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रविवार, 29 अगस्त 2010

कहानी की चोरी और चोरी की कहानी

कथाकार तेजेन्‍द्र शर्मा ने कुछ दिन पहले एक ई-मेल भेज कर सब दोस्तों को बताया था कि कहानीकार राजीव तनेजा ने उन्हें बताया है कि किसी ने उनकी (राजीव तनेजा की) चार कहानियां चुरा ली हैं। तेजेन्द्र जी ने इस मुद्दे को सार्वजनिक करते हुए मित्रों से इस मामले से जुड़े नैतिकता, अनैतिकता, चोरी और सीनाजोरी, मूल लेखक के प्रति आभार मानने जैसे सवालों के जवाब चाहे हैं और एक तरह से इस मामले पर रोचक बहस छेड़ी है।
कुल मिला कर किस्सा मज़ेदार है और इस पर बहस की जा सकती है।
शायद तेईस चौबीस बरस पहले की बात रही होगी। तब कमलेश्वर जी गंगा नाम की एक पत्रिका के संपादक हुआ करते थे। उसी गंगा में एक दिन गरमागरम मुद्दा उछला। प्रसिद्ध कहानीकार, नाटककार और उपन्यासकार स्वदेश दीपक जी ने एक बांग्ला लेखक (इस समय लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है।) पर आरोप लगाया था कि उस लेखक ने दीपक जी की कहानी बाल भगवान (बाद में इस कहानी पर नाटक भी आया था।) को चुराया है और उस पर बांग्ला में देवशिशु नाम से कहानी लिखी है।
कमलेश्वर जी ने इसे एक सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाया और अपनी पत्रिका के जरिये एक तरह की मुहिम शुरू कर दी कि इस तरह की साहित्यिक चोरी के खिलाफ क्या किया जाना चाहिये। कमलेश्वर जी ने यहां तक किया था कि पाठकों को दीपक जी के पक्ष में मुफ्त पत्र तक भेजने की सुविधा दे डाली थी और इन पत्रों का भुगतान गंगा पत्रिका द्वारा किया जाता।
बाद में पता चला था कि देवशिशु के लेखक की बहुत पहले इसी नाम से इसी कहानी पर आधारित बांग्ला फिल्म भी आ चुकी थी। वे फिल्में अलग नाम से बनाते थे और लेखन अलग नाम से करते थे। अब चोरी का मामला उलटा पड़ चुका था और नये मोड़ के हिसाब से बाल भगवान की कहानी देवशिशु से चुरायी गयी थी।
मुझे ठीक से याद नहीं कि बाद में पूरे मामले का क्या हुआ लेकिन राजीव तनेजा के मामले से उस मामले की याद हो आना स्वाभाविक ही था।
फिलहाल इसी मामले पर बात करें। न तो राजीव जी ने और न ही तेजेन्द्र ने ही बताया है‍ कि कहानी (एक नहीं चार कहानियां) किस स्तर पर चुरायी गयीं। हम यहां चार स्थितियों की कल्पना कर सकते हैं।
स्थिति एक : राजीव जी किसी दारू पार्टी में अपने कहानीकार दोस्तों को अपनी नयी कहानियों के प्लॉट सुना रहे थे और ये प्लॉट ही पहली बार दूसरे लेखक या लेखकों की कहानियों के रूप में सामने आये। नशा उतरने पर या अपने प्लाटों पर दूसरे के बसे घरों को देख कर (खोसला का घोंसला) उन्होंने पाया कि वे लुट चुके हैं।
स्थिति दो : राजीव जी अपनी कहानियां लिख चुके थे और किन्हीं मित्रों को पढ़ने या सुधारने के लिए दीं और ये कहानियां वापसी में राजीव के घर का पता भूल कर अलग अलग पत्रिकाओं के दफ्तर में जा पहुंची और बेवफा सनम की तरह दूसरे लेखकों का वरण करके उनके नाम से छप गयीं।
स्थिति तीन : ये भी हो सकता है कि राजीव जी ने अपनी कहानियां टाइप करने के लिए किसी टाइपिस्ट को दी हों और पैसों के अभाव में अपनी कहानियां वहां से उठवा न पाये हों। अब टाइपिस्ट ने अपना मेहनताना वसूल करने के लिए सिर्फ टाइपिंग की कीमत पर ये कहानियां किसी दूसरे लेखक को टिका दी हों (दर्जी आम तौर पर यही करते हैं।) ये भी हो सकता है कि टाइपिस्ट खुद उभरता लेखक रहा हो और कहानियां अपने नाम से छपवा डाली हों।
स्थिति चार : राजीव जी की छपी हुई कहानियां ही किसी पहलवान छाप लेखक ने अपने नाम से दूसरी पत्रिकाओं में छपवा ली हों। क्या कर लेगा राजीव।
हो सकता है मेरे पाठकों को इसके अलावा कोई और स्थिति भी सूझ रही हो। मुझे जरूर बतायें।
ऐसा मेरे साथ भी हो चुका है। एक ही कहानी की दो बार चोरी। अलग अलग भाषाओं में।
बताता हूं आपको।
1989 में हँस में मेरी कहानी ये जादू नहीं टूटना चा‍हिये छपी थी। कहानी काफी चर्चित रही और कई भाषाओं में अनूदित हुई। शायद 1998 की बात होगी। मेरे एक गुजराती मित्र, जो मेरी ये कहानी गुजराती में पहले ही पढ़ चुके थे, ने फोन करके बताया कि ये कहानी भारतीय विद्या भवन की गुजराती पत्रिका नवनीत में छपी है और मूल लेखक की जगह किसी मुसलमान लेखक का नाम है। हिंदी से अनुवाद में बेशक किसी गुजराती अनुवादक का नाम है। मेरे मित्र ने जब उस कहानी की फोटोकापी मुझे दी तो मैं हैरान रह गया। कहानी के अंजर पंजर ढीले कर दिये गये थे। कहानी की अंतिम पंक्ति जो पूरी कहानी की दिशा तय करती थी और मेरे लिए और पाठक के लिए भी बहुत मायने रखती थी, बदली जा चुकी थी। मैंने बहुत निराश हो कर नवनीत के संपादक को पत्र लिखा और अपने पत्र के साथ अपनी मूल कहानी, गुजराती में पहले से अनूदित पाठ और अब नवनीत में छपी कहानी की कापी भेजी और जानना चाहा कि किसी भी रचना का अनुवाद छापने के लिए उनके क्या नियम हैं।
ये सरासर चोरी का मामला था।
जब कई दिन तक कोई जवाब नहीं आया तो मैंने फोन पर ही बात की। उनके उत्तर गोल मोल थे और कहीं से भी मुझे संतुष्ट न कर सके। हार कर मैंने अनुवादक का पता और फोन नम्बर मांगा। अनुवादक ने जो कुछ बताया, उस पर सिर ही धुना जा सकता था। मैंने भी वही किया। अनुवादक ने बताया कि वह राह चलते फुटपाथ से रद्दी में हिंदी पत्रिकाएं खरीदता है और कोई कहानी अच्छी लगने पर उसका अनुवाद कर लेता है। ये कहानी उसने सरिता नाम की मैगजीन के‍ किसी पुराने अंक से ली थी। जब मैंने पूछा कि हिंदी में कहानी क्या इसी रूप में और इसी अंत के साथ छपी थी और क्या वे मुझे सरिता का वह अंक दे सकते हैं। अनुवादक के जवाब किसी भी लेखक को आत्म हत्या करने के लिए प्रेरित कर सकते थे। मैंने वह नहीं की। उसने बताया कि वह अनुवादक के रूप में अपनी जिम्मेवारी समझता है और जो खुद उसे अच्छा नहीं लगता या समझ में नहीं आता, उसे बदल डालता है और अपने हिसाब से तय करता है कि कहानी का अंत क्या होना चाहिये। मेरी कहानी के साथ भी उसने यही किया।
जहां तक सरिता का वह अंक मुझे देने की बात थी, अनुवादक महोदय ने बताया कि वे अपना काम हो जाने के बाद पत्रिकाओं को वापिस रद्दी में बेच देते हैं।
अब मेरे पास अपनी ही कहानी, जो किसी और के नाम से सरिता में छप चुकी थी, पढने का एक ही जरिया था कि पिछले 10 बरस के सरिता के सभी पुराने अंक खंगालूं और चोर लेखक को और सरिता के संपादक मंडल को प्रणाम करूं। ये सब करना संभव नहीं होता। मैंने भी नहीं किया। सरिता, चोर लेखक और चोर अनुवादक को बधाई दी जिन्होंने बेशक मेरी कहानी को खराब करके ही सही, और पाठक दिये।
हमारे आफिस में कर्मचारियों के लिए हर बरस पत्रिकाएं छापी जाती हैं। इस बार एक वरिष्ठ कर्मचारी ने बच्चन जी की एक चर्चित कविता अपने नाम से छपने के लिए दी। मैंने उस नवोदित कवि से पूछा कि ये कविता बच्चन जी के नाम से छपेगी, कर्मचारी के नाम से छपेगी या दोनों के नाम से। जवाब में हुआ ये कि कर्मचारी ने चपरासी को भेज कर कविता वापिस मंगवा ली।
राजीव जी, मन छोटा न करें। हम मायानगरी मुंबई में रहते हैं और रोज़ाना पचासों गीतों, आइडियाज़, धुनों, सिचुएशनों, पूरी की पूरी फिल्म की चोरी की घटनाएं सुनते पढ़ते हैं। चोरी तो होती ही है और जब चोरी एक बार से ज्यादा बार होती है, ये तय करना मुश्किल हो जाता है कि पहले चोरी किसने की। पहले अ ने अंग्रेजी धुन चुरायी और फिर ब ने अ द्वारा चुरायी धुन को अपनी बना कर अपना कहा या उसने भी मूल अंग्रेजी से चुरायी फिर अपना कहा, कहना मुश्किल होता है।
राजीव जी, किसी ने आपका आइडिया चुराया तो क्या चुराया। विश्व भर के लेखक सदियों से चले आ रहे उन्हीं ग्यारह आइडियाज़ में से अपने काम का आइडिया ले कर पूरा जीवन लेखन करते हैं। अब आप ही बतायें कि मेरे घर में मौजूद बूढ़े पिता पर लिखी गयी मेरी कहानी गोविंद मिश्र द्वारा अपने पिता पर लिखी गयी कहानी से बहुत जुदा कैसे हो सकती है जबकि सच तो ये है दो अलग अलग घरों में दो अलग अलग बूढ़े एक ही वक्त को कमोबेश एक ही तरीके से जी रहे हैं। सिर्फ कहानी का ट्रीटमेंट ही एक कहानी को दूसरी कहानी से अलग करता है।
छपी हुई कहानी चुरायी, पढ़ने के लिए या टाइपिंग के लिए दी कहानी अपने नाम से छपवा ली तो आपके पास तो प्रूफ होगा कहानी को अपना कहने के लिए। चढ़ बैठिये, चोर के सीने पर और कीजिये एक्सपोज उसे।
बात खत्म करने से पहले अपनी ही एक और कहानी का उदाहरण देता हूं। मैंने अपनी पत्थर दिल कहानी 1992 में लिखी थी और मेरा आरोप है कि बी आर चोपड़ा जी ने इस कहानी के लिखे जाने से 25 बरस पहले ही इस पर अपनी मशहूर फिल्म गुमराह बना ली थी। बेशक उसमें फिल्मी लटके झटके डालने के लिए बहुत सारे चेंजेज किये थे। ये बात अलग है कि गुमराह मैंने पहली बार पिछले हफ्ते ही देखी और बी आर चोपड़ा ने मेरी कहानी शायद ही पढ़ी हो। बेशक उनकी फिल्म और मेरी कहानी की बेसिक थीम एक ही है।

सूरज प्रकाश 09930991424
www.surajprakash.com

सोमवार, 25 जनवरी 2010

60वां गणतंत्रता दिवस - दुष्‍यंत के दस सवाल

पिछले दिनों जयपुर के मेरे मित्र दुष्‍यंत ने अपने अखबार के आज के अंक के लिए मुझसे 10 सवाल पूछे। यही सवाल हम सब अपने आप से भी पूछ सकते हैं।

आजादी के समय मेरा परिवार क्या था और मेरा बचपन कैसे गुजरा?

मैं 1952 में पैदा हुआ। होश संभालने पर पाया कि हमारा परिवार पूर्वी पाकिस्‍तान से उजड़ कर आया था। वे लोग बेशक वहां पर भी सम्‍पन्‍न तो नहीं थे लेकिन यहां आने के बाद वे एक तरह से सड़क पर थे और मेरी पिछली पीढ़ी को अपने पैर जमाने में बीसियों बरस लग गये। अब उजड़ी बिखरी पीढ़ी का वारिस होने का सबसे बड़ा खामियाजा जो मेरी पीढ़ी को विरासत में मिला वह था, आत्‍म विश्‍वास की कमी और हीनता बोध। सामान्‍य विश्‍वास हासिल करने में मेरी उम्र ही गुजर गयी।

2. मैंने जो काम कर रहा हूं। क्यों चुना? मेरा पुश्तैनी था, मजबूरी थी और
कोई संसाधन नहीं थे या मेरी दिली इच्छा थी इसलिए यह किया?

बताते थे कि मेरे दादा मिस्‍त्री थे। घर में पिता सबसे बड़े। आजादी के समय उनके 5 भाई बहन पढ़ ही रहे थे सो मेरे पिता की क्‍लर्की पर कई बरस तक पूरा परिवार लदा रहा। संयोग से हम भी 6 भाई बहन। पिता के हिस्‍से में आगे और पीछे की दोनों पीढि़यों का बोझ आया। हम सब भाइयों के हिस्‍से में भी औसत पढ़ाई और औसत जीवन ही आया। सिर्फ मैं जिद करके अपने जीवन को अपने तरीके जी पाया। अब दो एक भाई ठीक जीवन जी रहे हैं। मेरा जीवन, मेरी नौकरी, मेरा लेखन और मेरा परिवार सब मेरी खुद की कमाई है। जी तोड़ मेहनत से ये सब मैंने हासिल किया है।

3. मुझे क्यों लगता है या नहीं लगता है कि इस देश समानता के अधिकार के
तहत मुझे आगे बढऩे के समान मौके मिले या नहीं मिले?

बेशक मेरे आगे बढ़ने में कोई रुकावट नहीं आयी लेकिन सबके नसीब इतने अच्‍छे नहीं होते कि अपनी पसंद की जीवन भी मिले, नौकरी भी मिले और तसल्‍ली भी मिले। लेकिन मेरा बचपन भी विहीन बचपन ही तो था जब हम सारी चीजों को हसरत भरी निगाह से देखा करते थे।

4. किस दिन मुझे महसूस हुआ कि मैं इस देश का जिम्मेदार नागरिक हूं? एक
आजाद देश में हूं और मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूं?

