हमारी एक मित्र हैं रत्ना वर्मा। रायपुर में रहती हैं और बरसों तक वहां इतवारी पत्रिका संभालती रही हैं। इधर वे एक बहुत ही शानदार पत्रिका ले कर हाजिर हुई हैं। नाम है उदंती.com।
आप निश्चित ही उदंती का मतलब भी पूछना चाहेंगे। मैंने भी पूछा था। उदंती दरअसल रायपुर के पास बहने वाली एक नदी का नाम है और इस नदी के तट पर इसी नाम का एक पक्षी विहार है।
36 पन्ने की इस पत्रिका की कई खासियतें हैं। पहली तो यही ही ये वेब पर udanti.com पर उपलब्ध होने के अलावा सचमुच की पत्रिका के रूप में प्रकाशित भी होती है। अब तक इसके तीन अंक आ चुके हैं। पत्रिका की दूसरी खूबी है इसका उत्तम कला पक्ष। शानदार आर्ट पेपर पर छपी पत्रिका का एक एक पन्ना जिन मेहनत और कलात्मक अभिरुचि से संजोया गया है, उसका बयान नहीं किया जा सकता।
तीसरा उल्लेखीय पक्ष इस पत्रिका का ये है कि इसमें लोककलाओं, कलाओं, लोक जीवन और संस्कृति को, चाहे वह छत्तीसगढ़ की हो या कहीं और की, खास तौर पर कलात्मक ढंग से सामने लाने की कोशिश की गयी है। रत्ना जी जल्द ही पत्रिका के सेंट्रल स्प्रेड पर ग़ज़लें, कविताएं, गीत और लघुकथाएं शुरू करने वाली हैं।
पत्रिका का ग्राहक बनने और रचनाएं भेजने के लिए पता है- udanti.com@gmail.com। आप रत्ना जी से इस पते पर भी सम्पर्क कर सकते हैं-
संपादक उदंती.com
माती'ज गैलरी जीवन बीमा मार्ग पंढरी, रायपुर
छत्तीसगझ़ 492004
शनिवार, 25 अक्टूबर 2008
सोमवार, 20 अक्टूबर 2008
इंदु शर्मा कथा सम्मान 2009 के लिए नामांकन
20 अक्तूबर 2008
इंदु शर्मा कथा सम्मान 2009 के लिए नामांकन
प्रिय मित्र
आप जानते ही हैं कि पिछले चौदह बरस के दौरान इंदु शर्मा कथा सम्मान ने अपनी चयन प्रव्रिᆬया, पारदर्शिता तथा समकालीन श्रेष्ठ साहित्य के प्रति अपनी आस्था और सम्मान भावना के कारण न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति आर्जत की है। 1995 से 1999 तक मुंबई में इंदु शर्मा कथा सम्मान क्रमशः गीतांजलिश्री, धीरेन्द्र अस्थाना, अखिलेश, देवेन्द्र और मनोज रूपड़ा को दिये जाने के बाद से सम्मान कथा यूके के बैनर तले लंदन में सुश्री चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, वी एन राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी और नासिरा शर्मा को दिये गये।
पुरस्कार की चयन प्रक्रिया में औेर अधिक पारदर्शिता लाने की दृष्टि से हम हर वर्ष देश भर में हिन्दी के सभी वरिष्ठ और सम्मानित कथाकारों, संपादकों और प्रकाशकों आदि से अनुरोध करते आ रहे हैं कि वे पिछले तीन बरस में प्रकाशित अपनी पसंद की तीन पुस्तकों की अनुशंसा करें। इन्हीं अनुशंसाओं के आधार पर ही पिछले आठ बरस से ये सम्मान दिये जा रहे हैं।
आप जानते ही हैं कि इस सम्मान के अंतर्गत चयन किये गये रचनाकार को लंदन आने जाने का हवाई जहाज का टिकट, एयरपोर्ट टैक्स, वीजा शुल्क आदि दिये जाते हैं और लंदन में एक सप्ताह तक उनके घूमने और रहने की व्यवस्था की जाती है तथा एक भव्य समारोह में मुख्य अतिथि के हाथों शील्ड, सम्मान पत्र और श्रीफल आदि दिये जाते हैं। सम्मान कार्यक्रम आम तौर पर जून के आस पास होता है। यह मौसम लंदन के हिसाब से सबसे बढ़िया रहता है।
हम चाहते हैं कि इस पुरस्कार के लिए समकालीन श्रेष्ठ साहित्य की चयन प्रक्रिया में आप बराबर के सहभागी बनें। इधर के तीन बरसों (2006 से 2008) के दौरान प्रकाशित, चर्चित, प्रशंसित और आलोचकों और पाठकों द्वारा सराही गयी कहानी अथवा उपन्यास विधा की किन्हीं तीन ऐसी पुस्तकों के नाम सुझायें जो आपकी निगाह में पुरस्कार के योग्य ठहरती हों।
