारी स्‍कॉच एक ही घूँट में गले से नीचे उतारता हूं। महसूस कर रहा हूं कि वे हर आती और बड़ी होती जाती लहर से टकराती हैं, गिरती हैं और फिर उठ खड़ी होती हैं। लगता है, अंजलि लौट आयी हैं और अब कपड़े पहन रही हैं। मैंने आंखें बंद कर ली हैं। मेरा कंधा थपथपाया है अंजलि ने - अब चलें। मैं जैसे सपने से जागा हूं। उठने की कोशिश करता हूं लेकिन आराम कुर्सी से उठ नहीं पाता। इतना याद है कि अंजलि ही सहारा दे कर मुझे कमरे तक लायी थीं। • अचानक झटके से मेरी आँख खुली है। सिर भारी है। पता नहीं कितने बजे हैं। खिड़की की तरफ देखता हूं। समंदर शांत है और दूर लंगर डाले या चल रहे जहाजों की पांत नज़र आ रही है। मेरा पूरा शरीर तन रहा है। याद करने की कोशिश करता हूं। सोने से पहले क्‍या हुआ था और मैं कमरे में कैसे आया। इतना ही याद आता है कि अंजलि मुझे सहारा दे कर कमरे तक लायी थी। अंजलि.. अंजलि.. धीरे धीरे सारी इमेजेज सामने आ रही है। सौ की रफ्तार से नेशनल हाइवे पर चल रही कार में फ्रंट सीट पर बैठ कर टी शर्ट उतार कर ब्रा उतारना और दोबारा टी शर्ट पहनना, हाइवे पर गाड़ी रोक कर मुझे गले लगाना और अंधाधुंध चूमना, नाश्‍ते में बीयर लेना और फिर सौ की स्‍पीड से गाड़ी चलाना, और सुनसान बीच पर रात के अंधेरे में पूरी तरह न्‍यूड हो कर हरहराते समंदर से मिलने जाना। बेहद खूबसूरत हैं अंजलि। लैपटॉप पर तस्‍वीरें देखते हुए उनका मेरे बेहद नजदीक होना। कपड़े अस्‍त व्‍यस्‍त हो जाने के कारण उनके खूबसूरत और गठी हुई देह की झलक मिलना। मुझसे मिलने, मेरे साथ हॉलीडे मनाने इतनी दूर से आयी हैं अंजलि। यू आर... यू आर ग्रेट अंजलि। आइ लव यू अंजलि.. लव यू .. आइ नीड यू अंजलि.. अंजलि आइ नीड यू..। मेरी शिरायें तन रही हैं। उठ बैठता हूं। पानी पीता हूं। अंजलि मैं कमज़ोर नहीं पड़ना चाहता लेकिन इतना मज़बूत भी नहीं हूं कि इतने खुले इन्‍वीटेशन को ठुकरा दूं। अंजलि.. मुझे समझने की कोशिश करना। मैं तो आपको समझ नहीं पाया। उठ कर अंजलि के कमरे में जाता हूं। नाइट लैम्‍प की हल्की रौशनी है। वे करवट ले कर सोयी हुई हैं। पता नहीं मैं नशे में हूं इसलिए वे ज्‍यादा खूबसूरत लग रही हैं या वे खुद नशे में हैं इसलिए ज्‍यादा खूबसूरत लग रही हैं या दोनों का नशा। समंदर में उतरती उनकी नग्न काया मैंने अभी थोड़ी देर पहले ही तो इतने पास से देखी है.. महसूस की है। अब मेरे सामने हैं अंजलि। मैं तुम्‍हारे बिना नहीं रह सकता अंजलि। तुम मुझे जिस मोड़ पर ले कर आयी हो, वहां से मैं खाली हाथ नहीं लौट सकता। मैं जल रहा हूं। मैं पिघल रहा हूं। मैं मर जाऊंगा। एक झटका लगा है। मैं ये क्‍या कर रहा हूं। ये गलत है। कमज़ोर नहीं होना। वादा किया है अंजलि से। लेकिन अंजलि तुम खुद ही तो मुझे कमज़ोर करने के लिए एक के बाद एक जादू दिखा रही हो। क्‍या करूं मैं .. । जो होता है होने दो। देखा जायेगा। मैं अंजलि के बेड के पास जमीन पर बैठ गया हूं। उनकी तरफ हाथ बढ़ाता हूं। इससे पहले कि मैं उन्‍हें छू पाऊं, अंजलि उठी हैं। मुझे सहारा दे कर उठाया है और मेरा हाथ थामे हुए बिना एक भी शब्‍द बोले मुझे मेरे बिस्‍तर तक ला कर लिटा दिया है। थोड़ी देर तक मैं अपने माथे पर उनके हाथ का नरम स्पर्श महसूस करता हूं। और धीरे धीरे... नींद के आगोश में..। • सुबह अंजलि ने ही जगाया है। चाय के लिए। मैं अंजलि की तरफ देखता हूं। वे भेद भरी मुस्कुराहट के साथ गुड मार्निंग कहती हैं। मैं वाशरूम हो कर आता हूं। खिड़की के पास वाले सोफे पर बैठी हैं अंजलि। वे चाय का प्‍याला मेरी तरफ बढ़ाते हुए पूछती हैं - रात कैसी कटी बाबू? उनके संबोधन से मुझे रात की हरकत याद आती है। मैंने सिर झुका लिया है। क्‍या कर बैठा था मैं कल रात नशे की झोंक में। - कोई बात नहीं, हो जाता है। मैंने कहा था ना कि तुम्हें कमज़ोर नहीं पड़ने दूंगी। मैं अंजलि से नज़र ही नहीं मिला पा रहा हूं। किसी प्रिय की निगाहों में गिरना और खुद की निगाहों में गिरना - दोनों चीज़ें मेरे साथ एक साथ हो रही हैं। मैं उनकी आंखों में शरारत देख रहा हूं। खुद पर गुस्सा आ रहा है, मैं ऐसा क्‍यों कर गया। वे पूछती हैं - और चाय लोगे? उनके सामने से हटने का यही तरीका है कि अब चाय मैं बनाऊं वरना उनके सामने बैठा रहा तो झुलस जाऊंगा। मैं चाय बनाने के लिए उठता हूं। अंजलि कह रही हैं - ब्रेकफास्‍ट के बाद ज़रा घूमने चलेंगे। वैसे भी अरब महासागर महाराज अभी आराम फरमा रहे हैं। मुझे अच्‍छा लगा है कि अंजलि ने खुद ही टॉपिक बदल दिया है। मैं चाय ले कर आया हूं। अब हम एक दूसरे के ठीक सामने बैठे हैं। एक ही तरीका है रात की बात हमेशा के लिए खत्‍म करने का कि मैं खुद ही रात की बात करूं और मामला रफा दफा करूं। - रात कुछ ज्‍यादा ही हो गयी थी मुझे। यही तरीका है कि मैं अपनी हरकत के लिए उनकी शराब और उनके ओपन इन्‍वीटेशन को ही दोषी ठहरा दूं। - बहुत ज्‍यादा तो नहीं जनाब बस इतनी कि हम खुद आपके बराबर ही पीने के बाद आपको सहारा देकर कमरे तक लाये थे, आपको आराम से सुलाया था। लेकिन क्‍या कहें.. उन्‍होंने ठंडी सांस भरी है - लेकिन क्‍या कहें आपके हसीन नशे का। उतरने का नाम ही नहीं लेता था। पहले आधी रात को आपको हमारे पास लाया, हमने दोबारा आपको आपके बिस्‍तर पर लिटाया, आपके सो जाने के बाद हम वापिस आये तो भी आपके नशे ने आपको सोने कहां दिया। आप रात भर जागते रहे। कभी खिड़की पर खड़े हो रहे हैं तो कभी बाथरूम जा रहे हैं। कभी उठ रहे हैं तो कभी बैठ रहे हैं। लगता है अंजलि मेरी धुलाई करके ही छोड़ेगी। कहां तो मैंने टॉपिक बंद करने के लिहाज से शुरू किया था और ये तो उसी के बखिये उधेड़ने लगीं। पूछता हूं - आपको कैसे पता? - जनाब, हमें नहीं तो किसे पता होगा। आपकी हरकतों न हमें भी सारी रात जगाये रखा। उन्‍होंने जान बूझ कर उबासी ली है और अपने मुंह के आगे चुटकी बजायी है - हमें तो अभी भी नींद आ रही हैं। मैंने कुढ़ कर कहा है - तो रोका किसने है। सो जाइये, वैसे भी हमें कौन सा काम करना है। वे चहकी हैं - इतना आसान है सोना? कहीं आपके भीतर का शेर फिर जाग गया तो? मुझे कोई उत्तर नहीं सूझा है कि इस तीखी बात का क्‍या जवाब दूं। कहता हूं - शेर को अपना चौकीदार बनायेंगी तो ये खतरे तो रहेंगे ही। मेरा जवाब सुन कर वे तपाक से उठी हैं और ताली बजा कर मेरी तरफ बढ़ी हैं - क्‍या तीर मारा है मेरे शेर ने। खुश कर दित्‍ता। आ तुझे गले से लगा लूं मेरे शेर और वे सचमुच मेरे गले से लिपट गयी हैं। चलो इस बात पर एक और चाय हो जाये। मुझे सुकून मिला है कि सारा मामला हैप्‍पी ऐंडिंग के साथ निपट गया है। तय करता हूं आज दिन भर नहीं पीऊंगा। रात की रात को देखेंगे। • हम दिन भर खूब घूमे हैं। पैदल। एक एक दुकान में जा कर झांकते रहे। अंजलि ने ढेर सारी चीज़ें खरीदीं और सारी चीज़ें आखिरी दुकान में दे दीं कि होटल पहुंचवा दें। खाना भी हमने एक सरदार जी के ढाबे में खाया है। सबसे ज्‍यादा वक्‍त वहीं गुज़ारा। वहां बिछी चारपाई पर पसरे रहे और अंजलि सरदार जी से घर परिवार की बातें करती रही। पता चला कि सरदार जी की पचास बरस पहले यहीं पर स्‍पेयर पार्ट्स की दुकान थी। लेकिन जब देखा कि नार्थ इंडियंस यहां आकर खाने के लिए बहुत परेशान होते हैं तो पंजाब से अपने एक परिचित कुक को बुलवा कर ये ढाबा खोल लिया। अंजलि ने जब पूछा कि अपने घर से इतनी दूर घर वालों की याद नहीं आती तो बुजुर्ग सरदार जी मुस्‍कुरा कर बोले - ना जी, रब्ब की मेहर है। दमन और सिलवासा के ज्‍यादातर ढाबे मेरे बच्‍चों और भाइयों के ही हैं। एक एक करके सबको यहीं बुला लिया है। सुन कर हम खूब हंसे हैं। इसे कहते हैं असली इंटरप्रेनुअरशिप। • हम चार बजे वापिस पहुंचे हैं। कमरे में आते ही अंजलि पलंग पर पसर गयी हैं। उनका खरीदा सारा सामान आ चुका है। मैं फ्रिज खोल कर देखता हूं कि पीने के लिए नॉन एल्‍होकोलिक क्‍या रखा है। मैं अपने लिए रेड बुल का कैन निकालता हूं। अंजलि से पूछता हूं - लोगी? वे चिढ़ जाती हैं - क्‍या लेडीज़ ड्रिंक पी रहे हो। कुछ बीयर शीयर हो तो दो। मैं उन्‍हें स्‍ट्रांग बीयर का कैन थमाता हूं। वे हंसती हैं। क्‍या ज़माना आ गया है। मर्द लेडीज़ ड्रिंक पी रहे हैं और लेडीज बेचारी... च्‍च्‍च..। मैं उन्‍हें आंखें दिखाता हूं - बताऊं क्‍या? वे हंसती हैं - क्‍या खा के और क्‍या पी के बताओगे श्रीमन? हम दोनों समंदर को निहार रहे हैं। हाइ टाइड आ कर जा चुकी। लेकिन महासागर का विस्‍तार हमेशा बांधता ही है। जितनी देर देखते रहो, कभी ऐसा नहीं लगता कि हम और न देखें। अंजलि गुनगुना रही हैं। पूछती हैं - कुछ सुनोगे? मैं कहता हूं - नेकी और पूछ पूछ। हम बहुत अच्‍छे श्रोता हैं, बस हमें बदले में कोई गाने के लिए न कहे। अंजलि सचमुच बहुत अच्‍छा गा रही हैं। बहुत सारे ऐसे पुराने और बीते दिनों के गीत गाये हैं कि मैं हैरान हूं कि ये सारे गीत अंजलि की स्‍मृति का हिस्‍सा कब और कैसे बने होंगे। अंजलि तीस बत्तीस बरस की, या बहुत हुआ तो चौंतीस बरस की होंगी। लेकिन वे जो गीत गा रही हैं, सब के सब छठे सा सातवें दशक के हैं। उनके गीत सुनते सुनते कब शाम ढल गयी, पता ही नहीं चला। • आज डिनर के लिए अंजलि ने लॉंग स्‍कर्ट पहना है। समझ सकता हूं। वे घर से तो गोवा के लिए निकली थीं, वहां के हिसाब से कपड़े रखे होंगे। गोवा तो गोवा में ही रह गया, मंजिल दमन बन गयी। हम गार्डन रेस्‍तरां में ही बैठे हैं। समंदर ज्‍यादा दूर नहीं है। हाथ बढ़ा कर छू लो। अंजलि ड्रिंक्‍स के लिए मीनू देख रही हैं। मैं उन्‍हें देख रहा हूं। वे मीनू देखते हुए भी मेरा देखना ताड़ गयी हैं। ड्रिंक्‍स के लिए ऑर्डर देने के बाद उन्‍होंने मेरी तरफ देखा है - अब क्‍या है? - कुछ खास नहीं, बस एक रिक्‍वेस्‍ट है। - कह डालो। - कल रात की तरह समंदर से सीधे मुलाकात करने आज मत जाना। - बस यही या और कुछ? - यही मान लो तो बंदा जनम जन्मांतर के लिए आभार मानेगा। - तो श्रीमान आप इसके बदले मुझे कुछ कहने की इजाज़त देंगे? - कहो ना। - इस तरह से मना करने की वजह? वैसे इस बात की कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। - मना करने की कोई खास वजह नहीं। तुम्‍हें इस तरह से हाइ टाइड की लहरों में घुसते देख कर डर गया था। कहीं कुछ हो न जाये। - हां वैसे भी तुम इतने नशे में थे कि मुझे बचाने के लिए पानी तक आने की सोच भी नहीं सकते थे। कुर्सी से उठ तक नहीं पाये। भूल गये कि कमरे तक भी मैं ही लायी थी। मुझे अंजलि ने फिर मेरी ही बातों में फंसा लिया है। कम्‍बख्‍त हर बात की काट है इनके पास। क्‍या जवाब दूं। अंजलि ने ही बात संभाली है - दरअसल तुम अचानक सोच ही नहीं पाये थे कि मैं कुछ ऐसा भी कर सकती हूं। सुबह से एक के बाद एक झटके दे रही थी और ये झटका तुम्‍हारे लिए इतना बड़ा था कि तुम्‍हारे होश ही उड़ गये। एक परायी शादीशुदा और पहली ही मुलाकात में क्या क्‍या खेल दिखा रही है। बात तो अंजलि सही ही कह रही है। मैं सुबह से मिल रहे झटकों में ही डूब उतरा रहा था और रात वाला झटका तो मेरी नसों तक में उतर गया था। मैंने अंजलि को मनाने की कोशिश की है - अब रात गयी बात गयी। अपनी बात पूरी करो ना। - दरअसल मुझे समझ नहीं आ रहा कि शुरू से शुरू करूं। अपनी बात आज से शुरू करके वहां तक पहुंचाऊं जहां से ये दौड़ शुरू की थी या पीछे से आज तक की यात्रा करूं। बात लम्‍बी है और पूरी बात करने में समय लगेगा। - कहीं से भी शुरू करें, शाम अपनी है। - ओके, दरअसल मैंने तुम्‍हें अपने बारे में बहुत कम बताया है। तुम्‍हें क्‍या, किसी को भी मेरे बारे में कुछ भी नहीं पता। कल से तुम एक चुलबुली, बेलौस, खिलंदड़ी और एक्‍स्‍ट्रा मॉड लड़की से ही मिल रहे हो जो नेशनल हाइ वे पर चलती गाड़ी में अपनी ब्रा उतार सकती है, खूब पीती है, बीयर के साथ ब्रेकफास्‍ट करती है। फाइव स्‍टार होटल में ठहरते हुए एक पराये मर्द के सामने समंदर में नंगे बदन उतर जाती है और इसी तरह की हरकतें करती रहती हैं और हां, अपने फेसबुक फ्रेंड के साथ अपनी पहली ही मुलाकात में यादगार हॉलीडे मनाने के लिए दमन तक चली आती है और एक ही कमरे में ठहरती है। - हां जितना देखा और जाना है उससे तो यही इमेज बनती है। - तुम्‍हें पता है ना समीर कि मैं गोवा जाने वाली थी। एक दिन हमारी ऑफिशियल मीट रहती और दो दिन हमारे मज़े मारने के लिए इंतज़ाम था। कम से कम 100 लोग होते वहां लेकिन मैं अगली सुबह यानी मीट के अगले दिन ही गायब हो जाने वाली थी और सीधे कलंगूट बीच पर पहुंच जाती। तुम जो जानते ही हो कि कलंगूट बीच पर दुनिया भर से आये लोग दिन रात बीच पर ही नंग धड़ंग पड़े रहते हैं। मन होता है तो पानी में उतर जाते हैं और फिर आ कर बीच पर लेट जाते हैं। मैं भी यही करने वाली थी लेकिन वहां नहीं जा पायी और यहां आ गयी। जितना कर सकी, किया और आज भी करती लेकिन अब तुमने आज के लिए मना कर दिया तो यही सही। आखिर मर्द जात हो ना, कैसे सहन कर पाते। - कहती चलो। - दरअसल ये एक तरीका होता है। नेचर से, प्रकृति से सीधे इंटरेक्‍ट करने का। सीधे साक्षात्कार करने का। प्रकृति को इन्‍वाइट करो कि वह पूरी शिद्दत के साथ, पूरी खूबसूरती के साथ अपने सारे कीमती उपहार आपको सौंपे। आपके पोर पोर को निहाल कर दे। ये काम मैंने कई बार किये हैं समीर। धूप के साथ, बरसात के साथ, चाँदनी के साथ। मंद मंद बहती ठंडी हवा के साथ। मैंने कई कई रातें झिलमिल तारों की संगत में नंगे बदन गुजारी हैं। - वाह। वो कैसे भला? - अपने घर की छत पर। मैंने अपने घर की एक छत ऐसी बनवा रखी है जहां कोई नहीं झांक सकता। चारों तरफ के घरों से सबसे ऊंची छत, जहां मैं होती हूं और खुला आसमान होता है। मेरा रूफ गार्डन है। मेरी पसंद के दुनिया भर के बेहतरीन फूलों का साथ होता है वहां। ये आसमान मेरा अकेलेपन का बेहतरीन दोस्‍त है। सर्दियों में वह मुझे भरपूर धूप का उपहार देता है, बरसात में पवित्र जल का उपहार मुझे मिलता है और कई बार ऐसा भी हुआ है कि मैंने चांदनी रात में पूरी पूरी रात चाँदनी को अपने नंगे बदन का स्पर्श करने दिया है। तब मैं होती हूं और मेरे ऊपर खुला आसमान होता है। मैं बहुत लकी हूं कि मुझ पर नेचर खुले हाथों अपना खजाना लुटाती है और जब मैं छत से नीचे आती हूं तो पहले से और अमीर हो जाती हूं। - ग्रेट। लेकिन अंजलि, तुमने ये सब सीखा कहां से? मेरठ जैसे शहर में मैं सोच भी नहीं सकता कि तुम इतनी ऐय्याशी का जीवन जी रही हो। हमारे ड्रिंक्‍स आ गये हैं। आज अंजलि ने वोदका मंगायी है। चीयर्स करते हुए अंजलि कह रही है - अरे मुझे ये सब सीखने के लिए कहीं नहीं जाना पड़ा। बस होता चला गया। बेशक यहां तक की यात्रा बेहद मुश्‍किल और इतनी तकलीफों से भरी रही कि तुम सुनोगे तो दांतों तले उँगली दबा लोगे। - यात्रा के बारे में बाद में बताना, जो बता रही हो, ज्‍यादा रूमानी है। वही बताती चलो। - तो सुनो एक शब्‍द होता है सेल्‍फ एक्‍चुअलाइजेशन। हिंदी में इसे पता नहीं क्‍या कहेंगे। लेकिन मैंने अपने जीवन में इसकी सारी अच्‍छी अच्‍छी बातों को उतार लिया है। ये ही मेरी जीवन शक्ति है। इस अकेले शब्‍द ने मेरी ज़िंदगी बदल कर रख दी है। वरना मैं कहां थी, ये सोच के ही मेरी रूह कांप जाती है। - मैंने इसके बारे में कभी गहराई से जानने की कोशिश नहीं की। बेशक तुम्‍हारी वॉल पर इस तरह की चीजें अक्‍सर नज़र आती थीं और हमेशा और ज्‍यादा जानने की इच्‍छा रही। कभी हो नहीं पाया। देखो आज कितना अच्‍छा मौका मिला है, तुम खुद बता रही हो। - ज्‍यादा चमचागिरी करने की ज़रूरत नहीं। जो मिला है उससे ज्‍यादा कुछ मिलने वाला नहीं और जो नहीं मिला है, वह मिलने वाला नहीं। वे इतरायी हैं। - अरे तुम तो बातों को फालतू में गलत मोड़ दे रही हो। इस अरब महासागर की कसम खाता हूं कि मेरी नीयत बिलकुल साफ है और अगले कई दिन तक साफ ही रहने वाली है। - बनो मत और बको मत। मेरे सामने जब पहली बार ये शब्‍द आया तो मैं इसका मतलब नहीं जानती थी। डिक्‍शनरी में ज्‍यादा मदद नहीं मिली। तब घर पर कम्प्यूटर या नेट नहीं था। ये शब्‍द था कि मेरा पीछा ही नहीं छोड़ रहा था। कुछ था इस शब्‍द में जो मुझे इन्‍वाइट कर रहा था। जानो मुझे। आखिर मैं एक साइबर कैफे में गयी तो गूगल और विकीपीडिया से इसके बारे में विस्‍तार से पता चला। सब कुछ नोट किया, समझा और उस पर खूब मनन किया। फिर तो जहां से भी इस शब्‍द के बारे में जो भी मिला, उसे समझने की कोशिश की। अंजलि बात करते करते जैसे अतीत में चली गयी हैं - इस फिलासफी की एक एक बात को अपने जीवन में उतारने की कोशिश की और आज मैं जो भी हूं, इस अकेले शब्‍द की माया की वजह से हूं। मैं हंसा हूं - थोड़ा सा गुरू ज्ञान इधर भी दें भगवन ताकि हमारा जीवन भी संवर जाये। कब से भटक रहे हैं। - सेल्‍फ एक्‍चुअलाइजर वह व्‍यक्‍ति होता है जो अपने जीवन को रचनात्मक तरीके से, क्रिएटिवटी के साथ जीता है और अपनी क्षमताओं का भरपूर इस्‍तेमाल कर बेहतर तरीके से जीने की कोशिश करता है। वह ऐसी सोच रखता है कि वह जो काम कर सकता है, उसे ज़रूर करे। - वेरी इंटरेस्‍टिंग। कहती चलो। - इस बात की कई परतें हैं जो एक एक करके खुलती हैं। मैं बहुत थोड़े शब्‍दों में बताऊंगी। अंजलि ने वेटर को अपना गिलास भरने का इशारा किया है। मैं हैरान हूं कि कल मैं जिस अंजलि का रूप देख रहा था, उससे बिल्‍कुल अलग रूप में अंजलि मेरे सामने बैठी शराब की चुस्कियां लेते हुए जीवन के गूढ़ रहस्यों पर इतने अधिकार के साथ बात कर रही है। अंजलि ने बात आगे बढ़ायी है - ये मेरे इंटरप्रेटेशनंस हैं। शब्‍दों का हेर फेर भी हो सकता है। मैंने जिस रूप में समझा और अपने जीवन में ढाला, वही बता रही हूं। - मैं समझ रहा हूं। - जैसे वास्तविकता को सही नज़रिये से समझना और स्‍वीकार करना, अपने को, दूसरों को और सबसे बड़ी बात प्रकृति को, नेचर को सहज भाव से स्‍वीकार करना। जो जैसा है, उसे वैसे ही स्‍वीकार करना। ये सबसे मुश्‍किल होता है लेकिन एक बार सध जाये तो क्‍या कहने। - वाह, क्‍या खूब। आगे। - अपने अनुभव और जजमेंट पर भरोसा करना। - हमम। - जो करो सहज तरीके से करो और बिना आगा पीछा सोचे हुए करो। जिसे स्‍पांटेनियस कहते हैं। खुद के प्रति ईमानदार रहो। - जैसे? - साफ है कि जब हम किसी को धोखा देते हैं तो दरअसल खुद को धोखा दे रहे होते हैं। हम वही करें जो हमें रुचे। हम ये न देखें कि लोग क्‍या कहेंगे। मैं हंसा हूं - मैं समझ रहा हूं। कल से देख ही रहा हूं। - जो भी करें, पूरे मन से और पूरी तरह से डूब कर करें। - हर हाल में अपने स्‍व को बचाये रखें, तारीफ में कंजूसी न करें। जो भी संबंध बनायें इतने गहरे हों कि बस। एकांत का मजा लेना सीखें। एकांत बहुत सुकून देता है। आपमें गजब का सेंस ऑफ हयूमर होना चाहिये। उससे किसी को हर्ट न करें। जो भी अनुभव लें, वे खांटी हों, बेहतरीन हों। पूरी तरह डूब कर अनुभव बटोरें। सामाजिक रूप से आप स्वीकार्य हों। एक कहावत है मेक यूअर प्रेजेंस ऑर एबसेंस फैल्‍ट। आप इन्‍सान तो हैं ही आपमें इन्‍सानियत भी हो। और सबसे आखिरी और अहम बात, आपके थोड़े से दोस्‍त हों। वे आपके इतने करीब हों कि आप उनके साथ हों तो कम्‍फरटेबल हों। दोस्‍तों के नाम पर भीड़ जमा करने का कोई मतलब नहीं होता। - तो बंधु ये ही वे बातें हैं जिन्‍हें मैंने अपने जीवन में ढालने की कोशिश की है और अपने आपको कई कई बार मरने से बचाया है। - बहुत खूब। मैं अपनी जगह से उठा हूं और अंजलि के पास जा कर उसे उठने का इशारा किया है। मैंने अपनी तरफ से उन्‍हें पहली बार गले लगाया है। - अंजलि थोड़ी देर पहले तक मैं तुम्‍हें जिस रूप में देख रहा था, दस मिनट की इस बातचीत ने तुम्‍हारा एक नया ही चेहरा मेरे सामने पेश किया है। मैं बेशक तुम्‍हें पिछले एक बरस से तो जानता ही रहा होऊंगा लेकिन फेसबुक पर तुम्‍हारा ये रूप कभी सामने नहीं आया था। - फेसबुक चैट की एक सीमा होती है समीर। वहां आप थोड़ी देर के लिए, मन बहलाव के लिए, रोज़ाना की तकलीफ़ों से निजात पाने के लिए या रूटीन से बदलाव के लिए आते हैं। जीवन के गूढ़ रहस्यों की बात करेंगे तो आप इतने शानदार सोशल मीडिया प्‍लेट फार्म पर भी अकेले