अब मेरे पास कोई चाइस तो नहीं है कि अपने देश में रहते हुए किसी और देश का जिम्‍मेदार नागरिक कहलाऊं लेकिन पिछले बरसों से हमारे देश में भंयकर अवमूल्‍यन हुआ है, हर क्षेत्र में। आज के वक्‍त की सबसे बड़ी तकलीफ यही है कि भाग दौड़, आपा धापी, तकनीकी उन्‍नयन के नाम पर अंधी दौड़ और तथाकथित टार्गेट के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है दुनिया भर में और खास तौर पर भारत में, उसमें आम आदमी कहीं नहीं है। उसे कोई नहीं पूछ रहा जबकि सारे के सारे नाटक उसी के नाम पर, उसी के हित के नाम पर और उसी की जेब काट कर हो रहे हैं। सारे महानगर ऐसे लाखों लोगों से भरे पड़े हैं जिनके लिए दो जून की रोटी जुटाना, एक गिलास पानी जुटाना और एक कप चाय जुटाना तक मुहाल हो रहा है़। आम आदमी से सब कुछ छीन लिया गया है। पीने का पानी तक। कई बार चौराहों पर बेचारगी से घूमते गांव वासियों को देखता हूं तो सोच में पड़ जाता हूं कि बेचारा गांव की तकलीफों, बेरोजगारी, भुखमरी और जहालत से भाग कर यहां आया है तो उसे एक गिलास पानी पीने के लिए और एक कप चाय पीने के लिए कितने लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा! उस भले आदमी से उसका चेहरा ही छीन लिया गया है। ये सब हुआ है जीवन के हर क्षेत्र में आये अवमूल्‍यन के कारण। जब तक इस देश में हत्‍यारे मुख्‍यमंत्री बनते रहेंगे और रिश्‍वतखोर केंद्रीय मंत्री, हम कैसे उम्‍मीद करें एक ही साल में कोई क्रांतिकारी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक अथवा राजनीतिक स्तर पर कोई तब्दीलियाँ होंगी।


5. कब बुरा लगा कि मैं इस देश में पैदा क्यों हुआ? कोई घटना

ऐसी कोई स्‍मृति नहीं

6. मुझे क्या बात अक्सर ऐसी लगती है कि मैं अपने बच्चों के लिए सुरक्षित
भविष्य छोडऩे में कामयाब रहूंगा या नहीं रहूंगा? पैसा, सुरक्षा,
ईमानदारी, हैल्थ से जुड़े विचार।

जो कुछ मैं अपनी भावी पीढ़ी को दे कर जाऊंगा, वे सब उनका हक है और मेरी कोशिश भी है कि उन्‍हें हमसे बेहतर जीवन मिले। लेकिन चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं। कल की कौन जाने!

7. साठ साल में मैंने यह मान लिया है कि इस देश में ईमानदारी के सहारे
रहने पर तकलीफ होती है या खुशी मिलती है?

बीए में अर्थशास्‍त्र पढ़ाते हुए एक सिद्धांत हमें पढ़ाया गया था कि बुरी मुद्रा अच्‍छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। मतलब ये कि अगर आपकी जेब में दस रुपये का पुराना नोट हो और कहीं से आपके हाथ में दस रुपये का नया नोट आये तो आप जेब में रखे पुराने नोट की जगह नया नोट रख लेंगे और जेब वाला पुराना नोट सर्कुलेशलन में डाल देंगे। हर आदमी यही करता है और सारे नये नोट जेबों में चले जाते हैं और बेचारे पुराने नोट जस तक तस सर्कुलेशलन में बने रहते हैं बल्कि इनमें लोगों की जेब से निकले पुराने नोट भी शामिल हो जाते हैं। आज जीवन के हर क्षेत्र में यही हो रहा है। सब कुछ जो अच्‍छा है, स्‍तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है। कभी स्‍वेच्‍छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते। आज हमारे आस पास जो कुछ भी चलन में है, वह औसत है, बुरा है और कचरा है। हम उसे ढो रहे हैं क्‍योंकि बेहतर के विकल्‍प हमने खुद ही चलन से बाहर कर दिये हैं।

8. मेरे लिए देश में तीन खूबियां क्या है? जो दुनिया में कहीं नहीं पाई जाती?

अब क्‍या तो गिनती गिनें। खूबियों की भी कमी नहीं और खासियतों की भी कमी नहीं। बात ये है कि हमारी पीढ़ी को जो कुछ मिला, पिछली पीढ़ी के पास नहीं था इसलिए झगड़े थे। आज की पीढ़ी के पास सबकुछ है लेकिन धैर्य या संतोष नहीं है1 बात मूल्‍य बदलने की भी है। हमारी पीढ़ी तक शादी के बाहर या इतर या शादी से पहले सैक्‍स बहुत खराब बात मानी जाती थी। आज सैक्‍स जीवन की एक शैली है, बस, सुरक्षित तरीके से कीजिये। ये खूबियां दुनिया से हमारे पास आ गयीं, अब क्‍या देस और क्‍या परदेस।

9. मेरे देश में तीन खामियां क्या हैं, जो दाग हैं इसके नाम पर।

राजनैतिक कंगलापन, आम आदमी यानी जनसंख्‍या के एक बड़े हिस्‍से की कोई परवाह नहीं और भ्रष्‍टाचार।

10. दस साल बाद के भारत की मेरी कल्पना क्या है?

आप आने वाले कल की बात नहीं कर सकते। दस साल बाद की क्‍या कहें। बेशक हम चांद पर हो सकते हैं लेकिन व्‍यक्ति का सुकून, अपनापन आत्‍मीयता और परिवार सब बलि चढ़ जायेंगे। आदमी और अकेला और मशीनी होता जायेगा।
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बुधवार, 21 अक्टूबर 2009

नमक के बहाने

पुणे में वह मेरा आखिरी दिन था। लगभग पचास महीने वहां बिताने के बाद मैं मुंबई वा‍पिस जा रहा था। जो दो एक दावतनामे थे, वे निपट चुके थे। मैं वहां अपने आखिरी दिनों में होटलों में ही खाना खा रहा था। बेशक सामान बाद में ले जाता, मैं अगली सुबह वापिस जा रहा था। धीरे धीरे ही सही सारी किताबों की पैकिंग मैंने खुद की थी और बाकी सामान मेरा नौकर मोहिते पैक करता रहा था। रसोई समेटने का काम वही कर रहा था। डिब्‍बे वगैरह खाली करके मसाले, दालें और दूसरी चीजें उसे ले जाने के लिए मैंने कह दिया था। उसे ये जरूर कह दिया था कि थोड़ा सा नमक, काली मिर्च और मक्‍खन का एक पैकेट वह आखिरी दिन तक खुले रखे रहे। रसोई का बाकी सामान या तो पैक कर दे या अपने घर ले जाये।
तो जिस दिन का किस्‍सा है ये, अचानक झमाझम बरसात शुरू हो गयी। तीन चार घंटे लगातार पानी बरसता ही रहा। कार शाम को ही मुंबई भिजवा चुका था। अब कैसे भी करके होटल खाना खाने नहीं जाया जा सकता था। पैर के दूसरे ऑपरेशन के बाद बैकम शू पहन कर चलता था। बहुत ज्‍यादा चलना मना था और इस बरसात में इतना महंगा जूता बरबाद तो नहीं ही किया जा सकता था। साढ़े नौ बजने को आये थे। बरसात जैसे रात भर होने का परमिट ले कर आयी थी। मैं बार बार बाल्‍कनी में आता और बरसात का जायजा लेता। ऑटो वैसे भी दिन में नहीं मिलता, रात के वक्‍त मिलने के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता था।
जब ये तय हो गया कि बरसात तो नहीं ही रुकने वाली, मैंने घर पर ही कुछ बनाना तय किया। अब मुझे ये नहीं पता था कि मोहिते ने किस कार्टन में क्‍या पैक किया है या खाने का सामान कुछ छोड़ा भी है या नहीं। संयोग से तीन चार कार्टन खंगालने के बाद प्रेशर कुकर, चावल और मूंग मिल गये। सोचा मैंने, पहले दाल चावल ही भिगो लिये जायें फिर मसाले तलाश किये जायें।
मैंने आधे घंटे की मेहनत के बाद लगभग सारे कार्टन खोल डाले लेकिन नमक कहीं नहीं था। फ्रिज में रखा थोड़ा सा मक्‍खन जरूर मिल गया। नमक सहित सारे मसाले ले जाये जा चुके थे। अब क्‍या हो। भूख अपनी जगह कायम थी और बरसात अपनी जगह। नमक लाने के लिए बाजार तक जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। मैं जिस इमारत में रहता था उसके आठ फ्लैट्स में मेरे अलावा चार और आफिसर्स रहते थे। बाकी फ्लैट्स खाली थे। एक ही संस्‍थान में होने और एक ही इमारत में रहने के बावजूद उनसे संबंध ऐसे नहीं थे कि पहली बार उनके घर जा कर नमक मांग सकूं। सामने वाली बिल्डिंग में गेस्‍ट हाउस था और उसके पीछे वाली इमारत तक कभी गया ही नहीं था। बेशक वहां भी हमारे ही संस्‍थान के ही लोग रहते थे।
अब फीकी खिचड़ी तो नहीं ही खायी जा सकती थी। चम्‍मच भर नमक का सवाल था जो मैं हल नहीं कर पा रहा था। काफी देर तक अंदर बाहर होता रहा कि क्‍या करूं। अपने आप पर, अपने वक्‍त पर और अपनी जीवन शैली पर अफसोस होता रहा कि चम्‍मच भर नमक लायक संबंध भी नहीं रहे हैं हमारे। बार बार संकोच आड़े आता रहा और मैं नमक नमक जपता रहा।
इसी अंदर बाहर की चहलकदमी में अपने बचपन के कितने ही ऐसे प्रसंग याद आते रहे जब मां ने हमारी पसंद का कुछ नहीं बनाया होता था तो पूरे मोहल्‍ले की रसोई हमारे लिए अपनी होती थी और हम किसी भी पड़ोसी के घर में जा कर खाना खा सकते थे। पूरे मोहल्‍ले की रसोई हमारे लिए सांझी होती थी। मजाल है किसी घर में कोई खास पकवान बना हो और वह दस घरों में सबके हिस्‍से में न आये। बिना नमक वाली इस झमाझम बरसात में ये भी शिद्दत से याद आया कि छोटा सा एक तंदूर पूरे मोहल्‍ले में सिर्फ हमारे घर में था और जिस दिन हमारी मां दोपहर के वक्‍त तंदूर तपाने का फैसला करती, आस पास के दस घरों में पहले खबर कर दी जाती और मोहल्‍ले की सारी चाचियां मासियां तंदूर को गरम बनाये रखने के वास्‍ते अपने हिस्‍से की दो चार लकडि़यां और गूंथे आटे की परात ले कर आ जातीं। हम बच्‍चों की मौज हो जाती। उसी छोटे से तंदूर में से बारी बारी से सोंधी सोंधी गंध लिये कभी मिस्‍सी रोटी निकल रही है, तो कभी प्‍याज के परौंठे निकल रहे हैं। मक्‍की की रोटी निकल रही है और रात की बची दाल डाल कर बनाये गये परौंठे भी। अगर किसी बच्‍चे को अपनी मां के हाथ की सादी रोटी पसंद नहीं है तो किसी भी चाची की परात में से अपनी मन पसंद रोटी ले लो। खुशी खुशी मिलेगी। खाना बनाना निपट जाने के बाद तंदूर की बाकी बची आंच का इस्‍तेमाल मिट्टी की हांडी में उड़द और चने की दाल बनाने के लिए किया जाता था और ज़रूरी नहीं कि ये दाल हमारी ही बन रही हो। जिसका मन आये, दाल की हाड़ी चढ़ा सकती थी। आखिर ये दाल भी तो चार घरों में पहुंचती ही थी।
सब दिन हवा हुए। मैं अपने बचपन के यानी चालीस पैंतालीस साल पहले के दिल याद कर रहा था और सोच रहा था कि या तो भूखा सोउँ या फीकी खिचड़ी खाऊं। नमक मांग कर लाने की हिम्‍मत नहीं ही हुई।
तभी एक चमत्‍कार हुआ। रात दस बजे की पाली वाला सिक्‍युरिटी गार्ड आ चुका था और जाने वाले गार्ड से चार्ज ले रहा था। उसने मेरी बाल्‍कनी की तरफ देखा और आदतन मुझे सलाम किया। सलाम के जवाब में मैंने उसे ऊपर आने का इशारा किया। जब वह ऊपर आया तो मैंने उसे अपनी समस्‍या बतायी। हैरानी की बात, गार्ड को मालूम था कि मोहिते नमक सहित सारे मसाले और दूसरा सामान कल ही अपने घर ले गया है। गार्ड ने खुशी खुशी मेरे लिए बाजार से नमक लाना मंजूर किया और मैंने पुणे में बितायी अपनी आखिरी रात नमक वाली खिचड़ी खायी।
गार्ड बेशक भरी बरसात में भीगते हुए मेरे लिए नमक ले कर आया था, उस नमक की अपनी सीमा थी। उस नमक में सिर्फ खिचड़ी को नमकीन कर सकने का गुण था। जीवन को लवणयुक्‍त बनाने का गुण उसमें नहीं था। मिल बांट कर जीवन जीने से जो लवण आता है हमारे हिस्‍से में, सारे मतभेदों के बावजूद जो नमक हमारी मर्यादा को ढंके रहता है, हमारी चार कमजोरियों पर पर्दा किये रहता है जो साझा नमक, ये वो नमक नहीं था।
क्‍या अब भी कहीं मिलता है वो नमक। मिले तो बताना।
सूरज प्रकाश