आपकी राय हमें पहली जनवरी 2009 तक मिल जाये तो हम आपके बहुत आभारी होंगे। वैसे तो हम आपके द्वारा सुझायी पुस्तकों के अलावा अपने स्वयं के अध्ययन के जरिये पुस्तकें खुद खरीदते हैं। कई बार कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें भी हमारी निगाह में आ नहीं पातीं या हमें मिल नहीं पातीं। यदि आपको लगे कि कोई खास किताब हम तक जरूर पहुंचे तो आप ऐसी पुस्तक के बारे में हमें बता सकते हैं या उसकी एक प्रति भिजवा सकते हैं। जरूरत की अन्य प्रतियां हम मूल्य दे कर मंगवा लेंगे।
त्यौेहारों की शुभकामनाओं सहित,
आपका ही
सूरज प्रकाश
कथा यूके के भारतीय प्रतिनिधि
09860094402
इंदु शर्मा कथा सम्मान 2009 के लिए नामांकन
प्रिय मित्र
आप जानते ही हैं कि पिछले चौदह बरस के दौरान इंदु शर्मा कथा सम्मान ने अपनी चयन प्रव्रिᆬया, पारदर्शिता तथा समकालीन श्रेष्ठ साहित्य के प्रति अपनी आस्था और सम्मान भावना के कारण न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति आर्जत की है। 1995 से 1999 तक मुंबई में इंदु शर्मा कथा सम्मान क्रमशः गीतांजलिश्री, धीरेन्द्र अस्थाना, अखिलेश, देवेन्द्र और मनोज रूपड़ा को दिये जाने के बाद से सम्मान कथा यूके के बैनर तले लंदन में सुश्री चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, वी एन राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी और नासिरा शर्मा को दिये गये।
पुरस्कार की चयन प्रक्रिया में औेर अधिक पारदर्शिता लाने की दृष्टि से हम हर वर्ष देश भर में हिन्दी के सभी वरिष्ठ और सम्मानित कथाकारों, संपादकों और प्रकाशकों आदि से अनुरोध करते आ रहे हैं कि वे पिछले तीन बरस में प्रकाशित अपनी पसंद की तीन पुस्तकों की अनुशंसा करें। इन्हीं अनुशंसाओं के आधार पर ही पिछले आठ बरस से ये सम्मान दिये जा रहे हैं।
आप जानते ही हैं कि इस सम्मान के अंतर्गत चयन किये गये रचनाकार को लंदन आने जाने का हवाई जहाज का टिकट, एयरपोर्ट टैक्स, वीजा शुल्क आदि दिये जाते हैं और लंदन में एक सप्ताह तक उनके घूमने और रहने की व्यवस्था की जाती है तथा एक भव्य समारोह में मुख्य अतिथि के हाथों शील्ड, सम्मान पत्र और श्रीफल आदि दिये जाते हैं। सम्मान कार्यक्रम आम तौर पर जून के आस पास होता है। यह मौसम लंदन के हिसाब से सबसे बढ़िया रहता है।
हम चाहते हैं कि इस पुरस्कार के लिए समकालीन श्रेष्ठ साहित्य की चयन प्रक्रिया में आप बराबर के सहभागी बनें। इधर के तीन बरसों (2006 से 2008) के दौरान प्रकाशित, चर्चित, प्रशंसित और आलोचकों और पाठकों द्वारा सराही गयी कहानी अथवा उपन्यास विधा की किन्हीं तीन ऐसी पुस्तकों के नाम सुझायें जो आपकी निगाह में पुरस्कार के योग्य ठहरती हों।
आपकी राय हमें पहली जनवरी 2009 तक मिल जाये तो हम आपके बहुत आभारी होंगे। वैसे तो हम आपके द्वारा सुझायी पुस्तकों के अलावा अपने स्वयं के अध्ययन के जरिये पुस्तकें खुद खरीदते हैं। कई बार कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें भी हमारी निगाह में आ नहीं पातीं या हमें मिल नहीं पातीं। यदि आपको लगे कि कोई खास किताब हम तक जरूर पहुंचे तो आप ऐसी पुस्तक के बारे में हमें बता सकते हैं या उसकी एक प्रति भिजवा सकते हैं। जरूरत की अन्य प्रतियां हम मूल्य दे कर मंगवा लेंगे।
त्यौेहारों की शुभकामनाओं सहित,
आपका ही
सूरज प्रकाश
कथा यूके के भारतीय प्रतिनिधि
09860094402
शुक्रवार, 12 सितंबर 2008
कबाड़खाना.ब्लागस्पाट.कॉम पर किताबों की दुनिया पर मेरी पोस्ट
अच्छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं - मेरी ये पोस्ट पढि़ये kabaadkhaana.blogspot.com पर. आपकी राय का इंतज़ार रहेगा
सूरज प्रकाश
सूरज प्रकाश
गुरुवार, 4 सितंबर 2008
17वीं पुण्य तिथि पर शरद जोशी को याद करते हुए

बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा लेखक होना बेहतर है.