रह जायेंगे। - सही है। शायद इसी वजह से हमारी से मुलाकात इतनी शानदार और यादगार रहने वाली है। एक बात बताओ अंजलि, थोड़ी देर पहले तुमने कहा था कि बेशक यहां तक की तुम्‍हारी यात्रा बेहद मुश्‍किल और इतनी तकलीफों से भरी रही कि मैं सुनूंगा तो दांतों तले उँगली दबा लूंगा। तो मोहतरमा, ये दांतों तली उँगली दबाने का मौका आज मिलेगा या कल के लिए रिज़र्व रखें इसे? - समीर सच कहूं तो मैंने अपनी ज़िंदगी की किताब कभी भी किसी के सामने नहीं खोली है। कोई ऐसा मिला ही नहीं जिसे ये सब बताती। जिसे भी बताती वह मुझ पर तरस ही खाता जो मुझे मंजूर नहीं है। अब शायद तुम्‍हारे सामने ही ये किताब खुलेगी लेकिन अभी नहीं। ड्रिंक्‍स और डिनर के बाद हम कल की तरह रेत पर कुर्सियां डाल कर बैठेंगे। नो कैंडिल लाइट। तब हम तुम्‍हें अपनी कहानी सुनायेंगे। अँधेरा मेरी मदद करेगा। और उन्‍होंने अपना ड्रिंक रीपीट करने का इशारा किया है। • जिस वक्‍त रेत पर हमारी कुर्सियां लगायी गयी हैं बारह बज रहे हैं। अचानक अंजलि ने वेटर को बुलवाया है और एक पैकेट सिगरेट और लाइटर लाने के लिए कहा है। हमम। मैं मुस्‍कुराता हूं - इसी की बस कमी थी। अंधेरे में अंजलि सामने विशाल समंदर की बार बार पास आती और सिर पटक कर लौट जाती लहरों की तरफ देख रही हैं। जैसे खुद को अपनी कहानी सुनाने के लिए तैयार कर रही हैं। सिगरेट मंगवाना भी उसी तैयारी का हिस्‍सा है। उन्‍होंने सिगरेट सुलगायी है और पहला कश लगाया है - 17 बरस की थी जब देसराज के घर से मेरे लिए रिश्ता आया था। देसराज मेरे पति का नाम है। इस नाम ने और इस नाम के शख्‍स ने कभी मेरे कानों में घंटियां नहीं बजायीं। तुमने तालस्‍ताय का उपन्‍यास अन्‍ना केरेनिन्‍ना पढ़ा होगा। उस महान उपन्‍यास में अन्‍ना पहले ही पेज पर कहती है कि लोग अपने पार्टनर को उसकी सारी खराबियों के बावजूद प्‍यार करते हैं लेकिन मेरी तकलीफ ये है कि मैं अपने पति को उसकी सारी अच्छाइयों के बावजूद प्‍यार नहीं कर पाती। - समीर मेरी भी यही तकलीफ है। मैं कभी देसराज को प्‍यार नहीं कर पायी और न ही मुझे ही उस शख्‍स का प्‍यार मिला। तो मैं अपनी शादी का किस्‍सा बता रही थी। मैं नाबालिग थी लेकिन इतनी समझ ज़रूर थी कि इतनी कम उम्र में शादी नहीं करनी चाहिये लेकिन मेरे माता पिता के सामने कुछ ऐसी मज़बूरी आन पड़ी थी कि वे चाह कर भी इस रिश्ते को ठुकरा नहीं सकते थे। मेरे पापा कस्‍बे के हाई स्कूल के हेडमास्टर थे। हमारा घर भी कस्‍बे और गांव के बीच सी किसी जगह में था। - कुछ दिन ही पहले हमारे घर में एक बहुत बड़ा हादसा हो गया था जिसकी वजह से देसराज जी के घर से आए शादी के प्रस्‍ताव को किसी भी कीमत पर ठुकराया नहीं जा सकता था। मेरे इकलौते मामा की हत्या कर दी गई थी और मेरी मामी अपने दो बच्चों के साथ हमारे ही घर पर आने को मज़बूर हो गयी थी। - इतने अच्‍छे घर बार से आया रिश्‍ता देख कर मम्मी पापा ने अपने सिर जोड़े थे और तय किया था कि बिना दूल्‍हे को देखे होने वाली शादी को स्वीकार कर लिया जाए। इस गणित से बहुत सारे समीकरण हल होते थे। अच्‍छा खासा घर बार था। दहेज की कोई मांग भी नहीं थी और शादी का सारा खर्चा लड़के वाले करने वाले थे। हंसी आती है समीर कि हमारे यहां दूल्‍हा हमेशा लड़का ही रहता है। ये बात मुझसे छुपा ली गयी थी कि ये लड़का देसराज जो जिससे मैं ब्याही जा रही थी, 31 बरस का था और मुझसे 14 बरस बड़ा था। मैं सत्रह बरस की भी नहीं थी और ग्यारहवीं में पढ़ रही थी। मेरी एक भी नहीं सुनी गयी थी और मेरी शादी कर दी गयी थी। मेरी ससुराल वालों ने मेरे बहुत जोर देने पर इतना वादा जरूर किया था कि मुझे पढ़ाई जारी रखने देंगे। - और हम ब्याह दिये गये थे। इस विवाह से दो अपराध एक साथ हुए थे। एक तो बाल विवाह और दूसरे मेरे नाबालिग होने के कारण देसराज का मुझसे शारीरिक संबंध। नाबालिग लड़की से शारीरिक संबंध, चाहे वह आपकी पत्नी जो न हो बलात्कार ही तो कहलायेगा। सुहागरात के समय ही मैंने देसराज को देखा था। न तो इस शादी में ऐसा कुछ था जो मुझे पसंद आता और न ही देसराज में ही ऐसा कुछ था जो मुझे बांधता। - मेरा भरा पूरा ससुराल था। सास ससुर, दो जेठ जेठानियां,ननदें। बड़ी जेठानी की घर में चलती थी क्‍योंकि उनका एक बेटा था। मुझसे बड़ी जेठानी की दो लड़कियां थी। संयुक्त घर और संयुक्त खानदानी कारोबार। मेरा बहुत अच्‍छे से स्‍वागत हुआ था। बेहद सुंदर जो थी मैं। पता चला था कि मुझसे पहले देसराज कम से कम 50 लड़कियां रिजेक्‍ट कर चुका था। मेरा बस चलता तो हर बार मैं ही उसे 50 बार रिजेक्‍ट करती। घर में सबसे छोटी होने के कारण सबकी सेवा करने का अनकहा भार मुझ पर आ पड़ा था। अपने घर में काम करने की आदत थी तो निभ जाता था। - तभी मेरे साथ दूसरा हादसा हुआ था। अपने अठारहवें जन्मदिन से एक दिन पहले मेरा मिसकैरिज हुआ था। पूरे परिवार को लकवा मार गया था। सबसे बड़ी जेठानी का इकलौता बेटा आवारा था और मुझसे बड़ी जेठानी की दो लड़कियां थीं और अब दोनों ही और बच्‍चे पैदा करने की उम्र लगभग पार कर चुकी थीं। परिवार की सारी उम्‍मीदें मुझ पर थीं और...। तभी अंजलि ने पीछे मुड़ कर देखा है। थोड़ी दूर अंधेरे में एक वेटर एक ट्रे हाथ में लिये खड़ा है - पता नहीं किस चीज की जरूरत पड़ जाये। अंजलि ने बेहद स्‍नेह से मुझसे कहा है - यार उससे कहो कि हमें कुछ नहीं चाहिये। यहां इस तरह से ड्यूटी बजाने की ज़रूरत नहीं है। बेशक जाने से पहले एक शॉल दे जाये। एक काम और करना समीर। उसे या किसी और को लाने के लिए मत कहना। खुद जा कर मेरे लिए व्‍हिस्‍की का एक एक्‍स्‍ट्रा लार्ज पैग नाइंटी एमएल विद सोडा लेते आओ प्‍लीज। और सुनो, अपने लिए मत लाना। तुम्‍हारी लिमिट मेरी लिमिट से कम है। डोंट टार्चर यूअर सेल्‍फ। बहुत प्‍यास लगी है डीयर। करोगे ना मेरा इतना सा काम। मैं उठा हूं। इस समय अंजलि मुझे बेहद खूबसूरत, मासूम और निरीह बच्‍ची लग रही है जिसे आँचल में छुपा लिया जाना चाहिये। मैं उसका कंधा थपथपाता हूं। इट्स ओके। अभी लाता हूं। • मैंने अंजलि को अच्‍छी तरह से शॉल ओढ़ा दी है। उन्‍होंने व्‍हिस्‍की का गिलास थामते हुए मुझे अपनी कुर्सी उसकी कुर्सी के नज़दीक करने का इशारा किया है। अपना हाथ बढ़ाया है। मेरा हाथ थामने के लिए। मेरा हाथ उन्‍होंने अपनी गोद में रखकर अपने हाथ में थाम लिया है। एक लम्‍बा घूँट ले कर अंजलि ने कहना शुरू किया है - ऐसे कठिन समय में मुझे अपने पति की तरफ से हर तरह के मानसिक और भावनात्मक संबल की ज़रूरत थी और वही मुझसे दूर जा कर खड़ा हो गया था। यहां तक कि उसने मुझसे बात तक करनी बंद कर दी थी जैसे मिसकैरिज करके मैंने उसके खानदान के प्रति कोई अपराध कर दिया हो। वह जानबूझ कर काम के सिलसिले में टूअर पर जाने लगा था। पागल था। दूसरा बच्‍चा होने के लिए तो उसे मेरे पास आना और सोना ही था। वह कई दिन ये दोनों काम टालता रहा। मेरे लिए भी अच्‍छा रहा कि मेरी सेहत इस बीच ठीक हो गयी थी। बेशक सब का मेरे प्रति व्‍यवहार चुभने की हद तक खराब हो चुका था। - अब मेरा एक ही काम रह गया था। मैं दिन भर घर में दिन भर अकेली छटपटाती रोती रहती और सास के ताने सुनती रहती। वहां कोई मेरे आंसू पोंछने वाला नहीं था। कुल मिलाकर १८ बरस की उम्र और ग्यारहवीं पास अकेली लड़की कर ही क्‍या सकती थी। - माँ बाप ने तो अपना फर्ज पूरा कर दिया था। उन पर दोबारा बोझ डालने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी। सास सामने पड़ती तो उसकी गालियाँ सुनती और पति के सामने पड़ती तो उनकी गालियाँ हिस्‍से में आतीं। मेरी जेठानी बेशक मेरी तरफदारी करती थी। वह अपनी बच्‍ची की तरह प्‍यार करती। मैं हर तरफ से बिल्कुल अकेली हो गयी थी। कोई भी तो नहीं था पास मेरे जिससे अपने मन की बात कह पाती। एक दो बार मन में आया जान ही दे दूं। क्या रखा था जीने में। १८ बरस की उमर में ही सारे दुःख और सुख देख लिये थे। - घर के पिछवाड़े जामुन का एक पेड़ था। उसके तले बैठ कर रोना मुझे बहुत राहत देता था। एक दिन मैंने देखा कि पीछे के घर से हमारे आँगन में खुलने वाली खिड़की में एक युवक मुझे देख रहा है। मैं घबरा कर अंदर आ गयी थी। उसके बाद कई बार ऐसा हुआ। जब भी आंगन में जाती, वही युवक हाथ में कोई किताब लिए अपनी खिड़की में नजर आता। मैं उसे देखते ही सहम जाती और असहज हो जाती। डर भी लगता कि अगर मेरे घर के किसी सदस्य ने इस तरह उसे मुझे देखते हुए देख लिया तो ग़ज़ब हो जायेगा। - एक दो बार ऐसा भी हुआ कि उसने मुझे देखते ही नमस्कार किया। मैंने कोई जवाब नहीं दिया, बस एक अहसास ज़रूर हुआ कि वह कुछ कहना, कुछ सुनना चाहता है। - एक दिन मेरा मूड बहुत खराब था। सुबह सुबह सास ने डांटा था। पति ने उस दिन मुझ पर हाथ उठाया था और बिना नाश्ता किए घर से चले गए थे। मेरा कोई कसूर नहीं था लेकिन इस घर में सारी खामियों के लिए मुझे ही कसूरवार ठहराया जाता था। ये सबके लिए आसान भी था और सबको इसमें सुभीता भी रहता था। कसूरवार ठहराया जाना तो खैर रोज़ का काम था लेकिन पति का मुझ पर बिना वज़ह हाथ उठाना मुझे बुरी तरह से तोड़ गया था। उस दिन सचमुच मेरी इच्‍छा मर जाने की हुई लेकिन मरा कैसे जाये। ज़हर खाना ही आसान लगा। लेकिन ज़हर किससे मंगवाती। - तभी मुझे याद आया कि खिड़की वाले लड़़के से कहकर जहर मंगवाया जा सकता है। मुझे नहीं पता था कि आत्महत्या करने के लिए कौन सा ज़हर खाया जाता है, कहां से और कितने में मिलता है। मेरे पास 50 रुपए रखे थे। मैंने वही लिए और एक काग़ज़ पर लिखा - मुझे मरने के लिए ज़हर चाहिये। ला दीजिये। मैंने अपना नाम नहीं लिखा था। ज्‍यों ही वह लड़का मुझे खिड़की पर दिखाई दिया, मैंने उसे रुकने का इशारा किया और मौका देख कर वह काग़ज़ और पचास का नोट उसे थमा दिया। अंजलि रुकी हैं। एक लम्‍बा घूँट भरा है और सामने देख रही हैं। हवा में खुनकी बढ़ गयी है और लहरें हमारे पैरों तक आने लगी हैं। वे आगे बता रही हैं - काग़ज़ लेने के बाद उसने खिड़की बंद कर दी थी। मैं बार बार आकर देखती लेकिन फिर खिड़की नहीं खुली थी। दो घंटे बाद हमारे घर का दरवाज़ा खुला था और उस लड़के की माँ किसी बहाने से हमारे घर आयी थी। कुछ देर तक मेरी सास और जेठानी से बात करने के बाद वह बहाने से मुझे अपने साथ अपने घर ले गयी थी। - इतने दिनों में ये पहली बार हो रहा था कि मैं अपने घर से निकली थी। उनके घर गयी थी। उस भली औरत ने मेरे सिर पर हाथ फेरा था, मुझे नाश्ता कराया था और फिर धीरे-धीरे सारी बातें मुझसे उगलवा ही ली थीं। मुझे युवक पर गुस्सा भी आ रहा था कि छोटी-सी बात को पचा नहीं पाया और जाकर माँ को बता दिया था। अच्छा भी लगा था। मां की बातें सुन कर अब तक मरने का उत्‍साह भी कम हो चला था। उसकी माँ मेरी माँ जैसी थी और उन्‍होंने मुझे बहुत प्यार से समझाया था और बताया था कि मर जाना लड़ना नहीं होता। अपनी लड़ाई खुद लड़नी होती है और लड़ने के लिए जीना ज़रूरी होता है। इस सारे समय के दौरान युवक कहीं नहीं था। मुझे उसका नाम भी पता नहीं था। - नितिन की मां से मिल कर जब मैं अपने घर लौटी थी तो मेरी हिम्मत बढ़ी थी। मुझे नितिन की माँ में अपनी मां मिल गयी थी। अब मेरा उनके घर आना-जाना हो गया था। नितिन से मेरी नाराज़गी भी दूर हो गयी थी। अब हम अच्छे दोस्त बन गए थे। अपनी मां के कहने पर उसने मेरे लिए पहला काम ये किया था कि मेरे लिए प्राइवेट इंटर करने के लिए फार्म ला कर दिया था और अपनी पुरानी किताबें और सारे नोट्स मुझे दे दिये थे। उसी से पता चला था कि वह बीए कर रहा था। अपना जेब खर्च पूरा करने के लिए दिन भर ट्यूशंस पढ़ाता था। - अब मुझे एक बेहतरीन दोस्त मिल गया था। मैं उससे अपने मन की बात कह सकती थी। मैं अब रोती नहीं थी। नितिन ने मेरी आंखों में आंसुओं की जगह खूबसूरत सपने भर दिये थे। प्‍यार भरी ज़िंदगी का सपना, अपने पैरों पर खड़े होने का सपना, पढ़ने का सपना। ये सपना और वो सपना। अब किताबों की संगत में मेरा समय अच्छी तरह गुजर जाता। उसने मेरी हिम्‍मत बढ़ायी थी उसने और घर वालों की जली कटी सुनने और उनका मुकाबला करने का हौसला दिया था। मैं अब घर वालों की परवाह नहीं करती थी। मुझे नितिन ने ही बताया था कि आप सबकी परवाह कर के किसी को भी खुश नहीं कर सकते। सबसे बड़ी खुशी अपनी होती है। अगर खुद को खुश करना सीख लें तो आप दुनिया को फतह कर सकती हैं। कितना सयाना था और कितना बुद्धू भी नितिन। - अब मेरा सारा ध्‍यान पढ़ाई की तरफ था। ठान लिया था कि कुछ करना है। सत्रह और अठारह बरस की उम्र में जो खोया था, बेशक उसे वापिस नहीं पा सकी थी लेकिन ये तो कर ही सकती थी कि चाहे कुछ भी हो जाये, और नहीं खोना है। नितिन और उसकी मां मुझे बिल्‍कुल कमज़ोर न पड़ने देते। - मैंने बारहवीं का एक्‍जाम दिया था और अब पूरी तरह से खाली थी फिर भी नितिन की कोशिश रहती कि मैं बिलकुल भी वक्‍त बरबाद न करूं। कुछ न कुछ पढ़ती रहूं। उसी की मदद से एक अच्‍छी लाइब्रेरी की मेम्‍बरशिप मिल गयी थी और इस बहाने मुझे घर से बाहर निकलने का मौका मिल गया था। देसराज और सास कुढ़ते रहते। ताने मारते और मेरे चरित्र पर उंगलियां उठाते लेकिन अब मैं इस सबसे बहुत दूर आ चुकी थी। अब मैं और नितिन बाहर ही मिलते और एक बार तो मैंने हिम्‍मत करके उसके साथ एक फिल्‍म भी देख डाली थी। अभी तक न तो नितिन ने और न ही मैंने ही ये कहा था कि हम दोनों के बीच कौन-सा नाता है। मुझे नहीं पता था,मैं पूछ भी नहीं सकती थी कि वह ये सब मेरे लिए क्यूँ करता है। - मैं घर वालों के विरोध के बावजूद नितिन की और सिर्फ नितिन की बात मानती थी। तब मैं कहां जानती थी कि प्‍यार क्‍या होता है। देसराज मुझसे चौदह बरस बड़ा था। उसे भी कहां पता था कि प्‍यार क्‍या होता है। पता होता तो मुझे ज़हर मंगाने के लिए नितिन की मदद क्‍यों लेनी पड़ती और क्‍यों मेरी ज़िंदगी ही बदल जाती। मैं उसे अपना बेहतरीन दोस्‍त मानती थी। वह मेरे लिए फ्रेंड, फिलास्‍फर और गाइड था। वह हर वक्त मेरी मदद के लिए एक पैर पर खड़ा रहता। उसे पता था कि उसे मेरे घर वाले बिल्कुल पसंद नहीं करते थे। एक जवान पड़ोसी का इस तरह से जवान और किस्‍मत से खूबसूरत बहू से मिलना कौन बर्दाश्त कर सकता था इसलिए हमने बाहर मिलना शुरू कर दिया था। उसकी मदद के बिना मैं एकदम अधूरी थी। - एक दिन उसने मुझे एक रेस्‍तरां में चाय पीने के लिए बुलाया था। ये पहला मौका था कि हम इस तरह से चाय पर मिल रहे थे। उसने मेरे सामने एक पैंफलेट रखा था। पूछा था मैंने-क्‍या है ये। - खुद ही पढ़ लो। उसने कहा था। एक बड़ी कंपनी अपने प्रोडक्‍ट की डायरेक्ट मार्केटिंग के लिए शहर में डायरेक्ट सेलिंग नेटवर्क बनाना चाहती थी। उन्‍हें ऐसे एजेंट चाहिये थे जो पार्टटाइम या फुल टाइम काम कर सकें। ये हमारे शहर के लिए बिल्‍कुल नयी बात होती। पहले एक हजार रुपये देकर सामान खरीद कर उनका एजेंट बनना था। मैंने नितिन से कहा था न तो मेरे पास एक हजार रुपए हैं और न ही इस तरह का काम करने का अनुभव ही है। घर वालों से तो मैं किसी तरह से निपट ही लेती। नितिन बोला था - सब हो जाता है। पहला कदम मुश्किल होता है। उसके बाद के कदम आसान हो जाते हैं। मेरे लिए हजार रुपए भी नितिन ने जुटाये थे। एक तरह से जबरदस्ती ही उसने मुझे ये एजेंसी दिलायी थी। वही मेरे लिए सामान लेकर आया था। मैं समझ नहीं पा रही थी कि इस देवदूत का कैसे आभार कैसे मानूं। वह कोई नौकरी नहीं करता था। मेहनत से कमाया अपना पूरा जेब खर्च उसने मेरे लिए एक नई ज़िंदगी की शुरुआत करने के लिए खर्च कर डाला था। घर में मेरा विरोध हुआ था लेकिन मैंने भी तय कर लिया था कि पढ़ना भी है और अपने पैरों पर खड़ा भी होना है। मुझे अपना सामान बेचने के लिए शुरुआती ग्राहक ढूंढने में बहुत दिक्कत होती थी। मेरठ जैसे शहर में विदेशी मेक अप और दूसरा सामान बेचना आसान काम नहीं था। बरसों पुरानी आदतें बदलना आसान नहीं होता। - काम के लिए रोजाना दस बीस लोगों से मिलना पड़ता। सामान का बैग उठाये उठाये घर-घर भटकना पड़ता। हर तरह की बातें सुननी पड़ती। फलां घर की बहू घर-घर जा कर अपनी इज्‍ज़त नीलाम कर रही है। नितिन मेरा हौसला बढ़ाये रहता। कुछ ग्राहक भी दिलवा देता। लेकिन पहले दो तीन महीने मेरा काम संतोषजनक नहीं रहा था। मैं थक चुकी थी। बेशक मेरा लड़की होना, सुंदर होना मेरे काम को आसान करते थे लेकिन ये तरीका मुझे मंजूर नहीं था। नंगी और भेदती निगाहों का सामना करना पड़ता। एक बार नितिन के कहने पर उसके एक दोस्‍त की बहन के घर गयी थी कुछ सामान बेचने। दोस्‍त की बहन तो नहीं मिली थी लेकिन उसके ससुर घर पर अकेले थे। पानी पिलाने और सामान देखने के बहाने उस बुड्ढे ने मुझे एक तरह से नोंच खसोट ही लिया था। शाम को घर आकर दो बार नहाने के बावजूद मैं अपने बदन से चिपकी उसकी गंदी निगाहें नहीं हटा पायी थी। ऐसा अक्‍सर होता। - तभी तीन अच्‍छे काम हुए थे और घर में मेरी इज्‍ज़त बढ़ गयी थी। मैं इंटर में पास हो गयी थी। मैं दोबारा मां बनने वाली थी और कंपनी ने एक नयी स्कीम निकाली थी कि आप अपने बल पर जितने एजेंट बनायेंगी, उनकी बिक्री का लाभ भी आपको मिलेगा। - मुझे ये तरीका पसंद आ गया था। मैं इसी मुहिम में जी जान से जुट गयी थी। मेरी किस्‍मत अच्छी थी कि इस मिशन में मैं कामयाब होने लगी थी। मैंने किसी को भी नहीं छोड़ा। सारे रिश्तेदारों को, परिचित लोगों को और मोहल्‍ले में सबको फुल टाइम या पार्ट टाइम एजेंट बनाना शुरू कर दिया था। अब मैं घर पर ही नये और इच्छुक एजेंटों को बुला सकती थी। मैं अखबारों में पैंफलेट डालती, और लोगों को जोड़ती। मेरा आत्‍म विश्‍वास बढ़ने लगा था। तभी अंजलि ने मेरी तरफ देखा है और पूछा है - तुम्‍हें बोर तो नहीं कर रही। अब चौदह बरस की फिल्‍म देखने में कुछ वक्‍त तो लगेगा। - नहीं कहती चलो। सुन रहा हूं मैं। - बाकी बात बहुत ब्रीफ में बता रही हूं। मैंने काम करते हुए बीए किया, एमए किया, डिस्‍टैंट लनिंग से मार्केटिंग में एमबीए किया। बेटा अब तेरह बरस का है जिसे मेरी जेठानी ही पालती है। मेरे पास इस समय 2000 एजेंट हैं जो लोकल भी हैं और दूसरे शहरों में भी। यानी मेरे ज़रिये लगभग इतने परिवार पल रहे हैं। एक एनजीओ की सर्वेसर्वा हूं। ईवा नाम का ये एनजीओ बच्चों और गरीब लड़कियों के लिए काम करता है। मैं हर बरस बारहवीं क्‍लास की पाँच ऐसी लड़कियां चुनती हूं जिनकी पढ़ाई किसी न किसी वजह से छूट गयी है और वे पढ़ना चाहती हैं। उनकी पूरी पढ़ाई का खर्च मेरे जिम्‍मे। - मैं इस समय अपनी कंपनी में काफी महत्वपूर्ण कड़ी हूं। हैड क्‍वार्टर में और बड़ी जिम्‍मेवारियों के लिए बार-बार बुलाया जाता है लेकिन मेरे कुछ उसूल हैं। नहीं जाती। अब मुझे खुद इतना काम नहीं करना पड़ता। मेरा डेडिकेटेड स्‍टाफ है जो अपना काम बखूबी करता है। हर महीने दो लाख रुपये के करीब मेरे खाते में जमा हो जाते हैं। अच्‍छी खासी सेविंग कर ली है। कंपनी बीच बीच में ईनाम देती रहती है और घुमाती फिराती रहती है। अपनी पसंद का खूबसूरत घर बनाया है और मैं अपनी ही दुनिया में मस्‍त हूं। इस दुनिया में हर कोई नहीं झांक सकता। पूछता हूं मैं - इस पूरे सफर में नितिन कहां रह गया? - नितिन ने भी एमबीए किया था। वह एमए तक तो मेरठ में ही रहा। फिर एमबीए करने अहमदाबाद चला गया था। उसकी बहुत याद आती। हम फोन पर ही बात कर पाते। जब एमबीए करने जा रहा था तो बहुत उदास था। उसने मुझे दावत दी थी और तब इतने बरसों में पहली बार उसने मेरा हाथ थामा था और प्रोपोज किया था - छोड़ छाड़ दो ये सब। हम अपनी दुनिया बसायेंगे। तब तक मुझमें कुछ समझ तो आ ही चुकी थी। बेशक मैं उससे बेइंतहां प्‍यार करती थी लेकिन भाग कर शादी करने के बारे में सोच नहीं सकती थी। - अहमदाबाद जाने के बाद वह चाहत और गरमी कुछ दिन तो रहे फिर धीरे धीरे कम होने लगे थे। मेरी ज़िंदगी का वह अकेला प्‍यार था और रहेगा, बेशक उसकी ज़िंदगी में औरों ने दस्तक दी ही होगी। जो होता है अच्‍छा ही होता है। आजकल यूएसए में है। मैं अपने पहले और इकलौते प्‍यार को कभी नहीं भूल पायी। आइ मिस हिम ए लाट। आइ स्‍टिल