हमारे एक प्रिय दोस्त विदेश से एक इंटरनेट हिन्दी रेडियो चलाते हैं. इस रेडियो पर आप शायरों की आवाज़ में उनकी ग़ज़लें, कवियों की आवाज़ में उनकी कविताएं और गीत सुन सकते हैं. कुछ प्रोफेशन गायकों ने भी अपनी आवाज़ में दूसरे रचनाकारों की रचनाओं के लिए दी है.
हमें आपकी आवाज़ चाहिये.
गीतों के लिए, कहानियों के लिए, लघु कथाओं के लिए और रेडियो पर प्रस्तुत की जा सकने वाली किसी भी रचना के लिए.
बेशक इसमें फिलहाल नहीं जुड़ा हुआ है लेकिन आपको ये सुख तो मिलेगा कि आपने एक अच्छी रचना को अपनी आवाज़ दी है और उसे दुनिया भर में कभी भी कहीं भी सुना जा सकता है. आपका नाम तो आपकी आवाज़ के साथ रहेगा ही.
आपकी ओर से सहमति मिलने पर वे आपको ईमेल से रचना भेजेंगे और आप अपने कम्प्यूर पर ऑडियो सिस्टम में उसे रिकार्ड करके वापिस भेजेंगे.
तो आप तैयार हैं अपनी आवाज़ को दुनिया भर तक पहुंचाने के लिए
मुझे ईमेल करें.
kathaakar@gmail.com
soorajprakaash@gmail.com
गुरुवार, 29 मई 2008
सोमवार, 19 मई 2008
महानगर की कथाएं - एक रास्ता यह भी
"सुन री, अगले हफ्ते से बजाज सेंटर में चाइनीज और ओरिएंटल कुकरी की क्लासेस शुरू हो रही है। बहुत मन कर रहा हैं मेरा ओरिएंटल खाना बनाना सीखने का लेकिन जाऊं कैसे?
"क्यों, क्या परेशानी है?"
"परेशानी सिर्फ इतनी सी है मेरी बिल्लो रानी कि ये क्लासेस पूरे चालीस दिन की हैं और सवेरे दस से तीन बजे तक चलने वाली हैं। अब इस शौक को पूरा करने के लिए डेढ़ महीने की छुट्टी लेना कोई बहुत बड़ी समझदारी की बात तो नहीं होगी ना।"
"हम तेरी मुफ्त की छुट्टी का इंतजाम कर दें तो बता क्या ईनाम देगी।"
" सच . . . तू जो कहे . . . जहाँ तू कहे शानदार पार्टी मेरी तरफ से। बता कैसे मिलेगी मुझे छुट्टी?"
"मिलेगी बाबा . . . . जरा धैर्य से। पहले मेरे दो तीन सवालों के जवाब दे। कितने बच्चे हैं तेरे?"
"एक ही तो है केतन . . . . क्यों?"
"कोई सवाल नहीं। अच्छा ये बता ओर बच्चा तो नहीं पैदा करना है तुझे?"
"अभी तक तो सोचा नहीं। हां भी और नहीं भी।"
"कोई बात नहीं। ऐसा कर, कल ही तू जा कर अपना एडमिशन करवा लेना।"
" दैट्स ग्रेट। लेकिन छुट्टी।"
"छुट्टी मिलेगी आपको एमटीपी का एक लैटर दे कर। पूरे पैंतालीस दिन की। दो बार ली जा सकती है। मिसकैरिज के लिए कोई सबूत थोड़े ही चाहिये।"
"अरे वाह, मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था। मैं कल ही अपनी गायनॉक से बात करती हूँ।"
"सिर्फ अपने लिए नहीं, मेरे लिए भी बात करना। मैं भी . . . ।"
"यू टू ब्रूटस।"
"क्यों, क्या परेशानी है?"
"परेशानी सिर्फ इतनी सी है मेरी बिल्लो रानी कि ये क्लासेस पूरे चालीस दिन की हैं और सवेरे दस से तीन बजे तक चलने वाली हैं। अब इस शौक को पूरा करने के लिए डेढ़ महीने की छुट्टी लेना कोई बहुत बड़ी समझदारी की बात तो नहीं होगी ना।"
"हम तेरी मुफ्त की छुट्टी का इंतजाम कर दें तो बता क्या ईनाम देगी।"
" सच . . . तू जो कहे . . . जहाँ तू कहे शानदार पार्टी मेरी तरफ से। बता कैसे मिलेगी मुझे छुट्टी?"
"मिलेगी बाबा . . . . जरा धैर्य से। पहले मेरे दो तीन सवालों के जवाब दे। कितने बच्चे हैं तेरे?"
"एक ही तो है केतन . . . . क्यों?"
"कोई सवाल नहीं। अच्छा ये बता ओर बच्चा तो नहीं पैदा करना है तुझे?"
"अभी तक तो सोचा नहीं। हां भी और नहीं भी।"
"कोई बात नहीं। ऐसा कर, कल ही तू जा कर अपना एडमिशन करवा लेना।"
" दैट्स ग्रेट। लेकिन छुट्टी।"
"छुट्टी मिलेगी आपको एमटीपी का एक लैटर दे कर। पूरे पैंतालीस दिन की। दो बार ली जा सकती है। मिसकैरिज के लिए कोई सबूत थोड़े ही चाहिये।"
"अरे वाह, मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था। मैं कल ही अपनी गायनॉक से बात करती हूँ।"
"सिर्फ अपने लिए नहीं, मेरे लिए भी बात करना। मैं भी . . . ।"
"यू टू ब्रूटस।"
बुधवार, 7 मई 2008
महानगर की कथाएं - एक विकल्प यह भी
-हाय, करूणा, आज कित्ते दिन बाद दिख रही है तू? मुझे लगा या तो नौकरी बदल ली तूने या ट्रेन?
- कुछ नहीं बदला शुभदा, सब कुछ वही है, बस जरा होम फ्रंट पर जूझ रही थी, इसलिए रोज ही ये ट्रेन मिस हो जाती थी।
- क्यों क्या हुआ? सब ठीक तो है ना?
- वही सास ससुर का पुराना लफड़ा। होम टाउन में अच्छा खासा घर है। पूरी जिंदगी वहीं गुजारने के बाद वहाँ अब मन नहीं लगता सो चले आते हैं यहाँ। हम दोनों की मामूली सी नौकरी, छोटा सा फ्लैट और तीन बच्चे। मैं तो कंटाल जाती हूँ उनके आने से। समझ में नहीं आता क्या करूँ।
- एक बात बता, तेरे ससुर क्या करते थे रिटायरमेंट से पहले?
-सरकारी दफ्तर में स्टोरकीपर थे।
-उनकी सेहत कैसी है?
-ठीक ही है।
-उन दोनों में से कोई बिस्तर पर तो नहीं है?
-नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है। बस, बुढ़ापे की परेशानियाँ है, बाकी तो . . . . ।
-और तेरा सरकारी मकान है। तेरे ही नाम है ना . . . . तेरे हस्बैंड की तो प्राइवेट नौकरी है . . . ?
- हाँ है तो . . . . ।
-और तेरे ससुर की पेंशन तो 1500 से ज्यादा ही होगी?
-हाँ होगी कोई 2300 के करीब।
- बिलकुल ठीक। और तू रोज रोज के यहाँ टिकने से बचना चाहती है?
- चाहती तो हूँ, लेकिन मेरी चलती ही कहाँ है। घर में उनकी तरफदारी करने के लिए बैठा है ना श्रवण कुमार।
-अब तेरी ही चलेगी। एक काम कर। अपने ऑफिस में एक गुमनाम शिकायत डलवा दे कि तेरे नॉन डिपेंडेंट सास ससुर बिना ऑफिस की परमिशन के तेरे घर में रह रहे हैं। तेरे ऑफिस वाले तुझे एक मेमो इश्यू कर देंगे, बस। सास ससुर के सामने रोने धोने का नाटक कर देना . . . .कि किसी पड़ोसी ने शिकायत कर दी है। मैं क्या करूँ? ऐसी हालत में वे जायेंगे ही।
-सच, क्या कोई ऐसा रूल है?
-रूल है भी और नहीं भी। लेकिन इस मेमो से डर तो पैदा किया ही जा सकता है।
- लेकिन शिकायत डालेगा कौन?
-अरे, टाइप करके खुद ही डाल दे। कहे तो मैं ही डाल दूँ। मैंने भी अपने सास–ससुर से ऐसे ही छुटकारा पाया है।
मंगलवार, 29 अप्रैल 2008
महानगर की कथाएं - एक और विकल्पहीन
उस स्कूल की हैडमिस्ट्रेस रोज ही देखती है कि मिसेज मनचन्दा स्कूल का समय खत्म हो जाने के बाद भी स्कूल में ही बैठी रहती हैं और लाइब्रेरी वगैरह में समय गुजारती हैं। वे आती भी सबसे पहले हैं। बाकि अध्यापिकाएं तो जितनी देर से आती हैं उतनी ही जल्दी जाने की हड़बड़ी में होती हैं। अगर मैनेजमेन्ट ने हर अध्यापिका के लिये कम से कम पांच घण्टे स्कूल में रहने की शर्त न लगा रखी होती तो कई अध्यापिकाएं तो अपने दो तीन पीरियड पढ़ा कर ही फूट लेतीं।
मिसेज मनचन्दा ने हाल ही में यह स्कूल ज्वाइन किया है। वे सुन्दर हैं, जवान हैं और सबसे बड़ी बात, बाकि अध्यापिकाओं की तुलना में उनके पास डिग्री भी बड़ी है, बेशक वेतन उनका इतना मामूली है कि महीने भर आने जाने का ऑटोरिक्शा का भाड़ा भी न निकले।
आखिर पूछ ही लिया प्रधानाध्यापिका ने उनसे।
मिसेज मनचन्दा ने ठण्डी सांस भर कर जवाब दिया है - आपका पूछना सही है। दरअसल मेरा घर बहुत छोटा है, एक ही कमरे का मकान। उसी में हमारे साथ रिश्ते का हमारा जवान देवर रहता है। रात पाली में काम करता है. मेरे पति शाम सात बजे तक ही आ पाते हैं लेकिन देवर सारा दिन घर पर रहता है। अब मैं कैसे बताऊं कि सारा दिन घर से बाहर रहने के लिये ही ये नौकरी कर रही हूं। बेशक इस नौकरी से मेरे हाथ में एक भी पैसा नहीं आता, फिर भी किसी तरह के दैहिक शोषण की आशंका से बची रहती हूं। न सही दैहिक शोषण का डर, सारा दिन उस निठल्ले की चाकरी तो नहीं बजानी पड़ती। घर पर उनकी मौजूदगी में तो मैं घड़ी भर लेट कर कमर तक सीधी करने की कल्पना नहीं कर पाती।
सोमवार, 21 अप्रैल 2008
महानगर की कथाएं- एक – विकल्पहीन
वे बहुत सारे हैं। अलग अलग उम्र के लेकिन लगभग सभी रिटायर्ड या अपना सब कुछ बच्चों को सौंप कर दीन दुनिया से, सांसारिक दायित्वों से मुक्त। सवेरे दस बजते न बजते वे धीरे–धीरे आ जुटते हैं यहाँ और सारा दिन यहीं गुजारते हैं। मुंबई के एक बहुत ही सम्पन्न उपनगर भयंदर में स्टेशन के बाहर, वेस्ट की तरफ। रेलवे ट्रैक के किनारे गिट्टी पत्थरों के ढेर पर उनकी महफिल जमती है और दिन भर जमी ही रहती है। यहाँ अखबार पढ़े जाते हैं, समाचारों पर बहस होती है, सुख दुख सुने सुनाये जाते हैं और मिल जुल कर जितनी भी जुट पाये, दो चार बार चाय पी जाती है, पत्ते खेले जाते हैं और शेयरों के दामों में उतार चढ़ावों पर, अकेले दुकेले बूढ़ों की हत्या पर, बलात्कार के मामलों और राजनैतिक उठापटक पर चिंता व्यक्त की जाती है। सिर्फ बरसात के दिनों में या तेज गर्मी के दिनों में व्यवधान होता है उन लोगों के बैठने में।
कंकरीट के इस जंगल में कोई पार्क, हरा भरा पेड़ या कुंए की कोई जगत नहीं हैं, नहीं तो यह चौपाल वहीं जमती। वे दिन भर आती जाती ट्रेनों को देखते रहते हैं और इस तरह से अपना वक्त गुजारते हैं। शाम ढलने पर वे एक–एक करके जाने लगते हैं। एक बार फिर यहाँ पर लौट कर आने के लिए।
उनके दिन इसी तरह से गुजर रहे हैं। आगे भी उन्हें यहीं बैठकर इसी तरह से पत्ते खेलते हुए बातें करते हुए और मिल जुल कर कटिंग चाय पीते हुए दिन गुजारने हैं।
ये बूढ़े, सब के सब बूढ़े अच्छे घरों से आते हैं और सबके अपने घर–बार हैं। बरसों बरस आपने सारे के सारे दिन यहाँ स्टेशन के बाहर, रेलवे की रोड़ी की ढेरी पर आम तौर पर धूप बरसात या खराब मौसम की परवाह न करते हुए बिताने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं।
किसी का घर इतना छोटा है कि अगर वे दिन भर घर पर ही जमे रहें तो बहू बेटियों को नहाने तक ही तकलीफ हो जाये। मजबूरन उन्हें बाहर आना ही पड़ता है ताकि बहू बेटियों की परदेदारी बनी रहे। किसी का बेशक घर बड़ा है लेकिन उसमें रहने वालों के दिल बहुत छोटे हैं और उनमें इतनी सी भी जगह नहीं बची है कि घर के ये बुजुर्ग, जिन्होंने अपना सारा जीवन उनके लिए होम कर दिया और आज उनके बच्चे किसी न किसी इज्जतदार काम धंधे से लगे हुए हैं, उनके लिए अब इतनी भी जगह नहीं बची है कि वे आराम से अपने घर पर ही रह कर, पोतों के साथ खेलते हुए, सुख दुख के दिन आराम से गुजार सके। गुंजाइश ही नहीं बची है, इसलिए रोज रोज की किच किच से बचने के लिए यहाँ चले आते हैं। यहाँ तो सब उन जैसे ही तो हैं। किसी से भी कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।
बेशक वे आपस में नहीं जानते कि कौन कहाँ रहता है, कइयों के तो पूरे नाम भी नहीं मालूम होते उन्हें, लेकिन फिर भी सब ठीक ठाक चलता रहता है।
बस, संकट एक ही है। अगर उनमें से कोई अचानक आना बंद कर दे तो बाकी लोगों को सच्चाई का पता भी नहीं चल पाता।
बेशक थोड़े दिन बाद कोई नया बूढ़ा आ कर उस ग्रुप में शामिल हो जाता है।
