रविवार, 6 दिसंबर 2015

फ़िराक गोरखपुरी – बहुत पहले से उन कदमों की आहट



उर्दू भाषा के श्रेष्‍ठ रचनाकार फ़िराक गोरखपुरी (मूल नाम रघुपति सहाय) (28 अगस्त 1896 - 3 मार्च 1982) गोरखपुर के रहने वाले थे। राम कृष्ण की कहानियों के शुरुआती अध्‍ययन के बाद उनकी शिक्षा अरबी, फारसी और अंग्रेजी में हुई। उनके पिता भी जाने माने शायर थे।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

वंदे मातरम के रचयिता - बंकिम चंद्र चट्टोपाध्‍याय


पुरातनपंथी बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्‍मे ऋषि बंकिम चंद्र चट्टोपाध्‍याय (1838 – 1894) श्रेष्‍ठ कवि, लेखक और पत्रकार थे। उनके भाई संजीब चंद्र चट्टोपाध्‍याय भी उपन्‍यासकार थे। वे कलकत्‍ता विश्‍वविद्यालय के शुरुआती ग्रेजुएट्स में से एक थे। बाद में उन्‍होंने वकालत की डिग्री भी ली। वे मेधावी छात्र थे। पढ़ने लिखने में उनका मन लगता था। खाली समय में वे संस्‍कृत भी सीखते।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

कारपेंटरी से ज्ञानपीठ पुरस्‍कार तक का सफ़र –गुरदयाल सिंह


गुरदयाल सिंह (10 जनवरी, 1933 -)  आम आदमी की बात कहने वाले पंजाबी भाषा के विख्यात कथाकार हैं।
वे परिवार के पहले लड़के थे जो स्‍कूल जाने लगे थे। वे लिखते हैं कि स्‍कूल मेरे लिए ऐेसा जेलखाना था जिसके बारे में यही सोचता कि यहां से कभी रिहाई मिल जायेगी। बचपन से ही पारिवारिक बढ़ईगिरी के धंधे में लग जाना पड़ा। अभी वे 12-13 बरस के ही थे और कुछ सोचने-समझने लायक़ हो रहे थे, घरेलू हालात के चलते उन्हें स्कूल छोड़ना पड़ा, ताकि बढ़ई के धंधे में वह अपने पिता की मदद कर सकें।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

दिविक रमेश – शहतूत के पेड़़ पर बैठ कर लिखता था कविताएं



मुझे याद आ रहे हैं वे शुरुआत के दिन जब मुझे छिप छिप कर लिखना होता था और अपने लिखे को भी छिपा कर रखना होता था। स्पष्ट है तब मुझे एकांत में ही लिखना होता था। उस समय रात का समय सबसे अनुकूल प्रतीत होता था। बाद में दिन में नौकरी करने और रात में बी.ए.-एम.ए. करने की विवशता ने रात में लिखना मेरी आदत बना दी। मेरी कितनी ही रचनाएं, रात में, और वह भी अंधेरे में लिखी गई हैं। बहुत बार खुले आसमान के नीचे। शायद तारों का भी हाथ रहा होगा। आसपास जब सब सो रहे होते तो मैं कोरे कागज पर अंदाजे से मोटे-मोटे अक्षरों में लिख लेता। फिर दिन के एकांत में उसे अंतिम रूप दे लेता। एक और बात याद आयी। शुरू के दिनों की। घर के सामने एक शहतूत का पेड़ था। कितनी ही रचनाएं उसकी भी देन हैं। उस पर
चढ़ कर शाखाओं के बीच गद्दी बिछाकर बैठ जाता, स्कूली पढ़ाई के बहाने। और लिखी जाती कविताएं आदि। मेरे रचनात्मक साहित्य का वह अच्छा प्रेरणा स्थल रहा है। दिन में वहां बैठकर इत्मीनान से सोचा जा सकता था और लिखा भी।
विवाह हुआ। काफी बड़ा होने तक, मुझे शांत एकांत ही जरूरी लगता रहा। बहुत बार खिड़की से पेड़ों को देर तक ताकते रहने ने भी मुझे रचनात्मक बनाया है। जाने कब पेड़ो की टहनियों और पत्तों से रचना मस्तिष्क में और फिर कागज पर उतरने लगती। एक समयावधि में, खास कर कविता के लिए, बीड़ी जरूरी सी लगने लगी थी लेकिन वह जरूरत बहुत जल्दी छूट भी गई। महसूस किया कि काफी देर तक बीड़ियां पीने और माथे को देर तक दोनों हाथों से दबाए रखने के बावजूद कुछ नहीं लिखा गया। बाद में.लिखने का कोई खास समय नहीं रहा।
विशेष रूप से कविता-रचना के लिए जो मेरी विशेष विधा है। कोई भी पंक्ति कौंधती तो लिख लेता हूं-जितनी भी कौंधती हैं लिख लेता हूं। बाद में, थोड़े एकान्त में लिख लेता हूं। अब जरूरी नहीं अपनी स्टडी में ही बैठ कर लिखूं। स्थान गेस्ट हाऊस या होटल का कमरा हो सकता है, रेल का डिब्बा हो सकता है, किसी मित्र या परिजन का घर भी हो सकता है।
मेरे काव्य नाटक ‘खण्ड-खण्ड अग्नि’ की रचना का प्रारम्भ रेल के सफर में ही हुआ था। पर रचना पूरी घर पर आकर ही हो पाती है। अब घर में किसी अन्य की मौजूदगी अधिक दखल पैदा नहीं करती जैसे पहले पैदा करती थी लेकिन उस मौजूदगी बोलना व्यवधान का काम जरूर करता है और रचना बनने से चूक जाती है। कुल मिलाकर बात एकान्त में ही बनती है। पहले तो मैं अपनी स्टडी के दरवाजे भी बंद करके बैठता था। किसी का खटखटाना भी व्यवधान लगता था। यूं जब भी पहाड़ों या समुद्र के किनारों से लौटा हूं अधिक रचनामय हुआ हूं। मुझे तो हवाई जहाज से बादलों के समुन्द्र ने भी रचना के लिए प्रेरित किया है। शुरू शुरू में जब कहानियां लिखता था तो याद आ रहा है कि मुझे इतना समय और ऐसा स्थान चाहिए होता था जहां मैं एक ही बार में पूरी कहानी लिख लूं। लिखते समय मुझे चाय आदि के लिए पूछा जाना भी रास नहीं आता। एक और बात। बहुत बार न लिखने के अंतराल आए हैं और लगने लगा है कि बस अब नहीं लिखा जाएगा। लेकिन रचनात्मक पुस्तकें पढ़ते-पढ़ते न जाने कब फिर रचना लौट आई है। पुस्तक के पन्ने एक तरफ रह गए हैं और मैं रचना की प्रक्रिया का अंग बन गया हूं। बड़ी विचित्र और हाथ में पूरी तरह न आने वाली चीज़ है यह रचना प्रक्रिया। इतना तो कह ही सकता हूं कि भले ही मेरी रचनाओं में सामाजिक सरोकार बुनियादी तौर पर रहते हों लेकिन प्रकृति और प्राकृतिक सम्पदा की निकटता ने मुझे रचना के लिए प्रेरित किया है।