लव हिम। - यही होना होता है जीवन में अंजलि। जो हमारा जीवन संवारते हैं, हमें उन्‍हीं का साथ नहीं मिल पाता। - मैंने बहुत तकलीफें भोगी हैं समीर। वहां से यहां तक की पन्‍द्रह बरस की दौड़ बहुत मुश्‍किल रही है। कई बार यकीन नहीं होता कि ये सफर मैंने अकेले तय किया है। - कहती चलो। मैं अंजलि को दिलासा देता हूं। - घबराओ नहीं, मेरी बात लगभग पूरी हो चुकी है। बस दी एंड करना है। इस कहानी में आखिरी चैप्‍टर देसराज का है। परेश का बाप बनने के बाद उसे एक नयी दुनिया मिल गयी। उसे इस बात की कोई परवाह नहीं रही कि मैं क्‍या करती हूं कहां जाती हूं और हूं भी सही या नहीं। उसका पीना और बढ़ गया है। - तीन बरस पहले मैंने उसे अपनी ही कंपनी के प्रोडक्‍ट की एंजेसी दिला दी है। मेरे एजेंट जितना सामान बुक करते हैं उतना ही वह बेचता है। मुझसे ज्‍यादा ही कमा लेता है। हंसी आती है - वह सबको यही बताता है कि उसकी एजेंसी के बल पर ही मेरा काम चल रहा है। कई बार भ्रम भी कितने खूबसूरत होते हैं ना। अंजलि बताती जा रही है - वह अपनी दुनिया में मस्‍त है, मैं अपनी दुनिया में। कहने को हम पति पत्‍नी हैं लेकिन इस रिश्‍ते की रस्में निभाये बरसों बीत गये हैं। मैं अभी बत्‍तीस की हूं और देसराज छियालिस का। बेशक उससे मेरे वे संबंध नहीं रहे हैं लेकिन फिर भी मैंने कभी उससे बेईमानी नहीं की है। खुद को पूरी तरह काम में खपाये रखती हूं। एक मिनट के लिए भी खाली नहीं बैठती। हर वक्‍त कुछ न कुछ करती ही रहती हूं। ध्‍यान, योगा, जिम, सोशल कमिटमेंट्स, एनजीओ, बच्‍चे और प्रकृति। सच समीर, इस सेल्‍फ एक्‍चुआलाइजेशन ने तो मेरी ज़िंदगी ही बदल दी है। मेरे सारे काम इसी से कंट्रोल होते हैं। - मैं समझ रहा हूं अंजलि। मैं उसका कंधा थपथपाता हूं। मैं अंधेरे में अंजलि का चेहरा नहीं देख पा रहा लेकिन उसकी आवाज का दर्द बता रहा है कि वह कितनी तनहा है। दोस्त चला गया, पति न अपना था, न अपना रहा। ऐसे में उस जैसी खुद्दार लड़की खुद को कैसे संभालती होगी। - कुछ और बताना पूछना बाकी है समीर, वह अंधेरे में मेरी तरफ देखती है। - नहीं अंजलि, सब कुछ तो तुमने बता दिया है। सच में यकीन नहीं हो रहा कि जो अंजलि मेरे पास बैठी है, जो मुझसे पहली बार मिली है और जिसे मैं दो दिन से लगातार न सिर्फ देख रहा हूं, बल्‍कि पूरी शिद्दत से जिसे महसूस कर रहा हूं, यहां तक पहुंचने की तुम्‍हारी तकलीफ की बातें सुन कर दहल गया हूं। तुम्‍हें सलाम है दोस्‍त। अंजलि ने मेरा हाथ दबाया है - वो सब तो ठीक है लेकिन तुमने ये नहीं पूछा कि इस गिलास से मेरी दोस्‍ती कब और कैसे हो गयी। वह मेज पर रखे गिलास की तरफ इशारा करती है। मैं हंसता हूं – नहीं, मैं समझ रहा हूं। दोस्‍त चला गया हो, जीवन साथी कभी अपना न रहा हो और अपनी मेहनत के बलबूते पर सफलता मिलने लगी हो तो सेलिब्रेट करने के लिए कोई तो साथी चाहिये ही। तब भरा हुआ गिलास सबसे अच्‍छा दोस्‍त होता है। चाहे उसे कितनी बार खाली करो, चाहे किस भी ड्रिंक से भर दो, कोई शिकायत नहीं करता। - सही कह रहे हो समीर। अब ये गिलास ही मेरा सबसे अच्‍छा दोस्‍त है। देसराज वैसे तो आम दुकानदार किस्‍म का आदमी है लेकिन एक बात उसकी बहुत अच्‍छी है। वह बहुत सलीके से पीता है। घर पर ही उसने एक बढ़िया-सा बार बना रखा है। उसके पास बेहतरीन कटलरी है और हर तरह की शराबों का शानदार कलेक्‍शन है उसके पास। मैं हंसा हूं - तो घर का माल घर पर ही ...। - पहली बार मैंने उसके बार में से ही चुरा कर पी थी। उस दिन जब नितिन के दोस्‍त की बहन के ससुर ने मुझ पर हाथ डाला था। मुझे तब पता ही नहीं था कि कौन सी बॉटल में क्‍या है और उसे कैसे पीते हैं। बस गिलास में डाली थी और हलक से नीचे उतार ली थी। फिर तो सिलसिला बनता चला गया। अब तो तय करना ही मुश्‍किल है कि देसराज ज्‍यादा पीता है या मैं ज्‍यादा पीती हूं। - अब चलें समीर। ये पानी तो अब कुर्सी पर चढ़ कर सिर तक आने को बेताब हो रहा है। मैं सहारा दे कर अंजलि को कमरे तक लाता हूं। कल अंजलि मुझे सहारा देकर लायी थी। आज मैं..। • अंजलि वाशरूम में गयी हैं तो मैं पहले कमरे में ही पसर गया हूं लेकिन बाहर आते ही उन्‍होंने मुझे उठा दिया है - ये बेईमानी नहीं चलेगी। तुम जाओ अपने कमरे में। और मेरा हाथ थाम कर बेड रूम में ले आयी हैं। • अभी मेरी आँख लगी ही है कि झटके से मेरी नींद खुली है। अंजलि मेरे कंधे पर झुकी मुझसे पूछ रही हैं - क्‍या मैं थोड़ी देर के लिए तुम्‍हारे पास सो सकती हूं? मैं उठ बैठा हूं – ओह, श्‍योर श्‍योर कम। मैंने उनके लिए तकिया ठीक किया है लेकिन वे दुबक कर छोटी सी मासूम बच्‍ची की तरह मेरे सीने से लग कर सो गयी हैं। मैं उनके कंधे थपथपा रहा हूं और उनके बालों में उँगली फिर रहा हूं। इस समय एक जवान और खूबसूरत औरत का मेरी बांहों में होना भी मुझमें किसी तरह की सैक्‍सुअल फीलिंग नहीं जगा रहा। नशे में होने के बावजूद एक अजीब सा ख्याल मेरे मन में आता है - औरत ही हर बार कई भूमिकाएं अदा करती है। बहन, बेटी, पत्‍नी, मां। मेरे सीने से बच्‍ची की तरह लग कर सोयी अंजलि के लिए मैं आज पिता या भाई की भूमिका निभा रहा हूं। नींद मेरी आंखों से कोसों दूर चली गयी है। पता नहीं क्‍या-क्‍या दिमाग में आ रहा है। दो दिन में कितने तो रूप दिखा दिये इस मायावी अंजलि ने। कल सुबह का चलती कार में उनका वह रूप और अब मेरे सीने से लगी अबोध बच्‍ची सी सो रही अंजलि का ये रूप। कितने रूप एक साथ जी रही है ये अकेली औरत। मैं उनके चेहरे की तरफ देखता हूं। गहरी नींद में हैं। मेरा नशा अभी बाकी है। लेकिन इतना होश भी बाकी है कि पूरी रात इस तरह बिताना मेरे लिए कितना मुश्‍किल होगा। कुछ भी अनहोनी हो सकती है। मैं कमज़ोर पडूं, इससे पहले ही अंजलि को आराम से सुलाता हूं, उनका सिर तकिये पर टिकाता हूं और हौले से उठ कर बाहर वाले कमरे में आता हूं। दस कदम चलने से ही मेरी सांस फूल गयी है जैसे मीलों लम्‍बा सफर करके आया हूं। • अचानक झटके से मेरी नींद खुली है। पेट में कुछ गड़बड़ लग रही है। तेजी से बाथरूम की तरफ लपकता हूं। उफ.. । ये क्‍या मुसीबत है। वापिस आया ही हूं कि फिर..फिर ..। अभी तो बाथरूम की टंकी ही नहीं भरी होती। क्‍या करूं .. अंजलि को जगाऊं.. । नहीं वे भी क्‍या करेंगी। बेचारी बच्‍ची की नींद सो रही हैं। लेकिन बार बार फ्लश की आवाज सुन कर उनकी नींद खुल ही गयी है। पूछती हैं - क्या हुआ समीर। और मैं यहां कैसे आ गयी। मैं तो बाहर सोयी थी समीर। मैं निढाल सा सोफे पर पसरा बैठा हूं। बताता हूं - पेट गड़बड़ा गया है। बीस बार तो हो आया। बाहर के कमरे तक जाने और बार बार बाथरूम तक आने की ताकत ही नहीं बची है। अंजलि उठ कर मेरे पास आ गयी हैं। मेरे माथे पर हाथ फिरा कर देखती हैं, बुखार तो नहीं है। मैं इशारे से बताता हूं – बुखार नहीं है। वे बताती हैं - रुको, मेरे पास गोली है। वे लपक कर गयी हैं और अपने बैग में से गोली ले कर आयी हैं। पानी के साथ गोली ली है मैंने। अंजलि कहती हैं - लेट जाओ, लेकिन मैं ही मना कर देता हूं। उठ कर बैठने और बाथरूम भागने में दिक्कत होगी। अंजलि चिंता में पड़ गयी हैं - कितनी बार हो आये? मैं इशारे से बताता हूं - कई बार। गिनती याद नहीं। वे सीरियस हो गयी हैं - डॉक्‍टर को बुलाने की ज़रूरत है क्‍या? वे घड़ी देखती हैं - तीन बज कर चालीस मिनट। मैं मना कर देता हूं - जितना जाना था जा चुका। अब भीतर बचा ही क्‍या है। अंजलि अफसोस के साथ कहती हैं - गलती मेरी है। मैं समझ गयी थी कि तुम्‍हारी इतनी लिमिट नहीं है। लेकिन बार-बार और हर तरह के ड्रिंक्‍स पिलाती रही। छी: मैं भी क्‍या कर बैठी। तुम्‍हें कुछ हो गया तो...। वे अपने आपको कोसे जा रही हैं। मैं इस हालत में भी उन्‍हें समझाता हूं - ऐसा कुछ नहीं हुआ है। मैंने शायद ढंग से खाना नहीं खाया था और ज्‍यादा ले ली थी। अब गोली से आराम आ रहा है।I वे फिर उठी हैं और मेरे लिए जग भर के पानी में नमक, चीनी का घोल बनाया है। उसमें उन्‍होंने संतरे का जूस और नींबू का रस मिलाया है। वे हर पाँच मिनट बाद गिलास भर कर मुझे ये घोल पिला रही हैं ताकि डीहाइड्रेशन न हो जाये। थोड़ी देर पहले मेरे सीने से बच्‍ची की तरह लग कर सो रही अंजलि अब दादी मां बन कर मेरा इलाज कर रही हैं। यह पता चलने पर कि मैंने खाया ढंग से नहीं खाया था, वे मेरे लिए फ्रूट बॉस्‍केट में से केले ले आयी हैं और मुझे जबरदस्ती खिलाये हैं। मैं अब बेहतर महसूस कर रहा हूं लेकिन अंजलि कोई रिस्‍क नहीं लेना चाहतीं। उनकी नींद पूरी तरह से उड़ गयी है। उन्‍हें फ्रिज में रखी हुई योगर्ट मिल गयी है। वे अब मेरे सामने बैठी अपने हाथों से चम्मच से मुझे योगर्ट खिला रही हैं। मैं उनका सिर सहलाते हुए कहता हूं - बस कर दादी मां, अब बस भी कर लेकिन वे नहीं मानतीं। घंटे भर में उन्‍होंने अपना बनाया एक लीटर घोल मुझे पिला दिया है। सुबह के छ: बजने को आये हैं। अब मैं बेहतर महसूस कर रहा हूं। पिछले एक घंटे में सिर्फ दो बार गया हूं। अंजलि ने मुझे लिटा दिया है और मेरे पास बैठी हुई हैं। मैं उन्‍हें सो जाने के लिए कहता हूं लेकिन वे मना कर देती हैं। मेरी हालत के लिए वे अभी भी खुद को कसूरवार मान रही हैं। इस बीच वे दो बार मेरे लिए ब्‍लैक टी विद शुगर बना चुकी हैं। एक बार तो कंपनी देने के लिए खुद भी मेरे साथ ब्लैक टी पी है। पता नहीं कब मेरी आँख लग गयी होगी। देखता हूं अंजलि खिड़की के पास वाले सोफे पर बैठी पेपर पढ़ रही हैं। आठ बज रहे हैं। मुझे जागा देख कर वे मेरे पास आयी हैं और प्‍यार से मेरा माथा चूम कर बोली हैं - गुड मार्निंग दोस्‍त। थैंक गॉड। तुम अब ठीक हो, वरना मैं अपने आप को कभी माफ न कर पाती। देखता हूं - अंजलि नहा कर तैयार भी हो चुकी हैं। कॉलर वाली यलो टी शर्ट और ब्‍लैक ट्राउजर। ग्रेट कम्‍बीनेशन। कह रही हैं - एक काम करते हैं। अब हम यहां और नहीं रुकेंगे। बेशक शाम 6 बजे की फ्लाइट है मेरी लेकिन हम मुंबई ही चलते हैं। कुछ हो गया तुम्‍हें तो यहां ढंग से मेडिकल एड भी नहीं मिलेगी। मैं ब्रेकफास्‍ट यहीं मंगवा रही हूं। तब तक तुम नहा लो। कपड़े निकाल देती हूं तुम्‍हारे। और मेरे मना करने के बावजूद अंजलि ने मेरे सूटकेस में से मेरे लिए पकड़े निकाल दिये हैं। देखता हूं - येलो स्‍ट्राइप वाली टीशर्ट और ब्‍लैक पैंट। मैं कलर कम्‍बीनेशन देख कर हंसता हूं। वे समझ जाती हैं कि मैं क्‍यों हंस रहा हूं। मुझे चीयर अप करने के लिए बताती हैं - मेरे स्‍टाफ में आठ लोग हैं। तीन जेंट्स और पाँच लड़कियां। सैटरडे हम किसी न किसी बहाने पार्टी करते ही हैं। एक पार्टी होती है कलर कम्‍बीनेशन की। अगर किसी मेल मेम्‍बर के कपड़ों के रंग जरा सा भी किसी फीमेल स्‍टाफ के कपड़ों के रंग से मैच कर जायें तो दोनों को पार्टी देनी होती है। कई बार मजा आता है कि कई लोगों के रंग आपस में मैच कर जाते हैं। अब हमारे स्‍टाफ मेम्‍बर अपने लिए कपड़े खरीदते समय ख्याल रखते हैं कि किस किस के पास इस रंग के कपड़े हैं। शनिवार को तो सबकी हालत खराब होती है। यह बताते हुए अंजलि अब एक खूबसूरत स्‍मार्ट एक्‍सक्‍यूटिव में बदल गयी हैं। जब तक ब्रेकफास्‍ट आये और मैं नहा कर आऊं, अंजलि ने सारा सामान पैक कर दिया है और रिसेप्शन को बिल तैयार करने के लिए कह दिया है। मेरे लिए अंजलि ने केले, सादी इडली, योगर्ट और गाजर का जूस मंगाये हैं। रास्‍ते के लिए उन्‍होंने दो बॉटल डीहाइड्रेशन वाला घोल बना कर रख लिया है। मेरे बहुत जिद करने पर भी होटल का बिल अंजलि ने दिया है और मुझे वेटरों को टिप तक नहीं देने दी है। हंसी आ रही है कि अंजलि नर्स की तरह मेरी केयर कर रही हैं। मेरा हाथ थाम कर नीचे लायी है, और छोटे बच्‍चे की तरह कार में बिठाया है। सीट बेल्‍ट भी उसी ने लगायी है। इतना और किया कि लिफ्ट में ही मेरे गाल पर एक चुंबन जड़ दिया था। मैं अंजलि से कहना चाहता हूं कि तुम रात भर सोयी नहीं हो, कार मुझे चलाने दो लेकिन उन्‍होंने मेरी एक नहीं सुनी है। वे बता रही हैं कि वे अगर गोवा गयी होती तो कितने खूबसूरत दिन मिस करती। वहां सब इन्‍फार्मल होते ही भी फार्मल ही होता और अकेले वक्‍त बिताने के लिए सबकी नाराजगी मोल लेनी पड़ती। तभी मैंने पूछा है - अंजलि एक बात बताओ। - पूछो मेरे लाल। वे सुबह से पहली बार खुल कर हंसी हैं। मुझे अच्‍छा लगा है कि अंजलि अब अपने उसी मूड में लौट आयी हैं जिसमें वह परसों आते समय थीं। - हम परसों सुबह से एक साथ हैं। इस बीच बीसियों बार मेरा मोबाइल बजा है। मैंने कभी एटैंड किया है और कई बार नहीं भी किया है। लेकिन इस सारे अरसे में तुम्‍हारा मोबाइल एक बार भी नहीं बजा है। - भली पूछी दोस्‍त जी। निगाहें सड़क पर जमाये अंजलि कह रही हैं - सही कहा। मेरे पास दो मोबाइल हैं। एक ऑफिस का और एक पर्सनल। दोनों में शायद ही कोई नम्‍बर हो जो दोनों में हो। देसराज के नम्‍बर के अलावा। संयोग से वह हमारा डीलर भी है और रिश्‍ते में पति भी लगता है। तुमसे बात करने के लिए और होटल बुक करने के लिए ही मैंने अपना मोबाइल ऑन किया था। तब से दोनों मोबाइल बंद ही हैं। ये तीन दिन सिर्फ मेरे थे और मैंने अपने तरीके से जीये। मैं अपने वक्‍त में किसी का दखल नहीं चाहती। किसे क्‍या करना है, मैंने सबको बता रखा है। कोई समस्‍या हो तो इंतज़ार कर सकती है। मेरा सबसे बड़ा सच मेरा सामने वाला पल है। • अचानक कार रुकने के कारण मेरी नींद खुली है। अरे, मैं कब सो गया पता ही नहीं चला। अंजलि की तरफ देखता हूं। वे मुस्‍कुरा रही हैं। उन्‍होंने कार साइड में रोकी है। बाहर देखता हूं - अरे, ये तो शिमला रिसार्ट है। मैं पहले भी दो एक बार यहां आ चुका हूं। इसका मतलब हम मुंबई के पास हैं। घड़ी देखता हूं - बारह बजे हैं। अंजलि ने मेरी तरफ का दरवाजा खोला है। पता ही नहीं चला कि बात करते करते कब सो गया था। - कैसा लग रहा है अब? - बेहतर महसूस कर रहा हूं। - श्रीमान जी, कितना भी बेहतर महसूस करें, आपको पीने के लिए और नहीं मिलने वाली और खाने के लिए दही चावल ही मिलेंगे। - कोई बात नहीं सिस्‍टर जी। आपकी केयर में हूं तो आप मेरा भला ही सोचेंगी। हम दोनों ही हंस दिये हैं। रिसोर्ट में बायीं तरफ रेस्‍तरां हैं जहां फैमिली केबिन बने हुए हैं। बहुत कलात्‍मक। एक तरफ लम्‍बा सोफा जिस पर तीन आदमी आराम से बैठ सकें और मेज के दूसरी तरफ गाव तकियों से सजा एक तख्‍त। मैं तख्‍त पर गाव तकियों के सहारे पसर गया हूं। अचानक अंजलि सोफे से उठी हैं और बाहर चली गयी हैं। मैंने आंखें बंद की ली हैं। अंजलि वापिस आयी हैं तो उनके हाथ में आइपैड और डीहाइड्रेशन के घोल वाली बोतल है। बोतल मेरी तरफ बढ़ाते हुए पूछ रही हैं - बोतल से पीयेंगे या गिलास मंगवाऊं? मैं छोटा बच्‍चा बन गया हूं - एक शर्त पर पीऊंगा। - बता दीजिये। - इसके बाद आपके साथ एक आखिरी बीयर तो बनती है। - कमाल है। रात भर की तकलीफ काफी नहीं है। चलो ठीक है। सिर्फ एक गिलास मिलेगी। लो पहले इसे पीओ और उन्होंने बोतल खोल कर मेरे मुंह से लगा दी है। अंजलि पूछ रही हैं - यहाँ से 6 बजे की फ्लाइट के लिए कितने बजे निकलना ठीक रहेगा? - वैसे तो तीस चालीस मिनट का रास्‍ता है लेकिन हाइवे का मामला है। हम साढ़े तीन बजे निकलेंगे। - तुम्‍हें कोई तकलीफ तो नहीं है ना अब? - नहीं, एकदम ठीक कर दिया तुम्‍हारे ड्रिंक ने। अंजलि ने वेटर को पीने और खाने का ऑर्डर दिया है। मेरे लिए एक गिलास बीयर और कर्ड राइस पर सहमति हो गयी है। अंजलि अपने आइपैड में तस्‍वीरें दिखा रही हैं। वे भी आराम से तख्‍त पर बैठ गयी हैं। हर तस्‍वीर से जुड़ा कोई न कोई मजेदार किस्‍सा शेयर कर रही हैं। इस समय वे बहुत अच्‍छे मूड में हैं। मैं अधलेटा हूं और वे मेरे सिर की तरफ बैठी हैं। अचानक उन्‍होंने मेरा सिर अपनी गोद में रख दिया है। मैंने आंखें बंद कर ली हैं। वे मेरे चेहरे की तरफ झुकी हैं और मेरा माथा सहला रही हैं। उनके बालों ने मेरे चेहरे पर एक झीना जाल डाल दिया है। अचानक एक गरम बूंद मेरे गाल पर गिरी है। वे नि:शब्‍द रो रही हैं। आंसुओं से उनका चेहरा तर है। मैं कुछ कह नहीं पाता कि क्‍या कहूं। वे रोये जा रही हैं। मैं हाथ बढ़ा कर उनके आंसू अपनी उँगली की कोर पर उतार लेता हूं। वे मेरी उँगली अपने मुंह में दबा लेती हैं। कह रही हैं - मैंने तुम्हें बहुत परेशान किया। - नहीं तो? - मैं अचानक आयी, तुम्‍हारा शेड्यूल अपसेट किया। कितनी उम्‍मीदें जगा दीं और सताया। - नहीं तो? - जानती हूं कि पास में युवा और खूबसूरत लड़की हो तो किसी का मन भी डोल सकता है। पता नहीं तुम खुद पर कैसे कंट्रोल कर पाये। मैं उनके बाल सहलाते हुए हंसता हूं - बहुत आसान था। वे हमम करके इशारे से पूछती हैं - वो कैसे भला? - कुछ तुम्‍हारी शर्तें, कुछ मेरी वैल्‍यूज, कुछ मेरे डर और कुछ तुम्‍हारी वैल्‍यूज। अंजलि ने मेरे गाल पर चपत मारी है - और? - एक और बात भी थी कि वह सब करने के लिए खुद को मनाना और तुम्‍हें तैयार करना बिलकुल भी मुश्‍किल नहीं था। पता तो था ही कि तुम नार्मल सेक्‍स लाइफ तो नहीं ही जी रही हो। ऐसे में मेरा काम आसान हो जाता लेकिन ऐसे बनाये गये संबंधों का एक ही नतीजा होता है। - क्‍या? - या तो वे हमेशा के लिए उसी तरफ मुड़ जाते हैं या बिल्‍कुल खत्‍म हो जाते हैं। और ये दोनों बातें ही मैं नहीं चाहता था। - कहते चलो। - ऐसे करने का मतलब होता एक अच्‍छी दोस्‍त को हमेशा के लिए खो देना जो कि बहुत बड़ा नुक्‍सान होता। अंजलि झुकी हैं और पहली बार मेरे होंठों को क्षण भर के लिए अपने होठों से छू भर दिया है - शायद मैं इसी भरोसे पर यहाँ और तुम्‍हारे पास ही आयी थी कि मैं एक मैच्‍योर दोस्‍त से मिलने जा रही हूं। मेरे लिए भी तुम्‍हारी मस्‍त कर देने वाली मौजूदगी में अपने आपको नियंत्रण में रखना इतना आसान नहीं था। तुम्‍हें शायद पता न हो, मैं दोनों रात एक पल के लिए भी नहीं सोयी हूं। पहली रात तुम कमज़ोर पड़े थे तो मैंने तुम्‍हें सँभाला था। बेशक लहरों में बह जाना मेरे लिए भी सहज और आसान होता। दूसरी रात मैं कमज़ोर पड़ गयी थी और तुम्‍हारे पास चली आयी थी कि जो होना है हो जाये लेकिन कल रात तुमने मुझे कमज़ोर होने से बचा लिया और उठ कर दूसरे कमरे में चले गये थे। तब मैं नींद में नहीं थी। तुम्‍हारी नजदीकी का पूरा फायदा उठाना चाह रही थी लेकिन तुमने मौका ही नहीं दिया और भाग खड़े हुए । मैंने नकली गुस्‍सा दिखाया है - यू चीट। - थैंक्‍स समीर। - अब किस बात का थैंक्‍स भई? - इस यात्रा में मेरे सेल्‍फ एक्‍चुअलाइज़ेशन के अनुभवों में एक और आयाम जुड़ गया है समीर। मैं भोला बन गया हूं - वो क्‍या? - मेरा ये अहसास और पुख्‍ता हो गया है कि देह से परे भी दुनिया इतनी खूबसूरत हो सकती है। सही कह रहे हो समीर कि हमारी ये यात्रा अगर देहों से हो कर गुज़रती तो उन्‍हीं अंधी गलियों में भटक कर रह जाती और हम उससे कभी बाहर न आ पाते। थैंक यू माय दोस्‍त, थैंक यू। हम दोनों ने ही आगे की मुलाकातों के रास्‍ते बंद नहीं किये हैं। खुले रखे हैं। थैंक्‍स अगेन। मैं मुस्‍कुरा कर रह गया हूं। इस बात का क्‍या जवाब दूं। मैंने उनके बिखरे बाल समेट कर उनके कानों के पीछे कर दिये हैं। उनका चेहरा दमक रहा है। • एयरपोर्ट आते समय ड्राइविंग सीट मुझे वापिस मिल गयी है। मैं चुहल करते हुए पूछता हूं - तो आपका रूफ टॉप गार्डन हमें कब देखने को मिलेगा? - जल्‍दीबाजी न करें श्रीमन। अभी तो हमें इस जादुई यात्रा के तिलिस्‍म से बाहर आने में ही समय लगेगा। और याद रखें कि यात्राएं और मुलाकातें हमेशा संयोग से ही होती हैं। अचानक ही। जैसे ये मुलाकात हुई। हम ज़रूर मिलेंगे लेकिन कहां मिलेंगे और कब मिलेंगे, इसकी कोई भविष्‍यवाणी सेल्‍फ एक्‍चुअलाइज़ेशन नहीं करता। वे खिलखिला कर हंस दी हैं। मैंने उन्‍हें ड्राप किया है। कार से उतर कर हम गले मिले हैं और फिर से मिलने का वादा करके बिछड़ गये हैं। वापिस आने के लिए कार स्‍टार्ट करते समय मैं तय नहीं कर पा रहा कि मैं एकदम खाली हो गया हूं या किसी दैविक ताकत से भर गया हूं।
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रविवार, 12 अप्रैल 2015