भयंदर में ही रहने वाले मेरे मार्क्सवादी दोस्त हृदयेश मयंक इसे पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते हैं जहाँ किसी भी अनुत्पादक व्यक्ति या वस्तु का यही हश्र होता है – कूड़े का ढेर। दोस्त की दोस्त जानें लेकिन सच यही है कि इस देश के हर घर में एक अदद बूढ़ा है जो समाज से, जीवन से, परिवार से और अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह रिटायर कर दिया गया है और वह अपने आखिरी दिन अपने शहर में सड़क या रेल की पटरी के किनारे पत्थर–गिट्टियों पर बैठ कर बिताने को मजबूर है।
कंकरीट के इस जंगल में कोई पार्क, हरा भरा पेड़ या कुंए की कोई जगत नहीं हैं, नहीं तो यह चौपाल वहीं जमती। वे दिन भर आती जाती ट्रेनों को देखते रहते हैं और इस तरह से अपना वक्त गुजारते हैं। शाम ढलने पर वे एक–एक करके जाने लगते हैं। एक बार फिर यहाँ पर लौट कर आने के लिए।
उनके दिन इसी तरह से गुजर रहे हैं। आगे भी उन्हें यहीं बैठकर इसी तरह से पत्ते खेलते हुए बातें करते हुए और मिल जुल कर कटिंग चाय पीते हुए दिन गुजारने हैं।
ये बूढ़े, सब के सब बूढ़े अच्छे घरों से आते हैं और सबके अपने घर–बार हैं। बरसों बरस आपने सारे के सारे दिन यहाँ स्टेशन के बाहर, रेलवे की रोड़ी की ढेरी पर आम तौर पर धूप बरसात या खराब मौसम की परवाह न करते हुए बिताने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं।
किसी का घर इतना छोटा है कि अगर वे दिन भर घर पर ही जमे रहें तो बहू बेटियों को नहाने तक ही तकलीफ हो जाये। मजबूरन उन्हें बाहर आना ही पड़ता है ताकि बहू बेटियों की परदेदारी बनी रहे। किसी का बेशक घर बड़ा है लेकिन उसमें रहने वालों के दिल बहुत छोटे हैं और उनमें इतनी सी भी जगह नहीं बची है कि घर के ये बुजुर्ग, जिन्होंने अपना सारा जीवन उनके लिए होम कर दिया और आज उनके बच्चे किसी न किसी इज्जतदार काम धंधे से लगे हुए हैं, उनके लिए अब इतनी भी जगह नहीं बची है कि वे आराम से अपने घर पर ही रह कर, पोतों के साथ खेलते हुए, सुख दुख के दिन आराम से गुजार सके। गुंजाइश ही नहीं बची है, इसलिए रोज रोज की किच किच से बचने के लिए यहाँ चले आते हैं। यहाँ तो सब उन जैसे ही तो हैं। किसी से भी कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।
बेशक वे आपस में नहीं जानते कि कौन कहाँ रहता है, कइयों के तो पूरे नाम भी नहीं मालूम होते उन्हें, लेकिन फिर भी सब ठीक ठाक चलता रहता है।
बस, संकट एक ही है। अगर उनमें से कोई अचानक आना बंद कर दे तो बाकी लोगों को सच्चाई का पता भी नहीं चल पाता।
बेशक थोड़े दिन बाद कोई नया बूढ़ा आ कर उस ग्रुप में शामिल हो जाता है।
भयंदर में ही रहने वाले मेरे मार्क्सवादी दोस्त हृदयेश मयंक इसे पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते हैं जहाँ किसी भी अनुत्पादक व्यक्ति या वस्तु का यही हश्र होता है – कूड़े का ढेर। दोस्त की दोस्त जानें लेकिन सच यही है कि इस देश के हर घर में एक अदद बूढ़ा है जो समाज से, जीवन से, परिवार से और अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह रिटायर कर दिया गया है और वह अपने आखिरी दिन अपने शहर में सड़क या रेल की पटरी के किनारे पत्थर–गिट्टियों पर बैठ कर बिताने को मजबूर है।
गुरुवार, 10 अप्रैल 2008
मेरा उपन्यास देस बिराना विकिसोर्स पर
मित्रो
विकीसोर्स पर बहुत कम हिन्दी साहित्य उपलब्ध है. बेशक बहुत से हिन्दी रचनाकारों की स्तरीय रचनाएं ब्लागों में या इधर उधर बिखरी हुई हैं. हम सब को मिल कर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि हमारा साहित्य किसी कॉमन प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध हो. इसी दिशा में एक प्रयास करते हुए आज मैंने अपना उपन्यास देस बिराना इस पते पर डाला है -
http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE
बेहद पठनीय और सहज भाषा शैली में रचा गया यह मार्मिक उपन्यास एक ऐसे अकेले लड़के की कथा लेकर चलता है जिसे किन्हीं कारणों के चलते सिर्फ चौदह साल की मासूम उम्र में घर छोड़ना पड़ता है, लेकिन आगे पढ़ने की ललक, कुछ कर दिखाने की तमन्ना और उसके मन में बसा हुआ घर का आतंक उसे बहुत भटकाते हैं।
यह अपने तरह का पहला उपन्यास है जो एक साथ ज़िंदगी के कई प्रश्नों से बारीकी से जूझता है। अकेलापन क्या होता है, और घर से बाहर रहने वाले के लिए घर क्या मायने रखता है, बाहर की ज़िंदगी और घर की ज़िंदगी और आगे बढ़ने की ललक आदमी को सफल तो बना देती है लेकिन उसे किन किन मोर्चों पर क्या क्या खोना पड़ता है, इन सब सवालों की यह उपन्यास बहुत ही बारीकी से पड़ताल करता है। इसी उपन्यास से हमें पता चलता है कि भारत से बाहर की चमकीली दुनिया दरअसल कितनी फीकी और बदरंग है तथा लंदन में भारतीय समुदाय की असलियत क्या है। यह उपन्यास एमपी3 में ऑडियो में भी उपलब्ध है)
सूरज प्रकाश
विकीसोर्स पर बहुत कम हिन्दी साहित्य उपलब्ध है. बेशक बहुत से हिन्दी रचनाकारों की स्तरीय रचनाएं ब्लागों में या इधर उधर बिखरी हुई हैं. हम सब को मिल कर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि हमारा साहित्य किसी कॉमन प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध हो. इसी दिशा में एक प्रयास करते हुए आज मैंने अपना उपन्यास देस बिराना इस पते पर डाला है -
http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE
बेहद पठनीय और सहज भाषा शैली में रचा गया यह मार्मिक उपन्यास एक ऐसे अकेले लड़के की कथा लेकर चलता है जिसे किन्हीं कारणों के चलते सिर्फ चौदह साल की मासूम उम्र में घर छोड़ना पड़ता है, लेकिन आगे पढ़ने की ललक, कुछ कर दिखाने की तमन्ना और उसके मन में बसा हुआ घर का आतंक उसे बहुत भटकाते हैं।
यह अपने तरह का पहला उपन्यास है जो एक साथ ज़िंदगी के कई प्रश्नों से बारीकी से जूझता है। अकेलापन क्या होता है, और घर से बाहर रहने वाले के लिए घर क्या मायने रखता है, बाहर की ज़िंदगी और घर की ज़िंदगी और आगे बढ़ने की ललक आदमी को सफल तो बना देती है लेकिन उसे किन किन मोर्चों पर क्या क्या खोना पड़ता है, इन सब सवालों की यह उपन्यास बहुत ही बारीकी से पड़ताल करता है। इसी उपन्यास से हमें पता चलता है कि भारत से बाहर की चमकीली दुनिया दरअसल कितनी फीकी और बदरंग है तथा लंदन में भारतीय समुदाय की असलियत क्या है। यह उपन्यास एमपी3 में ऑडियो में भी उपलब्ध है)
सूरज प्रकाश
रविवार, 6 अप्रैल 2008
सोमवार, 31 मार्च 2008
मेरे बचपन का शहर देहरादून
लिखो यहां वहां http://www.likhoyahanvahan.blogspot.com/ में आज पढ़ें मेरे बचपन का शहर देहरादून जो आज भी मेरी सांस सांस में बसता है.
बचपन तो सबका सांझा ही होता है और जब हमें दूसरों के बचपन के जरिये अपने बचपन में झांकने का मौका मिलता है तो हम कह उठते हैं- स्साला . . ये ही हम भी करते रहे हैं. . तो लीजिये एक झलक मेरे बचपन की..
सूरज प्रकाश
बचपन तो सबका सांझा ही होता है और जब हमें दूसरों के बचपन के जरिये अपने बचपन में झांकने का मौका मिलता है तो हम कह उठते हैं- स्साला . . ये ही हम भी करते रहे हैं. . तो लीजिये एक झलक मेरे बचपन की..
सूरज प्रकाश
गुरुवार, 27 मार्च 2008
कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में
http://kabaadkhaana.blogspot.com/ में आज पढ़ें मेरी एक सरस पोस्ट - कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में.
आपको जरूर नशा आयेगा
सूरज प्रकाश
आपको जरूर नशा आयेगा
सूरज प्रकाश
सोमवार, 24 मार्च 2008
लौट कर आना ही होगा
आज मैं तीन महीने और पन्द्रह दिन के बाद पुणे में अपनी नौकरी पर वापिस आ गया हूं. 10 दिसम्बर 2007 को दिल्ली में हुए सड़क हादसे की वजह से मैं बिस्तर पर था और कभी कभार पोस्ट पर आ पाता था.
इस पूरे अरसे के दौरान सभी ब्लागी मित्रों ने मेरे शीघ्र स्वस्थ होने के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजीं और लगातार मेरा हाल पूछते रहे. मैं आप सब के प्रति आभारी हूं.
ये बेशक एक नया परिवार है लेकिन जिस तरह से बिल्कुल अनजान और अपरिचित मित्रों और पाठकों ने अपनी शुभकामनाएं भेजीं. उससे बहुत अच्छा लगा और ये विश्वास जगा कि प्रिंट मीडिया में हमने जो अपने पाठक खो दिये थे, ब्लागों की दुनिया उससे सौ गुना ज्यादा पाठक ले कर हमारे सामने है. सभी अपने और सभी आपसे संवाद करने के लिए तैयार
एक बार पुनः नमन.
हर सोमवार एक कहानी के साथ मेरे दूसरे ब्लाग soorajprakash.blogspot.com पर भी आपका स्वागत है.
सूरज प्रकाश
इस पूरे अरसे के दौरान सभी ब्लागी मित्रों ने मेरे शीघ्र स्वस्थ होने के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजीं और लगातार मेरा हाल पूछते रहे. मैं आप सब के प्रति आभारी हूं.
ये बेशक एक नया परिवार है लेकिन जिस तरह से बिल्कुल अनजान और अपरिचित मित्रों और पाठकों ने अपनी शुभकामनाएं भेजीं. उससे बहुत अच्छा लगा और ये विश्वास जगा कि प्रिंट मीडिया में हमने जो अपने पाठक खो दिये थे, ब्लागों की दुनिया उससे सौ गुना ज्यादा पाठक ले कर हमारे सामने है. सभी अपने और सभी आपसे संवाद करने के लिए तैयार
एक बार पुनः नमन.
हर सोमवार एक कहानी के साथ मेरे दूसरे ब्लाग soorajprakash.blogspot.com पर भी आपका स्वागत है.
सूरज प्रकाश
रविवार, 16 मार्च 2008
लघु कथा- कमीशन
उस दफ्तर में ज्वाइन करते ही मुझे वहां के सब तौर तरीके समझा दिये गये थे. मसलन छोटे मामलों में कितना लेना है और बड़े मामलों में कितनी मलाई काटनी है. यह रकम किस किस के बीच और किस अनुपात में बांटी जानी है, ये सारी बातें समझा दी गयी थीं. किस पार्टी से सावधान रहना है और किन पार्टियों की फाइलें दाब के बैठ जाना है, ये सारे सूत्र मुझे रटा दिये गये थे.
मैं डर रहा था, ये सब कैसे कर पाऊंगा, अगर कहीं पकड़ा गया या परिचितों, यार दोस्तों ने यह बात कहीं सरेआम की दी तो, लेकिन भीतर कहीं खुश भी था कि ऊपर की आमदनी वाली नौकरी है. खूब गुलछर्रे उड़ायेंगे. उधर पिताजी अलग खुश थे कि लड़का सेल्स टैक्स में लग गया है. हर साल इस महकमे को जो चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है, उससे तो बचेंगे.
सब कुछ ठीक चलने लगा था. मैं वहां के सारे दांव पेंच सीख गया था. बेशर्मी से मैं भी उस तालाब में नंगा हो गया था औरी पूरी मुस्तैदी से अपना और अपने से ऊपर वालों का घर भरने लगा था.
तभी पिताजी ने अपनी दुकान की सेल्स टैक्स की फाइल मुझे दी ताकि केस क्लीयर कराया जा सके. हालांकि एरिया के हिसाब से केस मुझे ही डील करना था. लेकिन मेरे साथी और अफसर कहीं गलत अर्थ न ले लें, मैंने वह फाइल अपने साथी को थमा दी ओर सारी बात बता दी.
जब उसने केस अंदर भेजा तो उसे बुलावा आया. वह जब केबिन से निकला तो उसका चेहरा तमतमाया हुआ था. बहुत पूछने पर उसने इतना ही बताया कि बॉस ने केस क्लीयर तो कर दिया है, पर यह पूछ रहे थे कि क्या ये केस सचमुच तुम्हारे पिताजी का है या यूं ही पूरा कमीशन अकेले खाने के लिए उसे बाप बना लिया है.