बुधवार, 23 सितंबर 2009

बुकर प्राइज़ की जगह देखना चाहते हैं तेजेन्द्र कथा यूके सम्मान को

बुकर प्राइज़ की शुरुआत लगभग 40 बरस पहले हुई थी। एक बरस छोड़ कर दिया जाने वाला ये सम्मान अब तक सात भारतीय लेखकों की कृतियों पर भी दिया जा चुका है। सम्मान के लिए पात्र होने के लिए किताब के साथ स्तरीय होने के अलावा बस, एक ही शर्त जुड़ी होती है कि उसका अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध हो।
साहित्य की किसी भी विधा से चुने गये एक अध्यक्ष और दो सदस्यों वाली बुकर प्राइज़ चयन समिति दुनिया भर के विभिन्न शहरों में बैठकें करती है और पहले दौर में 15 किताबों की सूची शार्टलिस्ट करती है। ये सूची सार्वजनिक नहीं की जाती।
चयन के दूसरे चरण में छ: पुस्तकें चुनी जाती हैं। इस सूची को सार्वजनिक किया जाता है। बाकी काम फिल्मों के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय सम्मान ऑस्कर की तर्ज पर होता है और पूरी दुनिया में फैले पाठक तब छ: में से एक किताब का चयन करते हैं।
बुकर प्राइज़ के लिए चुनी गयी किताब के साथ बहुत बड़ी पुरस्कार राशि तो जुड़ी हुई है ही, नाम, सम्मान और कई भाषाओं में कृति के अनुवाद की असीम संभावनाएं और करोड़ों पाठकों तक सीधी पहुंच के रास्ते इसी सम्मान से खुलते हैं। शॉर्टलिस्ट किये गये 6 लेखक भी खासा नाम और नावां कमाते हैं और उनके ऑडियो, विडियो और प्रिंट मीडिया में प्रकाशित इंटरव्यू मीडिया और पाठक जगत में जगह पाते हैं। उनकी किताबों की बिक्री भी बढ़ती ही है।
बेशक हमारा पन्द्रह बरस पुराना इंदु शर्मा कथा सम्मान बुकर प्राइज़ की तुलना में अभी काफी पीछे है लेकिन अगर आपके पास तीन बातें हों तो आपको सफलता की सीढ़ियां चढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। ये तीन चीज़ें हैं ड्रीम, डिज़ायर एंड विज़न यानि सपना, उसे पूरा करने की अदम्य इच्छा और आकाश का-सा फैलाव लिये विज़न।
तो कथा यूके के कर्ता-धर्ता तेजेन्‍द्र शर्मा अपने इन्हीं तीन गुणों के आधार पर एक दिन दुनिया भर में दिये जाने वाले साहित्यिक पुरस्कारों की पांत में कथा यूके सम्मानों को बुकर प्राइज़ के आस पास देखना चाहते हैं। बेशक दोनों सम्मानों के स्वरूप में और दायरे में जमीन आसमान का फर्क है लेकिन सपना तो वही होता है ना जो हमें सोने न दे, न कि वह जो हम नींद में देखते हैं। तेजेन्‍द्र का यही सपना इन सम्मानों को बंबई के एयर इंडिया ऑडिटोरियम से ले कर लंदन के हाउस ऑफ लार्ड्स तक ले गया है। बेशक अब तक का ये सफर इतना आसान कभी नहीं रहा है लेकिन एक कहावत है ना कि पानी के जहाज सबसे ज्यादा सुरक्षित बंदरगाह पर होते हैं लेकिन वे बंदरगाह पर ठहरे रहने के लिए बने नहीं होते। तो यही बुकर प्राइज़ की बराबरी वाला सपना भी वे एक दिन पूरा करके दिखायेंगे। अपने सभी सपनों को पूरा करने की अपनी कूवत, नीयत और हिम्मत के साथ तेजेन्‍द्र अपने इस सपने को भी पूरा कर ले जायेंगे।
कथा यूके के सम्मानों को वे आज उस मुकाम तक तो पहुंचा ही चुके हैं कि हर बरस जब अप्रैल के आस पास इन पुरस्कारों की घोषणा होती है तो उससे काफी पहले से देश भर में हर स्तर उस बरस की चयनित किताब को ले कर कयास भिड़ाये जाने लगते हैं और नाम उछाले जाने लगते हैं। ईष्ट मित्र, प्रशंसक, साथी रचनाकार, सभी तो बेसब्री से इन सम्मानों की घोषणा की राह देख रहे होते हैं उन दिनों।
एक बात और है। बुकर प्राइज़ की तरह न तो पिछले पन्‍द्रह बरसों से कथा यूके के निर्णायक मंडल के नाम घोषित किये गये हैं और न ही अंतिम 6 की सूची में आयी किताबों का नाम ही सार्वजनिक किया जाता है। इसके अलावा, कथा यूके सम्मानों के चयन का आधार लेखक नहीं, किताब होती है और इसका सबसे बड़ा सुबूत यही है कि अब तक दिये गये पन्‍द्रह में कम से कम 5 सम्मान लेखक या लेखिका की पहली कृति पर दिये गये हैं। बेशक तेजेन्द्र को और कई बार कथा यूके के भारतीय प्रतिनिधि के नाते मुझे भी सबसे ज्यादा इसी सवाल का जवाब देना पड़ता है। अक्सर और ज्यादातर हमसे पहला प्रश्न निर्णायक मंडल में शामिल विद्वानों के नामों का ले कर ही होता है। इस सवाल का जवाब तेजेन्‍द्र हमेशा यही दिया करते हैं कि पहला सच ये है कि साहित्य अकादमी में हर वर्ष चयन समिति के नाम सबको पता होते हैं और दूसरा सच हर बरस ये होता है कि पुरस्कारों की घोषणा से पहले पूरे देश को मालूम रहता है कि इस बरस किस भाषा में ये सम्मान किसकी झोली में डाला जाने वाला है। साहित्य अकादमी में यही दोनों सच कई बरसों से दोहराये जा रहे हैं। इसके बाद साहित्य अकादमी के काम करने के ढंग की पारदर्शिता, विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर कुछ भी कहना शेष नहीं रह जाता।
तेजेन्द्र आगे कहते हैं कि अगर हम निर्णायक मंडल की घोषणा नहीं करते तो कम से कम किसी भी तरह की सिफारिश या पक्षपात के आरोप से तो बचे ही रहते हैं, साथ ही इस आशंका से भी तो बचे रहते हैं कि घोषित किये जाने से पहले सम्मान के बारे में किसी को भी नहीं पता होता। और यही हमारे सम्मानों की पारदर्शिता, विश्वसनीयता, निष्पक्षता और ईमानदारी का प्रमाण है।
तेजेन्‍द्र अकूत मानसिक और शारीरिक ऊर्जा के भंडार हैं और कथा यूके के लिए हमेशा कुछ न कुछ बेहतर सोचने और करने में लगे ही रहते हैं। कथा यूके उनके लिए जीवन का आधार है, मानसिक बल है और जीवन धारा है। यही उनकी जीवन शक्ति है। उनके मन में कथा यूके के लिए कितना सम्मान है इस बात को इस किस्से से समझा जा सकता है।
शायद 2003 या 2004 में किसी मामूली सी तकनीकी गलती के कारण उनकी नौकरी पर बन आयी थी और उन्हें जबरन लम्बी छुट्टी पर घर पर बिठा दिया गया था। एक तरह का निलम्बन।
कथा यूके का आयोजन सिर पर था और सारी तैयारियां न केवल धन और समय मांगती थीं, ठंडे दिमाग से सोचने समझने और कुछ करने के लिए असीम मानसिक शांति की भी मांग करती थीं। बेरोजगार रहने और आर्थिक रूप से बेहाल रहने के बावजूद वे पूरी मुस्तैदी से सारी तैयारियों में लगे रहे और आयोजन बहुत सफल रहा। पूरे अरसे के दौरान उनके चेहरे पर कहीं शिकन तक नहीं थी। सम्मानित रचनाकार बहुत खुश हो कर वापिस लौटे।
मैं उस बार शायद दो हफ्ते के लिए उनका मेहमान रहा। पहले हफ्ते तो उन्होंने यही कहा कि आयोजन के लिए छुट्टी ली है लेकिन दूसरे हफ्ते वे बाकायदा बैग ले कर ड्यूटी के लिए निकलते रहे और शाम के वक्त वापिस आते रहे। मुझे भारत आने के बहुत दिनों बाद पता चला कि वे उन दिनों नौकरी से बाहर थे, पगार नहीं मिल रही थी उन्हें और उन्होंने फिर भी किसी तरह न केवल मेरे आने जाने का टिकट जुटाया था बल्कि मेरे और परिवार के लिए हमेशा की तरह उपहार भी दिये थे। मुझे ये भी बहुत देर से पता चला था कि उनकी नौकरी न रहने की खबर उनके परिवार को भी नहीं थी। बेशक हम दोनों ने आपस में आज तक इस बात का जिक्र नहीं किया है लेकिन निश्चित ही अपनी व्यक्तिगत परेशानियों की काली छाया तेजेन्द्र कथा यूके के पूरे आयोजन पर नहीं पड़ने देना चाहते थे। शायद उस वर्ष के सम्मानित लेखक को आज तक ये बात पता न हो कि उनके लंदन प्रवास के पूरे अरसे के दौरान जिस तरह तेजेन्द्र हँसते खिलखिलाते उनकी आवाभगत में लगे रहे थे, दरअसल खुद कितने परेशान चल रहे थे।
अपने खराब स्वास्थ्य, नौकरी पर एक के बाद एक आते संकट, किसी को भी तोड़ देने की हद तक बिगड़ चुकी पारिवारिक स्थितियों और बिलकुल अलग थलग पड़ जाने के मारक अनुभवों के बावजूद तेजेन्द्र हिम्मत नहीं हारते और एकला चलो रे की तर्ज पर न केवल पिछले दस बरस से इंगलैंड में कथा यूके की मशाल जलाये हुए हैं, उन्होंने वहां कहानी पाठ, कहानी कार्यशाला, गीत संगीत के कार्यक्रमों, नाटकों और भारत से पधारने वाले अमूमन सभी लेखकों की स्थानीय समुदायों से मुलाकात जैसे कई सार्थक सिलसिले शुरू किये हैं और इन सब प्रयासों के बेहतर उन्हें परिणाम भी मिले ही हैं। वे 10 बरस पहले जब लंदन गये थे तो वहां के हिन्दी रचनाकारों की इक्का दुक्का किताबें ही छपी थीं लेकिन ये तेजेन्द्र और उनकी कथा यूके की गतिविधियों और प्रेरणा का ही कमाल है कि इस अरसे में कई विधाओं में हिन्दी में तीस से भी अधिक किताबें न केवल आ चुकी हैं बल्कि पुरस्कृत भी हो चुकी हैं। इंगलैंडवासी रवनाकारों की दस पुस्तकों को तो इस अरसे में कथा यूके के पद्मानंद साहित्य सम्मानों से ही नवाजा जा चुका है।
इतने बड़े आयोजन के लिए धन जुटाना कोई आसान काम नहीं होता। सम्मानित रचनाकार और यदि साथ में सम्मान प्रदान करने के लिए कोई वरिष्ठ लेखक भारत से ही जा रहा हो तो उसके लिए भी भारत से लंदन की वापसी टिकट, वीज़ा शुल्क, हफ्ते भर होटल में ठहराना, एयरपोर्ट पर रिसीव करना और छोड़ना, खाने पीने की व्यवस्था, घुमाना फिराना, उनके सम्मान में गोष्ठियां आयोजित करना, गीतांजलि बहुभाषीय समाज के सम्मान के लिए उन्हें बरमिंघम ले जाना, उन्हें व्यक्तिगत उपहार आदि दे कर सम्मानित करना, इन सबके लिए विदेशी मुदा में ढेर सारे धन, धैर्य, समय और स्रोतों की ज़रूरत होती है। ये सब तो है ही, भारतीय प्रतिनिधि का बिल्ला लगाये ये बंदा भी हर बरस लंदन जा धमकता है यानी एक और अदद बंदे पर यहां गिनाये गये सारे खर्चे!
इसके अलावा, शील्ड है, मानपत्र है, स्मारिका के लिए भाग दौड़ है, उसका प्रकाशन है, स्मारिका भारत से ले जाने की व्यवस्था है, दोशाला है, आयोजन स्थल का किराया है, जलपान है, निमंत्रण पत्र तथा स्मारिका के प्रकाशन और वितरण की व्यवस्था है, आयोजन के लिए हफ्ते भर की छुट्टी है, सारे आयोजन के लिए भाग दौड़ है, हाउस ऑफ लार्ड्स की औपचारिकताएं हैं। ये सारे काम तेजेन्द्र और अकेले तेजेन्द्र को करने होते हैं और वे पिछले दस बरस से बखूबी कर रहे हैं। अगले दो आयोजनों के लायक धन हमेशा वे अपनी जेब से एहतिआतन बचाये रखते हैं।
स्मारिका के लिए विज्ञापन जुटाना शायद किसी भी देश में सबसे मुश्किल काम माना जाता है लेकिन वे अपने अकेले के बलबूते पर इस काम को भी लंदन में सरअंजाम दे ही रहे हैं। वे स्मारिका के लिए विज्ञापन मांगने में कोई शर्म महसूस नहीं करते। उनका कहना है कि मैं एक पराये देश में हिन्दी का माहौल बनाने में और भारत के एक हिन्दी के लेखक को विदेश में सम्मान दिलाने और यहां हिन्दी के पाठक तैयार करने की मुहिम पर अकेले के दम पर लगा हुआ हूं, सरकार करोड़ों रुपये खर्च करके हिन्दी को यूएनओ में ले जाने के प्रस्ताव तक पास नहीं करवा पाती और कथा यूके अपने पुरस्कारों के लिए हाउस ऑफ लार्ड्स तक जा पहुंची है तो इतनी मदद तो सबको करनी ही चाहिये। इसके अलावा किसी भी भारतीय भाषा की सर्वोत्तम कृति के लिए लंदन में और वह भी हाउस ऑफ लार्ड्स में हर बरस दिया जाने वाला ये इकलौता सम्मान है तो इस सम्मान समारोह के अद्भुत पलों का साक्षी बनने के लिए जितने भी उदार और मेहरबान लोगों और संस्थाओं को जोड़ा जा सके, उतना बेहतर।
पिछले तीन बरस से लंदन में तेज को अपनी संस्था की गतिविधियों को नये और सार्थक आयाम देने के लिए एक नया हमसफ़र मिला है। ये हमसफ़र कथा यूके की सारी गतिविधियों में बराबरी से शरीक तो होता ही है, इसके लिए धन जुटाने, नये प्रोजेक्ट शुरू करने और चल रहे कामों को और नयी ऊंचाइयों तक ले जाने की तेजेन्द्र् की कोशिशों में लगातार मानसिक और आत्मिक बल देता है। ये हमसफ़र उन्हें मिला है यूके की सरकार में काउंसिलर ज़किया ज़ुबैरी के रूप में। वे खुद बेहतरीन रचनाकार हैं और घनघोर पाठक हैं। भारत में पली बढ़ी, कराची में ब्याही और पिछले कई बरसों से लंदन में रह रहीं ज़किया जी संगीत, साहित्य और इतर विधाओं के ज़रिये हिन्दी-उर्दू के बीच नज़दीकियां लाने के मकसद से एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स नाम की संस्था चलाती हैं। कथा यूके के साथ मिल कर उन्होंने पिछले चार बरसों में साहित्य और संगीत की दिशा में कई अहम काम किये हैं।
दोनों संस्थाओं की ईमानदार कोशिशों को इसी बात से समझा जा सकता है कि 26/11 के मुंबई हादसे के बाद उन्होंने लंदन में हिन्दी में लिखने वाले भारतीय कहानीकारों और उर्दू में लिखने वाले पाकिस्तान के लेखकों को एक ही मंच से पेश किया। मकसद यही दिखाना था कि साहित्य या अदब किसी भी तरह की सीमाओं से या मनमुटावों से बंधा नहीं होता और साहित्य ही है जो इन्सान को बेहतरी की राह पर ले जाने का काम कर सकता है। ज़किया ज़ुबैरी कथा यूके के लिए और कथा यूके के जरिये हिन्दी के लिए जो कुछ भी कर रही हैं, उसके लिए फ्रेंड, फिलास्फर एंड गाइड जैसा जुमला भी छोटा पड़ता है।
1995 में शायद जुलाई या अगस्त में जब पहला इंदु शर्मा कथा सम्मान बंबई के एयर इंडिया के भव्य ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया था तो उसने कई इतिहास रच दिये थे। डॉक्टर धर्मवीर भारती को कई बरसों बाद बंबईवासियों ने मंच से बोलते और गीतांजलिश्री को उनके कहानी संग्रह अनुगूंज के लिए पहले इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित करते देखा था। ये भी बंबई में पहली बार हो रहा था कि थियेटर का कोई मंजा हुआ कलाकार मंच से पुरस्कृत रचनाकार की कहानी का सधी हुई आवाज़ में पाठ कर रहा था। पूरे आयोजन की रूपरेखा न केवल बहुत सोच समझ कर बनायी गयी थी बल्कि आगे आने वाले बरसों के लिए इंदु शर्मा कथा सम्मान आयोजन एक मानंदड की तरह देखे और याद किये जाने लगे थे। ये आलम हो चला था कि हर बरस बंबई वासी वार्षिक इंदु शर्मा कथा सम्मान आयोजन की राह देखा करते थे। समय की पाबंदी, मंच के साथ कोई समझौता नहीं, व्यापक मीडिया कवरेज, हर मेहमान को निमंत्रण पत्र भेजने के अलावा फोन करके आमंत्रित करने की परम्परा तेजेन्द्रॉ ने ही डाली थी। और ये परम्परा बिना किसी व्यवधान के तब तक चलती रही जब तेजेन्द्रि को कुछ कारणों से भारत को ही विदा कहनी पड़ी। लेकिन तब उन्हें नहीं पता था कि संभावनाओं, उम्मीदों और कुछ कर दिखाने का एक और बड़ा और विस्तृत आकाश लंदन में उनकी राह देख रहा है।
लंदन तेजेन्द्र के लिए कई मायनों में लकी सिद्ध हुआ है। बेशक व्यक्तिगत स्तर पर कुछ घाटे के सौदे उनके हिस्से में आये हैं। इन घाटे के सौदों के लिए वे अपने सितारों को ही दोष दे कर चुप रह जाना पसंद करते हैं लेकिन ये तो जग जाहिर है कि वहां जा कर कथा सम्मान अंतर्राष्ट्रीय हुआ है, उसका नाम, प्रतिष्ठा और दायरा बढ़ा है बेशक उससे उम्मीदें भी बढ़ गयी हैं। ये लंदन जाने के कारण ही हुआ है कि कथा यूके सम्मान मुंबई के एयर इंडिया ऑडिटोरियम से चल कर हाउस ऑफ लार्ड्स की दहलीज लांघ पाये हैं और ये तेजेन्द्र के लिए, कथा यूके सम्मानों के लिए, हिन्दी के लिए और हम सब के लिए एक बहुत बड़ी छलांग है। कुछ ही कदमों में चांद छू लेने की सी छलांग। ऐसी ही कुछ और छलांगें हैं जो उनकी योजनाओं में हैं और वे इनके जरिये आकाश तक जाना चाहते हैं। आप उन पलों की कल्पना ही कर सकते हैं जब सात समंदर पार इंगलैंड की धरती पर हिन्दी की अपनी श्रेष्ठ किताब के लिए भारत से वहां गया हमारा लेखक सम्मानित हो रहा होता है। ये सम्मान तब सिर्फ उस लेखक का नहीं हो रहा होता, हिन्दी और पूरी भारतीय अस्मिता का सम्मान हो रहा होता है। अपने अकेले के बलबूते पर वहां तक पहुंचने की हिम्मत और जज्बा तेजेन्द्र में ही है।
कथा यूके को लेकर तेजेन्द्र इतने पोज़ेसिव और संवेदनशील हैं कि उसे और नयी ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए हर वक्त जुटे रहते हैं। एक आयोजन खत्म हुआ नहीं होता कि वे अगले आयोजन की तैयारियों में जुट जाना चाहते हैं। उनका बस चले तो एक सफल आयोजन की प्रेस रिलीज़ भेजने के साथ ही उसी लिफाफे में अगले सम्मान के लिए नामांकन मांगने के लिए अनुरोध भेज दें। (कथा यूके के सम्मानों के चयन प्रक्रिया का एक हिस्सा ये भी है कि हर वर्ष देश भर में लेखकों, संपादकों, प्रकाशकों, मित्रों और सुधि समीक्षकों को पत्र भेज कर उनसे पिछले तीन वर्ष के दौरान छपी, पाठकों और समीक्षकों द्वारा सराही और पसंद की गयी तीन किताबों की सिफारिश करने का अनुरोध किया जाता है।)
वे समय के इतने पाबंद हैं कि आयोजन के लिए पूरे बरस का खाका एक बरस पहले से बना कर रख लेते हैं और उसके हिसाब से चलने का न केवल खुद प्रयास करते हैं बल्कि मुझ पर लगातार ये दबाव रहता है कि उनके शेड्यूल का पूरा पालन हो। परफैक्शन तो हर काम में उन्हें इतना चाहिये कि पिछले दस बरस से कथा यूके के जुड़ा रहने और अपनी सामर्थ्य भर काम करने और उसमें कई नये आयाम जोड़ने के बावजूद मैं आज तक उनके परफैक्शन लेवल तक नहीं पहुंच पाया हूं। कहीं ज़रा सी चूक हुई नहीं कि साहब का मूड ऑफ। तब उन्हें मनाने की कोई तरकीब काम नहीं आयेगी। हां, बिना शर्त माफीनामा दाखिल करने से कुछ बात बन सकती है।
मुझे कथा यूके से जुड़े दसेक बरस तो हो ही गये होंगे। भारत में पांचों सम्मान समारोहों का तथा लंदन में एक तरह से 6 सम्मान समारोहों का साक्षी रहा हूं मैं। कथा यूके के काम करने के तरीकों को लेकर हम दोनों में गहरे मतभेद हैं, लेकिन हम दोनों ही अपनी-अपनी जिद की ढपली बजाते हुए अपने अपने तरीके से काम करते ही रहते हैं क्योंकि तेजेन्द्र की तरह मेरा भी ये मानना है कि ये सम्मान एक लेखक द्वारा अपनी दिवंगत लेखिका पत्नी की स्मृति में किसी तीसरे लेखक की श्रेष्ठ कृति को दिये जाने की एक ईमानदार कोशिश है और इसे जितना बेहतर, पारदर्शी, निष्पक्ष और स्तरीय बनाया जा सके, उतना ही अच्छा। और इस ईमानदार कोशिश में अगर मेरे अनगढ़ हाथों का थोड़ा-सा सहारा मिल रहा है तो ये मेरा सौभाग्य है।
तेजेन्द्र से मेरी दोस्ती उतनी ही पुरानी है। पारिवारिक दोस्ती। हम दोनों के कई दुख भी सांझे हैं और सुख भी। बेशक जब हम इंदु शर्मा कथा सम्मान में पहली बार 1995 में मिले थे, उससे पहले भी एक दूसरे की रचनाओं से परिचित थे ही लेकिन मैं तब हाल ही में अहमदाबाद में 6 बरस गुजार कर वापिस आया था और एक तरह से बंबई के लेखन जगत के लिए अजनबी ही था। सिर्फ धीरेन्द्र अस्थाना से ही पच्चीस बरस पुराना दोस्ताना था। तेजेन्द्र से परिचय जिस तेजी से दोस्ती में बदला, उसे देख कर कई दोस्तों को रश्क होता है। साल भर पहले मेरे भीषण एक्सीडेंट के समय जिस तरह से तेजेन्द्र ने मेरे परिवार को मानसिक सहारा दिया, वह एक मिसाल है हमारी दोस्ती की।
मेरा पहला उपन्यास हादसों के बीच बेशक उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया था लेकिन मेरे दूसरे उपन्यास देस बिराना के वे घनघोर प्रशंसक हैं। इसका बर्ल्ब भी तेजेन्द्र ने ही लिखा है और इसका लोकार्पण भी लंदन में ही कथा यूके के सम्मान समारोह में ही हुआ था। इस उपन्यास के लंदन वाले अंश के लिए मैंने जितना होम वर्क किया है या जानकारी जुटायी है, उसमें तेजेन्द्र का बहुत बड़ा हाथ है। तब मैं पहली बार लंदन गया था और लगातार पन्द्रह दिन अपने उपन्यास के चऱित्रों के साथ एक तरह से भटकता रहा था। उससे पहले और बाद में भी मैं उनसे अपने उपन्यास के लिए जानकारी लेता रहा था।
कई लोगों की राय में तेजेन्द्र अपने आप में एक चलती फिरती संस्था हैं जो कई मोर्चों पर एक साथ जूझते रहते हैं। इसमें कोई शक नहीं। सवेरे साढ़े चार या पांच बजे से उनकी जो दिनचर्या शुरू होती है, रात ग्यारह बजे से पहले खत्म नहीं होती। दिन भर में वे पूरी दुनिया में बसे दोस्तों से, परिचितों से, संपादकों से, लेखक मित्रों से, भारत में अपनी मां से, बहनों से फोन या चैट से या ईमेल से सम्पर्क कर लेते हैं। एकाध ग़ज़ल या कविता लिख लेते हैं, कहानी पर काम कर लेते हैं और बढ़िया खाना भी बना लेते हैं। लम्बे फोन करना उनका प्रिय शगल है। नौकरी भी कर आते हैं इस बीच।
बस, एक ही व्यवधान होता है उनकी पूरी दिनचर्या में। अगर कहीं आप गाड़ी चला रहे हों और तेजेन्द्र आपके साथ वाली सीट पर बैठे हों तो उन्हें खर्राटे वाली नींद में जाने में सिर्फ 15 सेकेंड लगते हैं।