कोरा काग़ज़ मुझे आज़ादी देता है - ओरहन पामुक



मूलत: पेंटर  और वास्‍तुशिल्‍पी  ओरहान पामुक बताते हैं कि 23 बरस की उम्र में उनके दिमाग का कोई पेंच ढीला हो गया था कि वे लेखक बन बैठे। पता नहीं ऐसा क्‍यों हुआ लेकिन इसको ले कर उन्‍हें कोई अफसोस नहीं है। उनके भीतर का पेंटर जिंदा है और उनकी रचनाओं में अपनी उपस्‍थिति दर्ज कराता रहता है। उनके भीतर का कलाकार और कथाकार दोनों एक साथ अपनी भूमिका निभाते चलते हैं।
वे न लिख पाने के संकट से कभी नहीं जूझे। वे आगे की योजना बना कर चलते हैं। अगर कहीं अटकते भी हैं तो उस अध्‍याय को छोड़ कर अगले अध्‍याय पर काम करने लगते हैं। वे बेहद आशावादी लेखक हैं। वे कहते हैं कि अगर मुझे पता हो कि अगले दिन मुझे क्‍या लिखना है तो मैं उस रात पूरी तैयारी करता हूं और तब मेरे सामने का कोरा काग़ज़ मेरे लिए आज़ादी का पैगाम ले कर आता है। सृजनात्‍मकता की और जीवंत होने की आज़ादी।
वे कहते हैं कि लेखन हमेशा मुश्‍किल होता है लेकिन रचने के पीछे पुरस्‍कार छुपा होता है। आप वह रचते हैं जो किसी और ने नहीं रचा होता। यहां तक कि लिखी गयी छोटी सी बात भी आपको बेइंतहां खुशी से भर देती है। ये आपका आविष्‍कार होता है। यही आविष्‍कार खुशी का  सबब बनता है। कई  बार ये खुशी नहीं भी मिलती।
वे कहते हैं कि उपन्‍यास लिखना दूसरे की खिड़की से, दूसरों के नज़रिये से दुनिया को देखना होता है।
वे अभी भी पेन से लाइनों वाले काग़ज़ पर लिखते हैं। तय करके लिखते हैं और समय बरबाद नहीं करते। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्‍हें घर पर लिखना अजीब लगता है। उन्हें हमेशा एक दफ़्तर चाहिए, जो घर से अलग हो, जहां वे सिर्फ़ लिख सकें। वे घर में लिखने की मजबूरी से अलग ही ढंग से निपटते हैं। वे सुबह उठते हैं, नहाते-धोते हैं, नाश्ता करते हैं, बाक़ायदा फॉर्मल सूट पहनते हैं और पत्‍नी से यह कहकर घर से निकल पड़ते हैं कि मैं ऑफिस जा रहा हूं। पंद्रह-बीस मिनट सड़क पर टहलने के बाद वे घर लौट आते हैं,  अपने कमरे में घुसते हैं और उसे अपना ऑफिस मान लिखने लग जाते हैं।
2006 में नोबेल पुरस्‍कार पाने वाले ओरहन पामुक तुर्की के सबसे ज्‍यादा पढ़े जाने वाले लेखक हैं।