मोबाइल – 099101 77099

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

जैक लंडन – कहां कहां से गुज़र गया

जितनी रोमांचक और दिल पर सीधे असर करने वाली जैक लंडन की कहानियां होती हैं, उससे कहीं ज्‍यादा रोमांचक और दिल दहला देने वाली जैक लंडन (जनवरी 12, 1876 – नवम्‍बर  22, 1916) की खुद की कहानी है। सैन फ्रांसिस्‍को में वे एक अनब्‍याही मां की कोख से जन्‍मे थे। बड़े होने के बाद एक बार जब उन्‍हें मां के कागजों से उसकी आत्‍महत्‍या की कोशिश और अपने संभावित पिता के बारे में कुछ जानकारी मिली तो जैक ने विलियम चैने नाम के एक वकील को कन्‍फर्म करने के लिए खत लिखा। चैने ने बड़े भोलेपन से जवाब दिया था – बेटे, मैं तो नामर्द हूं। तुम्‍हारा पिता कैसे हो सकता हूं। हांफलां आदमी तुम्‍हारी मां के यहां खूब आया करते थे, वे ही शायद तुम्‍हारे पिता हों। 

लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

जयश्री रॉय - मेरे लेखन का सफर



2010 में ब्रेस्ट कैंसर हुआ तो लगा, इतना कुछ अपने भीतर ले कर
चली गई तो मर कर भी मुक्ति नहीं मिलेगी। उन दिनों हाथ में मेडिकल
रिपोर्ट्स की फाइल ले कर एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल तक अपनी
ज़िंदगी कि मीयाद पूछती फिर रही थी। केमो के दौरान अस्पताल के
बिस्तर पर 26 साल के अंतराल के बाद एक कहानी लिखी जो हंस में
छपी। इसके बाद लिखने-छपने का सिलसिला चल पड़ा। मेरे शब्द हाथ
पकडकर मुझे मृत्यु की काली सुरंग से खींच जिंदगी की ओर ले चला।
दूसरों के लिए लेखन क्या है मैं नहीं जानती, मेरे लिए यह जीने की एक
कोशिश है!
लिखने के लिए मुझे कोई सहूलियत नहीं मिलती। बस काम और
जिम्मेदारियों के बीच जहां थोड़ा समय मिल जाये। खाना बनाते, घर
सम्हालते... डायनिंग टेबल पर डायरी-पेन पड़े रहते हैं। कूकर की दो
सीटी के बीच, दाल में छौंक लगाते... दो बज गए बच्चे आ जाएँगे स्कूल
से, महरी नहीं आई, जूठे बर्तनों की ढेर पड़ी है... मेरी कहानियों से जली
दाल की महक आए तो अचरज नहीं!
रात को मैं बेहतर लिखती हूँ। अक्सर बारह बजे के बाद। सारी-सारी रात!
डॉक्टर की सख़्त मनाही के बावजूद। पहले हाथ से, अब कम्प्यूटर पर।
कहानियाँ प्रायः एक सीटिंग में। शायद ही कभी कोई एडिटिंग। बेहद
इंपल्सिव। धैर्य का भी अभाव। जब लिखने का मूड बन जाता है, किसी
काम में मन नहीं लगता जब तक कि लिख ना लूँ। अपना लिखा मैं
छपने से पहले किसी को दिखाती नहीं। सिरजने में ही सारा सुख।
छपना, ना छपना महत्वपूर्ण नहीं। टोटका आदि में यकीन नहीं। तीन
महीने पहले स्ट्रोक में जिस्म का बायाँ हिस्सा प्रभावित हुआ है। बाएँ
हाथ से लिखती/टाइप करती थी। स्ट्रोक के एक महीने के अंदर एक
कहानी लिख कर पूरा किया! जैसा कि पहले भी कहा, लिखना मेरे लिए
जीने की एक कोशिश है!
मुझे शब्दों से प्यार रहा है, किस हद तक कह कर समझाना मुश्किल!
मुझे लगता है, अब तक के जीवन में मैंने अपने हिस्से का आधा समय
सपने देखने और कल्पना लोक में विचरण करते हुये बिताया है। बचपन
में जाड़े के दिनों रज़ाई ओढ़ कर दिन चढ़े तक, गर्मियों में खुली छत पर
चाँद को तकते हुए... चाँद को तकते रहने की मेरी इस ‘अजीब-सी’
आदत की वजह से घर में कोई मुझे ‘मून गर्ल’ तो कोई ‘चकोरी’ कह
कर चिढ़ाया करता था। सेंसेटिव और संकोची स्वभाव की होने के कारण
कागज़ में खुद को व्यक्त करना ज़्यादा सहज प्रतीत होता था। तो छिप-
छिप कर लिखती थी और बिस्तर के नीचे रख देती थी। वर्षों यही
किया। एस एस सी के बाद गर्मियों की लंबी दोपहरें काटने के लिए पत्र-
पत्रिकाओं में पत्र आदि लिखने लगी और पुरस्कृत भी होने लगी। साथ
ही रेडियो सिलॉन में मेरे लिखे कई लंबे कार्यक्रम प्रसारित हुए। यह सब
बहुत उत्साहवर्धक था। धर्मयुग, अवकाश जैसी पत्रिकाओं में मेरी रचनाएँ
छपीं। संपादकों, पाठकों के गट्ठर बांध कर पत्र आते। मैं अचानक बैठे-
बिठाये लेखिका बन गई थी! वह एक अलग ही तरह का समय था! मगर
कॉलेज जॉइन करते ही लिखना छूट गया। पूरे 26 सालों के लिए!
जिम्मेदारियाँ मेरे हिस्से कुछ ज़्यादा ही आईं। ना जाने किस-किस का
जीवन मैंने जिया और मेरा जीवन कोई और। यदि जीवन में निरंतर
आने वाली दुश्वारियां कोई दुर्भाग्य या नियति ना हो कर महज संयोग
थीं तो यह संयोग कुछ ज़्यादा ही घटा मेरे साथ। जो किया, जितना
किया सबके लिए वह मेरा अपना कंसर्न था मगर इससे बंधी तो रह ही
गई। सालों मन का कुछ कर ना सकी। लेखन भी। इसके लिए जिस
मनःस्थिति की ज़रूरत होती है उसका नितांत अभाव रहा। मन में
संवेदनाएं उमड़ती-गुमड़तीं, एक क्रिएटिव एंज़ाइटी में रात-दिन परेशान
मगर कभी कुछ लिख ना सकी। ‘राइटर्स ब्लॉक’ जैसी स्थिति! कई बार
भीतर की बेचैनी से निजात पाने के लिए कागज-कलम ले कर घंटों बैठी
कागज पर आड़ी-तिरछी लकीरें खींचती रही मगर एक शब्द लिख ना
सकी। सोचती थी जिस शब्द से मैंने इस शिद्दत से प्यार किया, जब
भी बुलाऊंगी, वह मुझ तक दौड़ा चला आयेगा। मगर मैं गलत थी, मेरे
शब्द मुझसे रूठ गए थे! निराशा का वह अजब दौर था। जैसे कोई अर्से
से प्रसव पीड़ा में हो मगर अपने बच्चे को जन्म ना दे सके। कई बार
बैठ कर रोती थी...
बीमार माँ-बाप, परिवार और बच्चों की देख-भाल के लिए लेक्चरार की
नौकरी छोड़नी पड़ी। बेटे के 15 साल के होने तक एक पत्रिका पलट कर
देख ना सकी। एम ए करने के बाद हिन्दी साहित्य से कोई संपर्क नहीं
रहा। 2010 में जीवन में पहली बार ‘हंस’ पत्रिका देखी जिस में ‘मुबारक
पहला कदम’ में मेरी पहली कहानी छपी थी।