सूरज प्रकाश
मैं डर रहा था, ये सब कैसे कर पाऊंगा, अगर कहीं पकड़ा गया या परिचितों, यार दोस्तों ने यह बात कहीं सरेआम की दी तो, लेकिन भीतर कहीं खुश भी था कि ऊपर की आमदनी वाली नौकरी है. खूब गुलछर्रे उड़ायेंगे. उधर पिताजी अलग खुश थे कि लड़का सेल्स टैक्स में लग गया है. हर साल इस महकमे को जो चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है, उससे तो बचेंगे.
सब कुछ ठीक चलने लगा था. मैं वहां के सारे दांव पेंच सीख गया था. बेशर्मी से मैं भी उस तालाब में नंगा हो गया था औरी पूरी मुस्तैदी से अपना और अपने से ऊपर वालों का घर भरने लगा था.
तभी पिताजी ने अपनी दुकान की सेल्स टैक्स की फाइल मुझे दी ताकि केस क्लीयर कराया जा सके. हालांकि एरिया के हिसाब से केस मुझे ही डील करना था. लेकिन मेरे साथी और अफसर कहीं गलत अर्थ न ले लें, मैंने वह फाइल अपने साथी को थमा दी ओर सारी बात बता दी.
जब उसने केस अंदर भेजा तो उसे बुलावा आया. वह जब केबिन से निकला तो उसका चेहरा तमतमाया हुआ था. बहुत पूछने पर उसने इतना ही बताया कि बॉस ने केस क्लीयर तो कर दिया है, पर यह पूछ रहे थे कि क्या ये केस सचमुच तुम्हारे पिताजी का है या यूं ही पूरा कमीशन अकेले खाने के लिए उसे बाप बना लिया है.
सूरज प्रकाश
बुधवार, 12 मार्च 2008
न्यू यार्क का विश्व हिन्दी सम्मेलन - माया मिली न राम
विश्व हिन्दी सम्मेलन जुलाई 07 के तीसरे सप्ताह में न्यूयार्क में आयोजित किया गया था और जिन लोगों ने उसमें हिस्सेदारी की थी, उनके कटु अनुभव अरसे तक मीडिया में छाये रहे थे. ये अनुभव हर तरह के थे. अव्यवस्था से ले कर सम्मेलन में भाव न दिये जाने तक, लेकिन जो लोग किन्हीं कारणों से वहां नहीं जा पाये थे उनमें से कुछ का अलग ही दुखड़ा है. सम्मेलन में हिस्सेदारी के लिए मई 07 में विदेश मंत्रालय के हिन्दी विभाग में जमा कराये गये चार हजार रुपये मंत्रालय ने अब तक वापिस नहीं किये हैं हालांकि इस संबंध में उन्हें समय रहते जून 2008 में ही सूचित किया गया था. पत्र या ईमेल का कोई जवाब नहीं दिया जाता और फोन करने पर यही उत्तर मिलता है कि अभी और समय लगेगा और इस समय लगने के पीछे इतनी लम्बी कहानी सुनायी जाती है कि आप एसटीडी का बिल बढ़ने के डर से खुद ही फोन काट दें.
कैसा है ये विभाग जिसे पैसे लौटाने जैसे मामूली काम के लिए नौ महीने का समय कम पड़ रहा है.
सूरज प्रकाश, लेखक, अनुवादक और पत्रकार,
एच1/101 रिद्धी गार्डन, फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व मुंबई 97
कैसा है ये विभाग जिसे पैसे लौटाने जैसे मामूली काम के लिए नौ महीने का समय कम पड़ रहा है.
सूरज प्रकाश, लेखक, अनुवादक और पत्रकार,
एच1/101 रिद्धी गार्डन, फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व मुंबई 97
गुरुवार, 31 जनवरी 2008
बुधवार, 30 जनवरी 2008
प्रत्यक्षा जी को कहानी संग्रह के प्रकाशन पर हार्दिक बधाई
3 फरवरी 2008 को सवेरे 10 बजे नेशनल म्यूजियम, नई दिल्ली में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा आयोजित एक भव्य आयोजन में समर्थ युवा लेखिका प्रत्यक्षा के कहानी संग्रह जंगल का जादू तिल तिल का लोकार्पण है.
हम सब ब्लागी प्रत्यक्षा को इस अनूठे सम्मान के लिए हार्दिक बधाई देते हैं ओर कामना करते हैं कि इसी तरह से उनकी कहानी की कई किताबें हमें पढ़ने को मिलती रहें.
कार्यक्रम के बाद भोजन का भी प्रबंध है ( आयोजकों की तरफ से)
हम सब ब्लागी प्रत्यक्षा को इस अनूठे सम्मान के लिए हार्दिक बधाई देते हैं ओर कामना करते हैं कि इसी तरह से उनकी कहानी की कई किताबें हमें पढ़ने को मिलती रहें.
कार्यक्रम के बाद भोजन का भी प्रबंध है ( आयोजकों की तरफ से)
सोमवार, 28 जनवरी 2008
मोबाइल ने बचाई हमारी जान
10 दिसम्बर 2007 की सर्द सुबह थी वह. सवेरे साढ़े पांच बजे का वक्त. मुझे फरीदाबाद से नोयडा जाना था राष्ट्रीय स्तर के एक सेमिनार के सिलसिले में. सेमिनार के आयोजन का सारा काम मेरे ही जिम्मे था. पिछली रात मैं मेजबान संस्थान के जिस साथी के साथ नोयडा से फरीदाबाद अपने माता पिता से मिलने आया था, अचानक उसका फोन आया कि वह बाथरूम में गिर गया है और उसकी हालत खराब है. बताया उसने कि डॉक्टर ने उसे कुछ देर आराम करने के लिए कहा है. जब आधे घंटे तक उसका दोबारा फोन नहीं आया तो मैंने ही उससे पूछा कि अब तबीयत कैसी है. उसने बताया कि वह नोयडा तक कार चलाने की हालत में नहीं है. हां, जाना तो जरूर है. मैंने प्रस्ताव रखा कि वह घबराये नहीं, मैं ही कार चला लूंगा. उसका घर मेरे पिता जी के घर से 12 किमी दूर था. पहले तय कार्यक्रम के अनुसार वही मुझे लेने आने वाला था लेकिन अब नये हालात में मुझे ही उसके घर या उसके आस पास तक जाना था. हमने मिलने की जगह तय की और मैं अपने पिताजी के साथ उनके स्कूटर पर चल पड़ा ताकि कोई ऑटो लिया जा सके. मेरे 82 वर्षीय पिता बहुत जीवट वाले व्यक्ति हैं और इस उम्र में भी अपने सारे काम अपने स्कूटर पर ही यात्रा करते हुए करते हैं. पता नहीं जिंदगी में पहली बार ऐसा क्यों हुआ कि जब मैं उनके पीछे स्कूटर पर बैठा तो मुझे लगा कि आज कुछ न कुछ होने वाला है. हमें मथुरा रोड हाइवे तक कम से कम तीन किलोमीटर जाना था. अब तक कोई आटो नहीं मिला था. रास्ते पर कोहरा और अंधेरा थे जिसकी वजह से वे बहुत धीमे धीमे स्कूटर चला रहे थे. मथुरा रोड हाइवे अभी सौ गज दूर ही रहा होगा कि सड़क पर चलते तेज यातायात को देखते ही कुछ देर पहले अनिष्ट का आया ख्याल एक बार दोबारा मेरे दिमाग में कौंधा. लगा वह घड़ी अब आ गयी है. मैंने पिताजी को सावधान करने की नीयत से कुछ कहना चाहा और उनके कंधे दबाये.
उसके बाद न तो मुझे होश रहा न उन्हें. हम शायद पन्द्रह मिनट तक वहीं चौराहे पर बेहोश पड़े रहे होंगे. अचानक पसलियों में तेज, जान लेवा दर्द उठा और मुझे होश आया. मैं सड़क पर औंधा पड़ा हुआ था और दर्द से छटपटा रहा था. मैं समझ गया वो कुघड़ी आ कर अपना काम कर गयी है. मुझे तुरंत पिताजी का ख्याल आया लेकिन कोहरे. अंधेरे और अपनी हालत के कारण उनके बारे में पता करना मेरे लिए मुमकिन नहीं था. जब मेरी आंखें खुलीं तो मैंने कई चेहरे अपने ऊपर झुके देखे. मैं कराह रहा था. दर्द असहनीय था इसके बावजूद मैंने अपनी जैकेट की जेब से अपना मोबाइल निकाल कर लोगों के सामने गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया कि कोई मेरे पिताजी के घर पर फोन कर दे. मैं जोर जोर से उनके घर का नम्बर बोले जा रहा था. लेकिन शायद वे रात की या सुबह की पाली वाले मजदूर थे. मोबाइल उनके लिए अभी भी अनजानी चीज रही होगी. अंधेरा और कोहरा भी शायद अपनी भूमिका अदा कर रहे थे. कोई भी तो आगे नहीं आ रहा था.
मेरा दर्द असहनीय हो चला था. तभी मेरे फोन की घंटी बजी. और देवदूत की तरह कोई युवक वहां आया. उसने मेरे हाथ से फोन ले कर अटैंड किया. दूसरी तरफ वही साथी थे जो मेरा इंतजार कर रहे थे और देरी होने के कारण चिंता में पड़ गये थे. उसी युवक ने उन्हें बताया कि आप जिनका इंतजार कर रहे हैं. वे तो सड़क पर जख्मी पड़े हैं. तब उसी युवक ने उनके और मेरे अनुरोध पर पिताजी के घर पर फोन किया. मेरे साथी ने एक अच्छा काम और किया कि तुरंत मेरे बड़े भाई के घर पर जा कर इस हादसे की खबर दी और उन्हें साथ ले कर घटना स्थल तक आया. वह खुद बुरी तरह से घबरा गया था. शायद दस मिनट लगे होंगे कि दोनों तरफ से भाई आ पहुंचे. जब तक हम एस्कार्ट अस्पताल तक ले जाये जाते. वे आस पास रह रहे सभी नातेदारों को खबर कर चुके थे.
हमें अब तक नहीं पता कि किस वाहन ने हमें किस कोण से टक्कर मारी थी. स्कूटर हमसे कई गज दूर तीन हिस्सों में टूटा पड़ा था. तमाशबीनों ने हमारे ओढ़े हुए
शाल ही हमारे बदन पर डाल दिये थे और शायद हमें सड़क पर किनारे भी कर दिया था. मेजबान संस्थान के साथी की तबीयत ज्यादा खराब हो गयी थी लेकिन खुद अस्पताल भरती होने से पहले नोयडा में अपने संस्थान में हादसे की खबर कर दी थी. मुझे तीसरे दिन होश आया, पांच दिन आइसीयू में रहा और पन्द्रह दिन अस्पताल में. दायें पैर में मल्टीपल फ्रैक्चर. कुचली हुई पांच पसलियां और दायें कंधे पर भी फ्रैक्चर. पिता जी की दोनों टांगों में फ्रैक्चर ओर ब्लड क्लाटिंग. वे हाल ही की सारी बातें भूल चुके हैं. हादसे के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं. अभी मुझे खुद दो महीने और बिस्तर पर रहना है लेकिन वक्त बीतने के साथ साथ हम दोनों ठीक हो जायेंगे. जोर का झटका बेशक जोर से ही लगा है लेकिन हम दोनों बच गये हैं.
इस पोस्ट के जरिये मैं उन सभी मित्रों, शुभचिंतकों, ब्लाग मित्रों के प्रति आभार शब्द प्रयोग कर उनके और अपने बीच संबंधों की गरिमा को कम नहीं करना चाहता. सभी ब्लागों पर मेरे परिचित और अपरिचित मित्रों की ओर से मेरे शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की खबर मुझे मिलती रही. हिंदयुग्म ब्लाग के मित्रों ने तो जरूरत पड़ने पर रक्त दान के लिए इच्छुक रक्त दाताओं की सूची भी तैयार कर ली थी. मैं जानता हूं कि आप सब की प्रार्थनाओं. दुआओं और शुभेच्छाओं से हम दोनों जल्द ही चंगे हो जायेंगे लेकिन आप सब का प्यार मेरे पास आपकी अमानत रहेगा. हमेशा. हमेशा.
मुझे अभी दो महीने और बिस्तर पर गुजारने हैं. ज्यादा देर तक पीसी पर बैठना मना है. एक हाथ से ये पोस्ट टाइप की है. पिता जी भी स्वस्थ हो रहे हैं. बस, इस बात का मलाल रहेगा कि हम उस अनजान युवक को धन्यवाद नहीं कह पा रहे जिसने मेरे हाथ से फोन ले कर हमारे घर तक हादसे की खबर पहुचायी थी और हम बच पाये. प्रसंगवश, उस वक्त पिताजी के पास मोबाइल नहीं था और मेरे पुणे के मोबाइल में दर्ज नम्बरों से उस अंधेरे और कोहरे में फरीदाबाद का काम का नम्बर खोजना इतना आसान नहीं होता.
सूरज प्रकाश 022 28492796
उसके बाद न तो मुझे होश रहा न उन्हें. हम शायद पन्द्रह मिनट तक वहीं चौराहे पर बेहोश पड़े रहे होंगे. अचानक पसलियों में तेज, जान लेवा दर्द उठा और मुझे होश आया. मैं सड़क पर औंधा पड़ा हुआ था और दर्द से छटपटा रहा था. मैं समझ गया वो कुघड़ी आ कर अपना काम कर गयी है. मुझे तुरंत पिताजी का ख्याल आया लेकिन कोहरे. अंधेरे और अपनी हालत के कारण उनके बारे में पता करना मेरे लिए मुमकिन नहीं था. जब मेरी आंखें खुलीं तो मैंने कई चेहरे अपने ऊपर झुके देखे. मैं कराह रहा था. दर्द असहनीय था इसके बावजूद मैंने अपनी जैकेट की जेब से अपना मोबाइल निकाल कर लोगों के सामने गिड़गिड़ाना शुरू कर दिया कि कोई मेरे पिताजी के घर पर फोन कर दे. मैं जोर जोर से उनके घर का नम्बर बोले जा रहा था. लेकिन शायद वे रात की या सुबह की पाली वाले मजदूर थे. मोबाइल उनके लिए अभी भी अनजानी चीज रही होगी. अंधेरा और कोहरा भी शायद अपनी भूमिका अदा कर रहे थे. कोई भी तो आगे नहीं आ रहा था.