धर्मवीर भारती


जब ज्‍यादा चाय मांगने लगें भारती जी जो कुछ लिखा जायेगा।
डॉक्‍टर धर्मवीर भारती (दिसंबर 25, 1926 – सितंबर 4, 1997) जब खाने के प्रति लापरवाह होने लगें और चाय ज्‍यादा मांगने लगें तो पुष्‍पा जी समझ जाती थीं कि कोई रचना बाहर आने को है। ये हालत दो तीन दिन तक चलती तब जा कर भारती जी लिखने की मेज़ पर आ पाते। अक्‍सर रात के समय लिखते।
सबसे पहले कहानी के नोट्स बनने का सिलसिला शुरू होता। ये भी कई दिन तक चलता। सबसे पहले उन व्‍यक्तियों के नाम लिखे जाते जिन पर कहानी लिखी जानी होती। कुछ पाइंट्स नोट किये जाते, घटनाएं दर्ज की जातीं और इस तरह कहानी के लिए ज़मीन तैयार की जाती। ये वक्‍त भारती जी के लिए सबसे ज्‍यादा बेचैनी वाला होता। लेकिन एक बार कहानी के नोट्स तैयार हो जाने के बाद उनका आगे का सफर आसान हो जाता और दो तीन दिन में ही कहानी फाइनल कर लेते। कहानी शुरू करके लगातार उसी पर काम करते। कहानी लिखते समय भारती जी अपने पात्रों के साथ एकाकार हो जाते। प्रसंग के अनुसार कभी हंसते, कभी उदास हो जाते तो कभी ठहाके लगाने लगते।
कविताओं के मामले में बेशक इतनी तैयारी न होती लेकिन बेचैनी वाला आलम ज़रूर रहता।
उन्‍हें घर पर लिखने में सुभीता रहता बस, बच्‍चे उनके आस पास शोर न करें। चाय नियमित रूप से मिलती रहे। उनकी हिदायत रहती कि उनके कागजों में कोई छेड़छाड़ न की जाये। जैसे हैं, उन्‍हें वैसे ही रहने दिया जाये।
अपनी प्रसिद्ध कविता मुनादी उन्‍होंने लगातार दो दिन तक भारी तनाव में रहने के बाद लिखी थी। सुबह के अख़बार में जय प्रकाश नारायण की चार तस्‍वीरें छपी थीं जिनमें उन्‍हें पटना में भाषण देते, लाठी खाते, गिरते, और सिर पर कपड़ा बाँध कर खड़े होते दिखाया गया था। ये तस्‍वीरें देख कर भारती जी बेहद विचलित हो गये थे और अपने टैरेस वाले फ्लैट में सुबह शाम लगातार दो दिन तक मुट्ठियां ताने चहल कदमी करते रहे थे।
तीसरे दिन सुबह जब पुष्‍पा जी ने बाथरूम में भारती जी के गुनगुनाने की आवाज़ सुनी तो वे लपक कर भारती जी की मेज़ की तरफ गयी थीं।
मुनादी कविता रात में लिखी जा चुकी थी।

यहां मुनादी कविता का लिंक दे रहा हूं। कविता गद्यकोष पर पढ़ी जा सकती है।http://www.kavitakosh.org/kk/%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A6%E0%A5%80_/_%E0%A4%A7%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%B5%E0%A5%80%E0%A4%B0_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%80

लेखकों की रोचक आदतें



1. गैब्रियल गार्सिया मार्केज के लिखने की आदतें बेहद दिलचस्प थीं। उन्होंने हमेशा टाइपराइटर पर लिखा। वे सिर्फ दो उंगलियों से टाइप करते थे। दोनों हाथों की तर्जनी से। अगर उनकी मेज पर पीला गुलाब न हो, तो वे लिख नहीं पाते थे। वह अपने लिखे हुए को शब्दों में नहीं मापते थे, बल्कि मीटर में मापते थे, क्योंकि शुरुआती दिनों में वह कागज की लंबी रिम पर लिखा करते थे।
2. विख्यात अंग्रेजी कवि बायरन सोते-सोते डरावने सपने देखते थे। इन डरावने सपनों के चक्‍कर में वे हमेशा अपने सिरहाने कारतूसों से भरी दो पिस्तौलें रखकर सोते थे, ताकि सपनों के काल्पनिक शत्रु से मुकाबला किया जा सके। कहा जाता है कि बहुत सी रातों में उनके कमरे से पिस्तौलों के चलने की आवाज भी सुनाई देती थी।
3. जर्मन कवि शिलर अपनी मेज की दराज में सड़े हुए सेब भरे रखते थे। उनका कहना था कि वह सड़ी हुई गंध उसके मस्तिष्क को जगाये  रखती है।
4. रूसी साहित्यकार चेखव को घड़ी सामने रखकर लिखने की आदत थी। हर वाक्य की समाप्ति पर उनकी निगाह घड़ी पर होती थी।
5. बॉक्स आर्नाल्ड बैनेट करीब 15 वर्ष तक सदैव अपनी जेब में शिलिंग के वे सिक्के रखे रहे जो उन्हें प्रथम लेख के पारिश्रमिक स्वरूप मिले थे।
6. विख्यात लेखक और कलाकार लियोनार्ड द विंसी के लिखे अक्षर कुछ गिने-चुने विशेषज्ञ ही पढ़ और समझ पाते थे। वह औरों की भांति बाएं से दाएं न लिखकर, दाएं से बाएं लिखते थे।
7. फ्रांस के प्रसिद्घ लेखक अलेक्जेंडर ड्यूमा को रंग-बिरंगे कागजों की सनक थी। वे उपन्यास नीले कागज पर, कविता पीले कागज पर और लेख गुलाबी कागज पर लिखा करते थे।
8. जॉर्ज ऑर्वेल, मार्क ट्वेन, एडिथ वार्टन, विंस्टन चर्चिल और मार्सेल प्रोउस्ट आदि लेखक अपना अधिकतर लेखन बिस्तर में लेट कर ही करते थे।

खड़े हो कर लिखने वाले लेखक -अर्नेस्‍ट हेमिंग्वे



नोबल पुरस्‍कार विजेता अर्नेस्‍ट हेमिंग्वे ऐसे अकेले लेखक नहीं थे जो खड़े खड़े लिखते या टाइप करते हों। उनकी इस बिरादरी  में चार्ल्‍स डिकेंस, वर्जीनिया वुल्‍फ, लेविस कैरोल और फिलिप रोथ जैसे लेखक भी रहे जो आजीवन खड़े हो कर लिखते रहे। (लेट कर लिखने वाले भी कम नहीं हैं, लेकिन उनकी चर्चा  बाद में)।
हेमिंग्वे का सजा सजाया अध्‍ययन कक्ष था लेकिन जैसा कि आप इस तस्‍वीर में देख सकते हैं, वे अपने अस्‍त व्‍यस्‍त बेड रूम में ही खड़े हुए साहित्‍य रच रहे हैं। उनकी खड़ी मेज पर ही जरूरत की सारी चीजें धरी रहतीं। वे अपना वज़न कभी इस पैर पर डालते और कभी उस पैर पर लेकिन ये नहीं कि भइया थक गये हो तो जरा बैठ कर सुस्‍ता ही लो या टाइप राइटर ही नीचे उतार लो। यही नहीं कर पाते थे वे।
लिखने के लिए उन्‍हें सुबह का वक्‍त सबसे अच्‍छा लगता। भोर की पहली किरण के उगते ही वे अपने काम पर लग जाते। वे मानते थे कि ये ऐसा वक्‍त होता है जब आपको कोई डिस्‍टर्ब नहीं करता। हवा खुशगवार होती है और मूड एकदम ताजा। जो लिखा है उसे पढ़ते जाओ और ठीक भी करते जाओ। एक बार काम में जुट जाओ तो किसी भी बात की परवाह नहीं रहती। सुबह काम करने का वे ये भी फायदा गिनाते कि पता होता है कि रचना में अब क्‍या होने वाला है और कहां जा कर रुकना है। वे अमूमन 500 शब्‍द प्रतिदिन टाइप करते थे।
एक रोचक बात ये भी थी कि हालांकि हेमिंग्वे खूब पीते थे लेकिन पी कर लिखने का, ड्रिंक एंड टाइप का काम एक साथ उन्‍होंने कभी नहीं किया। इसका कारण यही समझ में आता है  कि लिखने का काम वे सुबह करते थे और पीने का काम रात में।

डॉक्टर राही मासूम रज़ा- शोर शराबे में लिखने वाले लेखक



डॉक्टर राही मासूम रज़ा (1925-1992) अपने घर पर ही, बच्‍चों के शोर शराबे के बीच ही लिख पाते थे। संगीत बज रहा हो, बच्‍चे खेल रहे हों, सब जन आपस में बात भी कर रहे हों और खूब धूम धड़ाका हो घर में तो ये उनके लिखने के लिए सही माहौल होता था।
जब अपने मूल लेखन पर काम कर रहे हों तब तो कोई बात नहीं होती थी। पूरी तन्‍मयता से काम कर सकते थे लेकिन जब दो तीन फ़िल्मों की स्क्रिप्ट पर एक साथ काम कर रहे हों तो बेहद रोचक स्‍थिति बनती। तीनों फ़िल्मों की स्क्रिप्ट सामने रख लेते। एक पर काम करना शुरू किया। जब उसका काम पूरा हो गया तो वहां से दिमाग़ को स्विच ऑफ़ किया और वहीं बैठे बैठे दूसरी स्क्रिप्ट पर काम शुरू। फिर दूसरी से स्विच ऑफ़ और तीसरी पर काम शुरू।
उन्‍होंने कभी भी फिल्‍मी लेखन के लिए होटल के महंगे कमरों की मांग नहीं की। वे घर पर ही शोर शराबे के बीच लिख पाते थे। हां, उन्‍हें दिन में कम से कम पचास बार बिना चीनी और बिना दूध की काली चाय की दरकार होती।

नये लेखकों को प्रेरित करने का उनका तरीका अनूठा था। वे कहते कि अगर कोई लेखक अपने पहले के लिखे से आगे न बढ़ कर पहले भी खराब लिख रहा है तो उसकी पिटाई करनी चाहिये। अगर वह अपने पहले जैसे ही लिख कर बेहतर काम नहीं कर रहा है और अपने आपको दोहरा रहा है तो उसे लतियाया जाना चाहिये और अगर कोई लेखक लगातार बेहतर लिख कर अपने आपको संवार रहा है तो भी उसे कंधे पर तो नहीं ही बिठाया जाना चाहिये, हां उसके कंधे जरूर थपथपा देने चाहिये

लेखकों की बातें – किस्‍सा तेइस

लेखकों की बातें – किस्‍सा तेइस।
पहाड़ पर जाकर लिखने वाला गरीब लेखक

आधुनिक पंजाबी उपन्यास लेखन के जनक नानक सिंह (1897-1971) की माली हालत ऐसी नहीं थी कि पहाड़ों पर जा कर अपने उपन्‍यास लिखें। वैसे भी फ्री लांस राइटर थे, नौकरी करते नहीं थे। लेकिन उन्‍होंने अपने कई उपन्‍यास धरमशाला, डलहौज़ी, मैकलोड गंज, कश्मीर आदि जगहों पर जा कर लिखे।
सवाल उठता है कि जब घर का खर्च चलाने के लाले पड़े हुए हों तो कोई लेखक भला महीनों तक पहाड़ों पर जा कर लिखने की कैसे सोच सकता है।
दरअसल नानक सिंह फुल टाइम लेखक थे। कुछ और करना न तो आता था और न ही उनके बस में था। उपन्‍यास लिखना ही उनका काम था जिसके लिए वे पहाड़ों पर जाते थे। वहीं लिख पाते थे। वहां जायेंगे नहीं तो लिखेंगे कैसे और लिखेंगे नहीं तो घर का खर्च कैसे चलायेंगे। बच्‍चों की फीस कहां से देंगे।
पहाड़ पर लिखना भी उनके लिए मजदूरी करने जैसा ही था। खुद ही अंगीठी या स्टोव पर चाय बनाना, खुद रोटी पकाना, अपने कपड़े धोना, कमरे की सफाई करना। वहीं खाना पकाना, वहीं लिखना और वहीं सो रहना। कभी ज्‍यादा लिखा और खाना बनाने का मन नहीं किया तो आस पास के ढाबे पर चले गये।
आप कल्‍पना कर सकते हैं कि उनके सारे उपन्‍यासों के अनगिनत पात्र उनके घनघोर अकेलेपन से निकल कर आये हैं। बस वे होते और उनके पात्र होते। इन पात्रों को वे कागजों पर उतार उतार कर चारपाई के नीचे फेंकते जाते।
पीने के नाम पर वे कहवा ही पीते थे। शायद ये बात भी रही हो कि वे कुछ और पीना एफोर्ड ही न कर पाते हों।
वे बेहद विनम्र, धीर धरने वाले और साधु स्‍वभाव के लेखक थे तभी तो वे पंजाबी और इस तरह से विश्‍व साहित्‍य को पवित्‍तर पापी, आदमखोर और एक म्‍यान दो तलवारें जैसी अमर कृतियां दे गये। उनके 7 कहानी-संग्रह, 2 नाटक, 11 कविता-संग्रह और 35 उपन्यास हैं। उन्‍हें 1961 के साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

नागर जी का कानपुर



हिंदी के महान साहित्यकार अमृत लाल नागर (1916-1990) घर के अन्दर तख़्त पर बैठ कर लेखन कार्य करते थे। लिखने का समय सुबह का ही रहता। जब वे अपने तख्‍त पर लिखने के लिए आसन जमा लेते तो अपनी पत्‍नी प्रतिभा से कह देते कि यदि कोई मिलने आये तो कह देना कि नागर जी कानपुर गये हैं। यही तख्‍त ही उनका कानपुर था। कोई बहुत ही सगा या प्रिय आ कर उन्‍हें प्‍यार भरी आवाज में पुकारता तभी वह अपने कानपुर से लौटते। नहीं तो लिखने का काम पूरा होने तक अपने कानपुर में ही जमे रहते।
अपने पात्रों से बहुत जूझते थे नागर जी और तभी उन्‍हें कागज पर उतारते जब उन्‍हें लगता कि हां अब मेरे पात्र जीवंत हो उठे हैं।
रात देर तक पढ़ते थे वे लेकिन लिखते समय अगर किसी विकट स्‍थिति में फंस जाते तो नागर जी मूड फ्रेश करने के लिए मेरठ से छपने वाले सस्‍ते जासूसी उपन्‍यास पढ़ते थे।
उनकी पत्‍नी ने उन्हें सारे सांसारिक झमेलों से मुक्‍त कर रखा था और वे इस बात को मानते भी थे। अपने खुद के बाहरी कामों में वे इतने भोले थे कि एक बार  अपनी रायल्‍टी का चेक जमा कराने गये और चेक ही कहीं खो आये।
शाम उनकी भाँग की महफिलों के लिए सुरक्षित रहती।
उन्‍होंने कुछ उपन्‍यासों की डिक्‍टेशन भी दी थी। प्रसिद्ध कहानीकार मुद्राराक्षस ने भी उनके उपन्‍यासों की डिक्‍टेशन ली थी।
उनके एक उपन्‍यास बूंद और समुद्र में एक हवेली का जिक्र आता है। नागर जी ने बाकायदा उस हवेली का नक्‍शा बना रखा था। पूछने पर बताते कि भई आजकल मैं सारा दिन इसी हवेली में रहता हूं। मुझे पता तो होना चाहिये ना कि इसका कौन सा दरवाजा किस तरफ खुलता है और आँगन में धूप आती है या नहीं।
उनका डाक का पता बहुत आसान था- नागर जी, चौक, लखनऊ।

लेखकों की रोचक आदतें



• जॉर्ज बर्नार्ड शॉ गिन कर पाँच पेज प्रतिदिन लिखते थे। पांचवें पेज का आखिरी वाक्‍य अगर अधूरा रह गया तो वे उसे अधूरा ही छोड़ देते थे और अगले दिन पूरा करते थे। किसी वजह लेखकोंसे अगर किसी दिन अगर साढ़े चार पेज लिखे तो अगले दिन साढ़े पाँच पेज लिख कर कोटा पूरा कर लेते थे।।लेखकों
• थॉमस मान दिन में औसतन चार सौ शब्द लिखा करते थे।
• लायन फ्यूशवेंगर दो हज़ार शब्दों की डिक्टेशन दिया करते थे जिनसे छ: सौ लिखे हुए शब्दों का प्रतिदिन का औसत आता था।
• सामरसेट मॉम चार सौ शब्द प्रतिदिन लिखा करते थे ताकि लिखने का अभ्यास बना रहे। वे अपने को अंधविश्वासी तो नहीं मानते थे लेकिन फिर भी वे अपने लिखने के कागजों, पुस्तकों की जिल्दों, घर के प्रवेश द्वारों, यहां तक कि ताश की अपनी गड्डियों के सारे पत्तों पर भी दुष्ट नेत्र का चिन्ह अंकित करवाते थे। लिखते समय वे सदैव अपने पास एक ताबीज रखते थे ताकि दुष्ट प्रकृति वाली वस्तुओं का उनके मस्तिष्क पर प्रभाव न पड़े।
• एच जी वेल्स का एक हज़ार शब्द प्रति दिन लिखने का औसत आता था।
• चार्ली चैप्‍लिन लगभग एक हज़ार शब्द प्रतिदिन की डिक्टेशन देते थे। इनसे उनकी फिल्मों के लिए तैयार संवादों का लगभग तीन सौ शब्दों का औसत आता था।
• प्रसिद्घ फ्रांसीसी उपन्यासकार बाल्जाक लिखते समय अपनी बगल में जलता दीप रखते थे। दोपहर की तीखी रौशनी में भी उनकी बगल में दीप जलता रहता। मजे की बात, पायजामा और ड्रेसिंग गाउन पहनकर ही उन्हें लिखने की प्रेरणा मिलती थी।
• चार्ल्स डिकेंस अपने साथ हमेशा एक कम्पास रखते थे। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि यदि वह उत्तर दिशा में सिर रखकर नहीं सोएंगे तो उन्हें मौत उठा ले जाएगी। वह जहां कहीं भी गए हमेशा उस कम्पास की सहायता से उत्तर की ओर सिर करके सोते रहे।