सोमवार, 8 जून 2009

कितना अच्‍छा दिन

सुबह सुहानी है। मौसम मीठा मीठा सा तराना छेड़े हुए है। आज का दिन हमारे लिए खास है। बड़ा बेटा अपनी पहली नौकरी पर गया है। नागपुर से बीटेक और आइआइएम, लखनऊ से एमबीए करने के बाद। मेरे खराब स्‍वास्‍थ्‍य के बावजूद मेरी हिम्‍मत बढ़ाने के लिए उसने मुझे अपने पैंट कमीज प्रेस करने के लिए दिये जो मैंने खुशी खुशी कर दिये। मुझे टाई की नॉट लगाने के लिए दी। मैंने लगा दी।
कई बरस पहले के दिन याद आ गये। बीस बरस पहले भी उसे स्‍कूल भेजने के दिन हम इतने ही उत्‍साह में थे। उसे तैयार कर रहे थे। तब बरसात हो रही थी और बेटा चिल्‍ला रहा था - जल्‍दी करो रेन कोट पहनाओ नहीं तो बरसात रुक जायेगी और रेनकोट पहनना बेकार हो जायेगा। आज भी बेशक मौसम वैसा ही है लेकिन बरसात नहीं है। शहर बेशक वही है। तब बंबई था अब मुंबई हो गया है।
वक्‍त कितनी तेजी से करवट बदलता है। पता ही नहीं चलता कब हम बूढ़े हो गये और बच्‍चे बड़े। कई बार हम बूढ़े होने से इनकार भी कर देते हैं। बस या राह में कोई अंकल कहे या मराठी या गुजराती में वढील यानी बुजुर्ग कहे तो नाराज हो जाते हैं। दिल्‍ली यात्रा में एक बस में इस बार कंडक्‍टर ने मेरी सफेद दाढ़ी देख कर मुझसे कहा कि सीनियर सिटीजन की सीट पर जो आदमी बैठा है उसे उठा कर आप बैठ जाओ लेकिन मैंने तकलीफ के बावजूद इनकार कर दिया कि सीनियर सिटीजन का हक मांगने लायक तो नहीं ही हुआ। खड़ा रहा। तब कंडक्‍टर खुद उठ कर उस आदमी तक गया और मेरे लिए सीट खाली करायी। तब बैठा।
एक और मजेदार किस्‍सा हुआ। मेरी एक मित्र है - फोन वाली मित्र। कभी मिले नहीं। मिलेंगे भी नहीं, पता नहीं। अक्‍सर बातें करते हैं। पढ़ाती है। अक्‍सर मेरी सलाह लेती रहती है और अपने सुख दुख बांटती है। उसे कुछ काम की सलाह दी होगी तो बेहद खुश थी। कहने लगी कि सूरज तुम्‍हें कुछ देना चाहती हूं - मना मत करना। मैं हैरान, फोन पर भला क्‍या देगी। उसने फोन पर किस करने की आवाज निकाली और कहा - ये स्‍वीट किस मेरी तरफ से। मैं हँसने लगा। बोली - हँसे क्‍यों। मैंने जवाब दिया कि मैं अट्ठावन बरस की उम्र में फोन पर इश्‍क लड़ा रहा हूं और पप्पियां पा रहा हूं। मेरे पिता जी जब इस उम्र में थे तो पेंशन का हिसाब लगाते रहते थे, तब उनके चार बच्‍चों की शादी हो चुकी थी और उनके चार पांच पोते पोती थे। ये बात 1985 की है और वे ये सब करने की सोच भी नहीं सकते थे। हम न केवल कर रहे हैं बल्कि ये उम्‍मीद भी करते हैं कि अभी तो ये सब चलते रहना है।
हमें पता है कि बेटा कभी कभार पी लेता है या सिगरेट के कश ले लेता है। छ: बरस हास्‍टलों में रहा और जिस तरह के माहौल में, अकेलेपन में और पढ़ाई के तनावों में रहा हम समझ सकते हैं कि कई बार इन चीजों से बचना मुश्किल होता है। लेकिन उसने जब भी पी, मम्‍मी को फोन पर बता दिया कि आज थोड़ी सी ली है। हमें खबर रहती है। अब मैं उसे किस मुंह से मना करूं जब कि मैं खुद ये सारी हरकतें बीस बरस की उम्र से पहले शुरू कर चुका था।
वह बी टैक करके आया था और उसका घर पर पहला दिन था। हम बातें कर रहे थे और उसकी बहुत इच्‍छा थी कि मेरे साथ पहली बार बीयर पीये। वह घंटों से जद्दो जहद कर रहा था लेकिन कह नहीं पा रहा था। शायद नागपुर से तय करके आया था कि पीयेगा लेकिन कहे कैसे। तभी मैंने उससे कहा कि बेटे अब तुम ग्रेजुएट हो गये हो इस हिसाब से मेरे दोस्‍त हुए। हम अब बराबरी से बात कर सकते हैं। चलो बेटे तुम्‍हारे ग्रेजुएशन की खुशी में हम दोनों आज एक साथ बीयर पीयेंगे।
आप समझ नहीं सकते उसे इस बात से कितनी राहत मिली कि मैं अपने इस एक ही वाक्‍य से उसकी दुनिया में शामिल हो पाया और उसे अपनी दुनिया में ले आया।
उसी ने तब ये बात बतायी थी कि वह मुझसे बीयर पीने के लिए कहने के लिए दो दिन से कहना चाह रहा था। डर भी रहा था कि मैं पता नहीं कैसे रिएक्‍ट करूं। बेशक अब वह एमबीए हो कर आ गया है, आज पहला दिन है उसके जॉब का लेकिन हम दोनों ने दोबारा नहीं पी है एक साथ। जरूरत ही नहीं हुई।
कभी मेरे पिता ने भी मेरा संकोच इसी तरह से दूर किया था और मेरी तरफ दोस्‍ती का हाथ बढ़ाया था। मैं अपनी नौकरी के सिलसिले में 22 बरस की उम्र में घर से 2000 मील दूर हैदराबाद में तीन बरस तक रहा था और दोस्‍तों के साथ कभी कभार बैठने लगा था। तभी घर लौटने पर एक बार मेरे पिता ने कहा था कि अगर नहीं पीते हो तो बहुत अच्‍छी बात है और अगर पीते हो तो हमारी कम्‍पनी में पी सकते हो। हम तुम्‍हें अच्‍छी कम्‍पनी देंगे। तय था कि कभी उनके साथ बैठ कर पी जायेगी तो पूरे अनुशासित तरीके से और लिमिट में ही पी जायेगी। हम बाप बेटे (मैं और मेरे पिता) आज भी एक साथ बैठ कर पीते हैं लेकिन सारी मर्यादाओं में रहते हुए।
मैं नहीं चाहूंगा कि ये परम्‍परा आगे भी जारी रहे लेकिन आने वाले वक्‍त के बारे में कौन कह सकता है।