मंगलवार, 17 नवंबर 2015

कैफ़ी आज़मी - तुम इतना जो मुस्‍कुरा रहे हो



उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के रहने वाले कैफ़ी आज़मी (मूल नाम अख़्तर हुसैन रिज़्वी) (19 जनवरी, 1919 - 10 मई, 2002) उर्दू के बेहतरीन शायर थे। उनके तहसीलदार पिता उन्हें आधुनिक शिक्षा देना चाहते थे किंतु रिश्तेदारों के दबाव के कारण कैफ़ी को इस्लाम धर्म की शिक्षा पाने के लिए लखनऊ के 'सुलतान-उल-मदरिया' में भर्ती किया गया। लेकिन वहां वे टिके नहीं। वहां वे यूनियनबाजी में पड़ गये और लंबी हड़ताल करा दी। बाहर निकाले ही जाने थे।
वे लखनऊ और इलाहाबाद विश्वविद्यालयों में पढ़े और उर्दू, अरबी और फ़ारसी भाषाओं का ज्ञान हासिल किया।
वे बहुत कम उम्र में ही वे शायरी करने लगे थे। 11 साल की उम्र में उन्होंने अपनी पहली गज़ल लिखी।

लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

विष्‍णु प्रभाकर - हिंदी का आवारा मसीहा



हिन्दी के सुप्रसिद्ध लेखक विष्णु प्रभाकर (विष्णु दयाल) (1912-2009) उत्तरप्रदेश के मुजफ्फरनगर के गांव मीरापुर में जन्‍मे थे। उनकी आरंभिक शिक्षा मीरापुर में हुई। घर की माली हालत ठीक नहीं होने के चलते वे आगे की पढ़ाई ठीक से नहीं कर पाए और गृहस्थी चलाने के लिए उन्हें चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के तौर पर सरकारी नौकरी करनी पड़ी। उन्हें प्रतिमाह 18 रुपये मिलते थे, लेकिन मेधावी और लगनशील विष्णु ने पढाई जारी रखी और हिन्दी में प्रभाकर व हिन्दी भूषण की उपाधि के साथ ही संस्कृत में प्रज्ञा और अंग्रेजी में बी.ए की डिग्री प्राप्त की।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

अन्‍ना भाऊ साठे – फकीरी से फकीरा तक का सफ़र



एक रोचक किस्‍सा है। जब नेहरू जी रूस गये तो उनसे पूछा गया कि आपके यहां गरीबों और वंचितों की कहानी कहने वाला कथाकार, कलाकार, गायक, वादक  और समाज सुधारक अन्‍ना भाऊ साठे है, कैसा है वह। नेहरू जी परेशान। कौन है अन्‍ना भाऊ साठे जिसे मैं नहीं जानता और रूस वाले पूछ रहे हैं।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

श्रीलाल शुक्ल – धारदार लेखक



हिन्दी के प्रमुख व्यंग्य लेखक श्रीलाल शुक्ल (31 दिसम्बर 1925 - 28 अक्टूबर 2011) अवधी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत और हिन्दी जानते थे। वे 13-14 साल की उम्र में ही संस्कृत और हिंदी में कविता- कहानी लिखने लगे थे। संघर्ष करके वे पढ़े और प्रांतीय सिविल सेवा में अफ़सर बने और बाद में पदोन्नति पाकर आईएएस बने। अपनी सरकारी सेवा में मिले अनूठे और रोचक अनुभवों को उन्‍होंने अपनी रचनाओं के लिए कच्‍चे माल के रूप में उपयोग किया। 
उनके 10 उपन्यास, 4 कहानी संग्रह, 9 व्यंग्य संग्रह, 2 निबंध पुस्‍तकें, 1 आलोचना पुस्तक आदि हैं। 

लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

बुधवार, 4 नवंबर 2015

शहरयार – रेत को निचोड़कर पानी निकालने वाला शायर

आंवला, जिला बरेली में जन्‍मे कुँवर अख़लाक मोहम्मद खाँ उर्फ शहरयार ( 6 जून 1936 - 13 फरवरी 2012) के वालिद पुलिस अफसर थे और अक्‍सर तबादलों पर रहते थे। शहरयार की शुरुआती पढ़ाई हरदोई में हुई। फिर वे अलीगढ़ चले आये। वहां अंग्रेजी मीडियम से पढ़े-लिखे शहरयार को उर्दू पढ़नी पढ़ी। स्कूली पढ़ाई पूरी करके यूनिवर्सिटी पहुँचे और फिर वहीं के हो रहे।
शहरयार कद-काठी से मज़बूत और सजीले थे। अच्छे खिलाड़ी और एथलीट भी थे। वालिद की इच्छा थी कि बेटे जी भी पुलिस अफसर बन जाएँ। इसके लिए उन्होंने भरपूर कोशिश की। लेकिन शहरयार के मन में कुछ और था। दरोगाई का फॉर्म ही जमा नहीं किया।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