विदा हो गयीं किताबें बेटियों की तरह


मित्र लोग किताबों की मेरी पोस्‍ट का इंतजार करते हैं।  दिसम्‍बर 2011 में मैंने अपनी पूरी लाइब्रेरी (लगभग 4000 किताबें) फेसबुक के जरिये उपहार में दे दी थीं। उस समय की एक पोस्‍ट आज फिर से साझा कर रहा हूं।

विदा हो गयीं किताबें बेटियों की तरह
आज का दिन मेरे लिए खास मायने रखता है। दूसरे शहरों में जाने वाली किताबों के पार्सल आज रवाना हो गये। स्थानीय बेटियां तो चौबीस और पच्चीस दिसम्बर को पहले ही विदा हो चुकी थीं। ये सोच कर बहुत सुख मिल रहा है कि हमारी सभी बेटियों को अच्छे, पढ़़े लिखे घर-बार मिल रहे हैं। कुछ साहित्यकारों के घर गयी हैं तो कुछ नवोदित लेखकों और ब्लागरों के घर। अलग-अलग स्कूलों में बच्चों के संग-साथ रहने के लिए सबसे ज्यादा किताबें गयी हैं। कुछ एनजीओ दूर दराज के इलाकों में गरीब, ज़रूरतमंद और पढ़ाकू बच्चों के लिए पुस्तकालय और वाचनालय चलाते हैं। वे इन किताबों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं।
हमारी अपनी बेटियां नहीं हैं। यही सही। किताबों को बेटियों की तरह विदा करने का सुख तो पाया जा सकता है। हम बेहद खुश हैं। बेहद। मैंने हर किताब पर एक मोहर लगायी है कि उसे पढ़ने के बाद किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दिया जाये। विश्वास कर रहा हूं जिनके घर में भी ये किताबें पहुंचेंगी, वे मेरी इस बात का मान रखेंगे और किताबों को नये पाठकों तक पहुंचाने के मिशन में सार्थक भूमिका निभायेंगे।
अभी भी हिंदी और अंग्रेजी की तीन-चार सौ किताबें हैं जो अपनी विदाई की तारीख की राह देख रही हैं। आने वाले दिनों में मैं लगातार यात्राओं पर रहूंगा। बाद में उनकी विदाई की तारीख तय पाऊंगा। यह भी बाद में तय हो पायेगा कि किस किताब को किसके घर जाना है।
आमीन
27 दिसम्‍बर 2011

किताबें आपके द्वारे



नासिक में एक कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान है। इनकी एक योजना है - ग्रंथ तुमच्या दारी" (पुस्‍तक तेरे द्वारे)। अगर आप अपने घर के आसपास 35 पुस्‍तक प्रेमी सदस्य बना सकते हैं तो कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान  नासिक से आप को 400 मराठी किताबों से भरी एक संदूक दी जाएगी। यह संदूक आपके आंगन में 4 महीने रहेगी। आप अपने आस पास जो पुस्‍तक प्रेमी जुटायेंगे वे चार महीने तक इन पुस्‍तकों को आनंद लेंगे और फिर अगले 4 महीने के लिये यह संदूक अपनी अगली यात्रा पर निकल जायेगी और आपके पाठकों के लिये 400 नयी किताबों का उपहार ले कर एक नयी संदूक आपके द्वारे आयेगी। मात्र 4 महीने तक इन पुस्तकों और संदूक सम्हालने का काम इन 35 सदस्यों मे से किसी एक को करना होता है। अपनी मनचाही पुस्तकें भी आप सुझाव देकर संदूक में रखने के लिये कह सकते हैं।
"पुस्तक तुमच्या दारी" योजना के बारे में अधिक जानकारी आप कुसुमाग्रज प्रतिष्ठान की वेबसाइट से ले सकते
हैं। इसके अलावा संस्‍थान  की और से साहित्‍य के विशिष्‍ठ सम्‍मान  दिये जाते हैं, परीक्षाएं ली  जाती हैं और  संगीत की शिक्षा भी दी जाती है।
वेबसाइट http://www.kusumagraj.org/
ईमेल  kusumagraj.p@gmail.com
फोन  0253- 2576125
(प्रसंगवश : मैंने अपने घर पर काम करने वाली बाई से पूछा कि क्‍या वह कुसुमाग्रज जी के बारे में जानती है  तो उसने न केवल कुसुमाग्रज जी के बारे में गर्व से बताया बल्‍कि मराठी के दस और कवियों लेखकों के नाम गिना दिये।)

एक किटी पार्टी किताबों वाली


(यह पोस्‍ट कुछ महीने पहले किसी अन्‍य संदर्भ से डाली गयी थी। इसका खास महत्‍व है इसलिए दोबारा आपके लिए)

हमारी एक मराठी भाषी मित्र हैं अनिला फड़नवीस। लिखती तो नहीं लेकिन पढ़ती खूब हैं। मूड आये तो अपनी ही खुशी के लिए कुछ न कुछ अनुवाद कर लेती हैं। एक संस्थान में लाइब्रेरियन हैं। अगले महीने नौकरी से रिटायर हो रही हैं।
एक दिन मैंने यूं ही पूछ लिया कि अब आगे के लिए क्‍या योजना है। उन्‍होंने जो कुछ बताया वह मेरे लिए हैरान करने वाला तो था ही, सोच को एक नयी दिशा देने वाला भी था।
बताया उन्‍होंने - अरे अपनी मंथली किटी पार्टी है ना उसी का और विस्‍तार करना है। पहले उसे पाक्षिक और फिर वीकली करने की योजना है। उसकी और यूनिट्स खोलने का काम करना है।
मैं हैरान हुआ – आप और किटी पार्टी। मैं सोच भी नहीं सकता कि आप किटी पार्टी में जाती होंगी और रिटायरमेंट के बाद उसी को पूरा समय देने के बारे में सोच रही हैं।
वे हँसने लगीं – आप जो समझ रहे हैं, ये वो वाली किटी पार्टी नहीं है। ये किताबों वाली किटी पार्टी है।
दोबारा हैरान होने की बारी थी - किटी पार्टी किताबों वाली। ये कैसी किटी पार्टी होती है।
बताया उन्‍होंने – हम बीस लेडीज़ का एक ग्रुप है। सब की सब हर महीने एक बार आखिरी रविवार को मिलती हैं। बारी बारी से एक एक की मेहमान बनती हैं। जैसे किटी पार्टी की मेम्‍बर्स मिलती हैं, वैसे ही। हम भी कंट्रीब्‍यूट करती हैं उनकी तरह। सौ रुपया महीना। खाती पीती भी हैं लेकिन हमारे मिलने का मकसद अलग होता है। जिसकी बारी आती है, वह इन दो हजार रुपयों की अपनी पसंद की नयी किताबें मंगवाती है। मराठी में आज भी कमीशन के बाद सौ रुपये में स्तरीय और अच्‍छी किताबें मिल जाती हैं।
इस किटी पार्टी में तीन काम होते हैं। पिछली पार्टियों में ले जायी गयी किताबें इस पार्टी में सब वापिस लाती हैं। पहले से तय योजना के अनुसार सबके घर अलग अलग साहित्‍यिक पत्रिकाएं आती हैं। वे भी लायी जाती हैं। बहुत रोमांचक होते हैं वे पल जब सब सामने रखी ढेर सारी नयी और पुरानी किताबों और पत्रिकाओं में से सबको अपनी पसंद की किताबें और पत्रिकाएं चुनने का मौका मिलता है। ये अदला बदली हर बार चलती रहती है। हर बार सबके हिस्‍से में न पढ़ी गयी पुरानी किताबें और एक नयी किताब आती है। पत्रिकाएं भी।
उसके बाद मेजबान सदस्‍या की ओर से खाना पीना होता है। पढ़ी गयी किताबों पर पूरी गंभीरता से बात होती है। कुछ किताबों के सार बताये जाते हैं और कुछ किताबों की समीक्षा की जाती है। सब की सब उन किताबों से गुजरने के अनुभव शेयर करती हैं। उन किताबों की भी बात होती है जो इनके अलावा किसी के हाथ लग गयी होती है और पढ़ ली गयी होती है।
पार्टी के आखिर में अगली मेजबान के नाम की पर्ची निकाली जाती है, अगली बार खरीदी जाने वाली किताबों के नाम सुझाये और कुछ हद तक तय किये जाते हैं और ये तय किया जाता है कि अगली बार की किटी पार्टी में कौन कौन किताबों पर बोलेंगी। हां, दीवाली वाले महीने में इसमें थोड़ा फेर बदल होता है। दीवाली के मौके पर मराठी में सौ से ज्‍यादा पत्रिकाएं अपने विशेषांक निकालती हैं। कई पत्रिकाएं तो ऐसी हैं जो सिर्फ दीवाली पर वार्षिक अंक ही निकालती हैं।  इन पत्रिकाओं का हम बेसब्री से इंतजार करते हैं। वर्ष का सर्वश्रेष्‍ठ साहित्‍य इनमें छपता है। पूजा के अवसर पर जिस तरह बांग्‍ला भाषा में सैकड़ों पत्रिकाएं छपती हैं और कई बांग्‍ला लेखक इन्‍हीं पत्रिकाओं के माध्‍यम से घर घर पहुंचते हैं, वही परम्‍परा मराठी में भी है। आपको हैरानी होगी कि मराठी का हर बड़ा लेखक हर घर के लिए अपना-सा और परिचित नाम है और उन्‍हें घर घर पहुंचाने में इन दीपावली अंकों की बहुत बड़ी भूमिका है। दीपावली से पहले ही हर आफिस में काम करने वाले दस बीस लोग आपस में ग्रुप बना लेते हैं और सामूहिक रूप से पत्रिकाओं के दीपावली अंक खरीदते और मिल जुल कर पढ़ते हैं।
हम चाह कर भी सारी या अपनी पसंद की चुनिंदा पत्रिकाएं नहीं खरीद सकते। हजारों रुपये चाहिये और पढ़ने के लिए ढेर सारा समय भी। ऐसे में हमारी किटी पार्टी ही यह काम करती है। सब मेम्‍बर अपनी अपनी पसंद की पत्रिकाएं सुझाती हैं और फिर बारी बारी से पढ़ती और अपने पास रखती हैं।
मैं हक्‍का बक्‍का। रोमांचित भी। अवाक भी। यही पूछ पाया – इसका योजना का  विस्‍तार आप किस रूप में करना चाह रही हैं।
वे मुस्‍कुरायी - बहुत आसान है। मराठी माणूस को किताब, पत्रिका, नाटक और संगीत के कार्यक्रम के लिए पूछना नहीं, बताना पड़ता है। बाकी काम बहुत आसान है।
मैं अपनी तरफ से क्या कहूं।

खराब किताबें



राज्‍य का नाम नहीं लूंगा। वहां की राजधानी में राज्‍य स्‍तरीय साहित्‍य परिषद टाइप की एक संस्‍था में किसी काम से गया। वहां बरामदे में चार आदमी बड़ी बेरहमी से किताबों के ढेर के ढेर फाड़ने में लगे हुए थे। मैं हैरान हुआ। दो चार किताबें उठा कर देखीं। कुछ तो संस्‍था द्वारा ही छापी गयी थीं और कुछ संस्‍था को ही भेंट की गयी थीं या पुरस्‍कार आदि के लिए जमा करायी गयी थीं। पूछा उनसे कि क्‍यों फाड़ रहे हो तो वे बोले कि हम रद्दी खरीदने वाले लोग हैं। किताबें फाड़ने के बाद ही वे रद्दी कहलाती हैं। तो मैंने पूछा कि आप किताबें भी तो खरीद सकते हो। वे मासूमियत से बोले कि हमारा टेंडर रद्दी के लिए होता है। किताबों के लिए नहीं।
मैंने भीतर जा कर प्रशासन अधिकारी से जितने भी सवाल पूछे, सबके जवाब ये थे - जिन लेखकों की किताबें छापने के लिए हम आर्थिक सहयोग देते हैं, उनकी कुछ प्रतियां हमें रखनी होती हैं। कई बार हम ही लेखक की किताबें छापते भी हैं। लेखक कई बार अपनी प्रतियां याद दिलाने के बाद भी नहीं ले जाते। इसके अलावा लोग अपनी किताबें भेजते रहते हैं। कहां तक रखें उनको और क्‍यों और कैसे रिकार्ड रखें उनका। स्‍कूल कालेज वाले फ्री में भी लेते नहीं। उन तक पहुंचाये कौन। सदस्‍य भी फ्री में भी ले जाने को तैयार नहीं। हार कर हमने पुरानी किताबें खरीदने वालों को ये स्‍टॉक बेचना शुरू किया तो वे बेशक तौल कर ले जाते थे लेकिन अपनी पूंजी को रोते थे। कहते थे पूरे साल में एक किताब भी नहीं बिकती। हर बरस का ही रोना है साहब। हर बरस कमरा भर जाता है ऐसी किताबों से। रद्दी में निकालनी ही पड़ती हैं। वैसे आप चाहें तो अपने लिए दस बीस किताबें चुन सकते हैं।

ये सुनते ही मैंने बाहर जाने का रास्‍ता पूछने में ही खैरियत समझी।
यही सोचा कि चलो इस धरती से कुछ तो खराब किताबें कम हो रही हैं। बेशक अगले बरस इतनी और जुड़ जायेंगी।

The second sex - उस तरह की किताब




बात 1989 की है। तब मैं अहमदाबाद पहुंचा था। मेरे ऑफिस से 200 कदम की दूरी पर ही गुजरात विद्यापीठ थी। विद्यापीठ का पुस्‍तकालय बहुत अच्‍छा था। मैंने पहला काम ये किया कि वहां की लाइब्रेरी की सदस्‍यता ली ताकि पढ़ने के लिए अच्‍छी किताबें मिलती रह सकें। इसके अलावा शनिवार की दोपहर हम सब लिखने पढ़ने वाले वहीं पर अड्डेबाजी किया करते थे।
तब तक प्रभा खेतान ने सिमोन द’ बुआ की the second sex का स्‍त्री उपेक्षिता के नाम से अनुवाद नहीं किया था। मैं the second sex को कैटेलॉग में तलाशता रहा, किताब न लेखिका के नाम से मिली और न ही किताब के नाम से ही, तो मैं  काउंटर पर आया। काउंटर क्‍लर्क ने कागज पर किताब का नाम देखते ही मेरी तरफ अजीब सी निगाहों से देखा और गुजराती में बुदबुदाया – इस किस्‍म की किताबों की एंट्री जनरल कैटेलॉग में नहीं होती। मेरा सवाल था- तो कहां होती हैं एंट्री और मुझे कैसे मिलेगी?
उसने मुझे सहायक लाइब्रेरियन के पास भेज दिया।
सहायक लाइब्रेरियन ने भी किताब का नाम देखते ही भाषण पिलाना शुरू कर दिया - आपको तो पता ही है ये विद्यापीठ महात्‍मा गांधी का संस्‍थान है। हम यहां सिर्फ चरित्र निर्माण वाली किताबें ही रखते हैं। मेरा सिर पीटने का मन हुआ, फिर भी मैंने धैर्य से कहा – ये किताब ऐसी वैसी नहीं है। यह महिलाओं की बेहतरी के बारे में बेहतरीन किताब है। क्‍या लाइब्रेरी में है ये किताब? वह अपनी रागिनी बजाता रहा- दरअसल इस तरह की किताबें खरीदने के लिए एक खास कमेटी बनती है और पूरी छानबीन के बाद ही इस तरह की किताबें खरीदी जाती हैं और उन्‍हें एक अलग कमरे में रखा जाता है।  आखिर हम चरित्र निर्माण...।
अब तक मेरा माथा सटक चुका था। मैंने उस महाशय से कहा कि एक मिनट के लिए अपना सिंहासन छोड़ कर मेरे साथ चलें। उन्‍होंने पूछा कि कहां जाना है। मैंने उनसे कहा कि आप आयें तो सही, कुछ दिखाना है। वे बेमन से मेरे साथ चले। मैं उन्‍हें कॉमन टाइलेट्स और पेशाब घर तक लाया और उनसे कहा – अब आप अपनी आंखों से देखिये और बताइये, ये सारी अमृत वाणी और चित्रकारी किसकी देन है। आपका वह डंडे और मूंछों वाला वॉचमैच गैर सदस्‍यों तो को अंदर घुसने नहीं देता, तो राह चलता आदमी तो ये सब  लिखने आया नहीं होगा। या तो ये आपके स्‍टाफ का काम है या फिर उन सदस्‍यों का जिनके चरित्र निर्माण की चिंता में आप दुबले हुए जा रहे हैं। और उनके लिए दे सेकेंड सैक्‍स जैसी किताब भी बैन कर रखी है। यही है आपके चरित्र निर्माण के प्रयासों का नतीजा। बताइये ये सारा अश्‍लीलतम साहित्‍य यहां किसने रचा है।
पाठक, आप सच मानें, वहां दीवारों पर एक इंच की जगह भी खाली नहीं थी जहां सचित्र रास लीलाओं की झांकियां व्‍याख्‍या सहित न रची गयी हों।
वे चुप थे। इतने बरसों की नौकरी में वे पहली बार लाइब्रेरी के पब्‍लिक टाइलेट्स में आये थे और देख कर हैरान थे।

अब मुझे दो बातें कहनी हैं। 1995 में अहमदाबाद से मेरे लौटने तक न तो मुझे द सेकेंड सैक्‍स वहां से पढ़ने के लिए मिल पायी थी और न ही तब तक उन टाइलेट्स में पुताई करवा कर उस साहित्‍य को हटाने छुपाने की कोई कोशिश ही की गयी थी।

द बर्मीज़ डेज़



जॉर्ज आर्वेल का एक उपन्यास है - । उसमें एक प्रसंग है कि अंग्रेज अफसर पी कर धुत्त पड़ा हुआ है और उसे मच्छर काट रहे हैं। तभी उसका एक दोस्त आता है। उसकी ये हालत देख कर वह दोस्त नौकर को बुरी तरह से डांटता है - तुम्हें  शरम नहीं आती मालिक को इस हालत में छोड़ रखा है। देखो कितने मच्छर हैं। तुम कुछ करते क्यों नहीं।
नौकर भोलेपन से जवाब देता है – साब जी, जब हमारा साब पी कर आता है तो आधी रात तक उनको पता नहीं चलता कि‍ मच्छर किधर हैं और बाकी आधी रात के बाद मच्छरों को पता नहीं चलता कि‍ साब किधर है।

ज्‍यां जेने - उठाईगिरी से सम्‍मानित लेखन तक का सफ़र



ज्‍यां जेने (Jean Genet 19 दिसम्‍बर 1910 – 15 अप्रैल 1986) ऐसे फ्रांसीसी उपन्‍यासकार, नाटककार, कवि, निबंधकार और राजनैतिक एक्‍टिविस्‍ट रहे हैं जिन्होंने अपना जीवन उठाईगिरी, टुच्‍ची चोरी चकारियों और इसी तरह के अपराधों से शुरू किया था। उनके उपन्‍यासों में Querelle of Brest, The Thief's Journal, और Our Lady of the Flowers, तथा नाटकों में The Balcony, The Blacks, The Maids और The Screens शामिल हैं।
• जेने की मां वेश्‍या थी। कुछ महीने जेने को पालने के बाद मां ने उन्‍हें पालना घर में रखवा दिया था। यहां एक बढ़ई ने जेने को पाला। पढ़ाई में अच्‍छे अंक लाने के बावजूद वे कुसंगति में पड़ गये और चोरी चकारी करने लगे। वे दो एक बार घर से भी भागे।
• बढ़ई पिता के बाद वे एक अधेड़ परिवार के साथ रहे। वहां वे रात को अक्‍सर चेहरा ढांप कर अपने धंधे पर निकल जाते। एक बार कहीं पहुंचाने के लिए जेने को ढेर सारा धन दिया गया लेकिन जेने उसे बीच में ही गायब कर गये।
• इस घटना के लिए और दूसरी हरकतों के लिए जेने को पंद्रह बरस की उम्र में लगभग ढाई बरस तक एक तरह से सुधार गृह में रखा गया। अपनी किताब The Miracle of the Rose (1946) में उन्‍होंने इस सज़ा का लेखा जोखा दिया है। उन पर समलैंगिकता का भी आरोप लगा। चोरी करने, जाली कागजा़त बनाने, बेजा हरकतें करने और दूसरे अपराधों की सज़ा के लिए उनके जेल जाने और छूटने का सिलसिला चलता रहा। जेल में ही जेने ने अपनी पहली कविता और उपन्‍यास Our Lady of the Flowers (1944) लिखे।
• बाहर आने पर पेरिस में जेने ज्‍यां कॉकटीयू से मिले। कॉकटीयू जेने के लेखन से खासे प्रभावित हुए और अपने संपर्कों से जेने का उपन्‍यास छपवाने में मदद की।
• हालत ये हो गयी कि 1949 में दस अपराध सिद्ध हो जाने के बाद जब ज्‍यां जेने को आजीवन कारावास की सज़ा देने की नौबत आ गयी तो कॉकटीयू और ज्‍यां पॉल सार्त्र और पाब्‍लो पिकासो सहित गणमान्‍य नागरिकों ने ज्‍यां जेने की सज़ा को माफ कर देने के लिए फ्रांस के राष्‍ट्रपति के आगे गुहार लगायी। इसके बाद जेने को कभी जेल नहीं जाना पड़ा।
• 1949 तक ज्‍यां जेने पाँच उपन्‍यास, तीन नाटक और असंख्‍य कविताएं लिख चुके थे। लेखन में भी वे समलैंगिकता और अपराधों को परोसने से बाज नहीं आये।
• सार्त्र ने ज्‍यां जेने के अस्‍तित्‍ववादी विकास (बदमाश से लेखक) पर 1952 में एक लम्‍बा विश्‍लेषणात्‍मक लेख संत जेने लिखा था। इस लेख से ज्‍यां जेने इतने प्रभावित हुए कि अगले पाँच बरस तक एक अक्षर भी नहीं लिख सके। जेने अवसाद के शिकार भी हुए और आत्‍महत्‍या का प्रयास भी किया।
• 1968 के बाद वे राजनीति में सक्रिय हुए। 1970 में ब्‍लैक पैंथर्स ने उन्‍हें अमेरिका में आमंत्रित किया। वहां वे लेखन के अलावा लैक्‍चरबाजी भी करते रहे।
• लेखन की ही तरह उनकी राजनैतिक पारी अंतर्राष्‍ट्रीय मंच पर खासी महत्‍वपूर्ण रही।