मंगलवार, 12 मई 2009

बहुत निराश हुआ चालीस बरस बाद अपने स्‍कूल जा कर

बहुत बरसों से ये इच्‍छा थी कि अगली बार जब भी अपने शहर देहरादून जाऊं, उस गांधी स्‍कूल में जरूर जाऊं जहां से मैंने 1968 में हाईस्‍कूल पास किया था। बेशक 1974 में नौकरियों के चक्‍कर में हमेशा के लिए मैंने अपना शहर छोड़ दिया था और उसके बाद भी कुछ बरस तक वहां रहा था, छठे छमाहे वहां जाने के बावजूद स्‍कूल के अंदर कभी जाना नहीं हो पाया था। कभी स्‍कूल बंद होता था तो कभी मेरे पास ही टाइम का टोटा होता था।
मैं कभी बहुत अच्‍छा विद्यार्थी नहीं रहा था। उस समय के चलन के हिसाब से हम सब बच्‍चे मास्‍टरों की वज‍ह बेवजह मार खाते ही बड़े होते रहे और अगली कक्षाओं में जाते रहे। लेकिन कुछ था जो इतने बरसों से मुझे हॉंट कर रहा था कि उस सारे माहौल को एक बार फिर महसूस करना है जहां से निकल कर मैं यहाँ तक पहुंचा हूं। बेशक कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार पाया साहित्‍य या नौकरी में या जीवन में लेकिन जो भी बना हूं, नींव पड़ने का सिलसिला तो उसी स्‍कूल में शुरू हुआ था।
कुछ खट्टी मीठी यादें थीं जो ताज़ा कर लेना चाहता था और भले की कुछ देर के लिए ही सही, उस पुराने माहौल में वक्‍त गुज़ारना चाहता था।
इस बार तय कर लिया था कि जाना ही है। मैंने कन्‍फर्म करने के लिहाज से प्रधानाचार्य का नाम पता किया था और उन्‍हें खत डाला था कि इस तरह मैं एक पूर्व विद्यार्थी के नाते स्‍कूल आना और बच्‍चों से मिलना बतियाना चाहता हूं। जाने से पन्‍द्रह बीस रोज पहले उप प्रधानाचार्य का फोन भी आ गया था और उन्‍होंने इस बात पर बहुत खुशी जाहिर की थी। कहा था कि पहुंचने पर मैं उन्‍हें सूचित कर दूं।
तय दिन की सुबह तक मेरे पास कोई जानकारी नहीं थी कि मुझे कितने बजे पहुंचना है वहां। मजबूरन इंटरनेट से बीएसएनएल की मदद से प्रिंसिपल के घर का नम्‍बर खोजा और उन्‍हें याद दिलाया कि मैंने उन्‍हें आने के बारे में खत लिखा था। थोड़ी देर माथापच्‍ची करने पर उन्‍हें याद आ गया। बोले कभी भी चले आओ। मैं हैरान हुआ, मैंने अपने पत्र में लिखा भी था और उप प्रधानाचार्य को फोन पर भी बताया था कि मैं बच्‍चों के बीच कुछ वक्‍त गुज़ारना चाहता हूं।
खैर, पुस्‍तकालय के‍ लिए और छोटी कक्षाओं के बच्‍चों के लिए भेंट स्‍वरूप देने के लिए खरीदी गयी किताबों का बैग संभाले में जब स्‍कूल के गेट पर पहुंचा तो याद आया कि दो मिनट की देरी हो जाने पर भी ये गेट हमारे लिए किस तरह से बंद हो जाया करता था और प्रार्थना की सारी औपचारिकताएं निपट जाने के बाद ही खुलता था और दो बेंत मार खाने के बाद ही हमें अंदर आने दिया जाता था।
गेट लावारिस सा खुला हुआ था। किसी ने नहीं रोका मुझे।
प्रिंसिपल का कमरा भी गेट की तरह लावारिस तरीके से खुला था और भीतर बाहर कोई नहीं था। तब हम इस बात की कल्‍पना भी नहीं कर सकते थे। वैसे तो पूरा स्‍कूल ही मातमी तरीके से उजड़ा हुआ लग रहा था और साफ पता चल रहा था कि लापरवाही का साम्राज्‍य है। प्रिंसिपल के कमरे के दोनों तरफ दीवार पर बने दो ब्‍लैक बोर्ड अभी भी थे। याद करता हूं कितने बरसों तक मैंने बायें वाले बोर्ड पर अख़बार से देख कर समाचार लिखे होंगे। गैरी सोबर्स के एक ओवर में छ: छक्‍के लगाने का समाचार इस बोर्ड पर मैंने ही लिखा था।
तब हमारा स्‍कूल सप्‍ताह के छ: दिनों के हिसाब से छ: दलों में बंटा हुआ होता था। नाम याद करने की कोशिश करता हूं: नालंदा, विक्रमशिला, सांची, उत्‍तराखंड, वैशाली और .. बाकी एक नाम याद नहीं आ रहा। जिस दल का दिन हो, वह दायीं तरफ वाले बोर्ड पर अपने दल के पदाधिकारियों के नाम लिखता था और पूरे दिन अनुशासन और सफाई का काम संभालता था। स्‍कूल की सारी गतिविधियां दलों के बीच होती थीं। मैं जिस दल में भी रहा, बोर्ड पर खूब सजा कर लिखने की जिम्‍मेवारी मेरी हुआ करती थी। अब दोनों बोर्ड साफ थे। पता नहीं कब से कुछ भी न लिखा गया हो।
लाइब्रेरी की तरफ मुड़ा तो वहीं स्‍टाफ रूम नज़र आया। पांच सात जन बैठे हुए थे। मेज के सिरे पर बैठे सज्‍जन ही प्रधानाचार्य होंगे, ये सोच के मैंने प्रणाम किया और अपना परिचय दिया। उन्‍होंने पहचाना और भीतर आने का इशारा किया। संयोग से उनके साथ वाली सीट पर मेरे परिचित हिन्‍दी अध्‍यापक बैठे हुए थे। वे उठ खड़े हुए और दो चार मिनट में मेरी सारी उप‍लब्धियां गिना डालीं।
परिचय का दौर शुरू हुआ। पता चला कि इस समय कुल आठ अध्‍यापक हैं और करीब 300 विद्यार्थी। बाकी पार्ट टाइम। जबकि स्‍कूल में अब सीबीएससी सेलेबस पढ़ाया जाता है। मैं हैरान हुआ, उस वक्‍त हमारा स्‍कूल शहर का सबसे बढि़या स्‍कूल माना जाता था और वहां प्रवेश पा लेना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। तब पन्‍द्रह सौ विद्यार्थी और तीस पैंतीस अध्‍यापक तो रहे ही होंगे। सहस्रधारा नाम की वार्षिक पत्रिका भी निकलती थी जो हमें रिजल्‍ट के साथ दी जाती थी।
मैं डाउन मेमोरी लेन उतर चुका था और हर विषय के अध्‍यापक का नाम और उनके पढ़ाने के तरीके के बारे में बता रहा था। कितना कुछ तो था जो याद आ रहा था। स्‍टाफ रूम में जितने भी लोग बैठे थे, वे हमारे वक्‍त के कुछ अध्‍यापकों के साथ काम कर चुके थे। प्रिंसिपल भी। सब हैरान थे कि चालीस बरस बीत जाने के बाद भी मुझे सब कुछ जस का तस याद है। अब उन्‍हें मैं कैसे बताता कि हर लेखक के पास स्‍मृतियों का ऐसा खज़ाना होता है कि वह चाह कर भी नहीं भूल पाता। वह उसकी पूंजी होती है और वही लेखन के लिए कच्‍चा माल।
मैंने स्‍कूल का एक चक्‍कर लगाने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। हिन्‍दी अध्‍यापक और प्रिंसिपल साथ चले। सबसे पहले लाइब्रेरी। हमारे वक्‍त मंगला प्रसाद पंत हुआ करते थे लाइब्रेरियन। उन्‍हें गुज़रे सदियां बीत गयीं। अगला झटका मेरा इंतज़ार कर रहा था। लगा कि चालीस बरस से किताबों की अलमारियां खुली ही नहीं हैं। तालों में सदियों से बंद पुरानी किताबें न पढ़े जाने की अपनी हालत पर आंसू बहा रही थीं। स्‍कूल चल रहा था। न लाइब्रेरियन थे वहां न कोई बच्‍चा।
अगला क्‍लास रूम। एक और झटका बारहवीं क्‍लास के कमरे में। देखा बारहवीं के बच्‍चे अब स्‍टूल पर बैठ कर पढ़ते हैं। मुझे याद आता है हम इसी स्‍कूल में दूसरी तीसरी में भी बेंच पर बैठा करते थे। दसवीं तक आते आते तो सबको छोटी छोटी कुर्सियों पर बैठना होता था।
एक और झटका। जिस कमरे में हम पांचवीं कक्षा में बैठते थे, वहां अब पहली, तीसरी और पांचवीं की कक्षाएं एक साथ चल रही थीं। तीन कोनों में तीन कक्षाएं। पन्‍द्रह बीस बच्‍चे। मैं बेहद उदास हो गया। ये क्‍या हो गया है मेरे शानदार स्‍कूल को कि स्‍कूल के आधे से ज्‍यादा कमरों में ताले लगे हुए हैं और तीन कक्षाओं के बच्‍चे एक ही कमरे में पढ़ रहे हैं। मैंने बैग से बच्‍चों के लिए लायी सारी किताबें निकालीं और हैड मिस्‍ट्रेस को देते हुए कहा - ये बच्‍चों में बांट देना। वह हैरानी से मेरा चेहरा देखने लगी। मैंने हँसते हुए बताया कि इसी कमरे में पैंतालीस साल पहले मैंने पांचवीं कक्षा की पढ़ाई की थी। हैड मास्‍टर राम किशन की लातें खाते हुए। उन्‍हीं दिनों की याद में।
प्रिंसिपल अपना रोना रो रहे थे कि कोई सहयोग नहीं करता। फंड्स की कमी रहती है। ये कमी और वो कमी। सब बकवास। असली समस्‍या है कि अब हिन्‍दी स्‍कूलों में कोई अपने बच्‍चे भेजना ही नहीं चाहता। आप जितनी भी कोशिश कर लें, आपके हिस्‍से में वे ही बच्‍चे आयेंगे जिनके मॉं बाप महंगे स्‍कूलों की फीस एफोर्ड नहीं कर सकते।
हम पूरे उजाड़ स्‍कूल का चक्‍कर लगा कर वापिस आ गये था। कुछ कमरों से पढ़ाने की आवाज़ें आ रही थीं लेकिन न तो प्रिंसिपल ने ऐसा कोई संकेत दिया और न ही मेरी ही इच्‍छा हुई कि मैं बच्‍चों से बात करूं। कितना तो होमवर्क करके आया था। सोचा था कि पूरे स्‍कूल के बच्‍चों और मास्‍टरों को सभा कक्ष में इकट्ठा किया जायेगा जैसा कि हमारे वक्‍त होता था और मैं बच्‍चों को अपने पुराने दिन याद करते हुए ये बताऊंगा और वो बताऊंगा। उन्‍हें स्‍कूली किताबों के अलावा भी कुछ पढ़ने की सलाह दूंगा और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने के बारे में बताऊंगा। सब धरा रह गया। जबकि हिन्‍दी अध्‍यापक मेरे लेखन के बारे में अच्‍छी तरह जानते थे और मैं अपना परिचय पहले भेज चुका था। ये श्रीमान नौ बरस तक नौकरी से विदआउट पे रह कर मुंबई में गीतकार बनने के चक्‍कर में एडि़यां रगड़ते रहे। एक गीत लिखने का काम नहीं मिला। जुगाड़ करके दसेक किताबें छपवा ली हैं। अब ये जनाब पैगम्‍बर हो गये हैं और इसी नाम से नयी किताब आयी है इनकी। उपदेश देते हैं। किताब में तो घोषणा है ही और बता भी रहे हैं कि मानवता के भले के लिए उन्‍होंने जो किताब लिखी है, अगले दो हज़ार साल तक ऐसी‍ किताब नहीं लिखी जायेगी और दो हज़ार साल बाद आगे की किताब लिखने के लिए वे खुद जनम लेंगे। शायद स्‍कूल में बच्‍चे कम होने का कारण ये अध्‍यापक भी हों।
चाय पीने की इच्‍छा ही नहीं हुई। प्रिंसिपल को अपनी एक किताब भेंट की और स्‍कूल से बाहर आ गया हूं। लाइब्रेरी को देने के लिए जो किताबें लाया था, वापिस ले जा रहा हूं। जानता हूं, बच्‍चों तक कभी नहीं पहुंचेगी।
जिस कॉलेज से मार्निंग क्‍लासेस से बीए किया था, वहां भी आने के बारे में मैंने खत लिखा था और वहां से लिखित न्‍यौता भी आ गया था, लेकिन अब मैं कहीं नहीं जाना चाहता।
अतीत की एक ही यात्रा काफी है।