मेरा दर्द असहनीय हो चला था. तभी मेरे फोन की घंटी बजी. और देवदूत की तरह कोई युवक वहां आया. उसने मेरे हाथ से फोन ले कर अटैंड किया. दूसरी तरफ वही साथी थे जो मेरा इंतजार कर रहे थे और देरी होने के कारण चिंता में पड़ गये थे. उसी युवक ने उन्हें बताया कि आप जिनका इंतजार कर रहे हैं. वे तो सड़क पर जख्मी पड़े हैं. तब उसी युवक ने उनके और मेरे अनुरोध पर पिताजी के घर पर फोन किया. मेरे साथी ने एक अच्छा काम और किया कि तुरंत मेरे बड़े भाई के घर पर जा कर इस हादसे की खबर दी और उन्हें साथ ले कर घटना स्थल तक आया. वह खुद बुरी तरह से घबरा गया था. शायद दस मिनट लगे होंगे कि दोनों तरफ से भाई आ पहुंचे. जब तक हम एस्कार्ट अस्पताल तक ले जाये जाते. वे आस पास रह रहे सभी नातेदारों को खबर कर चुके थे.
हमें अब तक नहीं पता कि किस वाहन ने हमें किस कोण से टक्कर मारी थी. स्कूटर हमसे कई गज दूर तीन हिस्सों में टूटा पड़ा था. तमाशबीनों ने हमारे ओढ़े हुए
शाल ही हमारे बदन पर डाल दिये थे और शायद हमें सड़क पर किनारे भी कर दिया था. मेजबान संस्थान के साथी की तबीयत ज्यादा खराब हो गयी थी लेकिन खुद अस्पताल भरती होने से पहले नोयडा में अपने संस्थान में हादसे की खबर कर दी थी. मुझे तीसरे दिन होश आया, पांच दिन आइसीयू में रहा और पन्द्रह दिन अस्पताल में. दायें पैर में मल्टीपल फ्रैक्चर. कुचली हुई पांच पसलियां और दायें कंधे पर भी फ्रैक्चर. पिता जी की दोनों टांगों में फ्रैक्चर ओर ब्लड क्लाटिंग. वे हाल ही की सारी बातें भूल चुके हैं. हादसे के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं. अभी मुझे खुद दो महीने और बिस्तर पर रहना है लेकिन वक्त बीतने के साथ साथ हम दोनों ठीक हो जायेंगे. जोर का झटका बेशक जोर से ही लगा है लेकिन हम दोनों बच गये हैं.
इस पोस्ट के जरिये मैं उन सभी मित्रों, शुभचिंतकों, ब्लाग मित्रों के प्रति आभार शब्द प्रयोग कर उनके और अपने बीच संबंधों की गरिमा को कम नहीं करना चाहता. सभी ब्लागों पर मेरे परिचित और अपरिचित मित्रों की ओर से मेरे शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की खबर मुझे मिलती रही. हिंदयुग्म ब्लाग के मित्रों ने तो जरूरत पड़ने पर रक्त दान के लिए इच्छुक रक्त दाताओं की सूची भी तैयार कर ली थी. मैं जानता हूं कि आप सब की प्रार्थनाओं. दुआओं और शुभेच्छाओं से हम दोनों जल्द ही चंगे हो जायेंगे लेकिन आप सब का प्यार मेरे पास आपकी अमानत रहेगा. हमेशा. हमेशा.
मुझे अभी दो महीने और बिस्तर पर गुजारने हैं. ज्यादा देर तक पीसी पर बैठना मना है. एक हाथ से ये पोस्ट टाइप की है. पिता जी भी स्वस्थ हो रहे हैं. बस, इस बात का मलाल रहेगा कि हम उस अनजान युवक को धन्यवाद नहीं कह पा रहे जिसने मेरे हाथ से फोन ले कर हमारे घर तक हादसे की खबर पहुचायी थी और हम बच पाये. प्रसंगवश, उस वक्त पिताजी के पास मोबाइल नहीं था और मेरे पुणे के मोबाइल में दर्ज नम्बरों से उस अंधेरे और कोहरे में फरीदाबाद का काम का नम्बर खोजना इतना आसान नहीं होता.
सूरज प्रकाश 022 28492796
बुधवार, 7 नवंबर 2007
अब दीवाली . . . .

अब दीवाली . . . .
अब नहीं बनाती मां मिठाई दीवाली पर
हम सब भाई बहन खूब रगड़ रगड़ कर पूरा घर आंगन नहीं चमकाते
अब बड़े भाई दिन रात लग कर नहीं बनाते
बांस की खपचियों और पन्नीदार कागजों से रंग बिरंगा कंदील
और हम भाग भाग कर घर के हर कोने अंतरे में
पानी में अच्छी तरह से भिगो कर रखे गए दीप नहीं जलाते
पूरा घर नहीं सजाते अपने अपने तरीके से।
अब बच्चे नहीं रोते पटाखों और फुलझड़ियों के लिए
ज़िद नहीं करते नए कपड़े दिलाने के लिए और न ही
दीवाली की छुट्टियों का बेसब्री से इंतजार करते हैं।
हम देर रात तक बाज़ार की रौनक देखने अब नहीं निकलते और न ही
मिट्टी की रंग बिरंगी लक्ष्मी, ऐर दूसरी चीजें लाते हैं
दीवाली पर लगने वाले बाजार से
अब हम नहीं लाते खील बताशे, देवी देवताओं के चमकीले कैलेंडर
और आले में रखने के लिए बड़े पेट वाला मिट़टी का कोई माधो।
अब हम दीवाली पर ढेर सारे कार्ड नहीं भेजते
आते भी नहीं कहीं से
कार्ड या मिलने जुलने वाले।
सब कुछ बदल गया है इस बीच
मां बेहद बूढ़ी हो गई है।
उससे मेहनत के काम नहीं हो पाते
वह तो बेचारी अपने गठिया की वजह से
पालथी मार कर बैठ भी नहीं पाती
कई बरस से वह जमीन पर पसर कर नहीं बैठी है।
नहीं गाए हैं उसने त्यौहारों के गीत।
और फिर वहां है ही कौन
किसके लिए बनाए
ये सब खाने के लिए
अकेले बुड्ढे बुढ़िया के पाव भर मिठाई काफी।
कोइ भी दे जाता है।
वैसे भी अब कहां पचती है इतनी सी भी मिठाई
जब खुशी और बच्चे साथ न हों . . .
बड़े भाई भी अब बूढ़े होने की दहलीज पर हैं।
कौन करे ये सब झंझट
बच्चे ले आते हैं चाइनीज लड़ियां सस्ते में
और पूरा घर जग जग करने लगता है।
अब कोई भी मिट्टी के खिलौने नहीं खेलता
मिलते भी नहीं है शायद कहीं
देवी देवता भी अब चांदी और सोने के हो गए हैं।
या बहुत हुआ तो कागज की लुगदी के।
अब घर की दीवारों पर कैलेंडर लगाने की जगह नहीं बची है
वहां हुसैन, सूजा और सतीश गुजराल आ गए हैं
या फिर शाहरूख खान या ऐश्वर्या राय और ब्रिटनी स्पीयर्स
पापा . . .छी आप भी . . .
आज कल ये कैलेंडर घरों में कौन लगाता है
हम झोपड़पट्टी वाले थोड़े हैं
ये सब कबाड़ अब यहां नहीं चलेगा।
अब खील बताशे सिर्फ बाजार में देख लिए जाते हैं
लाए नहीं जाते
गिफ्ट पैक ड्राइ फ्रूट्स के चलते भला
और क्या लेना देना।
नहीं बनाई जाती घर में अब दस तरह की मिठाइयां
बहुत हुआ तो ब्रजवासी के यहां से कुछ मिठाइयां मंगा लेंगे
होम डिलीवरी है उनकी।
कागजी सजावट के दिन लद गए
चलो चलते हैं सब किसी मॉल में,
नया खुला है अमेरिकन डॉलर स्टोर
ले आते हैं कुछ चाइनीज आइटम
वहीं वापसी में मैकडोनाल्ड में कुछ खा लेंगे।
कौन बनाए इतनी शॉपिंग के बाद घर में खाना।
मैं देखता हूं
मेरे बच्चे अजीब तरह से दीवाली मनाते हैं।
एसएमएस भेज कर विश करते हैं
हर त्यौहार के लिए पहले से बने बनाए
वही ईमेल कार्ड
पूरी दुनिया में सबके बीच
फारवर्ड होते रहते हैं।
अब नहीं आते नाते रिश्तेदार दीपावली की बधाई देने
अलबत्ता डाकिया, कूरियरवाला, माली, वाचमैन और दूसरे सब
जरूर आते हैं विश करने . . .नहीं . . .दीवाली की बख्शीश के लिए
और काम वाली बाई बोनस के लिए।
एक अजीब बात हो गई है
हमें पूजा की आरती याद ही नहीं आती।
कैसेट रखा है एक
हर पूजा के लिए उसमें ढेर सारी आरतियां हैं।
अब कोई उमंग नहीं उठती दीवाली के लिए
रंग बिरंगी जलती बुझती रौशनियां आंखों में चुभती हैं
पटाखों का कानफोड़ू शोर देर तक सोने नहीं देता
आंखों में जलन सी मची रहती है।
कहीं जाने का मन नहीं होता, ट्रैफिक इतना कि बस . . .
अब तो यही मन करता है
दीवाली हो या नए साल का आगमन
इस बार भी छुट्टियों पर कहीं दूर निकल जाएं
अंडमान या पाटनी कोट की तरफ
इस सब गहमागहमी से दूर।
कई बार सोचते भी हैं
चलो मां पिता की तरफ ही हो आएं
लेकिन ट्रेनों की हालत देख कर रूह कांप उठती है
और हर बार टल जाता है घर की तरफ
इस दीपावली पर भी जाना।
फोन पर ही हाल चाल पूछ लिए जाते हैं और
शुरू हो जाती है पैकिंग
गोवा की ऑल इन्क्लूसिव
ट्रिप के लिए।
—सूरज प्रकाश
शुक्रवार, 2 नवंबर 2007
कुछ और चिरकीं
भाई बोधिसत्व ने जब शुरुआत कर ही दी है तो स्वाभाविक है कि सब साथी अपने अपने दिमाग की हार्ड डिस्क में तलाशेंगे कि शायद कहीं चिरकीं की कोई फाइल डिलिट होने से रह गयी हो. तो लीजिये पेश है, हमारी याद में जो थे चिरकीं-
चिरकीं प्रसंग से पहले दो एक बातें
• रूस में चिरकिन कई लोगों का सरनेम हुआ करता है.. इस नाम वाले कवि विद्वान और कवि वहां हुए हैं.
• चिरकीं दुनिया में अकेले ऐसे कवि नहीं थे जो अपनी रचना का आधार वहां से तलाशते थे.. फ्रांस, इंगलैंड में भी ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने गू, पाद, हगने की आदतों, और गू की ईश्वरीय खासियतों को अपनी रचना का आधार बनाया है.
• फ्रांस के Euslrog de Beaulieo, Gilles Corrozal और Piron, इंगलैंड के स्विफ्ट ऐसे ही कवि हैं.
कुछेक बानगियां देखिये
Gilles Corrozel की कविता हैः
"Recess of great comfort
Whether it is situated
in the fields or in the citys
Recess in which no one dare enter
Except for cleaning his stomach
Recess of great dignity"
इसी तरह से फ्रांस के Euslrog de Beaulieo अपनी कविता में पाखाने की तारीफ यूं करते हैं :
"When the cherries become ripe
Many black soils of strange shapes
Will breed for many days and urgents
Then will mature and become products of various colours and breaths"
एक अन्य फ्रांसीसी कवि पिरॉन की कविता यूं हैः
"What am I seeing oh! God
It is night soil
What a wonderful substance it is It is excreted by
the greatest of all Kings
Its odour speaks of majesty"
• एक वक्त गू महिमा का ये आलम था कि दाइयां बच्चे की पहली टट्टी देख कर उसके भविष्य के बारे में बता दिया करती थीं. ये तो अपने भारत में ही पंजाब के कुछ हिस्सों में होता रहा है कि अगर किसी परिवार में कई कन्याओं के बाद अगर लड़का पैदा होता था या विवाह के कई बरस के बाद लड़का पैदा होता था तो बच्चे की दादी बच्चे का पहला गू (बेशक जरा सा ही और दलिये में मिला कर) खाती थीं.
• चिरकीं के नाम को ले कर मतभेद हैं कि वे चिरकीन थे, चिरकिन थे या चिरकीं लेकिन वे जो भी थे, लाजवाब थे.
मेरे कलेक्शन में उनकी कुछ और रचनाएं हैं. शब्द आगे पीछे हो सकते हैं. लेकिन मूल भाव यही रहे होंगे.
• पाठकों के पास अगर इनके मौलिक संस्करण हों तो स्वागत है.
1. जो भी कमाऊंगा मैं अब सब का सब लगाऊंगा पाखाने में
जब अगली दफा घर आऊंगा तेरे कभी नहीं मूतूंगा वहां पे.
2. कल जो उनकी याद में दस्त ऐसा आ गया
पोंक से दीवार पर तस्वीर उनकी बन गयी
3. जिधर देखता हूं उधर तू ही तू है
इधर टट्टियां हैं, उधर गू ही गू है
4. टूं को टंकारो पूं की पिचकारी
ठस वस सब छोड़ो भइया, फुसकारी की बलिहारी
5. गुरुड़ गुरुड़ मेरा पेट करे
निकल लेंड हत्यारे
6. दर्द करता है निकलता क्यों नहीं
क्या मैं हौवा हूं जो तुझे खा जाऊंगा.
7. गर पाखाने में आग लग गयी
तो उसे मूत कर बुझाऊंगा.
चिरकीं प्रसंग से पहले दो एक बातें
• रूस में चिरकिन कई लोगों का सरनेम हुआ करता है.. इस नाम वाले कवि विद्वान और कवि वहां हुए हैं.
• चिरकीं दुनिया में अकेले ऐसे कवि नहीं थे जो अपनी रचना का आधार वहां से तलाशते थे.. फ्रांस, इंगलैंड में भी ऐसे कवि हुए हैं जिन्होंने गू, पाद, हगने की आदतों, और गू की ईश्वरीय खासियतों को अपनी रचना का आधार बनाया है.