आदमी के पास अगर दो विकल्प हों कि वह या तो बड़ा अफसर बन जाये और खूब मज़े करे या फिर छोटा मोटा लेखक बन कर अपने मन की बात कहने की आज़ादी अपने पास रखे तो भई, बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा सा लेखक होना ज्यादा मायने रखता है. हो सकता है आपकी अफसरी आपको बहुत सारे फायदे देने की स्थिति में हो तो भी एक बात याद रखनी चाहिये कि एक न एक दिन अफसर को रिटायर होना होता है. इसका मतलब यही हुआ न कि अफसरी से मिलने वाले सारे फायदे एक झटके में बंद हो जायेंगे, जबकि लेखक कभी रिटायर नहीं होता. एक बार आप लेखक हो गये तो आप हमेशा लेखक ही होते हैं. अपने मन के राजा. आपको लिखने से कोई रिटायर नहीं कर सकता.
लेखक के पक्ष में एक और बात जाती है कि उसके नाम के आगे कभी स्वर्गीय नहीं लिखा जाता. हम कभी नहीं कहते कि हम स्वर्गीय कबीर के दोहे पढ़ रहे हैं या स्वर्गीय प्रेमचंद बहुत बड़े लेखक थे. लेखक सदा जीवित रहता है, भावी पीढियों की स्मृति में, मौखिक और लिखित विरासत में और वो लेखक ही होता है जो आने वाली पीढियों को अपने वक्त की सच्चाइयों के बारे में बताता है.
तो भाई मेरे, जब लेखक के हक के लिए, लेखक की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए और लेखक के सम्मान के लिए आपको पक्ष लेना हो तो आपको ऐसी अफसरी पर लात मार देनी चाहिये जो आपको ऐसा करने से रोके. आखिरकार लेखक ही तो है जो अपने वक्त को सबसे ज्यादा ईमानदारी के साथ महसूस करके कलमबद्ध करता है और कम से कम अपनी अपनी अभिव्यक्ति के मामले में झूठ नहीं बोलता.
ये और ऐसी कई बातें थीं तो शरद जोशी ने मुझसे उस वक्त कही थीं जब सचमुच मेरे सामने एक बहुत बड़ा संकट आ गया था कि मुझे तय करना था कि मुझे एक ईमानदार लेखक की अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता के पक्ष में खड़ा होना है या अपनी अफसरी बचाने के लिए अपने आकाओं के सामने घुटने टेकने हैं.
एक बहुत बड़ा हादसा हो गया था. शरद जी का भरी सभा में अपमान हो गया था. बेशक सारे एपिसोड में सीधे सीधे मुझे दोषी करार दिया जा सकता था और दोष दिया भी गया था लेकिन एक के बाद एक सारी घटनाएं इस तरह होती चली गयीं मानों सब घटनाओं का सूत्र संचालक कोई और हो और सब कुछ सुनियोजित तरीके से कर रहा हो. मैं हतप्रभ था और समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा कैसे हो गया और क्यों हो गया. बेशक शरद जी का अपमान हुआ था लेकिन मेरी भी नौकरी पर बन आयी थी.
हादसे के अगले दिन सुबह सुबह शरद जी के गोरेगांव स्थित घर जा कर जब मैं इस पूरे प्रकरण के लिए उनसे माफी मांगने आया था तो मैंने उनके सामने अपनी स्थिति स्पष्ट की थी और सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया था तो बेहद व्यथित होने के बावजूद शरद जी ने मेरी पूरी बात सुनी थी, मेरे कंधे पर हाथ रखा था और पूरे हादसे को रफा दफा करते हुए नेहा से चाय लाने के लिए कहा था..
तब उन्होंने वे सारी बातें मुझसे कहीं थीं जो मैंने इस आलेख के शुरू में कही हैं.
ये शरद जी की प्यार भरी हौसला अफजाई का ही नतीजा था कि मैंने भी तय कर लिया था कि जो होता है होने दो, मैं अपने दफ्तर में वही बयान दूंगा जो शरद जी के पक्ष में हो, बेशक मेरी नौकरी पर आंच आती है तो आये..
जिस वक्त की ये घटना है उस वक्त तक मैंने लिखना शुरू भी नहीं किया था और लगभग 34 बरस का होने के बावजूद मेरी दो चार लघुकथाओं के अलावा मेरी कोई भी रचना कहीं भी प्रकाशित नहीं हुई थी. छटपटाहट थी लेकिन लिखना शुरू नहीं हो पाया था.. शरद जी से मैं इससे पहले भी एक दो बार मिल चुका था जब वे एक्सप्रेस समूह की हिन्दी पत्रिका के संपादक के रूप में काम कर रहे थे. तब भी उन्होंने मुझे कुछ न कुछ लिखते रहने के लिए प्रेरित किया था लेकिन मैं नहीं लिख पाया तो नहीं ही लिख पाया.