सोमवार, 2 नवंबर 2015

रजनी गुप्‍त


लक्‍जरी से दूर दूर तक नाता नहीं रहा कभी
न,  मुझे लिखने के लिए खुद को मेज पर खींच लाने के लिए कभी तैयार करने की नौबत नही आयी
बल्कि अपने आसपास बिखरे जीवन की बहुतेरी कतरनों को जोड़ने सीने की उधेड़बुन में तमाम किरदार
निरंतर मेरे दिलोदिमाग में दौड़ते, खदकते, रचते, पकते व पन्‍नों पर उतरने के लिए अपनी बारी की
प्रतीक्षा करते रहते। अचानक से शब्‍द आते हैं कि धड़धड़ाते हुए सुपरफास्‍ट ट्रेन की तरह पन्‍ने दर
पन्‍ने रंगते चले जाते हैं, ऐसे में किसे सुधि होगी कि वो किसी विशेष रंग के पेन या स्‍याही की बाट
जोहे। पन्‍ने जरूर फुलस्‍कैप खुले हों ताकि पलटने में सहू‍लियत हो। रजिस्‍टर पर या नोटबुक
पर लिखना रास नही आता। न कभी शब्‍द गिनने की आदत रही, न ही मेरे लिए कुछ न कुछ रचते
रहने का या राइटर्स ब्‍लॉक से बचने के लिए कभी कुछ भी जुगत भिड़ानी पड़ी। जब जब जो जो नए
विषय मेरे भीतर पनपते गए, वे धीरे धीरे मेरी लेखनी का अंग बनते गए। इस समय मोबाइल,
फेसबुक और व्‍हाट्सअप की आभासी दुनिया में जीते जागते नवदंपतियेां की फास्‍ट लाइफ पर नया
उपन्‍यास लिखा जा रहा है ‘चिल यार‘।
मुझे अपनी इस दुनिया में दिन रात जीना पड़ता है। यह सच है कि एक बाहरी दुनिया लोगों को ऊपर
से नजर आती है पर रचनाकार हमेशा किसी ने किसी दुनिया में अनवरत विचरण करते रहने के लिए
अभिशप्‍त है। शायद ये बात किसी को अटपटी लग सकती है मगर सच्‍चाई यही है कि मेरा लेखन
एकांतवासी लेखन कभी नहीं रहा बल्कि घर व दफ्तर के झमेलों के बीच लिखना ही मेरी आदत है। मेरा
अनुभव है कि पहाड़ों पर जाकर या कुदरती खूबसूरती से भरी पूरी जगह पर मेरा लेखन हो ही नही
सकता, चाहकर भी। वहां जाकर प्रकृति के सानिध्‍य में खुद को बिसराकर एकाकार होना चाहती हूं। आंखें मूंदे सुध बुध बिसार बस रम जाना चाहती हूं अनूठे सौंदर्य से भरे अदभुत संसार में।
सच तो यह है कि लिखने के लिए खास जीवन शैली या खुद को तैयार करने के नायाब तरीके या खास आदतें या निश्‍चित तयशुदा समय या हैरान कर देने वाले पक्ष, मेरे साथ ये सब कभी नहीं। जब लिखने के लिए मन अकुलाने लगे या जबरदस्‍त लेखकीय दबाव मन को इतना मथ डाले, कोई घटना व्‍यथित कर डाले या बेचैनी इतनी बढ़ जाए तब न तो दिन रात का अंतर सूझता है, न ही सुसज्जित कुर्सी मेज की दरकार, न चाय कॉफी की तलब, न ही एकांत या पहाड़ों पर चले जाने जैसी लेखकीय लक्‍जरी नसीब हुई कभी। सच तो ये है कि मेरी कलम अपनी हठधर्मिता से मुझसे जबरन मनचाहा समय छीनकर लिखवाने में सक्षम है। घर हो या
बाहर, मुझे जब जहां जो भी गलत, एकतरफा, पक्षपाती, पूर्वाग्रही या अन्‍यायपूर्ण लगा, वहां मैंने जीवन से सीधे मुठभेड़ करने के लिए कलम को अपना हथियार बनाकर पूरी ताकत से प्रहार किया व पूरी आक्रामकता के साथ डटकर सिस्‍टम पर सवाल भी उठाए, फिर बात चाहे राजनीति की दुष्‍चक्र में फंसी ‘ये आम रास्‍ता नहीं‘ की नायिका की हो, चाहे ‘कितने कठघरे‘ जो जेल जीवन की बेगुनाह बंदिनियों पर एक सच्‍चा किस्‍स । कितने कटघरे की कथानायिका के जीवन में घटी सच्‍ची कहानी हो। सचमुच घर दफ्तर के शोर शरावे के बीच ही रचे गये हैं सभी उपन्‍यास।  
इन उपन्‍यासों को रचते बुनते व पन्‍नों पर उतारते समय मेरी दोनों बेटियां छोटी थीं, सो उनके साथ उनके ही स्‍टडी रूम को शेयर करते हुए मेरा अधिकांश लेखन हुआ है। यह एक अजीब सा तथ्‍य है कि कुछ पेरेंट्स बच्‍चों से पढ़ने के लिए कहते हैं पर मेरी बेटियां मुझे पढ़ते देख बड़ी हुई हैं। उनके ही कमरे में, उनकी ही मेज कुर्सी पर या बिस्‍तर पर रखी चौकी पर दिन रात बीता है मेरा। अब मेरे बच्‍चे बाहर पढ़ने चले गए, ऐसे में
मेरे सामने अब ये नयी चुनौती आन खड़ी है कि ऐसे नितांत एकांत क्षणों में पूर्ववत अपने सृजनयात्रा को
जारी रखने में सफल हो पाती हूं या नहीं।

रजनी गुप्‍त
मोबाइल 09452295943

सूर्यबाला - सात तालों के अंदर लेखन

उस इंटरव्यू लेने वाली लड़की ने एक छोटा सा प्रश्नभर किया था- कैसे लिखती हैं आप?
मेरा उत्तर उससे भी छोटा था- ‘एक अपराध की तरह...’
सचमुच मेरे अंदर हमेशा एक संग्राम सा छिड़ा रहता है। मां, पत्नी और तमाम सारी दुनियावी भूमिकाएं, बहुत प्यारी जिम्मेदारियां इस ‘लेखिका’ को डराती, धमकाती, सात तालों के अंदर ठेलती रहती हैं... और वह है कि चोरी छुपे यह लिखने का अपराध करने से बाज नहीं आती...। उसे खुद भी वह सात तालों के अंदर वाली कोठरी ही सुहाती है लेकिन यह लिखने वाले ‘अपराध’ के बिना भी तो उसे चैन नहीं आता... जितना-जितना वह एक सुबह से रात तक, एक आम गृहणी वाली घरेलू अस्तव्यस्तताओं के साथ लस्त-पस्त रहती है, उतनी-उतनी ये बेचैनियां उसे उद्विग्न, परेशान किये रहती हैं लेकिन अंततः जब वह ‘इलहामी’ क्षण आता है तो जैसे कलम चारों-धाम पर निकली होती है।
मेज? कैसी मेज? जब जानती भी नहीं थी कि कवि, कथाकार होना क्या होता है, तब बहुत छुटपन में एक नीम अंधेरी शाम, अकेली होने पर कुछ शब्द, पंक्तियां अनायास सूझती चली गई थीं। उन्हें लिखती भी क्या, बस मन-मन में दुहराती चली गई थीं। पूरी होने पर बकायदे सोलह पंक्तियों की एक तुकबंदी तैयार थी... बहनों ने सुनी, बचपनियां तारीफें की और बात आई गई हो गयी....
दूसरी शुरूआत ‘आज’ के बालसंसद स्तंभ से और क्रमशः साप्ताहिक साहित्य परिशष्टों में शिफ्ट होती चली गई। तब तक कविताओं के साथ कहानियां भी जुड़ गई थीं।
लेकिन सात-आठ वर्ष बीतते न बीतते कलम का डिब्बा बंद। ‘आज’ अतीत हो गया। पी.एच.डी. विवाह, बच्चे, गृहस्थी का अपरंपार सुख-जिम्मेदारियां....
लेकिन पति बच्चों के ऑफिस और स्कूल जाने के बाद बचा समय अब मेरा था। भाग-भाग कर काम निपटाती और फिर भर बाहों समेटकर बैठ जातीं इस समय को। भाग, कहां भागेगा अब मेरी पकड़ से। दिमाग की सारी ट्रैफिक कागज पर छितरने लगती।...
दोपहर हुई, बाहर बच्चों की जीप की आवाज आई। टाइम इज ओवर... फटाक-फटाक सारे लिखे अधलिखे कागज दराजों में बंद, ‘लेखिका की बच्ची’ भी... और कमर कस के तैयार....।
कोई समझेगा? मेरा संघर्ष बिल्कुल अलग अजूबे तरह का रहा है। बहुत भले मानुषों के बीच बीतने वाले, ‘बहुत अच्छे समय’ के बीच से, लिखने की मुहलत, समय, इजाजत निकलाने का संघर्ष....। मैं सबके साथ होना, हंसना बोलना चाहती हूं.... लेकिन-लेकिन मुझे इतना यह, और यह लिखना भी है। मैं इतने अच्छे लोगों का मन कैसे दुःखी करूं! (खुद अपना भी) लेकिन मेरा मन बेतरह कर रहा है कि एक चिड़िया की तरह उड़ जाऊं और यह बात लिखकर वापस हो आ जाऊं।
वैसे भी अभी तक किसी की जानकारी या जरा भी उपस्थिति में मैं बिलकुल नहीं लिख सकती। किसी को कानोंकान खबर न हो कि मैं इस समय.... किसी का फोन भी आये तो भी, बस यही कि सामने के फ्लैट में.... या बाथरूम.... या पूजा... (इतना ईमानदार और दयनीय झूठ तो पूजा वाले भगवान माफ कर ही देंगे।)
सबसे बड़ी समस्या तब आई थी जब राज (पति) रिटायर हुए थे। वे मस्त, मै लस्त। ... बुरी तरह अपराध बोध से ग्रस्त... इस आदमी के साथ तो मैं जीवन का लम्हा-लम्हा बितना चाहती हूं न! अभी तक यह इतना व्यस्त था कि उसके संग साथ को तरसती रही लेकिन अब?
तब एक दिन राज ने कहा था- ’मैं कहीं घर से बाहर चला जाया करूं? नहीं ऽऽऽ मैंने कानों पर हाथ रखकर चीख पड़ना चाहा, मुझे लिखने देने के लिए तुम बाहर जा रहे हो, यह सोचकर मेरा अपराध बोध मुझे जीने देगा क्या?
लिखने के लिए बस अपनी वाली टेबिल, ड्रॉर में भी ढेर सारी पेनों में कोई एक... लेकिन कहीं कलम बदली, जैसे किसी ने बुलाया, या कुछ और... तो दुबारा लिखना मुश्किल.... वही कलम, वही फ्लो चाहिए....
कागज? साफ शफ्फाक, फुलस्केप बिलकुल नहीं। उनसे मेरा आत्मविश्वास गायब और मेरी लेखिका के होश फाख्ता। ऐसे ही मुड़े तुड़े पुराने कागजों, टाइप किये पृष्ठों के पीछे ही मेरा पहला ड्राफ्ट हुआ करता है।...
सनकें? थोड़ी बहुत न हों तो समय मिलते ही लेखन पर टूटूं कैसे?.... बहुत सालों पहले मिट्टी जैसे भुरभुरे वंशलोचन की आदत थी। मुंह में डाला और लिखने बैठ गयी। इन दिनों सौंफ या सुपारी... एक चुटकी डाल लेने से रिमोट का काम करता है।
-सूर्यबाला
मो. 9930968670