बुधवार, 11 मार्च 2009

युवा पुत्र की अकाल मौत से उपजे शून्‍य में घुटता परिवार

बेंगलूर में रहने वाले मेरे मित्र के जवान बेटे की पिछले बरस नवम्‍बर में रात के वक्‍त एक सड़क दुर्घटना में मृत्‍यु हो गयी थी। बेचारा डेढ़ घंटे तक सड़क पर घायल पड़ा रहा। मां परेशान हाल मोबाइल से उससे बात करने की कोशिश कर रही थी। तभी वहां से गुज़र रहे किसी मोटर साइकिल सवार ने उसके बजते मोबाइल की आवाज सुनी। वह रुका और उसका मोबाइल अटैंड किया। उसी व्‍यक्ति ने तब बताया कि आपका बेटा तो यहां बेहोश पड़ा हुआ है। मोटर साइकिल अलग पड़ी हुई है। माता पिता लपके उसकी बतायी जगह पर। तब तक वह भला आदमी एक दो लोगों की मदद से उसे पास के अस्‍पताल तक ले जा चुका था। वे उसके बताये अस्‍पताल की तरफ मुड़े।
बच्‍चा अभी भी बेहोश था और उसके सिर पर पीछे की तरफ से खून बह रहा था। रात ग्‍यारह बजे से लगभग बारह बजे तक अपनी तरफ से उसे होश में लाने, खून देने और इलाज शुरू करने की नाकाम को‍शिशें करने के बाद अस्‍पताल के स्‍टाफ ने हाथ खड़े कर दिये और उसे किसी बड़े अस्‍पताल ले जाने के लिए कह दिया। दूसरे बड़े अस्‍पताल में भी यही हुआ कि वे न तो लगातार बहता खून रोक पाये और न ही खून चढ़ा ही पाये हालांकि मेरे मित्र लगातार डाक्‍टरों को बताते रहे कि उनका ब्‍लड ग्रुप और बेटे का ब्‍लड ग्रुप एक ही है। डॉक्‍टर बार बार अंदरूनी चोटों की बात करते रहे और यही कहते रहे कि हम नब्‍ज ही नहीं पकड़ पर रहे हैं।
रात लगभग सवा एक बजे डॉक्‍टरों ने हाथ खड़े कर दिये और एक होनहार नौजवान अस्‍पताल में और डॉक्‍टरों की देखरेख में होने के बावजूद दम तोड़ गया।
जो लोग उसे अस्‍पताल ले कर गये थे उन्‍हीं में से एक ने बाद में बताया था कि उसने लड़के की मोटर साइकिल को डिवाइडर से टकराते और उसे गिरते देखा था और उसने उसी के मोबाइल से एम्‍बुलेंस के लिए 102 पर फोन भी किया था। लेकिन लगभग सवा घंटे तक कोई भी मदद उस तक नहीं पहुंच पायी थी। जिस जगह दुर्घटना हुई थी, वह बेंगलूर के अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर जाने वाली सड़क पर है लेकिन किसी ने भी रुक कर उसकी मदद नहीं की। वह चश्‍मदीद गवाह इस संभावना से भी इनकार नहीं करता कि शायद उसे किसी तेज चलते वाहन ने टक्‍कर मारी हो।
मेरे मित्र और उनका परिवार हक्‍का बक्‍का है और समझ नहीं पा रहा कि ये सब कैसे हो गया और वे कुछ भी नहीं कर पाये। वे दोनों अस्‍पतालों में डॉक्‍टरों के आगे हाथ जोड़ते, गिड़गिड़ाते रहे और ढंग से इलाज शुरू तक नहीं किया गया। सिर से बहते खून को रोकने के लिए भी कुछ नहीं किया गया।
शाश्‍वत मिश्र होनहार लड़का था और नौकरी करते हुए एमबीए कर रहा था। मात्र बाईस बरस की उम्र। बहुत सारे शून्‍य छोड़ गया है वह अपने पीछे। ये स्‍थायी सवाल तो हर बार की तरह है ही कि लोग बाग़ रोज़ाना सड़कों किसी वजह से दुर्घटनाग्रस्‍त हो गये लोगों की मदद करने में अब भी आगे नहीं आते। एंबुलेंस के लिए फोन किये जाने के बावजूद डेढ़ घंटे तक वह नहीं आती। डॉक्‍टर इस तरह के एमर्जेंसी मामलों में भी रूटीन तरीके से ही काम करते हैं और घायल की जान बचाने की कोशिश नहीं करते। मैं खुद पिछले अट्ठाईस बरस से मुंबई में देख रहा हूं कि लोकल ट्रेनों से होने वाली अलग अलग दुर्घटनाओं में घायल होने वाले सैकड़ों लोग स्‍टेशनों पर ही घंटों पड़े रहते हैं और उनमें से ज्‍यादातर इलाज के इंतजार में दम तोड़ देते हैं।
मेरे मित्र को कुछ और सवाल परेशान कर रहे हैं। ये सब हुआ कैसे। कहीं किसी ने .. लेकिन किसी भी आशंका या संभावना के लिए पुलिस को पक्‍का गवाह चाहिये।
मेरे दोस्‍त की एक और परेशानी है और वे कुछ भी तय नहीं कर पा रहे। जिस कम्‍पनी में शाश्‍वत काम पर लगा था, वहां के नियमों के अनुसार सभी कर्मचारियों की बीमा कराया जाता है। अब मेरे मित्र का संकट ये है कि बीमे में मिली इतनी बड़ी रकम का करें क्‍या। बेटे की जान की कीमत में मिली ये रकम उन्‍हें परेशान किये हुए है। वे शाश्‍वत के पिछले स्‍कूलों और कॉलेज में उसकी याद में स्‍कॉलरशिप शुरू करना चाहते हैं, अपने भूले बिसरे गांव में बच्‍चों के लिए कुछ करना चाहते हैं लेकिन बीमे की रकम निश्चित रूप से ज्‍यादा है और इस तरह की स्‍कालरशिप में पूरी राशि खर्च नहीं होगी। ये रकम उन्‍हें लगातार दबाव में रखे हुए है। वे कुछ करना चाहते हैं लेकिन तय नहीं कर पा रहे कि कैसे क्रिएटिव तरीके से इस राशि का सदुपयोग करें।
मुझे विश्‍वास है मेरे ब्‍लॉगर मित्र आगे आयेंगे और उन्‍हें कोई राह सुझायेंगे।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

मैंने पढ़ी किताबें - 2008 में

मैंने पढ़ी किताबें और देखीं फिल्में
यहां मैं 2008 के दौरान पढ़ी गयी उन किताबों की फेहरिस्त दे रहा हूं जो मैंने खरीदीं या किसी न किसी बहाने मुझ तक पहुंचीं। कुछ किताबें पुस्तकालय से ले कर भी पढ़ी होंगी लेकिन उनके नाम अभी याद नहीं आ रहे। ऐसी किताबें भी 25 तो रही ही होंगी। मेरे दोस्ती पूछ सकते हैं कि 366 दिन में इतनी ज्यादा किताबें कैसे पढ़ी जा सकती हैं भला। इसकी दो वजहें रहीं। एक्सीडेंट के कारण चार महीने तक बिस्तर पर रहा और ठीक हो जाने के बाद भी ऑफिस और घर की 4 किमी की दूरी नापने के अलावा कहीं ज्यादा दूर तक नहीं गया। सिर्फ पढ़ता रहा और बेहतरीन फिल्में देखता रहा। कुछ किताबों के नाम याद नहीं आ रहे। ये किताबें दिल्ली में अस्पताल में पढीं थीं। पहले सोचा था कि फिल्मों की तरह इन किताबों को भी अपनी पसंद के हिसाब से एक से पांच तक स्टार दूंगा लेकिन उसमें सारे दोस्तों के नाराज हो जाने का खतरा था, इसलिए सिर्फ नाम दे रहा हूं। मेरे पास अभी भी 50 किताबें तो होंगी जो अभी पढ़ी जानी हैं। उनका जिक्र अगली बार।
देखी गयी कुछ यादगार फिल्मों के नाम भी दे रहा हूं। ज्यादातर‍ फिल्में घर पर देखीं हैं।
1. मोहब्बत का पेड़ प्रिया आनंद कहानी संग्रह
2. अंधेरा समुद्र परितोष चक्रवर्ती कहानी संग्रह
3. अन्या से अनन्या प्रभा खेतान आत्म कथा
4. अपवित्र आख्यान अब्दुल बिस्मिल्लाह उपन्यास
5. आइने सपने और वसंत सेना रवि बुले कहानी संग्रह
6. आखिरी अढाई दिन मीना कुमारी की जीवनी जीवनी
7. इच्छायें कुमार अम्बुंज कहानी संग्रह
8. इस जंगल में दामोदर खडसे कहानी संग्रह
9. उड़ान जितेन ठाकुर उपन्यास
10. उधर के लोग अजय नावरिया उपन्यास
11. उषा वर्मा की कहानियां कारावास कहानी संग्रह
12. उषा राजे सक्सेना की कहानियां कहानी संग्रह
13. ओ इजा शंभु नाथ सती उपन्यास
14. कठपुतलियां मनीषा कुलश्रेष्ठ कहानी संग्रह
15. कागजी़ बुर्ज मीरा कांत कहानी संग्रह
16. कागजी है पैरहन इस्मत चुगताई आत्म कथा
17. काशी का अस्सी काशी नाथ सिंह
18. किस्सा कोहेनूर पंखुरी सिन्हा कहानी संग्रह
19. कुइंया जान नासिरा शर्मा उपन्यास
20. कोई मेरा अपना सुषमा जगमोहन कहानी संग्रह
21. कोहरे में कैद रंग गोविंद मिश्र उपन्यास
22. कौन कुटिल हम जानी प्रेम जनमेजय व्यंग्‍य
23. खारा पानी पाकिस्तानी लेखक उपन्यास
24. गुडि़या भीतर गुडि़या मैत्रेयी पुष्पा आत्म कथा
25. गुलमेंहदी की झाडि़यां तरुण भटनागर कहानी संग्रह
26. गेशे जम्पा नीरजा माधव उपन्यास
27. घर बेघर कमल कुमार कहानी संग्रह
28. चिडि़या फिर नहीं चहकी आलोक मेहता कहानी संग्रह
29. छावनी में बेघर अल्पना मिश्र कहानी संग्रह
30. जंगल का जादू तिल तिल प्रत्यक्षा कहानी संग्रह
31. कहानी संग्रह जया जादवानी कहानी संग्रह
32. जानकी पुल प्रभात रंजन कहानी संग्रह
33. तिनका तिनके पास अनामिका उपन्यास
34. तूती की आवाज ह्रषिकेश सुलभ कहानी संग्रह
35. दस द्वारे का पींजरा अनामिका उपन्यास
36. दावानल नवीन जोशी उपन्यास
37. देवी नगारानी की किताब कविता
38. धुनों की यात्रा पंकज राग अध्ययन
39. धूल पौधों पर गोविंद मिश्र उपन्यास
40. नाम में क्या रखा है हरि भटनागर कहानी संग्रह
41. उपन्यास नीलाक्षी सिंह उपन्यास
42. नूर जहीर बड़ उरैये उपन्यास
43. पंकज मित्र हुडुकलुल्लुा कहानी संग्रह
44. फालतू के लोग राजेन्द्र राजन कहानी संग्रह
45. फूलों का बाड़ा मो आरिफ कहानी संग्रह
46. फ्रिज में औरत मुशर्रफ़ आलम जौकी कहानी संग्रह
47. बहत्त र मील अशोक बटकर (मराठी) उपन्यास
48. बूढ़ा चांद शर्मिला बोहरा जालान कहानी संग्रह
49. बॉस की पार्टी संजय कुंदन कहानी संग्रह
50. ब्रजेश शुक्ला मंडी उपन्यास
51. भया कबीर उदास उषा प्रियंवदा उपन्यास
52. भारतीय कहानियां ज्ञानपीठ कहानी संग्रह
53. भूलना चंदन पांडेय कहानी संग्रह
54. मधु कांकरियां सेज पर संस्कृाति उपन्यास
55. मीना कुमारी की शायरी शायरी
56. मेरे हिस्से का शहर सुधीर विद्यार्थी संस्मरण
57. यत्र तत्र सर्वत्र शरद जोशी
58. ये मेरी गज़लें अहमद फ़राज़ शायरी
59. रघू रेहन पर काशी नाथ सिंह उपन्यास
60. राग विराग संतोष चौबे उपन्यास
61. रेत भगवान दास मोरवाल उपन्यास
62. वह आदमी फ़ज़ल ताबिश उपन्यास
63. वहीं रुक जाते नरेन्द्र नागदेव
64. शराबी की सूक्तियां कृष्ण कल्पित कविता
65. संगम अंजना संधीर
66. सीढि़यां, मां और उसका देवता भगवान दास मोरवाल कहानी संग्रह
67. सूरज नंगा है प्रेम जनमेजय व्यंग्य
68. सोफिया तोलस्तोया की डायरी रचना समय अंक डायरी
69. प्रियदर्शन कहानी संग्रह
70. गोरीनाथ कहानी संग्रह
71. अशोक अग्रवाल यात्रा संस्मरण
72. रूप सिंह चंदेल उपन्यास
73. मनोज रूपड़ा उपन्यास
74. The Devil wears Prada Laure weisberger Novel
75. Istanbul Orhan pamuk Novel
76. Mayada Jean sasson Memoirs
77. Complete works Ruskin Bond Stories and Novels
78. Kite Runner Khalid Hossaine Novel
79. Bertrand Russel’s autobiography Bertrand Russel autobiography
80. Love In The Time Of Cholera Gabriel Garcia Marquez Novel
81. Snow Orhan Pamuk Novel Still reading
82. I Too Had Dream Verghese Kurien autobiography Still reading
83. The Motorcycle Diaries Ernesto “Che” Guevara Still reading
84. Living to tell the tale Gabriel Garcia Marquez reading
85. Long way to freedom Nelson Mandela autobiography Still reading
86. Shanta ram Gregory David Novel