जिस घटना का मैं जिक्र कर रहा हूं, उस वक्त की है जब राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे और वे देश भर में घूम घूम कर आम जनता की समस्याओं का परिचय पा रहे थे. इसी बात को ले कर शरद जी ने अपनी अत्यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय रचना पानी की समस्या को ले कर लिखी थी कि किस तरह से राजीव गांधी आम जनता से पानी को ले कर संवाद करते हैं.. मैंने मुंबई में चकल्लस के कार्यक्रम में ये रचना सुनी थी और बहुत प्रभावित हुआ था. उस दिन के चकल्लस में जितनी भी रचनाएं सुनायी गयी थीं, सबसे ज्यादा वाहवाही शरद जी ने अपनी इस रचना के कारण लूटी थी.
चकल्लस के शायद दस दिन बाद की बात होगी. हमारे संस्थान में एक राष्ट्रीय स्तर का कार्यक्रम होना था जिसके आयोजन की सारी जिम्मेवारी मेरी थी. कार्यक्रम बहुत बड़ा था और इससे जुड़े बीसियों काम थे जो मुझे ही करने थे. तभी मुझसे कहा गया कि इसी आयोजन में एक कवि सम्मेलन का भी आयोजन किया जाये और कुछ कवियों का रचना पाठ कराया जाये. मैंने अपनी समझ और अपने सम्पर्कों का सहारा लेते हुए शरद जी, शैल चतुर्वेदी, सुभाष काबरा, आस करण अटल और एक और कवि को रचना पाठ के लिए आमंत्रित किया था. शरद जी और शैल चतुर्वेदी जी को आमंत्रित करने मैं खुद उनके घर गया था. सब कुछ तय हो गया था.
मैं अपने आयोजन की तैयारियों में बुरी तरह से व्यस्त था. कार्यक्रम में मंच पर रिज़र्व बैंक के गवर्नर, उप गवर्नर, अन्य वरिष्ठ अधिकारी गण उपस्थित रहने वाले थे और सभागार में कई बैंकों के अध्यक्ष और दूसरे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद होते.
कार्यक्रम के दिन सुबह सुबह ही मुझे विभागाध्यक्ष ने बुलाया और पूछा कि कार्यक्रम में कौन कौन से कवि आ रहे हैं. मैं इस बारे में उन्हें पहले ही बता चुका था, एक बार फिर सूची दोहरा दी. तभी उन्होंने जो कुछ कहा, मेरे तो होश ही उड़ गये.
विभागाध्यक्ष महोदय ने बताया कि पिछली शाम ऑफिस बंद होने के बाद कार्यपालक निदेशक महोदय ने उन्हें बुलाया था और बुलाये जाने वाले कवियों के बारे में पूछा था. जब उन्हें बताया गया कि शरद जी भी आ रहे हैं तो कार्यपालक निदेशक ने स्पष्ट शब्दों में ये आदेश दिया कि देखें कहीं शरद जी अपनी पानी वाली रचना न सुना दें. सरकारी मंच का मामला है और कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक सहित पूरा बैंकिंग क्षेत्र मौजूद होगा, इसलिए वे किसी भी किस्म का रिस्क नहीं लेना चाहेंगे.
विभागाध्यक्ष महोदय अब चाहते थे कि मैं शरद जी को फोन करके कहूं कि वे बेशक आयें लेकिन पानी वाली रचना न पढ़ें. मेरे सामने एक बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ था. मैं जानता था कि जो काम मुझसे करने के लिए कहा जा रहा है. वह मैं कर ही नहीं सकता. शरद जी जैसे स्वाभिमानी व्यंग्यकार से ये कहना कि वे हमारे मंच से अलां रचना न पढ़ कर फलां रचना पढ़ें, मेरे लिए संभव ही नहीं था. मैं घंटे भर तक ऊभ चूभ होता रहा कि करूं तो क्या करूं. मुझे फिर केबिन में बुलवाया गया और पूछा गया कि क्या मैंने शरद जी तक संदेश पहुंचा दिया है. मैं टाल गया कि अभी मेरी बात नहीं हो पायी है. उनका नम्बर नहीं मिल रहा है.
उन दिनों हमारे विभाग में डाइरेक्ट टैलिफोन नहीं था और आपरेटर के जरिये नम्बर मांग कर किसी से बात करना बहुत धैर्य की मांग करता था. मैंने उस वक्त तो किसी वक्त टाला लेकिन कुछ न कुछ करना ही था मुझे.
मेरी डेस्क पर आयोजन की व्यवस्था से जुड़े कई काम अधूरे पड़े थे जो अगले दो तीन घंटे में पूरे करने थे. अब ऊपर से ये नयी जिम्मेवारी कि शरद जी से कहा जाये कि वे हमारे कार्यक्रम में पानी वाली रचना न सुनायें. सच तो ये था कि शरद जी से बिना बात किये भी मैं जानता था कि वे हमारे कार्यक्रम में पानी वाली रचना ही सुनायेंगे.
चूंकि उन्हें आमंत्रित मैंने ही किया था, ये काम भी मुझे ही करना था. उनसे साफ साफ कहना तो मेरे लिए असंभव ही था लेकिन बिना असली बात बताये उन्हें आने से मना तो किया ही जा सकता था. तभी मैंने तय कर लिया कि क्या करना है. मैंने शरद जी के घर का फोन नम्बर मांगा ताकि उनसे कह सकूं कि बेशक कवि सम्मेलन तो हो रहा है लेकिन हम आपको चाह कर भी नहीं सुन पायेंगे.