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

मनीषा कुलश्रेष्‍ठ

आज हमारे साथ अपने लेखन की पेचीदगियां शेयर कर रही हैं कथाकार मनीषा कुलश्रेष्‍ठ

यायावरी का बायप्रोडक्ट
लिखने की मेरी तकलीफ़ बाहरी कोई नहीं हैं,  भीतरी हैं। आलस्य, हर बार नए सिरे से आत्मविश्वासहीनता। लिखने की बेचैनी बनी रहती है, पर लिखने बैठने का मन नहीं होता। हर रोज़ मैं जाग कर आईपैड ऑन करती हूँ, लिखना शुरू करने के लिए, शब्द स्क्रीन पर उतर आने को बेताब हैं मगर मेरी उंगलियों की जड़ता है कि टूटती ही नहीं। ऐसे में मैं एडिक्शन की हद तक ‘स्पाइडर सॉलिटियर’ खेलती हूँ। शब्द अड़ जाते हैं,  निकलते नहीं। हर बार लगता है, अब नहीं लिख सकूंगी, लेकिन हफ्तों में सही जड़ता टूटती तो है, शब्द निकलते हैं.....तब मेरे पात्र अपना अतीत, अपना दर्शन, अपना – अपना तुर्श व्यक्तित्व लिए चुपचाप आकर मेरी गुमी हुई नींद से खेलते हुए, मेरे सिरहाने खड़े रहते हैं। बग़ावत करते हुए। सिफारिशें - शिकायतें करते हैं।
कहानियाँ परेशान कम करती हैं लेकिन उपन्यास तो बहुत परेशान करते हैं। आजकल मैं एक स्किज़ोफ्रेनिक पात्र पर उपन्यास लिख रही हूँ, यकीन मानिए भ्रम होने लगा कि मैं भी अवास्तविक आवाजों, वहम और वहशतों के घेरे में हूँ। उपन्यास अपने फाइनल ड्राफ़्ट में था और समय कम। मैंने सब छोड़ा और दो दिन का ब्रेक लिया।
यायावरी बाय डिफ़ॉल्ट मेरे हिस्से में आई ही है। यायावरी का बायप्रोडक्ट है, बार - बार जड़ से उखड़ने का अवसाद, जो कि अब आदत में बदल गया है। ‘दाग़ अच्छे हैं’ की तर्ज पर कुछ लोग कहते हैं, यायावरी अच्छी है लेखन के लिए। अपना ही आलस और न लिख पाने की जड़ - अवस्था अवसाद जगाती है, एक भय भी। यह सोच कर कि ‘मन्नो, अब नहीं तो कब? यही वक्त है, जिसके गर्भ में असीम संभावनाएं हैं। मेज पर बैठते ही तो नींद आती है।
मेरा असली लेखन कभी भी मेज़ पर बैठ कर नहीं होता। मेज़ पर तो आखिरी दिनों में संयोजन के लिए बैठती हूँ। तरतीबी तो पूरे ही व्यक्तित्व में नहीं है, सो लेखन में भी बेतरतीबी रहती है। मसलन किसी सोची हुई कहानी के टुकड़े मेरे आई पैड में, डायरी में, कागज़ के टुकड़ों, पेपर नेपकिन्स और स्मृति में बिखरे रहते हैं। जिनको मैं अंतत: जिग सॉ पज़ल की तरह जोड़ती हूं और यही क़वायद सच में मेरे लिए मुश्किल साबित होती है। असली मेहनत जिग- सॉ पज़ल जो आपने लिख के पटक दी है, उसे जोड़ने में होती है।
सब के विपरीत मुझे हमेशा क्यों यह लगता है कि किसी भी रचनात्मक लेखन की पहली शर्त यही हो कि लेखक को उस विषय या प्लॉट का कोई अनुभव ना हो। बस कानों सुना हो या कल्पनाओं में जिया हो, या दिवास्वप्नों में उतरा हो। स्वानुभूत चीज़ लिखने में शब्द अकसर साथ नहीं देते और कलम व्यर्थ के विवरणों – वर्णनों में उलझ जाती है, और आप खुद को अपनी कहानी या उपन्यास के प्लॉट में से मिटाने या स्मज करने में कहानी को बिगाड़ देते हो। यही वजह है कि मैं ने अपनी स्मृतियों से कहीं ज़्यादा अपनी फंतासियों पर यक़ीन किया है क्योंकि फंतासियाँ मैं कहीं बारीक तफ़सीलों में जीती हूँ।
राइटर्स ब्लॉक अकसर संक्रमित करता है। दो - चार महीने उंगलियाँ जड़ रहती हैं, कलम उदास। हाल ही में  डेढ़ साल कुछ नहीं लिखा। लंबा वनवास रहा.. वैसे राइटर्स ब्लॉक में नकारात्मक कुछ नहीं है। यह अपने लिए खींची अगली चुनौती के लिए पर तौलना है, जिसे पार करने में कई बार लंबा समय लग जाता है।
हाँ लिखते हुए मैंने भी अपनी कुछ सनकें पाल रखी हैं। चाय - कॉफी मुझे अतिरिक्त उद्विग्नता देते हैं। संयमित जाग्रति के लिए मुझे कुछ चबाते हुए लिखना हमेशा प्रिय है, इससे दिमाग़ कमाल की उर्वरता में रहता है। भुनी सौंफ़ या मुरमुरे और नमकीन। मैं रात के सन्नाटों में ही लिख सकती हूँ क्योंकि बहुत महीन है मेरी एकाग्रता का कांच।
मेरा लिखना रात ग्यारह बजे से सुबह चार तक चलता है, नॉवल लिखते हुए मेरी बॉडी क्लॉक उलट जाती है। मुझे खाली काग़ज और काले रंग की स्याही वाला फाउंटेन पेन आज भी बहुत प्रिय है, लेकिन दाहिने अंगूठे का टैंडन और कुछ नर्व्ज़ कट जाने के बाद पेन से तो मैं आधा पन्ना भी नहीं लिख पाती, मैं आई पैड पर लिखती हूँ। मुझे रेल यात्राओं में लिखना बहुत प्रिय है। मैं एडिटिंग की कायल हूँ, सधाव और संक्षिप्तता की। लिखकर कैंची लेकर बैठना बहुत ज़रूरी लगता है।
 मनीषा कुलश्रेष्ठ
09911252907