फिल्में जो देखीं – अधिकतर घर पर
1. After the rehearsal Ingmar Bergman
2. Benhur
3. Black diamond
4. Carry on spying
5. Casino royale
6. Come September
7. Confidentially yours
8. डोर
9. GiGi
10. La double vie
11. Le eclisse
12. Lolita
13. North by north west Alfred Hitchcock
14. Old man and the sea
15. On golden pond
16. Persona Ingmar Bergman
17. Phantom of liberty
18. Piano teacher
19. Private ryan
20. Promised land
21. Sweet November
22. The men of honour
23. The outsider
24. To kill a mocking bird
25. Virdiana
26. War and peace
27. Wild strawberries Ingmar Bergman
28. अनाड़ी राजकपूर
29. आग राजकपूर
30. आह राजकपूर
31. खुदा के लिए पाकिस्तानी
32. गॉड तुस्सी ग्रेट हो हिन्दी‍
33. चार्ली चैप्लिन की कई फिल्में
34. चीनी कम हिन्दी
35. चोरी चोरी राजकपूर
36. जागते रहो राजकपूर
37. जिस देश में गंगा बहती है राजकपूर
38. जॉनी गद्दार हिन्दी
39. टिंग्या् मराठी
40. तीसरी कसम राजकपूर
41. द नेमसेक
42. द लास्टै लायर हिन्दी
43. धरम हिन्दी
44. फैशन हिन्दी
45. बरसात राजकपूर
46. बाजी देव आनंद
47. ब्लैआक एंड व्हा्इट हिन्दी
48. भागम भाग
49. भेजा फ्राई
50. मनोरमा 6 फुट नीचे
51. मेरे बाप पहले आप
52. राम चंद पा‍किस्तानी
53. रॉक ऑन
54. वेडनेसडे
55. शराबी देव आनंद
56. प्रतिमा बांग्ला
57. वारिस शाह पंजाबी
58. खामोशी हिन्दी

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा

आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा
जी हां, अब बाजार में एक ऐसा औजार आ गया है कि आप बोलेंगे हिन्दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा. आपसे बोलने में गलती होगी तो उसे दोबारा बोलने पर ठीक भी कर देगा. इतना ही नहीं, आपके प्री रिकार्डेड संदेश, भाषण या बोले गये टैक्‍स्‍ट को भी उसी बहादुरी के साथ टाइप करके आपको थमा देगा. ये पैकेज आपके लिए एडिटिंग करेगा, अलाइनमेंट करेगा, आउटपुट में मूल डॉक्यूमेंट का फार्मेट बनाये रखेगा शब्‍द जोड़ने, हटाने देगा, अपडेट करने देगा, और आपको शब्देकोश की सुविधा के अलावा पर्यायवाची शब्द भी देगा.
है ना मजेदार ख्याल कि आप चांदनी रात में अपनी बाल्‍कनी में अकेले बैठे बीयर के घूंट ले रहे हैं और हैड फोन लगाये अपनी कहानी, ग़ज़ल, उपन्यास या कुछ भी अपने पीसी को डिक्टेशन दे रहे हैं. एक नज़ारा और भी हो सकता है कि जो कुछ कहना है हमें हैड फोन लगा कर पीसी के सामने कह दें. एडि‍टिंग बाद में होती रहेगी.
और भी कई नज़ारे हो सकते हैं, सारे प्रेम वार्तालाप, मंत्री जी के भाषण, संतों की वाणी, बीवी या हस्‍बैंड के गुस्से भरे अलफाज़ जस के तस बोलते हुए टाइप होते चलें. न मुकरने की आशंका न भूलने का डर. कितना अच्छा कि हिन्दी टाइप करने के लिए लिखना पढ़़ना आना जरूरी नहीं. कोई भी अपने पीसी से ये काम ले सकता है. सेक्रेटरी नहीं आयी तो परवाह नहीं, वाचांतर पैकेज है ना....
ये वाचांतर पैकेज आपके लिए कई बरस की रिसर्च के बाद ले कर आये हैं पुणे की सीडैक के वैज्ञानिक. कीमत पूरे सेट की सिर्फ 5900 रुपये. मंगाने या ज्यादा जानकारी के लिए देखें www.cdac.in या सम्पर्क करें अजय जी से ajai@cdac.in पर या उनसे फोन 9371034560 पर बात करें
सूरज प्रकाश

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

कबाड़खाना.ब्‍लागस्‍पाट.कॉम पर किताबों की दुनिया पर मेरी पोस्‍ट

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं - मेरी ये पोस्‍ट पढि़ये kabaadkhaana.blogspot.com पर. आपकी राय का इंत‍ज़ार रहेगा

सूरज प्रकाश

बुधवार, 13 अगस्त 2008

बायें हाथ से काम करने वालों का दिन

आज अखबार ने बताया कि आज लैफ्ट हैंडर्स डे है. जब भी इस तरह के डे की बात पढ़ता हूं तो यही अफसोस होता है‍ कि बरस भर के बाकी दिन तो दूसरों के लिए लेकिन एक दिन आपका. अब चाहे मदर्स डे हो या फादर्स डे. साल में एक दिन आपका. भले ही अपने देश का करवा चौथ का व्रत ही क्‍यों न हो. बेचारे पति के हिस्‍से में पूरे बरस में एक ही दिन आता है. जवाब में आप ये भी कह सकते हैं कि बेचारी महिलाओं के हिस्‍से में भी तो बरस भर में एक ही वीमेंस डे आता है. बाकी दिन तो उन्‍हें कोई याद नहीं करता.
तो बात चल रही थी लैफ्ट हैंडर्स डे की. मेरे पिता बेशक खब्‍बू थे लेकिन बचपन में हुई पिटाई के कारण दायें हाथ से लिखने के अलावा जीवन भर अपने सारे काम बायें हाथ से करते रहे. चाहे टेबिल टेनिस खेलना हो, कैरम खेलना हो या खाना खाना हो.
यही हाल मेरे बड़े भाई का रहा. वे खब्‍बू होने के बावजूद लिखने सहित अपने सारे काम दायें हाथ से करने को मजबूर हुए और नतीजा ये हुआ कि वे जिंदगी में जितनी तरक्‍की कर सकते थे. नहीं कर पाये. औसत से कम वाली जिंदगी उनके हिस्‍से में आयी.
मेरा छोटा बेटा भी खब्‍बू है. लेकिन उसे अपने सारे काम बायें हा‍थ से करने की पूरी छूट है. बेशक वह गिटार दायें हाथ से बजा लेता है और पीसी पर माउस भी दायें हाथ से ही चलाता है. पीसी की वजह समझ में आती है कि पीसी पूरे घर का सांझा है और वह इस बात को ठीक नहीं समझता कि बार बार सेटिंग करके माउस को अपने लिए लैफ्ट हैंडर बनाये. बाकी काम वह बायें हाथ से ही करता है.
मुझे याद पड़ता है कि हमारे बचपन में खब्‍बुओं को मार मार कर सज्‍जू कर दिया जाता था. (पंजाबी में बायें हाथ को खब्‍बा और दायें हाथ को सज्‍जा हाथ कहते हैं). मजाल है आप कोई काम खब्‍बे हाथ से कर के दिखा दें. घर पर तो पिटाई होती ही थी. मास्‍टर लोग भी अपनी खुजली उन्‍हें मार मार कर मिटाते थे. दुनिया में पूरी जनसंख्‍या के तीस से पैंतीस प्रतिशत लोग खब्‍बू तो होते ही होंगे लेकिन ये भारत में ही और वो भी उत्‍तर भारत में ज्‍यादा होता है‍ कि बायें हाथ से काम करने वाले को पीट पीट कर दायें हाथ से काम करने पर मजबूर किया जाता है. उसका मानसिक विकास तो रुकेगा ही जब आप प्रकृति के खिलाफ उस पर अपनी चलायेंगे.
मैंने सिर्फ गुजरात में ही देखा कि क्‍लास में और ट्रेनिंग सेंटर्स में भी इनबिल्‍ट मेज वाली कुर्सियां लैफ्ट हैंडर्स के लिए भी होती हैं बेशक तीस में से पांच ही क्‍यों न हों. ये भी मैंने गुजरात में ही देखा कि कई पति पत्‍नी दोनों ही खब्‍बू हैं. कई कई तो डाक्‍टर भी.
कहा जाता है कि पहले के ज़माने में युद्धों में बायें हाथ से लड़ने वालों को तकलीफ होती थी. वे मरते भी ज्‍यादा थे क्‍यों‍कि सामने वाले के बायें हाथ में ढाल है और दायें में तलवार. वह अपने सीने की रक्षा करते हुए सामने वाले के सीने पर वार कर सकता था लेकिन खब्‍बू महाशय के बायें हाथ में तलवार और दायें हाथ में ढाल है. बेचारा दिल तो उनका भी बायीं तरफ ही रहता था. नतीजा यही हुआ कि लड़ाइयों की वजह से खब्‍बू ज्‍यादा शहीद होते रहे और दुनिया की जनसंख्‍या में उनका प्रतिशत भी कम हुआ. ये एक कारण हो सकता है.
मैं विदेशों की नहीं जानता कि वहां पर लैफ्ट हैंडर्स के साथ क्‍या व्‍यवहार होता है. लेकिन ये मानने में कोई हर्ज नहीं कि उन्‍हें सम्‍मान तो मिलता ही होगा उन्‍हें भी तभी तो वे लैफ्ट हैंडर्स डे मनाने की सोच सकते हैं. पिटाई तो उनकी वैसे भी नहीं होती. आइये जानें दुनिया के कुछ खास खास खब्‍बुओं के बारे में. जरा सोचिये, अगर इन सबको भी पीट पीट कर सज्‍जू बना दिया जाता तो क्‍या होता. ये है सूची – महात्‍मा गांधी, सिंकदर महान, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, बिस्‍मार्क, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज बुश सीनियर, जूलियस सीजर, लुइस कैरोल, चार्ली चैप्लिन, विंस्‍टन चर्चिल, बिल क्लिंटन, लियोनार्डो द विंची, अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, ग्रेटा गार्बो, इलियास होव, निकोल किडमैन, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, सौरव गांगुली, वसीम अकरम, माइकल एंजेलो, मर्लिन मनरो, पेले, प्रिंस चार्ल्‍स, क्‍वीन विक्‍टोरिया, क्रिस्‍टोफर रीव, जिमी कोनर्स, टाम क्रूज, सिल्‍वेस्‍टर स्‍टेलोन, बीथोवन, एच जी वेल्‍स और अपने देश के बाप बेटा बच्‍चन जी.
है ना मजेदार लिस्‍ट.
आज के दिन सभी लैफ्ट हैंडर्स को सलाम.

सूरज प्रकाश

शुक्रवार, 20 जून 2008

जयपुर में कहानी पाठ- कुछ नोट्स




पिछले दिनों जयपुर जाना हुआ. पहले तो मी‍टिंग की तारीख तय न हो पाने की वज़ह से जाना टलता रहा फिर बम धमाकों की वज़‍ह से जाना टला. मीटिंग तो अपनी जगह थी लेकिन मेरे ध्‍यान में जयपुर के वे सभी साहित्‍यकार और पत्रकार मित्र थे जो मेरे आने की खबर पा कर लगभग रोज़ाना ही पूछ लेते थे कि कब पहुंच रहा हूं. व्‍यक्तिगत मुलाकात सिर्फ तीन ही रचनाकारों से थी. प्रेम चंद गांधी से सात आठ बरस पहले मुंबई में आधे दिन के लिए मिला था और वे तभी से मेरे मित्र बन गये थे. फारुख आफरीदी और कृष्‍ण कल्पित से बाबरी मस्जिद हादसे से एक दिन पहले बाड़मेर में मुलाकात हुई थी और रंगकर्मी सत्‍य नारायण पुरोहित तो मुंबई में हमारे ही संस्‍थान में थे और मुंबई प्रवास के अपने अंतिम बरसों में कई खूबसूरत शामें हमने एक साथ गुज़ारी थीं. मेजर रतन जांगिड़ से कई बार फोन पर ही बात हुई थी. वे सबसे ज्‍यादा उत्‍साहित लग रहे थे.
मैं खुद इस विजि़ट को ले कर बेहद उत्‍साहित था कि इन सबसे तो मुलाकात तो होगी ही, कई नये दूसरे रचनाकारों से भी मुलाकात हो जायेगी. लवलीन से मिलना हमेशा सुख देता है बेशक स्‍वास्‍थ्‍य के चलते वे ही बातचीत में पूरी तरह शामिल नहीं हो पातीं और बाद में अफसोस करती रहती हैं कि कुछ अनकहा रह गया. मैं हैरान था कि जिस दिन मुझे जयपुर पहुंचना था, मेरे कहानी पाठ की खबर कई अखबारों में छपी हुई थी. और तो और युवा पत्रकार और ग़ज़लकार डॉ. दुष्‍यंत ने तो मेरे पहुंचने से पहले मेरी रचनाएं छाप कर शहर को मेरा परिचय दे दिया था. जनवादी पत्रकार संघ के कार्यालय में उस समय लाइट नहीं थी लेकिन सभी साहित्‍यकार और साहित्‍य प्रेमी इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार नज़र आ रहे थे कि आंगन में ही कुर्सियां डाल कर संवाद कर लेंगे. संयोग से बत्‍ती आ गयी और कायर्क्रम शुरू हुआ.
मेरे लिए पिछले कई बरसों में शायद ये पहला मौका था ज‍ब मैं श्रोताओं के सामने कहानी पाठ कर रहा था. मुंबई में हमने मराठी कथा कथन से कुछ नहीं सीखा और वहां हिन्‍दी कहानी पाठ आम तौर पर नहीं ही होते. कवि गोष्ठियां बेशक महीने मे साढ़े सात हो जाती हैं. मुंबई में अपने सत्‍ताइस बरस के प्रवास में मैंने शायद दो ही बार कहानी सुनायी है. पुणे में भी रहते हुए तीन बरस हो गये हैं, वहां भी इस तरह की कोई परम्‍परा नहीं है. बेशक मैंने अपने बैंकिंग महाविद्यालय में इस परम्‍परा की शुरुआत की है और हमारे यहां शेखर जोशी, गोविंद मिश्र, जगदम्‍बा प्रसाद दीक्षित, मनहर चौहान, ओमा शर्मा, सूर्य बाला, सुधा अरोड़ा, अल्‍पना मिश्र, वंदना राग आदि कहानी पाठ कर चुके हैं. शायद हमारा संस्‍थान ही अकेला ऐसा संस्‍थान है जहां कहानी पाठ के लिए सम्‍मानजनक राशि दी जाती है.
विषयांतर हो गया.