• फ्रांस के Euslrog de Beaulieo, Gilles Corrozal और Piron, इंगलैंड के स्विफ्ट ऐसे ही कवि हैं.
कुछेक बानगियां देखिये
Gilles Corrozel की कविता हैः
"Recess of great comfort
Whether it is situated
in the fields or in the citys
Recess in which no one dare enter
Except for cleaning his stomach
Recess of great dignity"
इसी तरह से फ्रांस के Euslrog de Beaulieo अपनी कविता में पाखाने की तारीफ यूं करते हैं :
"When the cherries become ripe
Many black soils of strange shapes
Will breed for many days and urgents
Then will mature and become products of various colours and breaths"
एक अन्य फ्रांसीसी कवि पिरॉन की कविता यूं हैः
"What am I seeing oh! God
It is night soil
What a wonderful substance it is It is excreted by
the greatest of all Kings
Its odour speaks of majesty"
• एक वक्त गू महिमा का ये आलम था कि दाइयां बच्चे की पहली टट्टी देख कर उसके भविष्य के बारे में बता दिया करती थीं. ये तो अपने भारत में ही पंजाब के कुछ हिस्सों में होता रहा है कि अगर किसी परिवार में कई कन्याओं के बाद अगर लड़का पैदा होता था या विवाह के कई बरस के बाद लड़का पैदा होता था तो बच्चे की दादी बच्चे का पहला गू (बेशक जरा सा ही और दलिये में मिला कर) खाती थीं.
• चिरकीं के नाम को ले कर मतभेद हैं कि वे चिरकीन थे, चिरकिन थे या चिरकीं लेकिन वे जो भी थे, लाजवाब थे.
मेरे कलेक्शन में उनकी कुछ और रचनाएं हैं. शब्द आगे पीछे हो सकते हैं. लेकिन मूल भाव यही रहे होंगे.
• पाठकों के पास अगर इनके मौलिक संस्करण हों तो स्वागत है.
1. जो भी कमाऊंगा मैं अब सब का सब लगाऊंगा पाखाने में
जब अगली दफा घर आऊंगा तेरे कभी नहीं मूतूंगा वहां पे.
2. कल जो उनकी याद में दस्त ऐसा आ गया
पोंक से दीवार पर तस्वीर उनकी बन गयी
3. जिधर देखता हूं उधर तू ही तू है
इधर टट्टियां हैं, उधर गू ही गू है
4. टूं को टंकारो पूं की पिचकारी
ठस वस सब छोड़ो भइया, फुसकारी की बलिहारी
5. गुरुड़ गुरुड़ मेरा पेट करे
निकल लेंड हत्यारे
6. दर्द करता है निकलता क्यों नहीं
क्या मैं हौवा हूं जो तुझे खा जाऊंगा.
7. गर पाखाने में आग लग गयी
तो उसे मूत कर बुझाऊंगा.
मंगलवार, 30 अक्टूबर 2007
कहानीकार अस्पताल में
वैसे शिकायतें मामूली हैं. चौबीस बरस पुराना स्पौंडिलासिस, खर्राटे भरने की पुरानी आदत जिसकी वजह से अक्सर उनकी बीवी उन्हें बेडरूम से बाहर निकाल देती है और पिछले साल सिर में लगी गुम चोट की वजह से हुई तकलीफें. वे दायीं तरफ नहीं देख पाते, दायां हाथ ऊपर नहीं कर पाते और हर वक्त दायें कंधे में सनसनाहट सी महसूस करते रहते हैं. उनका इलाज शुरू हो गया है और गर्दन में आठ किलो का वजन लटका दिया गया है. बाकी एक्सरसाइज भी साथ साथ.
वैसे वे यहां चल रहे इलाज से बहुत खुश हैं लेकिन उनकी कुछ मौलिक तकलीफें हैं जो मैं आपके साथ शेयर कर रहा हूं.
जब हम उन्हें दशहरे के दिन अस्पताल ले जा रहे थे तो वे खुश थे कि दिन भर आसपास युवा और सुंदर नर्सें होंगी जो उनकी सेवा करेंगी और उनका दिल बहलाये रखेंगी (वे खुद हैंडसम हैं) पर हुआ ये कि सारी की सारी नर्सें लगता है कुपोषण की शिकार हैं. बाइ वन गेट वन फ्री वाली. कमजोर इतनी कि इंजेक्शन के सामान की ट्रे भी मुश्किल से उठा पायें. कहानीकार मित्र ने सोचा कि अपने हिस्से का खाना दे कर शायद उन्हें कुछ राहत दी जा सके लेकिन वहां तो आवां का आवां ही खराब है. सारी की सारी एक ही पैकिंग में सप्लाई वाली. बेचारे कहानीकार मित्र इसी बात को ले कर सारा दिन दुखी रहते हैं. वे आती हैं. कहती हैं- उठो अंकल. दवा का टाइम हो गया या इंजेक्शन लगाना है. बेचारे कुढ़ते रहते हैं.
उनका दूसरा दुख है कि 1998 में लंदन जाने से पहले उनके सैकड़ों मित्र थे जिनके वे हमेशा काम आते थे. अब दस बार फोन पर बताने के बाद भी कोई उनसे मिलने नहीं आता. जो आते हैं वे दो घंटे बैठ कर (विजिटिंग आवर्स दो ही घंटे हैं) पहले अपनी ग़ज़लें और कविताएं पेलते हैं, तब हाले मरीज पूछते हैं. इससे तो न ही आते तो बेहतर था.
कुछ मित्र हैं जिनके न आ पाने के बहाने ही खतम नहीं हो रहे. किसी को कुत्ते ने काट लिया है तो किसी की आंख के नीचे जल गया है और वे चश्मा नहीं पहन पा रहे.
दो दिन से हमारे मित्र और कुढ़े बैठे हैं. उनके एक करोड़पति मित्र हैं. सिनेमाई दुनिया के आदमी हैं. पहली बार मिलने आये तो मिठाई का एक डिब्बा दे गये. उनके जाने के बाद खोला तो कम से कम दस दिन पुरानी मिठाई थी जो खाने के लायक नहीं रही थी. अगले दिन दोबारा आये तो उनके हाथ में पानी की बोतल थी. दो घंटे अपनी लंतरानियां हांकते रहे. जाते समय अपनी बोतल में से आधा पानी कहानीकार मित्र की बोतल में डाल गये कि लो भइया. हम कुछ दे कर ही जा रहे हैं. मेरे मित्र की हालत क्या हुई होगी, आप अंदाजा लगा सकते हैं.
खैर करने को बातें तो बहुत सारी हैं. उन्हें अभी अस्पताल में ही रहना है कुछ दिन और. इस तरह के किस्से तो चलते रहेंगे.
आप चाहें तो वक्त निकाल कर उनसे मिलने जा सकते हैं या फोन करके हाल पूछ सकते हैं. उन्हें अच्छा लगेगा. उनका नम्बर है (0)9833959216. आप उन्हें kahanikar@gmail पर ईमेल करके भी उनके हाल पूछ सकते हैं.
अरे, मैं अपने प्रवासी कहानीकार का नाम तो बताना भूल ही गया.
वे है आप सबके परिचित तेजेन्द्र शर्मा.
सोमवार, 29 अक्टूबर 2007
बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार
बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार, बरसात और कम्यूनिस्ट कोना
पिछले बरस यानी 2006 में कथा यूके का इंदु शर्मा कथा सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत को उनके उपन्यास कैसी आगी लगाई के लिए हाउस हॉफ लॉर्ड्स में दिया गया। इसी सिलसिले में मैं उनके साथ जून 2006 में बीस दिन के लिए लंदन गया था। सम्मान आयोजन के पहले और बाद में हम दोनों खूब घूमे। बसों में . टयूब में . तेजेद्र शर्मा की कार में और पैदल भी। हम लगातार कई कई मील पैदल चलते रहते और लंदन के आम जीवन को नजदीक से देखने . समझने और अपने-अपने कैमरे में उतारने की कोशिश करते। हम कहीं भी घूमने निकल जाते और किसी ऐसी जगह जा पहुंचते जहां आम तौर पर कोई पैदल चलता नज़र ही न आता।
एक बार हमने तय किया कि बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार तक चला जाये। असगर भाई का विचार था कि कहीं इंटरनेट कैफे में जा कर पहले लोकेशन, जाने वाली ट्यूब और दूसरी बातों की जानकारी ले लेते हैं तो वहां तक पहुंचने में आसानी रहेगी। उन्हें इतना भर पता था कि हमें हाईगेट ट्यूब स्टेशन तक पहुंचना है और ये वाला कब्रिस्तान वहां से थोड़ी ही दूरी पर है। लेकिन मेरा विचार था कि हाईगेट स्टेशन तक पहुंच कर वहीं से जानकारी ले लेंगे।
हाईगेट पहुंचने में हमें कोई तकलीफ नहीं हुई। अब हमारे सामने एक ही संकट था कि हमारे पास लोकल नक्शा नहीं था और दूसरी बात हाईगेट स्टेशन से बाहर निकलने के तीन रास्ते थे और हमें पता नहीं था कि किस रास्ते से हमारी मंजिल आयेगी। हमारी दुविधा को भांप कर रेलवे का एक अफसर हमारे पास आया और मदद करने की पेशकश की। जब हमने बताया कि हमारी आज की मंजिल कौन सी है तो उसने हमें लोकल एरिया का नक्शा देते हुए समझाया कि हम वहां तक कैसे पहुंच सकते हैं।
बाहर निकलने पर हमने पाया कि बेशक हम लंदन के बीचों-बीच थे लेकिन अहसास ऐसे हो रहा था मानो इंगलैंड के दूर दराज के किसी ग्रामीण इलाके की तरफ जा निकले हों। लंदन की यही खासियत है कि इतनी हरियाली . मीलों लम्बे बगीचे और सदियों पहले बने एक जैसी शैली के मकान देख कर हमेशा यही लगने लगता है कि हम शहर के बाहरी इलाके में चले आये हों। बेशक हाईगेट सिमेटरी तक बस भी जाती थी लेकिन हमने एक बार फिर पैदल चलना तय किया। रास्ते में एक छोटा-सा पार्क देख कर बैठ गये और डिब्बा बंद बीयर का आनंद लिया।
आगे चलने पर पता नहीं कैसे हुआ कि हम सिमेटरी वाली गली में मुड़ने के बजाये सीधे निकल गये और भटक गये। वहां कोई भी पैदल चलने वाला नहीं था जो हमें गाइड करता। हम नक्शे के हिसाब से चलते ही रहे। तभी हमारी तरह का एक और बंदा मिला जो वहीं जाना चाहता था।
खैर... अपनी मंजिल का पता मिला हमें और हम आगे बढ़े। ये एक बहुत ही भव्य किस्म की कॉलोनी थी और वहां बने बंगलों को देख कर आसानी से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था वहां कौन लोग बसते होंगे। एक मजेदार ख्याल आया कि हमारे सुपर स्टार अमिताभ बच्चन अगर अपनी 227 करोड़ की सारी की सारी पूंजी भी ले कर वहां बंगला खरीदने जायें तो शायद खरीद न पायें।
ऐसी जगह के पास थी बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार। मीलों लम्बा कब्रिस्तान। अस्सी बरस की तो रही ही होगी वह बुढ़िया जो हमें कब्रिस्तान के गेट पर रिसेप्शनिस्ट के रूप में मिली। एंट्री फी दो पाउंड। हम भारतीय कहीं भी पाउंड को रुपये में कन्वर्ट करना नहीं भूलते। हिसाब लगा लिय़ा 184 रुपये प्रति टिकट। अगर कब्रिस्तान की गाइड बुक चाहिये तो दो पाउंड और। ये इंगलैंड में ही हो सकता है कि कब्रिस्तान की भी गाइड बुक है और पूरे पैसे देने के बाद ही मिलती है। हमने टिकट तो लिये लेकिन बाबा कार्ल मार्क्स तक मुफ्त में जाने का रास्ता पूछ लिया। उस भव्य बुढ़िया ने बताया कि आगे जा कर बायीं तरफ मुड़ जाना। ये भी खूब रही। मार्क्स साहब मरने के बाद भी बायीं तरफ।
मौसम भीग रहा था और बीच बीच में फुहार अपने रंग दिखा रही थी। कभी झींसी पड़ती तो कभी बौछारें तेज हो जातीं।
हम खरामा-खरामा कर्बिस्तान की हरियाली . विस्तार और एकदम शांत परिवेश का आनंद लेते बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार तक पहुंचे। देखते ही ठिठक कर रह गये। भव्य। अप्रतिम। कई सवाल सिर उठाने लगे। एक पूंजीवादी देश में रहते हुए वहां की नीतियों के खिलाफ जीवन भर लिखने वाले विचारक की भी इतनी शानदार कब्र। कोई आठ फुट ऊंचे चबूतरे पर बनी है कार्ल मार्क्स की भव्य आवक्ष प्रतिमा। आस पास जितनी कब्रें ह़ैं उनके बाशिंदे बाबा की तुलना में एकदम दम बौने नजर आते हैं। बाबा की कब्र पर बड़े बड़े हर्फों में खुदा है - वर्कर्स ऑफ ऑल लैंड्स . युनाइट। ये कम्यूनिस्ट मैनिफैस्टों की अंतिम पंक्ति है।
ये भी कैसी विडम्बना है जीवन की। जीओ तो मुफलिसी में और मरो तो ऐसी शानदार जगह पर इतना बढ़िया कोना नसीब में लिखा होता है।