यहां मेरे लिए हादसे की पहली किस्त इंतज़ार कर रही थी. बताया गया कि शरद जी दिल्ली गये हुए हैं और कि उनकी फ्लाइट लगभग डेढ़ बजे आयेगी और कि वे एयरपोर्ट से सीधे ही रिज़र्व बैंक के कार्यक्रम में जायेंगे. हो गयी मुसीबत. इसका मतलब मेरे पास शरद जी को कार्यक्रम में आने से रोकने का कोई रास्ता नहीं. वे सीधे कार्यक्रम के समय पर आयेंगे और सीधे आयोजन स्थल पर पहुंचेंगे तो उनसे क्या कहा जायेगा और कैसे कहा जायेगा, ये मेरी समझ से परे था.
मैंने अपने विभागाध्यक्ष को पूरी स्थिति से अवगत करा दिया और ये भी बता दिया कि मैं जो करना चाहता था, अब नहीं कर पाऊंगा. कर ही नहीं पाऊंगा.
मैं अभी कार्यक्रम की तैयारियों में फंसा ही हुआ था कि कई बार पूछा गया कि शरद जी का क्या हुआ. मैं क्या जवाब देता. मुख्य कार्यक्रम साढ़े तीन बजे शुरू होना था और मुझे दो बजे बताया गया कि कैसे भी करके किसी बाहरी एजेंसी के माध्यम से कवि सम्मेलन की आडियो रिकार्डिंग करायी जाये.
हमारे संस्थान की एक बहुत अच्छी परम्परा थी कि आपका पोर्टफोलियो है तो सारे काम आपको खुद ही करने होंगे. कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आयेगा और न ही किसी को आपकी मदद के लिए कहा ही जायेगा. मरता क्या न करता, मैं एक दुकान से दूसरी दुकान में रिकार्डिंग की व्यवस्था कराने के लिए भागा भागा फिरा. अब तो इतने बरस बाद याद भी नहीं कि इंतज़ाम हो भी पाया था या नहीं.
मुख्य कार्यक्रम शुरू हुआ. आधा निपट भी गया और बुलाये गये पांचों कवियों में से एक भी कवि का पता नहीं. कहीं सब के सब तो दिल्ली से नहीं आ रहे.. मैं परेशान हाल कभी लिफ्ट के पास तो कभी सभागृह के दरवाजे पर. कुल 5 लिफ्टें और कम्बख्त कोई भी ऊपर नहीं आ रही. मेरी हालत खराब. कार्यक्रम किसी भी पल खत्म हो सकता था और कवि सम्मेलन शुरू करना ही होता. एक भी कवि नहीं हमारे पास.
तभी एक लिफ्ट का दरवाजा खुला और एक कवि नज़र आये. मैं उन्हें फटाफट भीतर ले गया और उनसे फुसफुसाकर कहा कि अभी कोई भी नहीं आया है. बाकियों के आने तक आप मंच संभालिये. संचालन हमारे विभागाध्यक्ष महोदय कर रहे थे. उन्होंने ज्यों ही इकलौते कवि को देखा, उनके नाम की घोषणा की दी और कवि सम्मेलन शुरू. अब मैं फिर लिफ्टों के दरवाजों के पास खड़ा बेचैनी से हाथ मलते सोच रहा था कि अब मैं किसी भी अनहोनी को नहीं रोक सकता. किसी भी तरह से नहीं.
एक लिफ्ट का दरवाजा खुला. चार मूर्तियां नज़र आयीं. शैल जी, शरद जी, सुभाष काबरा जी और एक अन्य कवि. मेरी सांस में सांस तो आयी लेकिन अब मैं शरद जी से क्या कहूं और कैसे कहूं. किसी तरह उन्हें भीतर तक लिवा ले गया. अब जो होना है, हो कर रहेगा. शरद जी ने कुर्सी पर बैठते ही कहा, सूरज भाई एक गिलास पानी तो पिलवाओ. मैं लपका एक गिलास पानी के लिए. आसपास कोई चपरासी या टी बाय नज़र नहीं आया. मैं लाउंज तक भागा ताकि खुद ही पानी ला सकूं. जब तक मैं एक गिलास पानी ले कर आया, शरद जी के नाम की घोषणा हो चुकी थी. पानी पीया उन्होंने और मंच की तरफ चले.
तय था वे पानी वाली रचना सुनायेंगे. मेरी हालत खराब. इतनी सरस रचना सुनायी जा रही है और सभागृह में एकदम सन्नाटा. सिर्फ शरद जी की ओजपूर्ण आवाज़ सुनायी दे रही है.