जयपुर के इस कहानी पाठ में तीस के करीब मित्र थे. वरिष्‍ठ रचनाकार नंद भारद्वाज की अध्‍यक्षता में हुई इस गोष्‍ठी में तय तो ये हुआ था कि मैं महानगर पर कुछ लघु कथाएं और एक कहानी सुनाऊंगा लेकिन कार्यक्रम देर से शुरू होने के बावजूद सबके अनुरोध मैंने अपनी विवादास्‍पद कहानी उर्फ़ चंदरकला भी सुनायी. मैं हैरान था कि मित्रों ने रचनापाठ का सुख तो उठाया ही, बाद में रवनाओं पर विस्‍तार से बात भी की. मैं इस बात से भी हैरान था कि बेशक में कई रचनाकारों से पहली बार मिल रहा था, ज्‍यादातर मित्रों ने मेरी कहानियां और अनूदित रचनाएं पढ़ रखी थीं. राजा राम भादू, रमेश खत्री, रंगकर्मी अशोक राही, और दूसरे सभी मित्र बहुत प्‍यार से‍ मिले.
ये कहानी पाठ मेरे लिए कई सुखद अनुभव ले कर आया. इतने सारे रचनाकारों से एक साथ मिलना, बात करना और स्‍थायी संबंध बनना किसी भी रचनाकार के लिए आजीवन न भूलने वाले अनुभव होते हैं. मैं जिस बैंक में बैठक के‍ सिलसिले में गया था, वहां के मेरे अधिकारी मित्र इस बात को ले कर हैरान थे कि पहली बार मिलने पर भी मुझे इतना प्‍यार और सम्‍मान मिल रहा है. मैंने उन्‍हें बताया कि रचनाकार के लिए कोई भी शहर पराया नहीं होता अगर वहां उसका एक भी रचनाकार दोस्‍त या पाठक रहता हो. तब सारा शहर उसका अपना हो जाता है. रमेश खत्री जी को लगा कि अभी मेरा कुछ और दोहन किया जा सकता है. अगले दिन उन्‍होंने न केवल रेडियो स्‍टेशन पर किताबों का सिकुड़ता संसार पर हमारी परिचर्चा आयोजित करा डाली, अपनी स्‍टेशन डाइरेक्‍टर मिसेज माथुर से और अन्‍य सहकर्मियों से सार्थक बातचीत का मौका भी दिया.
भाई फारुख अफरीदी के बारे में क्‍या कहूं. जब तक मेरे साथ रहे, और सबसे ज्‍यादा देर तक रहे, उनका डिजिटल कैमरा, उनका टेप रिकार्डर और उनके इंटरव्‍यू के सवाल लगातार चलते रहे.


मैं अक्‍सर कहा करता हूं कि बहुत बड़ा अफसर बनने की तुलना में छोटा सा लेखक होना हमेशा बेहतर होता है. एक तो लेखक कभी रिटायर नहीं होता और दूसरे, उसके नाम के आगे कभी स्‍वर्गीय नहीं लगता. जयपुर जैसी विजिट के बाद इस बा‍त को आगे बढ़ाते हुए ये भी कहा जा सकता है कि वह कभी भी किसी भी शहर में अकेला नहीं होता. एक दोस्‍त काफी होता है पूरे शहर से उसका परिचय कराने के लिए.

गुरुवार, 27 मार्च 2008

कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में

http://kabaadkhaana.blogspot.com/ में आज पढ़ें मेरी एक सरस पोस्‍ट - कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में.
आपको जरूर नशा आयेगा

सूरज प्रकाश

सोमवार, 24 मार्च 2008

लौट कर आना ही होगा

आज मैं तीन महीने और पन्‍द्रह दिन के बाद पुणे में अपनी नौकरी पर वापिस आ गया हूं. 10 दिसम्‍बर 2007 को दिल्‍ली में हुए सड़क हादसे की वजह से मैं बिस्‍तर पर था और कभी कभार पोस्‍ट पर आ पाता था.
इस पूरे अरसे के दौरान सभी ब्‍लागी मित्रों ने मेरे शीघ्र स्‍वस्‍थ होने के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजीं और लगातार मेरा हाल पूछते रहे. मैं आप सब के प्रति आभारी हूं.
ये बेशक एक नया परिवार है लेकिन जिस तरह से बिल्‍कुल अनजान और अ‍परिचित मित्रों और पाठकों ने अपनी शुभकामनाएं भेजीं. उससे बहुत अच्‍छा लगा और ये विश्‍वास जगा कि प्रिंट मीडिया में हमने जो अपने पाठक खो दिये थे, ब्‍लागों की दुनिया उससे सौ गुना ज्‍यादा पाठक ले कर हमारे सामने है. सभी अपने और सभी आपसे संवाद करने के लिए तैयार
एक बार पुनः नमन.
हर सोमवार एक कहानी के साथ मेरे दूसरे ब्‍लाग soorajprakash.blogspot.com पर भी आपका स्‍वागत है.
सूरज प्रकाश

बुधवार, 12 मार्च 2008

न्‍यू यार्क का विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन - माया मिली न राम

विश्‍व हिन्‍दी सम्‍मेलन जुलाई 07 के तीसरे सप्‍ताह में न्‍यूयार्क में आयोजित किया गया था और जिन लोगों ने उसमें हिस्‍सेदारी की थी, उनके कटु अनुभव अरसे त‍क मीडिया में छाये रहे थे. ये अनुभव हर तरह के थे. अव्‍यवस्‍था से ले कर सम्‍मेलन में भाव न दिये जाने तक, लेकिन जो लोग किन्‍हीं कारणों से वहां नहीं जा पाये थे उनमें से कुछ का अलग ही दुखड़ा है. सम्‍मेलन में हिस्‍सेदारी के लिए मई 07 में विदेश मंत्रालय के हिन्‍दी विभाग में जमा कराये गये चार हजार रुपये मंत्रालय ने अब तक वापिस नहीं किये हैं हालांकि इस संबंध में उन्‍हें समय रहते जून 2008 में ही सूचित किया गया था. पत्र या ईमेल का कोई जवाब नहीं दिया जाता और फोन करने पर यही उत्‍तर मिलता है कि अभी और समय लगेगा और इस समय लगने के पीछे इतनी लम्‍बी कहानी सुनायी जाती है कि आप एसटीडी का बिल बढ़ने के डर से खुद ही फोन काट दें.
कैसा है ये विभाग जिसे पैसे लौटाने जैसे मामूली काम के लिए नौ महीने का समय कम पड़ रहा है.

सूरज प्रकाश, लेखक, अनुवादक और पत्रकार,
एच1/101 रिद्धी गार्डन, फिल्‍म सिटी रोड, मालाड पूर्व मुंबई 97

सोमवार, 28 जनवरी 2008

मोबाइल ने बचाई हमारी जान

10 दिसम्‍बर 2007 की सर्द सुबह थी वह. सवेरे साढ़े पांच बजे का वक्‍त. मुझे फरीदाबाद से नोयडा जाना था राष्‍ट्रीय स्‍तर के एक सेमिनार के सिलसिले में. सेमिनार के आयोजन का सारा काम मेरे ही जिम्‍मे था. पिछली रात मैं मेजबान संस्‍थान के जिस साथी के साथ नोयडा से फरीदाबाद अपने माता पिता से मिलने आया था, अचानक उसका फोन आया कि वह बाथरूम में गिर गया है और उसकी हालत खराब है. बताया उसने कि डॉक्‍टर ने उसे कुछ देर आराम करने के लिए कहा है. जब आधे घंटे त‍क उसका दोबारा फोन नहीं आया तो मैंने ही उससे पूछा कि अब तबीयत कैसी है. उसने बताया कि वह नोयडा तक कार चलाने की हालत में नहीं है. हां, जाना तो जरूर है. मैंने प्रस्‍ताव रखा कि वह घबराये नहीं, मैं ही कार चला लूंगा. उसका घर मेरे पिता जी के घर से 12 किमी दूर था. पहले तय कार्यक्रम के अनुसार वही मुझे लेने आने वाला था लेकिन अब नये हालात में मुझे ही उसके घर या उसके आस पास तक जाना था. हमने मिलने की जगह तय की और मैं अपने पिताजी के साथ उनके स्‍कूटर पर चल पड़ा ताकि कोई ऑटो लिया जा सके. मेरे 82 वर्षीय पिता बहुत जीवट वाले व्‍यक्ति हैं और इस उम्र में भी अपने सारे काम अपने स्‍कूटर पर ही यात्रा करते हुए करते हैं. पता नहीं जिंदगी में पहली बार ऐसा क्‍यों हुआ कि जब मैं उनके पीछे स्‍कूटर पर बैठा तो मुझे लगा कि आज कुछ न कुछ होने वाला है. हमें मथुरा रोड हाइवे तक कम से कम तीन किलोमीटर जाना था. अब तक कोई आटो नहीं मिला था. रास्‍ते पर कोहरा और अंधेरा थे जिसकी वजह से वे बहुत धीमे धीमे स्‍कूटर चला रहे थे. मथुरा रोड हाइवे अभी सौ गज दूर ही रहा होगा कि सड़क पर चलते तेज यातायात को देखते ही कुछ देर पहले अनिष्‍ट का आया ख्‍याल एक बार दोबारा मेरे दिमाग में कौंधा. लगा वह घड़ी अब आ गयी है. मैंने पिताजी को सावधान करने की नीयत से कुछ कहना चाहा और उनके कंधे दबाये.
उसके बाद न तो मुझे होश रहा न उन्‍हें. हम शायद पन्‍द्रह मिनट तक वहीं चौराहे पर बेहोश पड़े रहे होंगे. अचानक पसलियों में तेज, जान लेवा दर्द उठा और मुझे होश आया. मैं सड़क पर औंधा पड़ा हुआ था और दर्द से छटपटा रहा था. मैं समझ गया वो कुघड़ी आ कर अपना काम कर गयी है. मुझे तुरंत पिताजी का ख्‍याल आया लेकिन कोहरे. अंधेरे और अपनी हालत के कारण उनके बारे में पता करना मेरे लिए मुमकिन नहीं था. जब मेरी आंखें खुलीं तो मैंने कई चेहरे अपने ऊपर झुके देखे. मैं कराह रहा था. दर्द असहनीय था इसके बावजूद मैंने अपनी जैकेट की जेब से अपना मोबाइल निकाल कर लोगों के सामने गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया कि कोई मेरे पिताजी के घर पर फोन कर दे. मैं जोर जोर से उनके घर का नम्‍बर बोले जा रहा था. लेकिन शायद वे रात की या सुबह की पाली वाले मजदूर थे. मोबाइल उनके लिए अभी भी अनजानी चीज रही होगी. अंधेरा और कोहरा भी शायद अपनी भूमिका अदा कर रहे थे. कोई भी तो आगे नहीं आ रहा था.
मेरा दर्द असहनीय हो चला था. तभी मेरे फोन की घंटी बजी. और देवदूत की तरह कोई युवक वहां आया. उसने मेरे हाथ से फोन ले कर अटैंड किया. दूसरी तरफ वही साथी थे जो मेरा इंतजार कर रहे थे और देरी होने के कारण चिंता में पड़ गये थे. उसी युवक ने उन्‍हें बताया कि आप जिनका इंतजार कर रहे हैं. वे तो सड़क पर जख्‍मी पड़े हैं. तब उसी युवक ने उनके और मेरे अनुरोध पर पिताजी के घर पर फोन किया. मेरे साथी ने एक अच्‍छा काम और किया कि तुरंत मेरे बड़े भाई के घर पर जा कर इस हादसे की खबर दी और उन्‍हें साथ ले कर घटना स्‍थल तक आया. वह खुद बुरी तरह से घबरा गया था. शायद दस मिनट लगे होंगे कि दोनों तरफ से भाई आ पहुंचे. जब तक हम एस्‍कार्ट अस्‍पताल तक ले जाये जाते. वे आस पास रह रहे सभी नातेदारों को खबर कर चुके थे.
हमें अब तक नहीं पता कि किस वाहन ने हमें किस कोण से टक्‍कर मारी थी. स्‍कूटर हमसे कई गज दूर तीन हिस्‍सों में टूटा पड़ा था. तमाशबीनों ने हमारे ओढ़े हुए
शाल ही हमारे बदन पर डाल दिये थे और शायद हमें सड़क पर किनारे भी कर दिया था. मेजबान संस्‍थान के साथी की तबीयत ज्‍यादा खराब हो गयी थी लेकिन खुद अस्‍पताल भरती होने से पहले नोयडा में अपने संस्‍थान में हादसे की खबर कर दी थी. मुझे तीसरे दिन होश आया, पांच दिन आइसीयू में रहा और पन्‍द्रह दिन अस्‍पताल में. दायें पैर में मल्‍टीपल फ्रैक्‍चर. कुचली हुई पांच पसलियां और दायें कंधे पर भी फ्रैक्‍चर. पिता जी की दोनों टांगों में फ्रैक्‍चर ओर ब्‍लड क्‍लाटिंग. वे हाल ही की सारी बातें भूल चुके हैं. हादसे के बारे में उन्‍हें कुछ पता नहीं. अभी मुझे खुद दो महीने और बिस्‍तर पर रहना है लेकिन वक्‍त बीतने के साथ साथ हम दोनों ठीक हो जायेंगे. जोर का झटका बेशक जोर से ही लगा है लेकिन हम दोनों बच गये हैं.
इस पोस्‍ट के जरिये मैं उन सभी मित्रों, शुभचिंतकों, ब्‍लाग मित्रों के प्रति आभार शब्‍द प्रयोग कर उनके और अपने बीच संबंधों की गरिमा को कम नहीं करना चाहता. सभी ब्‍लागों पर मेरे परिचित और अपरिचित मित्रों की ओर से मेरे शीघ्र स्‍वस्‍थ होने की कामना की खबर मुझे मिलती रही. हिंदयुग्‍म ब्‍लाग के मित्रों ने तो जरूरत पड़ने पर रक्‍त दान के लिए इच्छुक रक्‍त दाताओं की सूची भी तैयार कर ली थी. मैं जानता हूं कि आप सब की प्रार्थनाओं. दुआओं और शुभेच्‍छाओं से हम दोनों जल्‍द ही चंगे हो जायेंगे लेकिन आप सब का प्‍यार मेरे पास आपकी अमानत रहेगा. हमेशा. हमेशा.
मुझे अभी दो महीने और बिस्‍तर पर गुजारने हैं. ज्‍यादा देर तक पीसी पर बैठना मना है. एक हाथ से ये पोस्‍ट टाइप की है. पिता जी भी स्‍वस्‍थ हो रहे हैं. बस, इस बात का मलाल रहेगा कि हम उस अनजान युवक को धन्‍यवाद नहीं कह पा रहे जिसने मेरे हाथ से फोन ले कर हमारे घर तक हादसे की खबर पहुचायी थी और हम बच पाये. प्रसंगवश, उस वक्‍त पिताजी के पास मोबाइल नहीं था और मेरे पुणे के मोबाइल में दर्ज नम्‍बरों से उस अंधेरे और कोहरे में फरीदाबाद का काम का नम्‍बर खोजना इतना आसान नहीं होता.
सूरज प्रकाश 022 28492796