उनकी मज़ार पर इस समय जो शिलालेख लगा ह़ै वह 1954 में गेट ब्रिटेन की कम्यूनिस्ट पार्टी ने लगवाया था और उस स्थल को विनम्रता पूर्वक सजाया गया था। एक और अजीब बात इस मज़ार के साथ जुड़ी हुई है कि 1970 में इसे उड़ा देने का असफल प्रयास किया गया था।
अभी हम मार्क्स बाबा की तस्वीरें ले ही रहे थे कि हमारी निगाह सामने वाले कोने की तरफ गयी जहां कुछ कब्रों पर ताजे फूल चढ़ाये गये थे। हम देख कर हैरान रहे गये कि ये पूरा का पूरा कोना दुनिया भर के ऐसे कम्यूनिस्ट नेताओं की कब्रों के लिए सुरक्षित था जिन्होंने पिछले दशकों में इंगलैंड में रह कर देश निकाला झेलते हुए यहां से अपने-अपने देश की राजनीति का सूत्र संचालन किया था। यहां पर हमने ईराकी . अफ्रीकी . लातिनी देशों के कई प्रसिद्ध नेताओं की कब्रें देखीं। ज्यादातर कब्रों पर इस्लामी नाम खुदे हुए दिखायी दिये। किसी ने लंदन में तीस तो किसी ने बीस बरस बिताये थे और अपने अपने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी और अंत समय आने पर यहीं . बाबा कार्ल मार्क्स से चंद कदम दूर ही सुपुर्दे खाक किये गये थे। उस कोने में कम से कम पचास कब्रें तो रही ही होंगी।
कब्रिस्तान सौ बरस से भी ज्यादा पुराना होने के बावजूद अभी भी इस्तेमाल में लाया जा रहा था। बरसात बहुत तेज होने के कारण हम ज्यादा भीतर तक नहीं जा पाये थे लेकिन कब्रों पर लगे फलक पढ़ कर लग रहा था कि ये कब्रगाह ऐसे वैसों के लिए तो कतई नहीं है। दफनाये गये लोगों में कोई काउंट था तो कोई काउंटेस। कोई गवर्नर था तो कोई राजदूत।
वापसी पर हम जिस रास्ते से हो कर आय़े वह एक बहुत बड़ा हरा भरा खूबसूरत बाग था जिसमें सैकड़ों किस्म के फूल और पेड़ लगे हुए थे। वहां से वापिस आने का दिल ही नहीं कर रहा था।
हम दोनों ही सोच रहे थे . रहने को नहीं . मरने को ही ये जगह मिल जाये तो यही जन्नत है।
पिछले बरस यानी 2006 में कथा यूके का इंदु शर्मा कथा सम्मान वरिष्ठ साहित्यकार असगर वजाहत को उनके उपन्यास कैसी आगी लगाई के लिए हाउस हॉफ लॉर्ड्स में दिया गया। इसी सिलसिले में मैं उनके साथ जून 2006 में बीस दिन के लिए लंदन गया था। सम्मान आयोजन के पहले और बाद में हम दोनों खूब घूमे। बसों में . टयूब में . तेजेद्र शर्मा की कार में और पैदल भी। हम लगातार कई कई मील पैदल चलते रहते और लंदन के आम जीवन को नजदीक से देखने . समझने और अपने-अपने कैमरे में उतारने की कोशिश करते। हम कहीं भी घूमने निकल जाते और किसी ऐसी जगह जा पहुंचते जहां आम तौर पर कोई पैदल चलता नज़र ही न आता।
एक बार हमने तय किया कि बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार तक चला जाये। असगर भाई का विचार था कि कहीं इंटरनेट कैफे में जा कर पहले लोकेशन, जाने वाली ट्यूब और दूसरी बातों की जानकारी ले लेते हैं तो वहां तक पहुंचने में आसानी रहेगी। उन्हें इतना भर पता था कि हमें हाईगेट ट्यूब स्टेशन तक पहुंचना है और ये वाला कब्रिस्तान वहां से थोड़ी ही दूरी पर है। लेकिन मेरा विचार था कि हाईगेट स्टेशन तक पहुंच कर वहीं से जानकारी ले लेंगे।
हाईगेट पहुंचने में हमें कोई तकलीफ नहीं हुई। अब हमारे सामने एक ही संकट था कि हमारे पास लोकल नक्शा नहीं था और दूसरी बात हाईगेट स्टेशन से बाहर निकलने के तीन रास्ते थे और हमें पता नहीं था कि किस रास्ते से हमारी मंजिल आयेगी। हमारी दुविधा को भांप कर रेलवे का एक अफसर हमारे पास आया और मदद करने की पेशकश की। जब हमने बताया कि हमारी आज की मंजिल कौन सी है तो उसने हमें लोकल एरिया का नक्शा देते हुए समझाया कि हम वहां तक कैसे पहुंच सकते हैं।
बाहर निकलने पर हमने पाया कि बेशक हम लंदन के बीचों-बीच थे लेकिन अहसास ऐसे हो रहा था मानो इंगलैंड के दूर दराज के किसी ग्रामीण इलाके की तरफ जा निकले हों। लंदन की यही खासियत है कि इतनी हरियाली . मीलों लम्बे बगीचे और सदियों पहले बने एक जैसी शैली के मकान देख कर हमेशा यही लगने लगता है कि हम शहर के बाहरी इलाके में चले आये हों। बेशक हाईगेट सिमेटरी तक बस भी जाती थी लेकिन हमने एक बार फिर पैदल चलना तय किया। रास्ते में एक छोटा-सा पार्क देख कर बैठ गये और डिब्बा बंद बीयर का आनंद लिया।
आगे चलने पर पता नहीं कैसे हुआ कि हम सिमेटरी वाली गली में मुड़ने के बजाये सीधे निकल गये और भटक गये। वहां कोई भी पैदल चलने वाला नहीं था जो हमें गाइड करता। हम नक्शे के हिसाब से चलते ही रहे। तभी हमारी तरह का एक और बंदा मिला जो वहीं जाना चाहता था।
खैर... अपनी मंजिल का पता मिला हमें और हम आगे बढ़े। ये एक बहुत ही भव्य किस्म की कॉलोनी थी और वहां बने बंगलों को देख कर आसानी से इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता था वहां कौन लोग बसते होंगे। एक मजेदार ख्याल आया कि हमारे सुपर स्टार अमिताभ बच्चन अगर अपनी 227 करोड़ की सारी की सारी पूंजी भी ले कर वहां बंगला खरीदने जायें तो शायद खरीद न पायें।
ऐसी जगह के पास थी बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार। मीलों लम्बा कब्रिस्तान। अस्सी बरस की तो रही ही होगी वह बुढ़िया जो हमें कब्रिस्तान के गेट पर रिसेप्शनिस्ट के रूप में मिली। एंट्री फी दो पाउंड। हम भारतीय कहीं भी पाउंड को रुपये में कन्वर्ट करना नहीं भूलते। हिसाब लगा लिय़ा 184 रुपये प्रति टिकट। अगर कब्रिस्तान की गाइड बुक चाहिये तो दो पाउंड और। ये इंगलैंड में ही हो सकता है कि कब्रिस्तान की भी गाइड बुक है और पूरे पैसे देने के बाद ही मिलती है। हमने टिकट तो लिये लेकिन बाबा कार्ल मार्क्स तक मुफ्त में जाने का रास्ता पूछ लिया। उस भव्य बुढ़िया ने बताया कि आगे जा कर बायीं तरफ मुड़ जाना। ये भी खूब रही। मार्क्स साहब मरने के बाद भी बायीं तरफ।
मौसम भीग रहा था और बीच बीच में फुहार अपने रंग दिखा रही थी। कभी झींसी पड़ती तो कभी बौछारें तेज हो जातीं।
हम खरामा-खरामा कर्बिस्तान की हरियाली . विस्तार और एकदम शांत परिवेश का आनंद लेते बाबा कार्ल मार्क्स की मज़ार तक पहुंचे। देखते ही ठिठक कर रह गये। भव्य। अप्रतिम। कई सवाल सिर उठाने लगे। एक पूंजीवादी देश में रहते हुए वहां की नीतियों के खिलाफ जीवन भर लिखने वाले विचारक की भी इतनी शानदार कब्र। कोई आठ फुट ऊंचे चबूतरे पर बनी है कार्ल मार्क्स की भव्य आवक्ष प्रतिमा। आस पास जितनी कब्रें ह़ैं उनके बाशिंदे बाबा की तुलना में एकदम दम बौने नजर आते हैं। बाबा की कब्र पर बड़े बड़े हर्फों में खुदा है - वर्कर्स ऑफ ऑल लैंड्स . युनाइट। ये कम्यूनिस्ट मैनिफैस्टों की अंतिम पंक्ति है।
ये भी कैसी विडम्बना है जीवन की। जीओ तो मुफलिसी में और मरो तो ऐसी शानदार जगह पर इतना बढ़िया कोना नसीब में लिखा होता है।
उनकी मज़ार पर इस समय जो शिलालेख लगा ह़ै वह 1954 में गेट ब्रिटेन की कम्यूनिस्ट पार्टी ने लगवाया था और उस स्थल को विनम्रता पूर्वक सजाया गया था। एक और अजीब बात इस मज़ार के साथ जुड़ी हुई है कि 1970 में इसे उड़ा देने का असफल प्रयास किया गया था।
अभी हम मार्क्स बाबा की तस्वीरें ले ही रहे थे कि हमारी निगाह सामने वाले कोने की तरफ गयी जहां कुछ कब्रों पर ताजे फूल चढ़ाये गये थे। हम देख कर हैरान रहे गये कि ये पूरा का पूरा कोना दुनिया भर के ऐसे कम्यूनिस्ट नेताओं की कब्रों के लिए सुरक्षित था जिन्होंने पिछले दशकों में इंगलैंड में रह कर देश निकाला झेलते हुए यहां से अपने-अपने देश की राजनीति का सूत्र संचालन किया था। यहां पर हमने ईराकी . अफ्रीकी . लातिनी देशों के कई प्रसिद्ध नेताओं की कब्रें देखीं। ज्यादातर कब्रों पर इस्लामी नाम खुदे हुए दिखायी दिये। किसी ने लंदन में तीस तो किसी ने बीस बरस बिताये थे और अपने अपने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी थी और अंत समय आने पर यहीं . बाबा कार्ल मार्क्स से चंद कदम दूर ही सुपुर्दे खाक किये गये थे। उस कोने में कम से कम पचास कब्रें तो रही ही होंगी।
कब्रिस्तान सौ बरस से भी ज्यादा पुराना होने के बावजूद अभी भी इस्तेमाल में लाया जा रहा था। बरसात बहुत तेज होने के कारण हम ज्यादा भीतर तक नहीं जा पाये थे लेकिन कब्रों पर लगे फलक पढ़ कर लग रहा था कि ये कब्रगाह ऐसे वैसों के लिए तो कतई नहीं है। दफनाये गये लोगों में कोई काउंट था तो कोई काउंटेस। कोई गवर्नर था तो कोई राजदूत।
वापसी पर हम जिस रास्ते से हो कर आय़े वह एक बहुत बड़ा हरा भरा खूबसूरत बाग था जिसमें सैकड़ों किस्म के फूल और पेड़ लगे हुए थे। वहां से वापिस आने का दिल ही नहीं कर रहा था।
हम दोनों ही सोच रहे थे . रहने को नहीं . मरने को ही ये जगह मिल जाये तो यही जन्नत है।
शुक्रवार, 26 अक्टूबर 2007
ज़ख्मी पांवों और बुलंद हौसलों का शहर.....बंबई
ज़ख्मी पांवों और बुलंद हौसलों का शहर.....बंबई
बंबई.. बॉम्बे... मुंबई.. . मुम्बाई.. ...जितने नाम हैं मुंबई के, उससे कई गुना चेहरे हैं इस मायावी नगरी के.. सपनों का शहर.. सबके सपने पूरे करने वाला शहर.. सबके सपने चूर चूर करने वाला शहर.... बार बार सपनों में आने वाला शहर .. तरह तरह से लुभाने, भरमाने और ललचाने वाला शहर और अपने पास बुला कर पूरी तरह भुला देने वाला शहर....टूटे सपनों की एक बहुत बड़ी, विशाल और रोजाना बड़ी होती जाती आकाश को छूती कब्रगाह ....टूटे बिखरे सपनों और टूटे दिल वाले ज़िंदा - मुरदा इन्सानों का हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा मकबरा..निदा फाज़ली के शब्दों में हादसों का शहर... हौले हौले सांस लेता, धड़कता बेदिल मुंबई का दिल जिसे इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं कि यहां कौन जीता है और कौन मरता है.. आप ज़िंदा हैं या कल रात मर गये यह जानने की किसे फुर्सत....।
तो ...क्या है बंबई या नये मुहावरे में कहें तो मुंबई.. कौन - सा चेहरा सच्चा है इसका और कौन सा झूठा.. किस चेहरे पर विश्वास करें और किस चेहरे से बच कर रहें कि दिन-दहाड़े खुली आंखों धोखा न खा जायें.. ऐ बाबू ज़रा बच .. संभल के ... हां सुना नहीं क्या ....ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां .... कहीं पत्ता, कहीं सट्टा.. कहीं जूआ कहीं रेस.. कहीं टमटम.. कहीं ट्रामें कहीं मोटर कहीं रेल...ज़रा हट के ज़रा बच के ये है बांबे मेरी जान.. . तो ... कौन सी मुंबई और किसकी बंबई है ? किसकी सगी और किसकी पराई.. किन शर्तों पर मेरी और किन शर्तों पर आपकी... और कितनी देर के लिए ..कब अपनायेगी और कब छूट जायेगी समंदर किनारे की रेत की मानिंद हथेलियों से बंबई। कब हंसायेगी और कब तक रुलायेगी मुंबई ....। कितने इम्तिहान लेगी ये बंबई ..!