गवर्नर महोदय ने उप गवर्नर महोदय की तरफ कनखियों से देखा. उप गवर्नर महोदय ने इसी निगाह से कार्यपालक निदेशक महोदय को देखा और कार्यपालक निदेशक महोदय ने अपनी तरफ से इस निगाह में योगदान देते हुए हमारे विभागाध्यक्ष को घूरा और आंखों ही आंखों में इशारा किया कि ये रचना पाठ बंद कराया जाये. हमारे विभागाध्यक्ष महोदय की निगाह निश्चित ही मुझ पर टिकनी थी और मेरे आगे कोई नहीं था. मैंने कंधे उचकाये – मैं कुछ नहीं कर सकता. मंच पर तो आप ही खड़े हैं..
एक बार फिर तेज़ निगाहों का आदान प्रदान हुआ और एक तरह से विभागाध्यक्ष को डांटा गया कि वे ये रचना पाठ बंद करायें. नहीं तो.. नहीं तो.. मैं आगे कल्पना नहीं कर पाया कि इस नहीं तो के कितने आयाम हैं. विभागाध्यक्ष डरते डरते शरद जी के पास जा कर खड़े हो गये लेकिन कुछ कहने की हिम्मत नहीं कर पाये. यहां ये बताना प्रासंगिक होगा कि विभागाध्यक्ष खुद व्यंग्य कवि थे और दिल्ली में बरसों से कवि सम्मेलनों का सफल संचालन करते रहे थे. एक और कड़ी निगाह विभागाध्यक्ष की तरफ और उन्होंने धीरे से शरद जी से कहा कि आप कोई और रचना पढ़ लें, इसे न पढ़ें.
यही होना था. शरद जी हक्के बक्के. समझा नहीं पाये, क्या कहा जा रहा है उनसे.. फिर उन्होंने काग़ज़ समेटे और माइक पर ही कहा - ये तो आपको पहले बताना चाहिये था कि मुझे कौन सी रचना पढ़नी है और कौन सी नहीं, मैं पहले तय करता कि मुझे आना है या नहीं. मैं यही रचना पढूंगा या फिर कुछ नहीं पढूंगा.. बोलिये क्या कहते हैं...
एक लम्बा सन्नाटा. . . किसी के पास कोई शब्द नहीं.. कोई उपाय नहीं.. बिना शब्दों के ही सारा कारोबार हो रहा था.. अब शरद जी मंच से नीचे उतरे और सीधे सभागृह के बाहर..
अनहोनी हो चुकी थी.. मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था.. हमारे एक वरिष्ठ अधिकारी जो कभी टाइम्स में पत्रकार रह चुके थे और कभी बंबई में शरद जी के साथ धोबी तलाव इलाके में एक लॉज में रह चुके थे, शरद जी को मनाने उनके पीछे लपके.
शरद जी बुरी तरह से आहत हो गये थे.. ये बताने का वक्त नहीं था कि ये सब क्यूंकर हुआ और इस स्थिति को कैसे भी करके टाला ही नहीं जा सका.
अगले दिन अखबारों में ये खबर थी. ऑफिस में मुझसे स्पष्टीकरण मांगा गया और मेरे लिए आने वाले दिन बहुत मुश्किल भरे रहे.. लेकिन शरद जी से मिलने के बाद मेरी हिम्मत बढ़ी थी और मैं किसी भी अनचाही स्थिति के लिए अपने आपको तैयार कर चुका था.. शरद जी से उस मुलाकात के बाद ही मुझमें लिखने की हिम्मत आयी थी. अब मुझे लिखते हुए बीस बरस होने को आये.. शरद जी के वे शब्द आज भी हर बार कलम थामते हुए मेरे सामने सबसे पहले होते हैं कि बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा सा लेखक होना ज्यादा मायने रखता है.
मैं बेशक अपने संस्थान में मझोले कद का अफसर हूं लेकिन अपना परिचय छोटे मोटे लेखक के रूप में देना ही पसंद करता हूं. मुझे पता है,. जब तक चाहूं सक्रिय रह सकता हूं.. लेखन से रिटायरमेंट नहीं होता ना.... सूरज प्रकाश
शुक्रवार, 29 अगस्त 2008
कुछ अनछुए पल कमलेश्वर जी के साथ - प्रिया आनंद
ये रचना और साथ में चित्र मेरी टेलिफोन मित्र प्रिया आनंद ने हिमाचल प्रदेश से भेजे हैं. कमलेश्वर जी से जो भी मिला, उनका मुरीद हो गया. प्रिया मैडम ये दुर्लभ तस्वीरें मेरे ब्लाग के माध्यम से आप सब के साथ शेयर कर रही हैं. उनका स्वागत है.