असगर वजाहत

वरिष्‍ठ कथाकार, नाटककार, लघुकथा विशेषज्ञ, यायावर, फोटोग्राफर और यारबाश असगर वजाहत अपने लिखने की तकलीफों के बारे में कुछ रोचक बातें हमसे शेयर कर रहे हैं।

लिखने के बारे में अपने आप को तैयार करना? दो तीन बातें हैं। दरअसल लिखने के बारे में मुझे परिस्थितियां या विचार बहुत प्रेरित करते हैं। कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई विचार मन में तेजी से घुसता  है और फिर वह मुझे  चैन नहीं लेने देता जब तक कि आप अपनी बात को कागज पर न उतार लें। उतारने को एक कप चाय या जब पीता था तब सिगरेट मदद करती है। कुछ लोग शराब पीकर लिखते हैं लेकिन मुझसे यह नहीं होता। अपने आपको लेखन के लिए तैयार उस समय अधिक पाता हूं जब शारीरिक और और मानसिक रूप से कोई ज्यादा परेशानी नहीं होती। शरीर का कोई हिस्सा दुःख रहा है, कहीं जाने की जल्दी है, कोई ज़रूरी काम करना है... ऐसे हालत में काम नहीं हो पाता। हाँ,  कभी-कभी अपने साथ ज्यादती भी करनी पड़ जाती है। लेकिन उसका नतीजा जल्दी सामने आ जाता है और यह पता चलता है कि लिखना कुछ और था लिख कुछ और गया। इसलिए लिखने का काम छोड़ कर अपने आप को बुरा भला कहने का काम शुरू हो जाता है।
अनुभव ने सिखाया है कि अपने ऊपर ज़ोर डालना बेकार है। जब जिस  बात को बाहर आना है वह बाहर निकलेगी उसका कोई दिन कोई तारीख, कोई समय नहीं है।  आफिस में बैठ कर भी कुछ कहानियां मैंने लिखी हैं।
एक बार ये हुआ कि सोचा किसी होटल में किराये का कमरा ले लिया जाए और वहां रह कर लिखा जाये। गए साहब। कमरा ले लिया। कमरे में आये तो बिलकुल अलग लगा। मैं कमरे में रखी हर चीज़ से अपना परिचय कराने लगा। इस काम में बहुत समय निकल गया। और कमरे से दोस्ती किये बिना मैं यहाँ बैठ कर लिख नहीं पाऊंगा। मन उकता गया...दो घंटे बाद कमरा छोड़ दिया। होटल वाले हैरान ..और मैं परेशान...।
मैं कुछ भी लिखने से पहले यह पसंद करता हूं कि अपने दोस्तों के साथ उसे शेयर कर सकूं। ऐसा करने से मेरे अंदर एक नई ऊर्जा का संचार होता है। कभी-कभी तो बातचीत के दौरान  बंद  गाठें  खुल  जाती हैं जिनको अकेले में  नहीं सुलझा पाया था। जब मैं बात करता हूँ तो दूसरे आदमी या दोस्त की मौजूदगी एक तरह की चुनौती देती है।  इस चुनौती की वजह से दिमाग़ जल्दी जल्दी काम करना शुरू कर देता है। विशेष रूप से नाटक लिखने के लिए यह तैयारी बहुत काम आती है। नाटक के विषय को जितने लोग के साथ शेयर करता  हूं उतना ही अच्छा होता है। बहुत से सुझाव काम के भी हो सकते है और कुछ सुझाव बेकार भी हो सकते हैं।
टोटके तो ऐसा कुछ नहीं है जिन पर विश्वास करता हूं। हां यह जरूर है कि सफेद कागज पर काली रौशनाई से लिखना पसंद करता हूं।  सफेद को काला  करने का जुनून-सा उठता रहता है। सफेद काग़ज़ मुझे बेचैन कर देता है। यदि कागज पर लाइनें खींची हो तो मुझे  लिखने में असुविधा होती है। कलम  ठीक ढंग से नहीं चल रहा हो तो मैं उठाकर फेंक देता हूं। इसी वजह से  अच्छे कलम लिखने के लिए रखे हैं। अच्छे का मतलब महंगे नहीं बल्कि लगातार काम करने वाले। अगर लिखना बहुत जरूरी हो जाए तो कलम कागज की बंदिश भी टूट जाती है।
बुढ़ापे में भी मै बच्चों की तरह स्टेशनरी के लिए पागल रहता हूँ। बहुत साल पहले की बात है..न्यूयॉर्क में एक बहुत धनी महिला से दोस्ती हो गयी थी। उसने एक बार मुझसे पूछा था कि मै न्यूयॉर्क में क्या देखना या करना चाहता हूँ...मतलब उसके पास इतना धन था और मेरे ऊपर इतनी मेहरबान थी कि मैं कुछ भी कर या मांग सकता था... वह कितना ही पैसा खर्च कर सकती थी। मैंने उससे कहा था कि मुझे न्यूयॉर्क का सबसे बड़ा स्टेशनरी स्टोर दिखा दो। वह मुझे ले गयी थी। क्या स्टोर था। मैं तो पागल हो गया था..।
मैं यह नहीं चाहता कि मेरा आधा लिखा कोई पढ़े। कोई कोशिश करता है तो मुझे बड़ी परेशानी होती है। मैं चाहता हूं कि मैं अपनी जो भी चीज, अपनी रचना किसी के सामने पढ़ने के लिए रखूं तब ही वह पढ़ी जाये, उससे पहले नहीं।
शांति हो अच्छा है...न हो तो न हो...। कंप्यूटर पर  लिखना दो मित्रों ने सिखाया है...मेरे गुरू हैं... एक तो मौलाना सूरज प्रकाश.... जिनकी दाढ़ी  के कारण आजकल के हालात में चिंतित रहता हूँ...। दूसरे मित्र हैं भरत तिवारी जो हिन्दी वेब पर बहुत एक्टिव हैं... इन दोनों की मेहरबानी से छुट-पुट खट-पट कर लेता हूँ ...पर लंबा काम हाथ से ही होता है।

असगर वजाहत
 मोबाइल 9818149015

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

मोपासां- आधुनिक कहानी के जनक


हेनरी रेने अल्‍बर्ट गय द मोपासां (1850 -1893) को आधुनिक कहानी का जनक माना जाता है।
अभी वे 11 बरस के ही थे कि उनकी मां उन्‍हें और उनके छोटे भाई को लेकर अपने पति से कानूनी रूप से अलग हो गयी थीं। वे बहुत समझदार और साहित्‍य प्रेमी महिला थीं। मोपासां के विकास में मां का बहुत बड़़ा हाथ है। मोपासां का बचपन मस्‍ती करते हुए और मछली मारते हुए बीता। 13 बरस की उम्र में वे हॉस्‍टल में रहने चले गये।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