यह वही मुंबई है ना जहां एक वक्त के फिल्मों के बेताज बादशाह भगवान दादा, जिनका जुहू पर 25 कमरे का आलीशान घर हुआ करता था, मरने से पहले अपने आखिरी दिनों तक तीस तीस सेकेण्ड के रोल पाने के लिए दिन भर जूनियर कलाकारों की भीड़ में खड़े रहते थे।.. यह वही मुंबई है ना जहां बोझा ढोने और फुटपाथ पर सोने वाला एक मामूली सा कुली हाजी मस्तान अंडर वर्ल्ड का किंग बन जाता है और जिसके जीवन पर बनी फिल्म में हिन्दी सिनेमा का अब तक का सबसे बड़ा कलाकार अमिताभ बच्चन रोल अदा करता है। अपने वक्त के सबसे बड़े, मशहूर और स्थापित कितने ही लेखकों, गीतकारों, अभिनेताओं और दूसरी सफल हस्तियों को इसी नगरिया ने संघर्ष के दिनों में फुटपाथ पर सुलाया है, वड़ा पाव खिला कर अपना संघर्ष और अपनी कोशिशें जारी रखने की हिम्मत दी है और उनके कान में सफलता का यह मंत्र फूंका है - जो कुछ हासिल करना है, यहीं पर करना है। वापिस लौटना भी चाहो तो कौन सा मुंह ले कर जाओगे? और वे यहीं पर रह गये और सफल हो कर दिखाया।
इस शहर की किसी डायरी में यह बात दर्ज नहीं है कि यहां कितने लोग खाली हाथ और बुलंद हौसले लेकर आये थे और उन्होंने अपनी मेहनत और काबलियत के बल पर एक दिन अपने सारे सपने सच करके दिखाये। यह बात भी किसी की डायरी में दर्ज नहीं है कि कितने लोग यहां बेशुमार दौलत ले कर आये और रातों रात फुटपाथ पर आ गये।...और बदकिस्मती से यह वही नगरी है जहां टूटे सपनों की किरचों से हर दूसरी रूह, हर आत्मा और हर जिस्म जख्मी है। मशहूर शायर शहरयार ने इस शहर के ही बारे में तो कहा था ना .. सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यूं है .. इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है.
कुछ भी हो आखिर बंबई .. बंबई ही है। जो किसी की भी नहीं फिर भी सबकी है। जिसका कोई नहीं उसकी बंबई है। जिसके पास कुछ भी नहीं और सिर्फ बंबई है उसे भी रात को भूखा सोने की ज़रूरत नहीं। बंबई उसे अपनी रात की बांहों में ज़रूर पनाह देगी और आधे पेट ही सही, रोटी भी देगी। जिसके सिर पर छत नहीं उसे भी बंबई अपनी अपना लेती है। ख्वाजा अहमद अब्बास ने ऐसे ही तो नहीं कहा था - रहने को घर नहीं है सारा जहां हमारा....।
बंबई का ग्लैमर, यहां का शो-बिजिनेस, यहां की शानो-शौकत और यहां की बेइंतहां दौलत सबको अपनी तरफ खींचती है, बुलाती है और न्यौता देती है हिम्मत है तो कुछ बन कर दिखाओ। ये सब कुछ तुम्हारा भी हो सकता है। सिर्फ हासिल करना आना चाहिये। आंकड़े बताते हैं कि इस शहर में सपने खरीदने रोजाना तीन सौ से लेकर चार सौ तक लड़कियां और इतने ही लड़के रोजाना आते हैं। किसी भी तरह की रोजी रोटी की तलाश में आने वाले दूसरे लोगों की संख्या तो इनसे ज्यादा ही है। वैसे आंकड़े तो ये भी बताते हैं कि जो भी इस शख्स इस शहर के मिज़ाज को नहीं पहचान पाता, या अपनी हैसियन से ज्यादा ऊंचे सपने देखना शुरू कर देता है तो वापिस तो वह भी नहीं जाता। या तो वह शहर की लाखों की भीड़ में हमेशा हमेशा के लिए गुम हो जाता है या किसी दिन लोकल ट्रेन के नीचे कट कर मुक्ति पा लेता है। लोकल ट्रेनें बेशक इस नगर की धड़कन हैं। एक दिन भी लोकल गाड़ियां बंद हुईं नहीं कि शहर का दम घुटने लगता है और यूं लगने लगता है कि अब गया और तब गया। सपनों के बाज़ार में लुटे पिटे कितने ही लोग इन्हीं लोकल गाड़ियों से मुक्ति मांगते हैं। शहर में मरने का सबसे आसान और गारंटीशुदा तरीका। जो एक ही किस्त में मरने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, वे फिर शहर के किसी भी बीयर बार में, दारू के अड्डे में या नशे के किसी और अड्डे पर, कहीं भी अपना ग़म गलत करते हुए किस्तों में मरते हैं लेकिन वे उन सपनों का भूल कर भी ज़िक्र नहीं करेंगे जो कभी उन्हें खींच कर यहां लाये थे। इसी शहर में रंगीन और चकाचौंध से भरे सपनों की तलाश में रोज़ाना अलग अलग रूटों, गाड़ियों, बसों पर सवार और आश्वासनों की पोटली लिये यहां आने वाली या लायी जाने वाली सैकड़ों लड़कियां आखिर कहां जाती या पहुंचा दी जाती हैं, कहने की ज़रूरत नहीं है।
दरअसल बंबई चरम सीमाओं का शहर है। इस पार या उस पार। बिलकुल इधर या बिलकुल उधर। बीच वालों के लिए कोई जगह नहीं है यहां। आप कुछ भी करें यहां, आप या तो सबसे आगे रहना होगा या सबसे पीछे। बीच में रहेंगे तो आगे वाले आगे नहीं आने देंगे और पीछे वाले धक्का देंगे। या तो आप के सामने पूरा आसमान होना चाहिये या पीठ पीछे दीवार तभी आप इस शहर में ज़िंदा रह पायेंगे।
बंबई विरोधाभासों का शहर है। देश का सबसे बड़ा कॉस्मोपॉलिटन शहर आपकी प्राइवेसी की खूब कद्र करता है, इतनी ज्यादा कि आप न जानना चाहें तो ज़िंदगी भर आपको अपने पड़ोसी का नाम भी पता न चले और आप किसी से बोलना बतियाना चाहें तो कोई भी नहीं मिलेगा और आपको पागल कर देने वाली भीड़ में भी इतना अकेलापन दे देगा कि आप किसी से दो मीठे बोल बोलने के लिए तरस जायें। यह इसी शहर में हो सकता है कि यहां के मूल बाशिंदे ज़िंदगी की छोटी छोटी ज़रूरतों के लिए लगातार संघर्ष करते रहें और बाहर वाले आ कर अपनी किस्मत का सितारा बुलंदी तक ले जायें। यह बात यहां के हर क्षेत्र में देखी जा सकती है।
यह भी इसी शहर में होता है कि आप पीढ़ियों से यहां रहते हुए भी अपनी मूल पहचान को बनाये रख सकते हैं और बिना मराठी सीखे सैकड़ों साल यहां आराम से गुज़ार सकते हैं।
कितनी अजीब बात है कि यहां अगर कोई शख्स बिलकुल भी शिकायत नहीं करता और हर हाल में खाता पीता मस्त रहता है वह है फुटपाथ पर रहने वाला आदमी..। उसे किसी से कोई शिकायत नहीं। उसके पास न छत है न फर्श.. वह कहीं भी टीन टप्पर डाल कर सो जाता है। टीन टप्पर नहीं तो ये मेरा आसमान तो है..पानी नहीं तो कोई बात नहीं आसपास गटर तो होगा, उसी में से निकाल कर पी लेंगे। कुछ नहीं होता हमारे बच्चों को । वे बीमार वीमार होने लगे तो हो चुका काम...। इसी गटर के पानी में नहा भी लेंगे, कपड़े भी धो लेंगे और खाना भी बना लेंगे। और तो और कहीं पीने पिलाने का प्रोग्राम बन गया तो शराब में पानी भी इसी गटर का ही मिलाया जायेगा। उसके बाद खाना है तो ठीक वरना इसी एकाध नौटांक के नशे पर ही गा बजा कर, गाली गलौज करके वहीं गिर पड़ कर रात गुजार लेंगे। ज़िंदगी की निहायत व्यक्तिगत जरूरतों के लिए प्रायवेसी नहीं तो कोई बात नहीं। जब ऊपर वाले ने कुछ दिया ही नहीं तो किससे शर्म और कैसी शर्म...। न उसे सचिन की अगली सेंचुरी का तनाव, न पाकिस्तान से भारत के टेस्ट मैच हार जाने की चिंता, न डॉलर के रेट बढ़ जाने की चिंता और न इन्कम टैक्स रेड की चिंता। उसे न इस बात की चिंता कि अपनी बीबी को साड़ी से मैचिंग लिपस्टिक नहीं दिलवा पाया और न इस बात की ंिचंता कि मेडिकल में अपने लड़के के लिए इतना डोनेशन कहां से लाये....।
कितने मामूली सपने ले कर आता है वह इस शहर में और कितना मस्त रहता है।
तो इसका मतलब यही हुआ न कि जितना बड़ा सपना उतनी ही बड़ी छलांग और उतनी ही बड़ी दुनिया आपके कदमों के तले। और जितना बड़ा सपना टूटेगा उतनी ही बड़ी किरचें चुभेंगी और उतना ही ज्यादा लहू बहेगा।
मुंबई इसी का नाम है। हर आदमी के लिए अलग मायने रखती है मुंबई। सबको संघर्ष करने के लिए बुलाती है बंबई लेकिन सबको उनका हिस्सा नहीं देती। बहुत बेमुरव्वत है बंबई। बहुत रुलाती, तड़पाती और सताती है बंबई। लेकिन फिर भी जाने क्या कशिश है इसकी सर जमीं में कि वापिस ही नहीं जाने देती। न सफल आदमी को न असफल आदमी को। दोनों यहीं के हो कर रह जाते हैं और यहीं जीने मरने को अभिशप्त होते हैं।
सफलताओं और असफलताओं की कितनी कहानियां रोज़ लिखी जाती हैं अरब सागर के किनारे की रेती पर और कितने सपने रोज़ खरीदे , बेचे और भुनाये जाते हैं यहां। कोई नहीं देखता कि कितनी लड़कियां रोज यहां सपनों की तलाश में आती हैं और कितने दिन में टूटे बिखरे सपनों की अर्थी अपने कमज़ोर कांधों पर लिये वे हमेशा हमेशा के लिए कहां गुम हो जाती हैं। कितने सपनों के सौदागर यहां चौराहे चौराहे अपनी दुकाने सजाये बैठे हैं, कोई गिनती नहीं। अपने मकान के सपना.. अपने घर का सपना ... कैरियर का सपना.., प्यार भरे दो बोल सुन लेने के सपना .. किसी को अपना बना लेने का सपना और किसी का बन जाने का सपना...कुछ कह सुन लेने का सपना, दुनिया की चोटी पर बिठा देने का, दो वक्त की इज्जत की रोटी का सपना..कुछ कर दिखाने का सपना, यह सपना और वह सपना.... यहां कोई सपनों का हिसाब किताब नहीं रखता..। एक बार किसी ने नाथू राम गोडसे से पूछा था - क्या आपने इससे पहले भी बापू को मारने की कोशिश की थी तो उसने जवाब दिया था - जब हम किसी को यह बताते हैं कि हमारे कितने बच्चे हैं तो हम अपनी बीवी के अबार्शनों की संख्या नहीं बताते।
यह शहर भी आपके टूटे, बिखरे चूर चूर हुए सपनों का, आपकी असफलताओं का कोई हिसाब किताब नहीं रखता। हिसाब पूछता भी नहीं। यह भी नहीं पूछता कि आप यहां तक कैसे पहुंचे.. बस.. मायने यह रखता है कि आप कहां से चल कर आये थे और कहां तक पहुंच कर दिखाया। अगर आपने कुछ कर दिखाया है तो शहर सुबह उठ कर पहला सलाम आपको ही को करेगा वरना सुबह सुबह जुहू और चौपाटी पर अरब सागर की लहरें आपका लंगोट तक बहा ले जायेंगी और आपको पता भी नहीं चलेगा।
तो यही बंबई आपके पास चल कर आती है सपनों की बातें करने। आपके पास कलकत्ता आता है रवीद्र बाबू के ज़रिये, शरत और सत्यजीत राय के जरिये, संगीत और सौन्दर्य के जरिये। आपके पास रूस आता है तॉलस्ताय, गोर्की और चेखव के ज़रिये। और भी कई शहर आतें हैं किसी न किसी वजह से। सिर्फ बंबई ही आती है सिर्फ सपने ले कर। भरमाने वाले सपने ले कर। जो बंबई फिल्में परोसती हैं या टीवी सीरियल वाले परोसते हैं या सपने दिखाने वाले परोसते हैं उसकी सच्चाई से सब वाकिफ़ हैं और ऐसी बंबई के आप तक पहुंचने या न पहुंचने के बीच कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। वे भी तो सपने ही परोसते हैं। चिकने चमकीले सपने। उन सपनों की बंबई असली बंबई नहीं होती।
आपको अपनी बंबई देखनी हो तो खुद आना होगा उस तक । चल कर। अपनी शर्तों पर नहीं, उसकी शर्तों परे। बंबई आपको अपनाये या नहीं, ये आप पर उतना ही निर्भर करता है जितना बंबई पर कि वह आपको स्वीकारे या नहीं।
आमीन
सूरज प्रकाश
बंबई.. बॉम्बे... मुंबई.. . मुम्बाई.. ...जितने नाम हैं मुंबई के, उससे कई गुना चेहरे हैं इस मायावी नगरी के.. सपनों का शहर.. सबके सपने पूरे करने वाला शहर.. सबके सपने चूर चूर करने वाला शहर.... बार बार सपनों में आने वाला शहर .. तरह तरह से लुभाने, भरमाने और ललचाने वाला शहर और अपने पास बुला कर पूरी तरह भुला देने वाला शहर....टूटे सपनों की एक बहुत बड़ी, विशाल और रोजाना बड़ी होती जाती आकाश को छूती कब्रगाह ....टूटे बिखरे सपनों और टूटे दिल वाले ज़िंदा - मुरदा इन्सानों का हिन्दुस्तान का सबसे बड़ा मकबरा..निदा फाज़ली के शब्दों में हादसों का शहर... हौले हौले सांस लेता, धड़कता बेदिल मुंबई का दिल जिसे इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं कि यहां कौन जीता है और कौन मरता है.. आप ज़िंदा हैं या कल रात मर गये यह जानने की किसे फुर्सत....।
तो ...क्या है बंबई या नये मुहावरे में कहें तो मुंबई.. कौन - सा चेहरा सच्चा है इसका और कौन सा झूठा.. किस चेहरे पर विश्वास करें और किस चेहरे से बच कर रहें कि दिन-दहाड़े खुली आंखों धोखा न खा जायें.. ऐ बाबू ज़रा बच .. संभल के ... हां सुना नहीं क्या ....ऐ दिल है मुश्किल जीना यहां .... कहीं पत्ता, कहीं सट्टा.. कहीं जूआ कहीं रेस.. कहीं टमटम.. कहीं ट्रामें कहीं मोटर कहीं रेल...ज़रा हट के ज़रा बच के ये है बांबे मेरी जान.. . तो ... कौन सी मुंबई और किसकी बंबई है ? किसकी सगी और किसकी पराई.. किन शर्तों पर मेरी और किन शर्तों पर आपकी... और कितनी देर के लिए ..कब अपनायेगी और कब छूट जायेगी समंदर किनारे की रेत की मानिंद हथेलियों से बंबई। कब हंसायेगी और कब तक रुलायेगी मुंबई ....। कितने इम्तिहान लेगी ये बंबई ..!