सूरज प्रकाश
हिमाचल का एक प्यारा सा शहर मंडी
शिखर समारोह 2006 के एक दिन पहले वाली शाम मैं मंडी के ब्यूरो आफिस में थी। रात के दस बजे तक मैं और अजय (ब्यूरो) जागते ही रहे थे। संकन गार्डन के पुरातन घंटाघर से गजर की आवाज सुनाई दी, तो उस समय मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि कल बहुत सारे ऐसे लोगों को देखूंगी, जिन्हें अब तक मैंने सिर्फ पढ़ा था। शाम भी देर तक मैं और अजय इंदिरा मार्केट में घूमते रहे थे। इस मार्केट को देखकर अचानक ही लखनऊ के गड़बड़झाला बाजार की याद आ गई। कुछ-कुछ वैसा ही माहौल था। हम सीढियों से उतर कर संकन गार्डन में गए। मंडी के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों की यहां सबसे ज्यादा बैठकें होती हैं। वहां बात यही चल रही थी कि कल कमलेश्वर जी आने वाले हैं।
- कमलेश्वर नहीं... पहाड़ों में आग आ रही है। किसी ने कहा था।
रात उनसे मेरी फोन पर बात हई। मैंने कहा आपका मंडी में स्वागत है।
``मंडी आ तो गया हूं, पर यह पता नहीं लग रहा है कि पूर्व में हूं या पश्चिम में´´ हंसकर उन्होंने कहा था।
अगले दिन विपाशा सदन में लेखकों का यह महाकुंभ आरंभ हुआ।

चित्रा मुद्गल, प्रभाकर श्रोत्रिय, लीलाधर जगूड़ी, राजेंद्र प्रसाद पांडेय, राजी सेठ, जया जादवानी और भारतीय दूरदर्शन के प्रथम स्क्रिप्ट राइटर कमलेश्वर। उनके अलावा और भी साहित्यकार थे।
सत्र का विषय था - मैं क्यों लिखता हूं।

``मैं यह नहीं कहूंगा कि किसी लड़की ने मेरा दिल तोड़ा है, इसलिए लिखता हूं कमलेश्वर जी ने मंच पर घोषित किया... लोग हंस दिए। इसके बाद उन्होंने अपनी बात शुरू की। शब्द... शब्द जैसे मोतियों की लडियां पिरोई जा रही हों।
उन्होंने कहा - यह सिल्क रूट की तरह साहित्य संस्कृति का चौराहा है, इसलिए मंडी है।´´ बात चली तो यशपाल, गुलेरी से होकर ओरवेल पामुक तक आ गई।
एक के बाद एक साहित्यकार बोलते गए। सत्र समाप्त हुआ।
ब्रेकफास्ट के दौरान मुझे शरारत सूझी, मैंने अपनी दोस्त से कहा... चल कमलेश्वर जी को छकाते हैं। साथ-साथ चलते हमने उन्हें एक क्षण के लिए रोका और उनके अगल-बगल हो लिए... काफी करीब।

तस्वीर बीरबल शर्मा ने खींची और एक उम्दा शरारत उसने भी की। कैमरे का फोकस सिर्फ मुझ पर और कमलेश्वर जी पर ही रखा। यह उसी शरारत की तस्वीर है। यह तस्वीर शाम धुलकर आई तो लोगों ने कहा, ऐसा नूर तुम्हारे चेहरे पर कभी नहीं आया। कैसे कहती कि जिस सूरज की तपिश मेरे साथ थी यह रौनक उसी से आई थी।
कमलेश्वर जी ने गायत्री जी से मेरा परिचय करवाया।
डाइनिंग हाल तक हम फिर साथ-साथ ही रहे।
सामने मुख्यमंत्री और कमलेश्वर जी, इधर मैं, गायत्री जी तथा कुछ अन्य लोग। इसी बीच मेरे मित्र अशेष ने मेरे पास आकर कहा... सारे पत्रकार उधर खड़े होकर खा रहे हैं, तुम यहां क्यों बैठी हो...?
``आपके राज्य अतिथि मेरे आत्मीय हैं, इसलिए उन्होंने मुझे यहां बिठा रखा है´´, मैंने जवाब दिया था।
खाना खत्म हुआ, लोग धीरे-धीरे धूप में आ गए।
हम धूप में ही कुर्सियों पर बैठे... कमलेश्वर जी, गायत्री जी और मैं।
मैंने कमलेश्वर जी से कहा- आप आज के दिन के लिए मेरी डायरी पर कुछ लिख दें। मैंने डायरी उन्हें थमा कर कैमरा फोकस कर लिया। मेरी डायरी हाथ में थामे उन्होंने ब्यास दरिया के बहते पानी पर एक नजर डाली और फिर ऊंचे हरे पहाड़ों को देखा। उसी वक्त वह पल मैंने कैमरे में कैद कर लिया।
कमलेश्वर जी और गायत्री जी की यह उसी समय की तस्वीर है। मेरी डायरी पर उन्होंने लिखा-
प्रिया के लिए....।
अपने समय के यथार्थ को समझना और सहेजना ही लेखक का धर्म है। कमलेश्वर 8-12-2006...
तब मुझे जरा भी नहीं पता था कि यह उन्हें मैं आखिरी बार देख रही हूं।

यह रोचक ही रहा कि जितने दिन कमलेश्वर जी मंडी में रहे, सूरज चमकता रहा और सारा शहर धूप में नहाया रहा। पर उनके जाते ही धूप गायब... बर्फ, बारिश... ठंडा घना कोहरा।
क्या सचमुच यह धूप कमलेश्वर जी की आग की थी...?