जयनंदन - लोहा छीलने से कलम थामने तक का सफ़र

हम भारतीय अपने बारे में, खासकर अपनी तकलीफों के बारे में बताने के मामले में बेहद संकोची होते हैं। लेखक तो और भी ज्‍यादा। भारतीय लेखक लिखते समय किन तकलीफों से गुज़रता है और उनसे कैसे पार पाता है, हम बहुत कम जानते हैं। आज की कड़ी में हम रू बरू हो रहे हैं समकालीन कथाकार जयनंदन की लिखने से जुड़ी तकलीफ़ों से।

बचपन से ही मुझे अपने भीतर बहुत सारी शिकायतें दिखायी पड़ती थीं। अपने जीवन से, अपने समाज से, अपने परिवार से, व्यवस्था से, परंपरा से। हर पल ऐसा लगता था कि मुझे बहुत कुछ कहना है.....विरोध करना है.....धिक्कार पिलाना है। और इन सबके लिए मुझे लगा कि लेखन ही एक सुलभ और अचूक हथियार हो सकता है लेकिन हालात ने मुझे अनुभव के अनेक जमीनी धरातलों पर घसीटा। बहुत कम ही उम्र में मैंने खेती के तमाम श्रमसाध्य पचड़े झेल लिये, फिर कारखाने में 20 बरस तक मज़दूर के तौर पर तेल, ग्रीज़ और कालिख से लिथड़कर विभिन्न मशीनों पर लोहा छीला।
मैं साहित्य में उन जंगली पौधों की तरह उगा, जिसका न कोई माली होता है, न संरक्षक, न शुभचिंतक। खुली प्राकृतिक आंधी, पानी, धूप और दुनियाबी निष्ठुरताओं के घूरे से ही कुकुरमुत्ते की तरह मैंने गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध अपना सिर उठाया।
जब कारखाने में था तो वहां चप्पे-चप्पे पर संघर्ष और मुश्किलें बिछी थीं। वहां लिखने पर सख्त पाबंदी थी। मैं मज़दूर था, मुझे श्रम करने की अनुमति थी, कलम चलाने की नहीं। जिन अफसरों को पता चल गया कि मैं काम छोड़कर यदा-कदा लिखने में डूब जाता हूं, वे मुझ पर खास नज़र रखने लगे थे। लिखते हुए मैं कई बार पकड़ा गया और मुझे अनुशासनात्मक कार्रवाई से भी गुज़रना पड़ा। मेरे लेखन को मेरी सिंसियर ड्यूटी के खिलाफ मेरा एक नकारात्मक पक्ष समझ कर सुपरवाइजर मुझ पर ज्यादा नज़र रखता था और मुझे कोसकर हतोत्साहित करना अपना फर्ज़ समझता था।
मगर मेरी धुन इतनी पक्की थी कि इन प्रतिकूलताओं के बावजूद मैंने अपने कामगार जीवन में भी लगातार कहानियां लिखीं और प्रकाशित हुआ।
भावनाओं और विचारों का अजीब गणित है...जहां बंदिशें, रुकावटें और मुश्‍किलें होती हैं, वहां भावनाओं का ज्वार ज्यादा उठता है। तो उन दिनों खूब और तेज रेला उठता रहता था मेरे अंदर जिन्हें कागज़ पर उतारने के लिए एक-एक शब्द लिखने के लिए जैसे मुझे जूझना पड़ता था। लिखने की मेज़ तो मेरे नसीब में कभी रही ही नहीं। बारह मीटर लंबी बेड वे ग्राइंडिंग मशीन आगे-पीछे चल रही है। जॉब से स्पार्क निकल रहा है और कुलेंट निर्झर की तरह बह रहा है। मैं कागज-कलम लेकर स्विच पैनल पर बैठा हूं। आधा ध्यान लिखने पर है और आधा ध्यान इस बात पर कि कोई साहब आकर टोक न दे। ड्रिलिंग सेक्शन के बगल में रशियन स्लॉटिंग मशीन ऊपर-नीचे रेसिप्रोकेट कर रही है। किसी जॉब में कट लगा हुआ है। मैं बेड पर चढ़कर इंडेक्सिंग हेड पर बैठा हूं...कुछ सोचता हुआ....कुछ मनन करता हुआ। टूल रूम में मैं सिंलिड्रिकल ग्राइंडिंग मशीन में भिड़ा हूं। आठ घंटे का कोटा जल्दी-जल्दी पूरा करके आलमारियों के पीछे छिपकर बैठना है और जो भाव उमड़ रहा है, उसे लिखना है, जब्त नहीं हो रहा है। अगर शॉप के अंदर कहीं छिपने की जगह नहीं मिली तो शेड के बाहर पीछे की झाड़ी में बैठकर कहीं लिखना है। आज सोचकर ताज्जुब होता है कि कैसे कारखाने के कान फाड़ू शोर की स्थिति में भी मैंने लिखा।
इन दिनों मैं ऑफिस में स्थानांतरित होकर आ गया हूं। लोहे छीलने, काटने और तराशने वाले हाथ को अब कलम पकड़ने की ऑफिशियल मान्यता मिल गयी है। मतलब अब मुझे तनख्वाह कलम की बदौलत मिल रही है। आठ घंटे खड़े-खड़े पसीने से सराबोर होकर किसी रोबोट की तरह काम करने की घुटन का अंत हो गया है और अब वातानुकूलित हॉल में भव्य कुर्सी और मेज पर बैठने के दिन आ गये हैं। एमए पास करना और साहित्य में होना काम आ गया। इस तरह लेखन जो पहले अल्पकालीन जुनून था, अब पूर्णकालिक लक्ष्य बन गया और आजीविका का स्रोत भी।
लिखने का मेरा कोई मुकर्रर वक्त नहीं है और न ही मुझे कोई विशेष मूड और माहौल की ज़रूरत होती है। जब कोई मुद्दा या प्रसंग या वारदात नींदें उड़ा देती है तो उसके पूरा लिखे जाने तक गहरी नींद नहीं आती। अन्य लेखकों की तरह लिखने को लेकर अपनी न कोई खास आदतें हैं, न चोंचले हैं और न टोटके हैं। दरअसल अर्से तक मज़दूर रहा हुआ मैं खुद को साहित्य का साहब न समझकर साहित्य का मजदूर ही समझता हूं।
मोबाइल : 09431328758

मेरे पास लिखने की मेज़ ही नहीं थी - सुभाष पंत

हम भारतीय अपने बारे में, खासकर अपनी तकलीफों के बारे में बताने के मामले में बेहद संकोची होते हैं। लेखक तो और भी ज्‍यादा। भारतीय लेखक लिखते समय किन तकलीफों से गुज़रता है और उनसे कैसे पार पाता है, हम बहुत कम जानते हैं। आज की कड़ी से हम यही कोशिश करेंगे कि अपने वरिष्‍ठ और समकालीन लेखकों की लिखने से जुड़ी तकलीफ़ों से रू ब रू हों। शुरुआत कर रहे हैं वरिष्‍ठ कथाकार सुभाष पंत से।