किताबें चोरी की बातें


मैंने इन्‍हीं पन्‍नों पर लिखा था कि सबसे ज्‍यादा किताबें वही पढ़ी जाती हैं जो चुरा कर लायी गयी होती हैं। जब किताब देखते ही उसे चुरा लेने का दिल करे तो शायद उस स्‍थिति की तुलना किसी और स्‍थिति से नहीं की जा सकती। मैं साहित्‍य की चोरी को बहुत बुरा मानता हूं लेकिन किताबों की चोरी की खबरें मुझे रोमांचित करती हैं। मैं खुद कभी भी एक भी किताब नहीं चुरा पाया लेकिन मुझे पता है कि मेरे घर से कौन सी किताबों पर किन किन मित्रों ने हाथ साफ किये हैं। आज किताबों की चोरी की ही बात करते हैं।
कथाकार मनोज रूपड़ा जितने बड़े कथाकार हैं उससे बड़े कलाकार भी हैं। आज उनके पुस्‍तक चौर्य के तीन किस्‍से।
किस्‍सा एक : जनाब मनोज जी कथाकार मित्र मनीषा कुलश्रेष्‍ठ के साथ दिल्‍ली में एक बड़े प्रकाशक के यहां किताबें खरीदने गये। मनीषा ने किताबें देखीं, पसंद की, खरीदीं और बिल अदा करके एक बैग में डलवा लीं। मनोज ने एक मोटी सी, महत्‍वपूर्ण और महंगी किताब उठायी और मनीषा के बैग में ही डाल दी। दोनों बाहर आये। मनीषा को आज तक नहीं पता कि कब वह किताब उसके बैग में डाली गयी और बाहर आने पर निकाल भी ली गयी।
किस्‍सा दो: मनोज जी नागपुर में लोकमत समाचार के ऑफिस में गये। वहां साहित्‍य संपादक प्रकाश चंद्रायन की मेज पर विक्रम सेठ के उपन्‍यास एन ईक्‍वल म्‍यूजिक के अनुवाद सम सा संगीत की प्रति देख कर उनकी आंखें चमक उठीं। जब वे बाहर आये तो किताब उनके साथ चली आयी। बाद में प्रकाश जी ने भरे मन से उनसे कहा कि जो किताब आफिस से बाहर जाती है, उसका रिकार्ड रखना होता है। अब तुम किताब तो वापिस करोगे नहीं, हमारे लिए उसकी समीक्षा ही कर दो।
मनोज ने लोकमत समाचार से चुरायी गयी किताब की समीक्षा उसी अख़बार के लिए की और उसका मानदेय भी पाया।
किस्‍सा तीन: एक थे भाटिया साहब। किताबों की दुकान चलाते थे। मनोज वहां से एक किताब खरीदते और तीन किताबें चुरा लाते। लेकिन वह एक अच्‍छा काम ये करते थे कि किताब पढ़ने के बाद चुपके से वहां रख भी आते।
एक दिन भाटिया साहब ने मनोज को बुलाया और कहा- मुझे पता है कि तुम किताबें ले भी जाते हो और वापिस भी रख जाते हो। मैं बुरा नहीं मानता क्‍योंकि तुम्‍हारी नीयत साफ है। अब तुम ठहरे हलवाई। जब किताबें वापिस रखते हो तो उन पर हल्‍दी और तेल के दाग लगे होते हैं और वे बेचने लायक नहीं रहतीं। या तो तुम किताबों पर कवर चढ़ा कर पढ़ा करो या फिर भट्टी पर बैठ कर किताबें मत पढ़ा करो।

अब्राहम लिंकन की पहली किताब


अमेरिका के 16वें राष्‍ट्रपति अब्राहम लिंकन (फरवरी 12,1809 – अप्रैल 15, 1865) बेहद गरीब थे और बचपन में स्‍कूली और अपनी मन पसंद किताबें जुटा कर पढ़ पाना उनके लिए किसी ऐय्याशी से कम नहीं था। वे ढंग से स्‍कूली शिक्षा भी नहीं पा सके थे।
उन दिनों वे लकड़ियां चीर कर गुज़ारा कर रहे थे। अपने पड़ोसी क्राफोर्ड से उन्‍हें व्‍हिम्‍स की लिखी Life of Washington पढ़ने के लिए उधार मिल गयी। ये किताब उन्‍हें बुककेस बनाने के एवज में पढ़ने के लिए मिली थी। एक रात भयंकर आंधी आयी और किताब पूरी तरह से भीग गयी। एक तरह से बरबाद ही हो गयी।
सुबह किताब देखने लायक नहीं बची थी। नुक्‍सान हो चुका था और उसकी भरपाई नहीं हो सकती थी। हताश और निराश बालक लिंकन किताब के मालिक के सामने हाजिर हुए। उनके पास किताब की कीमत चुकाने के लिए धेला भी नहीं था इसलिए तय हुआ कि वे इस नुक्‍सान की भरपाई मज़दूरी करके करेंगे।  क्राफोर्ड सहमत हो गये और यह तय हुआ कि लिंकन किताब की कीमत 75 सेंट के बराबर मज़दूरी करके चुकायेंगे।
 - क्‍या ये किताब के नुक्‍सान की भरपाई होगी किताब की कीमत? भोले लिंकन ने पूछा था।
जवाब मिला था - अब ये किताब न तो मेरे लिए और न ही किसी और के लिए ही कोई मायने रखती है। मज़दूरी करने के बाद तुम इसे रख सकते हो, अगर किसी काम की बची हो।
लिंकन उसी हालत में किताब को लिये हुए घर लौटे और खुशी खुशी तीन दिन तक क्राफोर्ड के लिए लकड़ियां चीरने का काम किया। किताब अब उनकी हो गयी थी।
आप कल्‍पना कर सकते हैं कि बालक लिंकन ने किस तरह भीग कर बुरी तरह खराब हो गयी किताब का एक एक पन्‍ना अलग करके सुखाया होगा और उसे दोबारा सहेज कर पढ़ने लायक बनाया होगा।

फर्नांदो पेसोआ -छद्म लेखक



क्‍या आप किसी ऐसे कवि की कल्‍पना कर सकते हैं जो कम से कम 75 छद्म नामों से लिखता रहा हो और इन छद्म नामों में से उसके खुद के अलावा तीन नाम ऐसे हों जिन्‍हें अपनी भाषा के चार महत्‍वपूर्ण और दिशा बदलने वाले रचनाकारों में गिना जाता रहा हो।

फर्नांदो  पेसोआ ( जून 13, 1888  - नवम्‍बर 30, 1935) ऐसे ही पुर्तगाली कवि, लेखक, समीक्षक, अनुवादक, प्रकाशक और दार्शनिक थे। वे 20वीं शताब्‍दी के पुर्तगाली भाषा के बेहद महत्‍वपूर्ण रचनाकार माने जाते हैं। वे अंग्रेजी और फ्रेंच में भी लिखते थे और इन भाषाओं में अनुवाद भी करते थे।

• उन्‍होंने 6 बरस की उम्र में ही छद्म नामों से लिखना शुरू कर दिया था। छद्म नामों से लिखने का सिलसिला आजीवन चलता रहा। उनके रचे गये ये काल्‍पनिक लेखक न केवल अपनी भाषा शैली में एक दूसरे से अलग थे बल्‍कि अलग अलग धर्म के और व्‍यवसाय के थे। उनका नजरिया एक दूसरे से इतना अलग था कि यह कल्‍पना तक नहीं की जा सकती थी कि इन सबके पीछे एक ही लेखक काम कर रहा है। कुछ छद्म लेखक तो बदनाम भी हुए।
• पेसोआ ने डेविड मेरिक के नाम से अंग्रेजी में कहानियां भी लिखीं जो बदकिस्‍मती से अधूरी रहीं।
• 1912 में पेसोआ ने समीक्षक के रूप में एक निबंध लिख कर पुर्तगाली साहित्‍य जगत में तहलका मचा दिया।
• पेसोआ ने 1915 में कुछ समानधर्मा रचनाकारों के साथ मिल कर आधुनिक पुर्तगाली साहित्‍य को समर्पित एक पत्रिका भी निकाली जिसके दो ही अंक निकल सके। तीसरा अंक जो आर्थिक संकटों के चलते छप नहीं सका था, 1984 में खोज निकाला गया था और प्रकाशित किया गया था। इसमें पेसोआ अपने मूल नाम के अलावा छद्म नामों के साथ भी मौजूद थे।
• पेसोआ ने 1924-25 में आर्ट जरनल की स्‍थापना की जिसमें वे अपने ही सृजित छद्म नामों वाले लेखकों अल्‍बर्टो कैरो और रिकार्डो रेइस का गद्य छापते थे। वे अपने खुद के नाम से भी समीक्षाएं, लेख और अनुवाद दे कर साहित्‍य को समृद्ध करते रहे।
• पेसोआ ने 1925 में अंग्रेजी में गाइडबुक टू लिस्‍बन लिखी जो 1992 में ही छप सकी। उन्‍होंने कई पुर्तगाली किताबों के अंग्रेजी में अनुवाद भी किये।
• वे जाने माने ज्‍योतिषी भी रहे और अच्‍छी खासी फीस ले कर जनम पत्रियां बनाया करते थे। उन्‍होंने विख्‍यात महानुभावों की लगभग 1500 जनम पत्रियां बनायी थीं। मजे की बात उन्‍होंने खुद की और अपने बनाये छद्म लेखकों की भी जनम पत्रियां बनायीं। उनकी भविष्‍य वाणी अचूक मानी जाती थी।
• वे एक साथ कई वादों और विज्ञानों में दखल रखते थे और उन पर लिखते थे।
• पेसोआ जिन नामों से लिखते थे उनमें तीन Alberto Caeiro, Álvaro de Campos और Ricardo Reis प्रमुख है और इन तीनों की लेखन शैली, जीवन शैली और दर्शन उनसे बिल्‍कुल अलग हैं। ये चारों नाम पुर्तगाली साहित्‍य के चार नक्षत्रों की तरह हैं। चारों में कोई समानता नहीं जबकि दरअसल चारों पेसोआ ही हैं। पेसोआ का कहना है कि जो कुछ उनके छद्म लेखक लिख पाये, वे खुद नहीं लिख सकते थे।
• जीवन भर और 75 नामों से पत्रिकाओं में लिखने के बावजूद उनकी केवल तीन किताबें अंग्रेजी में और एक ही किताब पुर्तगाली में छप पायी थी। वे अपने पीछे लगभग 27000 अप्रकाशित कागज छोड़ गये थे और इन पर अगले 50 वर्ष तक काम होता रहा।
• वे लिस्‍बन में लीवर की खराबी के कारण 1935 में गुजरे। उनकी मृत्‍यु  के बाद ही उनके सारे रहस्‍यों से पर्दा उठा और उन्‍हें आशातीत ख्‍याति मिली।
• वे अपने ही छद्म नामों वाले लेखकों की आलोचना किया करते थे और उनके काम  की समीक्षा भी करते थे।
• कहा जाता है कि एक बार उन्‍होंने अपने ही एक छद्म लेखक की मृत्‍यु का समाचार अखबारों में दिया, उसकी याद में शोक सभा की रिपोर्ट प्रकाशित करायी और बताया कि उसमें कौन कौन लेखक शामिल हुए। तय है कि उस शोक सभा में पेसोआ के पैदा किये हुए लेखक ही शामिल हुए होंगे।

तू भी खुश, मैं भी खुश - किताबों के किस्‍से





ये किस्‍सा बहुत पुराना है। उस्‍मानिया युनिवर्सिटी, हैदराबाद का किस्‍सा है। खराब किताबों को अच्छी किताबें बना कर ठेलने का। विश्वविद्यालय के तेलुगु विभाग के रीडर उपन्यासकार थे और हिंदी विभाग की रीडर कहानीकार। दोनों ही औसत दर्जे के। अब दोनों के विभाग साथ साथ थे, तो रोज़ का साथ का उठना बैठना था। वे दोनों चाह कर भी अपने-अपने विषय के कोर्स में अपनी किताबें नहीं लगा सकते थे। लेकिन जहां चाह वहां राह।

दोनों किताबों के परस्पर अनुवाद कराये गये। अब हिंदी कहानीकार रीडर महोदया की अनूदित किताब तेलुगु में बीए के कोर्स में पढ़ायी जाने लगी और तेलुगु उपन्‍यासकार रीडर हिंदी के बीए में खपा लिये गये। दोनों खुश।

उमा शंकर जोशी -किताबों का सम्‍मान



उमा शंकर जोशी (21 जुलाई 1911 – 19 दिसम्‍बर 1988) प्रख्‍यात गुजराती कवि और स्‍कॉलर रहे। उन्‍हें कविता संग्रह निशीथ के लिए 1967 में ज्ञानपीठ सम्‍मान दिया गया था। एक मामूली अध्‍यापक से अपना कैरियर शुरू करते हुए वे गुजरात विश्‍वविद्यालय के उप कुलपति के पद तक पहुंचे। गुजराती जन मानस में उनके प्रति बहुत आदर है।
उनके पास बहुत से लेखक मित्र और प्रकाशक अपनी किताबें भेंट करने के लिए आते थे। सौजन्‍यवश वे किताबें स्‍वीकार करने से मना भी न कर पाते और चाह कर भी पढ़ने के लिए समय न निकाल पाते।
जब भी कोई लेखक अपनी किताब उन्‍हें सप्रेम भेंट करता तो वे भेंटकर्ता के सामने ही किताब दोनों हाथों में  थामते, पाँच सेकेंड के लिए आंखों से लगाते और फिर आंखें बंद करके 10 सेकेंड के लिए सीने से लगा लेते। तभी वे किताब नीचे रखते। भेंटकर्ता अपनी पुस्‍तक को इतने बड़े लेखक द्वारा दिये जा रहे सम्‍मान से गदगद हो जाता।
एक बार उनसे एक मित्र ने पूछा – मैं आपको भेंट की जाने वाली हर किताब को इसी तरह का सम्‍मान देते हुए देखता हूं। क्‍या सारी किताबें आपके लिए इतने सम्‍मान के योग्‍य होती हैं।
उमा शंकर जोशी बहुत भोलेपन से बोले – नहीं भाई, ऐसा तो नहीं है। लोग इतनी किताबें दे जाते हैं कि दस जनम में न पढ़ सकूं। अब यही करता हूं कि मैं किताब को पहले आंखों से और फिर दिल से लगाता हूं तो इस तरह किताब मेरे भीतर उतर जाती है। तब उसे पढ़ने की जरूरत नहीं रहती।
 उनके बारे में उनकी वेबसाइट umashankarjoshi.in से और जानकारी ली जा सकती है।

स्‍टीफन ज्‍वाइग की कहानी शतरंज



प्रसिद्ध लेखक स्‍टीफन ज्‍वाइग की एक कहानी शतरंज के खेल के बारे में है।

कहानी में एक कैदी है जिस पर मुकदमा चल रहा है। उसे इस अरसे में एक अकेली कोठरी में रखा गया है। कमरे में कुछ भी नहीं है। एक बार उसे सुनवाई के लिए दूसरी इमारत में ले जाया जाता है। कैदी सुनवाई वाले चेम्‍बर के बाहर अपनी बारी का इंतजार कर रहा है। तभी एक अधिकारी आता है और अपना ओवर कोट वहीं टाँग कर भीतर जाता है। कैदी को अचानक कोट की जेब से झांकती एक किताब नज़र आती है। किताब देख कर ही उसका ब्‍लड प्रेशर हाई हो जाता है। पढ़ने के लिए किताब....। वह अपने आपको रोक नहीं पाता और आखिर किताब चुरा ही लेता है।
जब तक वह सुनवाई के बाद अपनी कोठरी में नहीं पहुंच जाता, किताब का ख्‍याल उसे रोमांचित किये रहता है। वह बहुत प्‍यार से, उत्‍सुकता से किताब खोलता है। किताब देखते ही उसका सारा उत्‍साह मंद पड़ जाता है। किताब में विश्‍व प्रसिद्ध खिलाड़ियों की शतंरज की दो सौ चालें समझायी गयी हैं। वह किताब एक कोने  में फेंक देता है। लेकिन कहावत है कि न मामे से काणा मामा अच्‍छा होता है। वह किताब उठाता है और धीरे धीरे उसमें ध्‍यान  लगाता है। किताब में उसे रस आने लगता है। वह रोटी के टुकड़े बचा बचा कर उन्‍हें सुखाकर गोटियां बनाता है। फर्श पर लकीरें खींच कर शतरंज बनाता है। और दी गयी चालों के हिसाब से खेलता है। उसका समय अच्‍छा गुजरने लगता है।
एक अरसा बीत जाने पर वह सारी चालें इतनी बार खेल चुका है कि अब उसे खेलने के लिए शतरंज और गोटियों की जरूरत ही नहीं रही। उसे सारी चालें याद हो गयी हैं और वह मन ही मन खेल कर टाइम पास करता है।
बाद में छूटने पर एक बार वह समुद्री यात्रा कर रहा होता है। वहीं दो खिलाड़ियों में शतरंज का रोमांचक खेल चल रहा है। वह एक दर्शक की हैसियत से खेल में दखल देता है और अपनी चालों से सबको हैरान कर देता है। वहीं वह यह भेद खोलता है कि किस तरह से शतरंज की चालों वाली किताब चुरा कर उसने इस खेल में महारत हासिल की है।

सफदर हाशमी की किताबों पर कविता


सफदर हाशमी (12 अप्रैल 1954 – 2 जनवरी 1989) बेहतरीन नाट्य लेखक, अभिनेता, गीतकार, कवि और जुझारू रंगकर्मी थे। वे जन नाट्य मंच के नाम से दिल्‍ली और आसपास के इलाकों में नुक्‍कड़ नाटक करके जन जागृति की मुहिम चलाते थे। 2 जनवरी 1989 को जब वे साहिबाबाद में हल्‍ला बोल नाम का नुक्कड़ नाटक खेल रहे थे तो उन्‍मादी भीड़ ने उन पर जानलेवा हमला किया और वे शहीद हो गये थे। बच्‍चों के लिए उन्‍होंने बहुत खूबसूरत पोस्‍टर बनाये थे और कविताएं लिखी थीं।
आज किताबों पर उनकी एक खूबसूर कविता आपसे शेयर कर रहा हूं:

किताबें
करती हैं बातें
बीते ज़माने की
दुनिया की इंसानों की
आज की, कल की
एक - एक पल की
खुशियों की, ग़मों की
फूलों की, बमों की
जीत की, हार की
प्यार की, मार की !
क्या तुम नहीं सुनोगे
इन किताबों की बातें ?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं |
किताबों में चिड़ियां चहचहाती हैं
किताबों में खेतियां लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं
परियों के किस्से सुनाते हैं |
किताबों में रोकेट का राज है
किताबों में साइंस की आवाज़ है
किताबों का कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान का भंडार है |
क्या तुम इस संसार में
नहीं जाना चाहोगे ?
किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं 