यह वही मुंबई है ना जहां एक वक्त के फिल्मों के बेताज बादशाह भगवान दादा, जिनका जुहू पर 25 कमरे का आलीशान घर हुआ करता था, मरने से पहले अपने आखिरी दिनों तक तीस तीस सेकेण्ड के रोल पाने के लिए दिन भर जूनियर कलाकारों की भीड़ में खड़े रहते थे।.. यह वही मुंबई है ना जहां बोझा ढोने और फुटपाथ पर सोने वाला एक मामूली सा कुली हाजी मस्तान अंडर वर्ल्ड का किंग बन जाता है और जिसके जीवन पर बनी फिल्म में हिन्दी सिनेमा का अब तक का सबसे बड़ा कलाकार अमिताभ बच्चन रोल अदा करता है। अपने वक्त के सबसे बड़े, मशहूर और स्थापित कितने ही लेखकों, गीतकारों, अभिनेताओं और दूसरी सफल हस्तियों को इसी नगरिया ने संघर्ष के दिनों में फुटपाथ पर सुलाया है, वड़ा पाव खिला कर अपना संघर्ष और अपनी कोशिशें जारी रखने की हिम्मत दी है और उनके कान में सफलता का यह मंत्र फूंका है - जो कुछ हासिल करना है, यहीं पर करना है। वापिस लौटना भी चाहो तो कौन सा मुंह ले कर जाओगे? और वे यहीं पर रह गये और सफल हो कर दिखाया।
इस शहर की किसी डायरी में यह बात दर्ज नहीं है कि यहां कितने लोग खाली हाथ और बुलंद हौसले लेकर आये थे और उन्होंने अपनी मेहनत और काबलियत के बल पर एक दिन अपने सारे सपने सच करके दिखाये। यह बात भी किसी की डायरी में दर्ज नहीं है कि कितने लोग यहां बेशुमार दौलत ले कर आये और रातों रात फुटपाथ पर आ गये।...और बदकिस्मती से यह वही नगरी है जहां टूटे सपनों की किरचों से हर दूसरी रूह, हर आत्मा और हर जिस्म जख्मी है। मशहूर शायर शहरयार ने इस शहर के ही बारे में तो कहा था ना .. सीने में जलन, आंखों में तूफान सा क्यूं है .. इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूं है.
कुछ भी हो आखिर बंबई .. बंबई ही है। जो किसी की भी नहीं फिर भी सबकी है। जिसका कोई नहीं उसकी बंबई है। जिसके पास कुछ भी नहीं और सिर्फ बंबई है उसे भी रात को भूखा सोने की ज़रूरत नहीं। बंबई उसे अपनी रात की बांहों में ज़रूर पनाह देगी और आधे पेट ही सही, रोटी भी देगी। जिसके सिर पर छत नहीं उसे भी बंबई अपनी अपना लेती है। ख्वाजा अहमद अब्बास ने ऐसे ही तो नहीं कहा था - रहने को घर नहीं है सारा जहां हमारा....।
बंबई का ग्लैमर, यहां का शो-बिजिनेस, यहां की शानो-शौकत और यहां की बेइंतहां दौलत सबको अपनी तरफ खींचती है, बुलाती है और न्यौता देती है हिम्मत है तो कुछ बन कर दिखाओ। ये सब कुछ तुम्हारा भी हो सकता है। सिर्फ हासिल करना आना चाहिये। आंकड़े बताते हैं कि इस शहर में सपने खरीदने रोजाना तीन सौ से लेकर चार सौ तक लड़कियां और इतने ही लड़के रोजाना आते हैं। किसी भी तरह की रोजी रोटी की तलाश में आने वाले दूसरे लोगों की संख्या तो इनसे ज्यादा ही है। वैसे आंकड़े तो ये भी बताते हैं कि जो भी इस शख्स इस शहर के मिज़ाज को नहीं पहचान पाता, या अपनी हैसियन से ज्यादा ऊंचे सपने देखना शुरू कर देता है तो वापिस तो वह भी नहीं जाता। या तो वह शहर की लाखों की भीड़ में हमेशा हमेशा के लिए गुम हो जाता है या किसी दिन लोकल ट्रेन के नीचे कट कर मुक्ति पा लेता है। लोकल ट्रेनें बेशक इस नगर की धड़कन हैं। एक दिन भी लोकल गाड़ियां बंद हुईं नहीं कि शहर का दम घुटने लगता है और यूं लगने लगता है कि अब गया और तब गया। सपनों के बाज़ार में लुटे पिटे कितने ही लोग इन्हीं लोकल गाड़ियों से मुक्ति मांगते हैं। शहर में मरने का सबसे आसान और गारंटीशुदा तरीका। जो एक ही किस्त में मरने की हिम्मत नहीं जुटा पाते, वे फिर शहर के किसी भी बीयर बार में, दारू के अड्डे में या नशे के किसी और अड्डे पर, कहीं भी अपना ग़म गलत करते हुए किस्तों में मरते हैं लेकिन वे उन सपनों का भूल कर भी ज़िक्र नहीं करेंगे जो कभी उन्हें खींच कर यहां लाये थे। इसी शहर में रंगीन और चकाचौंध से भरे सपनों की तलाश में रोज़ाना अलग अलग रूटों, गाड़ियों, बसों पर सवार और आश्वासनों की पोटली लिये यहां आने वाली या लायी जाने वाली सैकड़ों लड़कियां आखिर कहां जाती या पहुंचा दी जाती हैं, कहने की ज़रूरत नहीं है।
दरअसल बंबई चरम सीमाओं का शहर है। इस पार या उस पार। बिलकुल इधर या बिलकुल उधर। बीच वालों के लिए कोई जगह नहीं है यहां। आप कुछ भी करें यहां, आप या तो सबसे आगे रहना होगा या सबसे पीछे। बीच में रहेंगे तो आगे वाले आगे नहीं आने देंगे और पीछे वाले धक्का देंगे। या तो आप के सामने पूरा आसमान होना चाहिये या पीठ पीछे दीवार तभी आप इस शहर में ज़िंदा रह पायेंगे।
बंबई विरोधाभासों का शहर है। देश का सबसे बड़ा कॉस्मोपॉलिटन शहर आपकी प्राइवेसी की खूब कद्र करता है, इतनी ज्यादा कि आप न जानना चाहें तो ज़िंदगी भर आपको अपने पड़ोसी का नाम भी पता न चले और आप किसी से बोलना बतियाना चाहें तो कोई भी नहीं मिलेगा और आपको पागल कर देने वाली भीड़ में भी इतना अकेलापन दे देगा कि आप किसी से दो मीठे बोल बोलने के लिए तरस जायें। यह इसी शहर में हो सकता है कि यहां के मूल बाशिंदे ज़िंदगी की छोटी छोटी ज़रूरतों के लिए लगातार संघर्ष करते रहें और बाहर वाले आ कर अपनी किस्मत का सितारा बुलंदी तक ले जायें। यह बात यहां के हर क्षेत्र में देखी जा सकती है।
यह भी इसी शहर में होता है कि आप पीढ़ियों से यहां रहते हुए भी अपनी मूल पहचान को बनाये रख सकते हैं और बिना मराठी सीखे सैकड़ों साल यहां आराम से गुज़ार सकते हैं।
कितनी अजीब बात है कि यहां अगर कोई शख्स बिलकुल भी शिकायत नहीं करता और हर हाल में खाता पीता मस्त रहता है वह है फुटपाथ पर रहने वाला आदमी..। उसे किसी से कोई शिकायत नहीं। उसके पास न छत है न फर्श.. वह कहीं भी टीन टप्पर डाल कर सो जाता है। टीन टप्पर नहीं तो ये मेरा आसमान तो है..पानी नहीं तो कोई बात नहीं आसपास गटर तो होगा, उसी में से निकाल कर पी लेंगे। कुछ नहीं होता हमारे बच्चों को । वे बीमार वीमार होने लगे तो हो चुका काम...। इसी गटर के पानी में नहा भी लेंगे, कपड़े भी धो लेंगे और खाना भी बना लेंगे। और तो और कहीं पीने पिलाने का प्रोग्राम बन गया तो शराब में पानी भी इसी गटर का ही मिलाया जायेगा। उसके बाद खाना है तो ठीक वरना इसी एकाध नौटांक के नशे पर ही गा बजा कर, गाली गलौज करके वहीं गिर पड़ कर रात गुजार लेंगे। ज़िंदगी की निहायत व्यक्तिगत जरूरतों के लिए प्रायवेसी नहीं तो कोई बात नहीं। जब ऊपर वाले ने कुछ दिया ही नहीं तो किससे शर्म और कैसी शर्म...। न उसे सचिन की अगली सेंचुरी का तनाव, न पाकिस्तान से भारत के टेस्ट मैच हार जाने की चिंता, न डॉलर के रेट बढ़ जाने की चिंता और न इन्कम टैक्स रेड की चिंता। उसे न इस बात की चिंता कि अपनी बीबी को साड़ी से मैचिंग लिपस्टिक नहीं दिलवा पाया और न इस बात की ंिचंता कि मेडिकल में अपने लड़के के लिए इतना डोनेशन कहां से लाये....।
कितने मामूली सपने ले कर आता है वह इस शहर में और कितना मस्त रहता है।
तो इसका मतलब यही हुआ न कि जितना बड़ा सपना उतनी ही बड़ी छलांग और उतनी ही बड़ी दुनिया आपके कदमों के तले। और जितना बड़ा सपना टूटेगा उतनी ही बड़ी किरचें चुभेंगी और उतना ही ज्यादा लहू बहेगा।
मुंबई इसी का नाम है। हर आदमी के लिए अलग मायने रखती है मुंबई। सबको संघर्ष करने के लिए बुलाती है बंबई लेकिन सबको उनका हिस्सा नहीं देती। बहुत बेमुरव्वत है बंबई। बहुत रुलाती, तड़पाती और सताती है बंबई। लेकिन फिर भी जाने क्या कशिश है इसकी सर जमीं में कि वापिस ही नहीं जाने देती। न सफल आदमी को न असफल आदमी को। दोनों यहीं के हो कर रह जाते हैं और यहीं जीने मरने को अभिशप्त होते हैं।
सफलताओं और असफलताओं की कितनी कहानियां रोज़ लिखी जाती हैं अरब सागर के किनारे की रेती पर और कितने सपने रोज़ खरीदे , बेचे और भुनाये जाते हैं यहां। कोई नहीं देखता कि कितनी लड़कियां रोज यहां सपनों की तलाश में आती हैं और कितने दिन में टूटे बिखरे सपनों की अर्थी अपने कमज़ोर कांधों पर लिये वे हमेशा हमेशा के लिए कहां गुम हो जाती हैं। कितने सपनों के सौदागर यहां चौराहे चौराहे अपनी दुकाने सजाये बैठे हैं, कोई गिनती नहीं। अपने मकान के सपना.. अपने घर का सपना ... कैरियर का सपना.., प्यार भरे दो बोल सुन लेने के सपना .. किसी को अपना बना लेने का सपना और किसी का बन जाने का सपना...कुछ कह सुन लेने का सपना, दुनिया की चोटी पर बिठा देने का, दो वक्त की इज्जत की रोटी का सपना..कुछ कर दिखाने का सपना, यह सपना और वह सपना.... यहां कोई सपनों का हिसाब किताब नहीं रखता..। एक बार किसी ने नाथू राम गोडसे से पूछा था - क्या आपने इससे पहले भी बापू को मारने की कोशिश की थी तो उसने जवाब दिया था - जब हम किसी को यह बताते हैं कि हमारे कितने बच्चे हैं तो हम अपनी बीवी के अबार्शनों की संख्या नहीं बताते।
यह शहर भी आपके टूटे, बिखरे चूर चूर हुए सपनों का, आपकी असफलताओं का कोई हिसाब किताब नहीं रखता। हिसाब पूछता भी नहीं। यह भी नहीं पूछता कि आप यहां तक कैसे पहुंचे.. बस.. मायने यह रखता है कि आप कहां से चल कर आये थे और कहां तक पहुंच कर दिखाया। अगर आपने कुछ कर दिखाया है तो शहर सुबह उठ कर पहला सलाम आपको ही को करेगा वरना सुबह सुबह जुहू और चौपाटी पर अरब सागर की लहरें आपका लंगोट तक बहा ले जायेंगी और आपको पता भी नहीं चलेगा।
तो यही बंबई आपके पास चल कर आती है सपनों की बातें करने। आपके पास कलकत्ता आता है रवीद्र बाबू के ज़रिये, शरत और सत्यजीत राय के जरिये, संगीत और सौन्दर्य के जरिये। आपके पास रूस आता है तॉलस्ताय, गोर्की और चेखव के ज़रिये। और भी कई शहर आतें हैं किसी न किसी वजह से। सिर्फ बंबई ही आती है सिर्फ सपने ले कर। भरमाने वाले सपने ले कर। जो बंबई फिल्में परोसती हैं या टीवी सीरियल वाले परोसते हैं या सपने दिखाने वाले परोसते हैं उसकी सच्चाई से सब वाकिफ़ हैं और ऐसी बंबई के आप तक पहुंचने या न पहुंचने के बीच कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। वे भी तो सपने ही परोसते हैं। चिकने चमकीले सपने। उन सपनों की बंबई असली बंबई नहीं होती।
आपको अपनी बंबई देखनी हो तो खुद आना होगा उस तक । चल कर। अपनी शर्तों पर नहीं, उसकी शर्तों परे। बंबई आपको अपनाये या नहीं, ये आप पर उतना ही निर्भर करता है जितना बंबई पर कि वह आपको स्वीकारे या नहीं।
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