मैं लिखने की मेज़ पर कैसे आया, जबकि मेरे पास लिखने के लिए कोई मेज़ ही नहीं थी। मैंने कभी लेखक नहीं होना चाहा था। लेखक मुझे विशिष्‍ट मानव प्रजाति के महान लोग लगते थे। मैं गरीबी रेखा से नीचे का लड़का था, हालांकि तब गरीबी रेखा खींची नहीं जाती थी।
1972 में मैं अहमदाबाद जा रहा था। किसी स्टेशन पर मैंने रेलगाड़ी की खिड़की से अपने बचे खाने का पैकेट बाहर फेंका, जो अब खाने योग्य नहीं रहा था। उस जूठन पर एक औरत और उसके दो बच्चे ऐसे झपटे मानो वे अशर्फी लूट रहे हों। सहसा मेरे भीतर पता नहीं क्या हुआ। कुछ ऐसी बेचैनी जिसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। मेरी फेंकी जूठन पर किसी को लपकते देखने का यह मेरा पहला अनुभव था। बची यात्रा के दौरान मुझे ऐसा लगता रहा जैसे वे तीन जोड़ी आँखें निरन्तर मेरा पीछा कर रही हैं...। वे चालीस साल से अब तक मेरा पीछा कर रही है। शायद हमेशा करती रहेंगी...।
उन आँखों ने ही मुझे विवश करके लिखने की मेज़ पर बैठाया, जबकि मेरे पास लिखने की मेज़ थी ही नहीं। मैंने बिस्तर पर घुटने के बल बैठ कर पहली कहानी ’गाय का दूध’ लिखी। गाय का दूध कहानी धारा के विरुद्ध यथार्थवादी कहानी थी। कमलेश्‍वर जी ने इसे सारिका के विशेषांक फरवरी 73 में मेरे पोट्रेट के साथ प्रकाशित किया। कहानी देश की सभी भाषाओं में अनूदित हुई और उस अंक की सर्वश्रेष्‍ठ कहानी मानी गयी। मैं न चाहते हुए लेखको की पांत में शामिल हो गया।
तीन जोड़ी आँखों ने मुझे लिखना सिखाया और यह भी बताया कि मुझे क्या और किनके लिए लिखना है। मैं बिना किसी तैयारी के लेखन में आ गया। मेरे पास लेखक का मिजाज़, शख्सियत, नफ़ासत और लटके-झटके कभी नहीं रहे। मुझे लिखने के लिए भी कोई नाटक करने की ज़रूरत कभी नहीं करनी पड़ी। मुझे ऐसा कभी नहीं लगा कि लिखने के लिए पहाड़ पर जाने की ज़रूरत पड़ती है।
2000 में कम्प्यूटर पर आने से पहले का मेरा तमाम लेखन घुटनों के बल बिस्तर पर बैठ कर ही हुआ। लिखने के लिए मुझे एकांत की ज़रूरत नहीं होती। मैं किसी भी माहौल में लिख लेता हूँ। शोर शराबे में भी। गपशप मारते हुए भी। टीवी देखते हुए भी। जब मैंने लिखना शुरू किया था, तब फाउन्टेंट पैन से लिखता था। मेरी हस्तलिपि बहुत खूबसूरत थी। इसलिए मुझे ऐसे कागज़ की ज़रूरत होती थी, जिस पर स्याही न फैले और ऐसा पैन चाहिए होता था, जिसकी निब ठीक हो। फाउन्टेन के प्रति मुझमें इतना मोह था कि मैं उनकी चोरी भी कर सकता था। खराब निब के पैन से मैं कभी कुछ नहीं लिख पाया।
पांडुलिपि में कोई काट-छाँट भी मुझे कभी बर्दाश्‍त नहीं हुई। किसी पृष्‍ठ पर एक भी गलती हो जाती तो उसे काटकर सुधारने की जगह मैं पूरा पृष्‍ठ ही फिर से लिखना पसंद करता था। एक बैठक मे पाँच-सात लाइनों से ज्यादा मैंने कभी नहीं लिखा। चाहे लिखने का कितना ही भीतरी दबाव रहा हो। इतना लिखने के बाद मैं टहल लेता हूँ या गपशप मार लेता हूँ। कहानियों के ज्‍यादातर आइडिया शाम को टहलते समय आते हैं।
मैं किसी रचना को लिखने में बहुत वक्त देता हूँ, ताकि उसके साथ मेरा रिश्‍ता बहुत समय तक बना रहे। यह एक खास किस्म की रचनात्मक काहिली भी हो सकती है। लेकिन मुझे अपनी इस काहिली से प्यार है...।
मैं 1974 के आसपास हिंदी में एमए कर रहा था। भाषा विज्ञान का पेपर था। आता जाता कुछ था नहीं। समय बिताने के लिए मैंने उन तीन घंटों में वहां एक पूरी कहानी ही लिख मारी। घर आकर उसे फिर से लिखा। ये कहानी सारिका में छपी थी।
कथानक के चयन में मैं काफी सावधान रहता हूँ। कहानी में अगर उसकी कोई सामाजिक प्रासंगिता न हो, तो उसे मैं अपनी रचना में जगह नहीं देता। लेखन मेरे लिए सामाजिक दायित्व है। यह एक गैर लेखकीय मनोवृति हो सकती है, लेकिन मैं मजबूर हूँ।
किसी रचना के पात्र के नाम को लेकर मेरे भीतर कोई लेखकीय सनक ज़रूर है। पात्र का कोई ठीक नाम नहीं सूझता तो रचना शुरू नहीं होती। ’पहल’ के आग्रह पर मुझे कहानी लिखनी थी। मैंने मिसेज बरनाबास नाम की पात्रा से ’सिंगिंग बेल’ कहानी लिखनी आरम्भ की। नहीं लिख सका। कई बार कोशिश की। कहानी आगे नहीं बढ़ी। फिर अनायास मिसेज डिसूजा के नाम से इसे लिखना शुरू किया तो कहानी लिखी गई। इसी तरह जब रतिनाथ योगेश्‍वर देहरादून में थे तो उनके नाम ने मुझे बहुत अपील किया। रतीनाथ के नाम वाली कहानी लिखी गयी और कमलेश्‍वर जी ने छापी।
बस पात्र के नाम के चयन वाला ही मेरा लेखकीय टोटका है। वरना तो मैं एक खुली किताब हूँ....।
मोबाइल : 09897254818

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ - बोल कि लब आजाद हैं तेरे

सियालकोट (पंजाब) में जन्‍मे फ़ैज़ (13 फरवरी, 1911- 20 नवंबर 1984) अंग्रेज़ी और अरबी में पोस्‍ट ग्रेजुएट थे। फ़ैज़ ने दुनिया के बारे में बहुत कुछ ऐसी किताबों से जाना जो उनकी अलमारी में छुपा कर रखी जाती थीं। वे अरबी, फारसी, उर्दू तथा पंजाबी जानते थे। पंजाबी में लिखते भी थे। 1941 में उनकी पहली किताब नक्‍श ए फरियादी छपी थी। शायरी की उनकी आठ किताबें हैं।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com

भीष्म साहनी – विभाजन की त्रासदी के लेखक


रावलपिंडी, पाकिस्तान में जन्मे भीष्म साहनी (8 अगस्‍त 1915 – 15 जुलाई 2003) प्रसिद्ध प्रगतिशील लेखक थे। वे विभाजन से पूर्व रावलपिंडी में अवैतनिक शिक्षक होने के साथ-साथ व्यापार भी करते रहे। वे स्वाधीनता के आंदोलन से भी जुड़े रहे। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्हें जेल जाना पड़ा था।
लेखकों की दुनिया अब ईबुक के रूप में notnul.com पर उपलब्‍ध। मूल्‍य सौ रूपये।संपर्क: support@notnul.com, neelabh.srivastav@notnul.com