भाई बोधिसत्व ने जब शुरुआत कर ही दी है तो स्वाभाविक है कि सब साथी अपने अपने दिमाग की हार्ड डिस्क में तलाशेंगे कि शायद कहीं चिरकीं की कोई फाइल डिलिट होने से रह गयी हो. तो लीजिये पेश है, हमारी याद में जो थे चिरकीं-
चिरकीं प्रसंग से पहले दो एक बातें
• रूस में चिरकिन कई लोगों का सरनेम हुआ करता है.. इस नाम वाले कवि विद्वान और कवि वहां हुए हैं.
• चिरकीं दुनिया में अकेले ऐसे कवि नहीं थे जो अपनी रचना का आधार वहां से तलाशते थे.. फ्रांस, इंगलैंड में भी ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने गू, पाद, हगने की आदतों, और गू की ईश्वरीय खासियतों को अपनी रचना का आधार बनाया है.
• फ्रांस के Euslrog de Beaulieo, Gilles Corrozal और Piron, इंगलैंड के स्विफ्ट ऐसे ही कवि हैं.
कुछेक बानगियां देखिये
Gilles Corrozel की कविता हैः
"Recess of great comfort
Whether it is situated
in the fields or in the citys
Recess in which no one dare enter
Except for cleaning his stomach
Recess of great dignity"
इसी तरह से फ्रांस के Euslrog de Beaulieo अपनी कविता में पाखाने की तारीफ यूं करते हैं :
"When the cherries become ripe
Many black soils of strange shapes
Will breed for many days and urgents
Then will mature and become products of various colours and breaths"
एक अन्य फ्रांसीसी कवि पिरॉन की कविता यूं हैः
"What am I seeing oh! God
It is night soil
What a wonderful substance it is It is excreted by
the greatest of all Kings
Its odour speaks of majesty"
• एक वक्त गू महिमा का ये आलम था कि दाइयां बच्चे की पहली टट्टी देख कर उसके भविष्य के बारे में बता दिया करती थीं. ये तो अपने भारत में ही पंजाब के कुछ हिस्सों में होता रहा है कि अगर किसी परिवार में कई कन्याओं के बाद अगर लड़का पैदा होता था या विवाह के कई बरस के बाद लड़का पैदा होता था तो बच्चे की दादी बच्चे का पहला गू (बेशक जरा सा ही और दलिये में मिला कर) खाती थीं.
• चिरकीं के नाम को ले कर मतभेद हैं कि वे चिरकीन थे, चिरकिन थे या चिरकीं लेकिन वे जो भी थे, लाजवाब थे.
मेरे कलेक्शन में उनकी कुछ और रचनाएं हैं. शब्द आगे पीछे हो सकते हैं. लेकिन मूल भाव यही रहे होंगे.
• पाठकों के पास अगर इनके मौलिक संस्करण हों तो स्वागत है.
1. जो भी कमाऊंगा मैं अब सब का सब लगाऊंगा पाखाने में
जब अगली दफा घर आऊंगा तेरे कभी नहीं मूतूंगा वहां पे.
2. कल जो उनकी याद में दस्त ऐसा आ गया
पोंक से दीवार पर तस्वीर उनकी बन गयी
3. जिधर देखता हूं उधर तू ही तू है
इधर टट्टियां हैं, उधर गू ही गू है
4. टूं को टंकारो पूं की पिचकारी
ठस वस सब छोड़ो भइया, फुसकारी की बलिहारी
5. गुरुड़ गुरुड़ मेरा पेट करे
निकल लेंड हत्यारे
6. दर्द करता है निकलता क्यों नहीं
क्या मैं हौवा हूं जो तुझे खा जाऊंगा.
7. गर पाखाने में आग लग गयी
तो उसे मूत कर बुझाऊंगा.