आयन रैंड के उपन्‍यास पढ़ने वाला कामचोर क्‍लर्क




ये किस्‍सा लखनऊ का है। एक आइएएस अधिकारी ट्रांसफर हो कर अपने नये विभाग में पहुंचा। उसने देखा कि वह जिस पैसेज से हो कर अपने चैंबर तक पहुंचता है, वहीं एक क्‍लर्क दिन भर उपन्‍यास ही पढ़ता रहता है। अधिकारी ने आते-जाते उसे कभी काम करते नहीं देखा। सैक्‍शन ऑफिसर को बुलवाया, पूछा उससे तो पता चला कि वह तो बरसों से कोई काम ही नहीं करता, बस जब देखो अंग्रेजी उपन्‍यास ही पढ़ता रहता है। आइएएस अधिकारी के कान खड़े हुए - तो इसका मतलब वह ऑफिस में उपन्‍यास पढ़ने का वेतन पा रहा है। जवाब मिला - क्‍या करें साहब, कोई भी काम दो, करता ही नहीं। पूछा गया – कब से चल रहा है ऐसा तो पता चला कि उसे तो हमेशा से उपन्‍यास पढ़ते ही देखा गया है।
अधिकारी ने तब कहा कि जरा पता लगाइये कि किस लेखक के उपन्‍यास पढ़ता है। पता चला कि इन दिनों आयन रैंड का उपन्‍यास एटलस श्रग्‍ड पढ़ रहा है।
अधिकारी ने तय कर लिया कि क्या करना है। उसने अपने कॉलेज के दिनों में ये उपन्‍यास पढ़ रखा था। फिर से खोज कर पढ़ना शुरू किया। आयन रैंड का फाउंटेनहैड और दूसरे उपन्‍यास भी अच्‍छी तरह पढ़ लिये।
एक दिन चाय के समय क्‍लर्क को अपने चैम्‍बर में बुलवाया। इधर-उधर की बातें शुरू कीं। क्‍लर्क हाथ ही न धरने दे। अधिकारी धीरे-धीरे बात आयन रैंड पर ले आया और बताया कि वह मेरी भी प्रिय लेखिका है। उनके रचे कई पात्रों की बातें कीं तो क्‍लर्क थोड़ा खुला।
अब अधिकारी अक्‍सर क्‍लर्क को बुलवा भेजता और सिर्फ उपन्‍यासों की ही बात करता। अपनी पसंद और उसकी पसंद की किताबों का आदान-प्रदान शुरू किया। थोड़ा समय लगा क्‍लर्क को लाइन पर लाने में कि वह सहज हो कर बात कर सके।
एक दिन अधिकारी ने क्‍लर्क को अपने विश्‍वास में लेते हुए कहा- यार, एक परेशानी है। तुम्‍हारी मदद चाहिये।
क्‍लर्क अब न कहने की स्‍थिति में नहीं था- आप आदेश दीजिये।
- इस ऑफिस का रिकार्ड मेन्‍टेंनेस सिस्‍टम बहुत खराब है। तुम कुछ कर सकते हो क्‍या।
क्‍लर्क ने आश्‍वस्‍त किया - हो जायेगा साहब।

ये किस्‍सा यहां पूरा होता है कि उस नाकारा क्‍लर्क का बनाया हुआ रिकार्ड सिस्‍टम आइएएस अकादमी मसूरी में बरसों तक पढ़ाया जाता रहा।

पाठक की चिंता और विमल मित्र का लेखन



बांग्‍ला उपन्‍यासकार विमल मित्र (1912–1991) जितने प्रसिद्ध बांग्‍ला में थे, उतने ही चाव से हिंदी में भी पढ़े जाते थे। उन्‍होंने सौ भी अधिक उपन्‍यास और सैकड़ों कहानियां लिखी। उनके उपन्‍यास पर 1953 में साहिब बीवी और गुलाम पर फिल्‍म भी बनी थी और उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍म लेखन के लिए फिल्‍म फेयर एवार्ड मिला था। वे कई बार अठारह अठारह घंटे तक लिखते रहते थे।

एक बार एक युवक उनसे मिलने आया और उनके पैर छू कर उनके पास बैठ गया और रोने लगा। '
वे हैरान हुए। पूछा- भाई तुम कौन हो और क्‍यों रो रहे हो। मैं तुम्‍हारी क्‍या मदद कर सकता हूं।
युवक ने कहा कि फलां पत्रिका में आपका एक धारावाहिक उपन्‍यास चल रहा है।
विमल जी ने कहा – हां चल तो रहा है।
युवक ने आगे कहा - उसकी नायिका एक बीमार युवती है।
विमल बाबू – हां है तो, फिर
युवक – उपन्‍यास की कथा जिस तरह से आगे बढ़ रही है, तय है कि अगले एकाध अंक के बाद आप नायिका को मार देंगे।
विमल बाबू – लेकिन पात्रों को जीवित रखना या मार देना लेखक के हाथ में थोड़े ही होता है। अब जैसी कहानी आगे बढ़े .. लेकिन तुम ये सब क्‍यों पूछ रहे हो और रो क्‍यों रहे हो।
युवक फिर रोने लगा - दरअसल मेरी बहन को भी वही बीमारी है जो आपके उपन्‍यास की नायिका को है। वह लगातार उपन्‍यास पढ़ रही है। अगर आपने नायिका को मार दिया तो मेरी बहन भी नहीं बच पायेगी। वह फिर से उनके पैरों पर गिर पड़ा – मेरी बहन को बचा लीजिये साहब। 

बिना किताबों वाला घर



ये किस्‍सा एक प्रसिद्ध बांग्‍ला उपन्‍यासकार का है। उनकी बेटी बड़ी हुई तो कई अच्‍छे अच्‍छे रिश्‍ते आने लगे। ऐसा ही एक रिश्‍ता दूर कस्‍बे में बसे एक बहुत बड़े जमींदार के घर से आया। हमारे उपन्‍यासकार महोदय अपनी पत्‍नी के साथ घर-बार देखने ट्रेन से गये। स्‍टेशन पर शानदार बग्‍घी लेने आयी थी। आगे-पीछे चार घुड़सवार। जमींदार के महल में दोनों की बहुत खातिरदारी हुई। किसी किस्‍म की कोई कमी नहीं। शानौ-शौकत सब आला दरजे की। सैकड़ों बीघा खेत, नौकर चाकर, हाथी घोड़े और दुनिया भर के ऐशो-आराम का इंतज़ाम।
वापसी में दोनों को कीमती उपहारों से लाद दिया गया। ट्रेन चली तो उपन्‍यासकार की पत्‍नी बेहद खुश हो कर बोली – घर बैठे हमें कितना अच्‍छा वर और घर-बार मिल रहा है। हमारी बेटी के तो भाग खुल गये। बेटी राज करेगी हमारी।
उपन्‍यासकार महोदय तुनक कर बोले – राज तो तब करेगी जब हम इस घर में उसकी शादी करेंगे।
बीवी चौंकी - क्‍या मतलब? क्‍या कमी नज़र आयी आपको इस घर में। सब कुछ तो आला दरजे का था।
तब उपन्‍यासकार महोदय ने आराम से बताया – तुम दिन भर महल जैसे घर में रही। सब कुछ देखा-भाला। माना, वहां किसी भी चीज़ की कमी नहीं थी लेकिन भागवान, तुम्‍हीं बताओ, पूरे महल में तुम्‍हें एक भी किताब नज़र आयी?
तब उन्‍होंने ठंडी सांस भरते हुए कहा – हमारी बेटी सारी उम्र हज़ारों किताबों के बीच बड़ी हुई है। बिना किताबों वाले घर में तो एक दिन में पागल हो जायेगी।

ये किस्‍सा बलाई चंद मुखोपाध्‍याय ,(1899-1979) का है जो बनफूल के नाम से लिखते थे। वे उपन्‍यासकार , नाटककार कवि थे। उनके उपन्‍यासों पर कई फिल्‍में बनी हैं। भुवनसोम उनके उपन्‍यास पर ही बनी थी।

शनिवार, 11 अप्रैल 2015

ये किस्‍सा एक खराब किताब का



कुछ बरस पहले मुंबई में एक साहित्यिक आयोजन चल रहा था। कई वरिष्ठ रचनाकार बाहर से आये थे। उस वक्‍त निर्मल वर्मा जी वक्‍ता के रूप में अपनी बात कह रहे थे। पिछले दिन के सत्रों की खबर तस्‍वीरों सहित अखबारों में छपी थीं। रमेश चंद्र शाह आदि मंच पर थे।
तभी सफारी सूट पहने एक सज्‍जन भीतर आये। वे मझौले लेवल के कारोबारी आदमी लग रहे थे। मंच की तरफ देखा तक नहीं कि कौन हैं वहां। आस पास का जायजा लिया और बाहर खड़े अपने ड्राइवर को इशारा किया। दो मिनट में ही उनका ड्राइवर किताबों के दो बंडल लिये अंदर आ गया। अब जनाब एक-एक आदमी के पास जा कर उसका नाम पूछ कर किताबें भेंट करने लगे। प्रिय भाई अलां को सप्रेम भेंट और फलां को सप्रेम भेंट। मेरे पास भी आये, नाम पूछा, आंखें मिलाने या अपना नाम बताने की ज़रूरत नहीं समझी और एक सप्रेम भेंट टिका गये। किताब देखी - उनकी पीएचडी की थीसिस थी। कविता में रस और रस में कविता टाइप कुछ नाम था।
शाम को डिनर का प्रोग्राम था इसलिए मैं कपड़े बदल कर जब पांच बजे के करीब घर से वापिस आया तो वही सज्‍जन अपनी थीसिस के अगले बंडल निपटा रहे थे। भला रोज़ रोज़ थोड़े ही मिलते हैं इतने सारे गुण ग्राहक एक साथ। अख़बार में खबर देख कर बीवी ने साफ साफ कह दिया होगा कि जाओ सारी किताबें आज ही निपटा कर आओ। वरना....  ये  वरना ही उन्‍हें अपना धंधा छुड़वा कर ये नेक काम करवा रहा होगा।
अभी मैं बैठा ही था कि एक बार फिर मेरे पास आ कर मेरा नाम पूछने लगे। मैंने बताया - सुल्‍तान अहमद। एक और सप्रेम भेंट - सुल्‍तान अहमद के नाम।
दोनों प्रतियां मेरी कार में कई दिन तक रखी रहीं। एक दिन हिन्‍दी भाषी मेकैनिक कार में कब से रखी इस किताब के पन्ने पलट के देख रहा था, तो तुरंत उसे थमा दी। वापिस न लेने की शर्त पर।
अब इस पूरे प्रसंग में उन पीएचडी भाई साहब, मेरा या मेकैनिक का क्‍या कसूर। एक सही किताब एक गलत हाथ से दूसरे गलत हाथ में जाती रही और अपने दुर्भाग्‍य को कोसती रही।
अगले रविवार किताबों का एक और रोचक किस्‍सा।

अच्‍छी किताब ने पिटाई से बचाया


इस बार का किस्‍सा मेरे बेटे अभिजित की जुबानी


           मैं तब नाइंथ में था। सेंट्रल स्‍कूल आइआइटी, पवई में पढ़ता था। उन दिनों पापा ऐन फ्रैंक की डायरी का अनुवाद कर रहे थे। जब तक अनुवाद पूरा न हो जाये, मुझे किताब को हाथ को लगाने की अनुमति नहीं थी। आखिर अनुवाद पूरा हुआ और किताब मुझे मिली।  मैंने किताब स्‍कूल बैग में डाली और स्‍कूल बस में ही पढ़ना शुरू कर दिया। अब किताब में इतना मन रमा कि छोड़ने को दिल ही न करे। स्‍कूल पहुंच कर भी डेस्‍क के भीतर किताब खोल कर बीच बीच में पढ़ता रहा।
          तीसरे पीरियड तक आते आते ये हालत हो गयी कि किताब खोल कर सिर झुका कर लगातार पढ़ने लगा। पता ही नहीं चला कि कब इंगलिश की टीचर मिसेज भसीन आयीं और पढ़ाना शुरू कर दिया। अपन राम तो ऐन फ्रैंक में मस्‍त। मिसेज भसीन ने देखा कि मेरा ध्‍यान क्‍लास में नहीं है। एटैंडेंस में मैंने यस मैम भी नहीं बोला था। उन्‍होंने दो तीन बार मेरा नाम पुकारा लेकिन सुनायी किसे देना था। पूरी क्‍लास में सन्नाटा। मिसेज भसीन मेरे सिर पर आ कर खड़ी हो गयीं और बोली - क्‍या पढ़ रहे हो अभिजित?
      मैडम को सिर पर खड़ा देख कर मेरे तो हाथ पैर फूल गये। मैडम बहुत कड़क थी। तय था आज जम के पिटाई होगी। मुंह से मैं.. मैं .. ही निकल पाया। मैडम ने मेरे हाथ से किताब ली और टाइटल देख कर पूछा – कहां से लाये?
     - पापा की लाइब्रेरी से, सॉरी मैडम, अब आगे से..।
     - जब पढ़ लो तो मुझे देना। मैंने नहीं पढ़ी है। कह कर मैडम ब्‍लैक बोर्ड की तरफ बढ़ गयीं।
     आप समझ सकते हैं कि मैंने कितनी राहत की सांस ली होगी। एक अच्छी किताब ने पूरी क्‍लास के सामने मेरी दुर्गत होने से बचा लिया था।

     अगले रविवार एक और रोचक किस्‍सा किताबों का।

45 बरस बाद मिला किताब को उसका पहला पाठक लेकिन उसे किताब नहीं दी गयी



बात 2008 की है। तब मैं पुणे में था और मेरे कथाकार मित्र राज कुमार राकेश शिमला में थे। संयोग से हम दोनों ही उस समय (एक दूसरे की जानकारी के बिना) बर्ट्रेंड रसेल की आत्‍म कथा पढ़ रहे थे। किताब की भूमिका लिखी है माइकल फुट ने। 95 वर्षीय फुट इंगलैंड के जाने माने लेखक, पत्रकार और सुदीर्घजीवी एमपी रहे हैं। बर्ट्रेंड रसेल को 1950 में नोबेल पुरस्‍कार मिला था।
अब जी, राकेश जी को तलब लगी कि बर्ट्रेंड रसेल साहब की लिखी किताब अन्‍आर्मड विक्‍टरी पढ़ें। ये किताब बहुत कुछ समेटे हुए है। चीन युद्ध को ले कर नेहरू, चाऊ एन लाई  और बर्ट्रेंड रसेल के बीच हुई खतो-किताबत, क्‍यूबा मसले पर कमेंटरी और अमेरिका और रूस की दादागिरी के भीतरी किस्‍से। 1963 में छपी ये किताब भारत में आयी लेकिन तुरंत बैन कर दी गयी थी। किताब मिली नहीं कहीं भी उन्‍हें। दिल्‍ली तक पूछ के देख लिया। मुझसे कहा तो मैंने अपनी लाइब्रेरी, ब्रिटिश लाइब्रेरी और लैंड मार्क सब जगह तलाशी, किताब नहीं ही मिली। भला 1963 में छपी और प्रतिबंधित किताब इतनी आसानी से थोड़े ही मिलेगी।
अचानक उन्‍हें सूझा और वे गाड़ी उठा कर सीधे शिमला स्थित इंस्‍टीट्यूट ऑफ एडवांस स्‍टडीज में जा पहुंचे। किताब वहां थी। निकलवायी गयी। राकेश जी खुश लेकिन लाइब्रेरियन जी खुश नहीं। उन्‍होंने किताब देने से मना कर दिया कि नहीं दे सकते। डाइरेक्‍टर, कोई फैकल्‍टी, रिसर्च स्‍कालर, फैलो या स्‍टाफ ही इस किताब की कभी भी मांग कर सकता है। हम उनकी अनदेखी करके बाहर वाले को किताब कैसे दे सकते हैं। झगड़े और मारपीट की नौबत आ गयी। आखिर एक संकाय सदस्‍य के बीच बचाव करने पर राकेश को किताब दिखायी गयी। किताब देखते ही सब के मुंह पर ताला लग गया। यह किताब संस्थान द्वारा 1963 में खरीदी गयी थी और इस घटना के दिन तक यानी पिछले 45 बरस में एक बार भी जारी नहीं करायी गयी थी।
बेचारे बर्ट्रेंड रसेल और बेचारी उनकी किताब 'अन्‍आर्मड विक्‍टरी'। लेकिन हमारे राकेश जी भी कम नहीं। किसी तरह से स्‍टाफ के नाम से किताब जारी करवायी और रातों रात उसकी फोटो कॉपी करके अपनी जिद पूरी की। किताब उनके अनमोल खजाने में है।

अगले रविवार किताबों का एक और रोचक किस्‍सा।

जॉर्ज बर्नार्ड शॉ की किताब फुटपाथ पर


जॉर्ज बर्नार्ड शॉ एक दिन फुटपाथ पर लगे किताबों के ठीये के पास से गुज़र रहे थे तो उन्‍हें सामने पुरानी किताबों के ढेर में अपनी एक किताब नज़र आयी। उनकी यह देखने की उत्‍सुकता स्वाभाविक थी कि इस किताब का फुटपाथ तक पहुंचने का रूट क्‍या रहा होगा। उन्‍होंने किताब उठायी तो देखा कि अरे, ये प्रति तो वे अरसा पहले एक मित्र को भेंट कर चुके थे और उस पर उनका खुद का लिखा सप्रेम भेंट और उनके हस्ताक्षर भी हैं। उन्‍होंने किताब वाले से पूछा कि कितने में दी ये किताब तो उसने बताया एक पाउंड। बर्नार्ड शॉ बिगड़े - लूट मचा रखी है क्‍या, ये मेरी लिखी किताब है और तू एक पाउंड मांग रहा है, ला दे बीस पेंस में। और वे उसे रेजगारी थमा के किताब घर ले आये। आराम से बैठ कर किताब साफ की। पहली भेंट के नीचे लिखा, तुम्‍हें पुनः भेंट प्रिय मित्र, उस पर हस्ताक्षर किये, तारीख डाली और नौकर के हाथ किताब उस अभागे मित्र के पास दोबारा भिजवा दी।
हर सोम वार किताबों का एक रोचक किस्‍सा शेयर करेंगे।

हम कौन सी किताबें पढ़ते हैं- कुछ नोट्स



सबसे ज्‍यादा वे किताबें पढ़ी जाती हैं जो पाठक कहीं से चुरा कर लाता है। किताब चुराने का  जोखिम तभी उठाया जायेगा जब किताब नजर तो आ रही हो लेकिन हमारे पास न हो। कई बड़े लेखक किताब चोर रहे हैं। ये एक कला है।
फिर उन किताबों का नम्‍बर आता है जिन्‍हें हम उधार मांग कर तो लाते हैं लेकिन वापिस नहीं करते। करना ही नहीं चाहते। जिसके यहां से  उधार लाये थे, उसके घर आने पर छुपा देते हैं।
फुटपाथ पर बिक रही अचानक नज़र आ गयी वे किताबें भी खूब पढ़ी जाती हैं जिनकी हम कब से तलाश कर रहे थे।
पूरे पैसे दे कर खरीदी गयी किताबें भी अपना नम्‍बर आने पर आधी अधूरी पढ़ ही ली जाती हैं।
लाइब्रेरी से लायी गयी किताबें पूरी नहीं पढ़ी जातीं और उन्‍हें वापिस करने का वक्‍त आ जाता है।
रोज़ाना डाक में उपहार में आने वाली या किसी आयोजन में अचानक लेखक के सामने पड़ जाने पर भेंट कर दी गयी किताबें कभी नहीं पढ़ी जातीं। कई बार तो भेंट की गयी किताबें भेंटकर्ता के जाते ही किसी और पाठक के पास ठेल दी जाती हैं। वह आगे ठेलने की सोचता रहे या बिन पढ़े एक कोने में रखे रहे।
कोर्स की किताबें पढ़ने में हमारी नानी मरती है और समीक्षा के लिए आयी किताबें भी तब तक पढ़े जाने का इंतज़ार करती रहती हैं जब तक संपादक की तरफ से चार बार अल्‍टीमेटम न मिल जाये। तब भी वे कितनी पढ़ी जाती हैं। हम जानते हैं।
पुस्‍तक मेलों में खरीदी गयी किताबें भी पूरे पढ़े जाने का इंतज़ार करते करते थक जाती हैं और अगला पुस्‍तक मेला सिर पर आ खड़ा होता है।
यात्रा में टाइम पास करने के लिए स्‍टेशन, बस अड्डे या एयरपोर्ट पर खरीदी गयी किताबें यात्रा में जितनी पढ़ ली जायें, उतना ही, बाकी वे कहीं कोने में या बैग ही में पड़े-पड़े अपनी कहानी का अंत बताने के लिए बेचैन अपने इकलौते पाठक को वक्‍त मिलने का इंतज़ार करती रहती हैं।
हर व्‍यक्‍तिगत लाइब्रेरी में लगातार कम से कम 40 प्रतिशत ऐसी अनचाही किताबें जुड़ती जाती हैं, जो एक बार भी नहीं खुलती। इनमें किताबों का कोई कसूर नहीं होता जितना उनका गलती से वहां पहुंच जाने का होता है।

ये मेरे नोट्स हैं। आपके अनुभव निश्‍चित रूप से अलग हो सकते हैं। जानना रुचिकर होगा।