प्रिया आनंद, दिव्य हिमाचल,
सूरज प्रकाश
हिमाचल का एक प्यारा सा शहर मंडी
शिखर समारोह 2006 के एक दिन पहले वाली शाम मैं मंडी के ब्यूरो आफिस में थी। रात के दस बजे तक मैं और अजय (ब्यूरो) जागते ही रहे थे। संकन गार्डन के पुरातन घंटाघर से गजर की आवाज सुनाई दी, तो उस समय मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि कल बहुत सारे ऐसे लोगों को देखूंगी, जिन्हें अब तक मैंने सिर्फ पढ़ा था। शाम भी देर तक मैं और अजय इंदिरा मार्केट में घूमते रहे थे। इस मार्केट को देखकर अचानक ही लखनऊ के गड़बड़झाला बाजार की याद आ गई। कुछ-कुछ वैसा ही माहौल था। हम सीढियों से उतर कर संकन गार्डन में गए। मंडी के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों की यहां सबसे ज्यादा बैठकें होती हैं। वहां बात यही चल रही थी कि कल कमलेश्वर जी आने वाले हैं।
- कमलेश्वर नहीं... पहाड़ों में आग आ रही है। किसी ने कहा था।
रात उनसे मेरी फोन पर बात हई। मैंने कहा आपका मंडी में स्वागत है।
``मंडी आ तो गया हूं, पर यह पता नहीं लग रहा है कि पूर्व में हूं या पश्चिम में´´ हंसकर उन्होंने कहा था।
अगले दिन विपाशा सदन में लेखकों का यह महाकुंभ आरंभ हुआ।

चित्रा मुद्गल, प्रभाकर श्रोत्रिय, लीलाधर जगूड़ी, राजेंद्र प्रसाद पांडेय, राजी सेठ, जया जादवानी और भारतीय दूरदर्शन के प्रथम स्क्रिप्ट राइटर कमलेश्वर। उनके अलावा और भी साहित्यकार थे।
सत्र का विषय था - मैं क्यों लिखता हूं।

``मैं यह नहीं कहूंगा कि किसी लड़की ने मेरा दिल तोड़ा है, इसलिए लिखता हूं कमलेश्वर जी ने मंच पर घोषित किया... लोग हंस दिए। इसके बाद उन्होंने अपनी बात शुरू की। शब्द... शब्द जैसे मोतियों की लडियां पिरोई जा रही हों।
उन्होंने कहा - यह सिल्क रूट की तरह साहित्य संस्कृति का चौराहा है, इसलिए मंडी है।´´ बात चली तो यशपाल, गुलेरी से होकर ओरवेल पामुक तक आ गई।
एक के बाद एक साहित्यकार बोलते गए। सत्र समाप्त हुआ।
ब्रेकफास्ट के दौरान मुझे शरारत सूझी, मैंने अपनी दोस्त से कहा... चल कमलेश्वर जी को छकाते हैं। साथ-साथ चलते हमने उन्हें एक क्षण के लिए रोका और उनके अगल-बगल हो लिए... काफी करीब।

तस्वीर बीरबल शर्मा ने खींची और एक उम्दा शरारत उसने भी की। कैमरे का फोकस सिर्फ मुझ पर और कमलेश्वर जी पर ही रखा। यह उसी शरारत की तस्वीर है। यह तस्वीर शाम धुलकर आई तो लोगों ने कहा, ऐसा नूर तुम्हारे चेहरे पर कभी नहीं आया। कैसे कहती कि जिस सूरज की तपिश मेरे साथ थी यह रौनक उसी से आई थी।
कमलेश्वर जी ने गायत्री जी से मेरा परिचय करवाया।
डाइनिंग हाल तक हम फिर साथ-साथ ही रहे।
सामने मुख्यमंत्री और कमलेश्वर जी, इधर मैं, गायत्री जी तथा कुछ अन्य लोग। इसी बीच मेरे मित्र अशेष ने मेरे पास आकर कहा... सारे पत्रकार उधर खड़े होकर खा रहे हैं, तुम यहां क्यों बैठी हो...?
``आपके राज्य अतिथि मेरे आत्मीय हैं, इसलिए उन्होंने मुझे यहां बिठा रखा है´´, मैंने जवाब दिया था।
खाना खत्म हुआ, लोग धीरे-धीरे धूप में आ गए।
हम धूप में ही कुर्सियों पर बैठे... कमलेश्वर जी, गायत्री जी और मैं।
मैंने कमलेश्वर जी से कहा- आप आज के दिन के लिए मेरी डायरी पर कुछ लिख दें। मैंने डायरी उन्हें थमा कर कैमरा फोकस कर लिया। मेरी डायरी हाथ में थामे उन्होंने ब्यास दरिया के बहते पानी पर एक नजर डाली और फिर ऊंचे हरे पहाड़ों को देखा। उसी वक्त वह पल मैंने कैमरे में कैद कर लिया।
कमलेश्वर जी और गायत्री जी की यह उसी समय की तस्वीर है। मेरी डायरी पर उन्होंने लिखा-
प्रिया के लिए....।
अपने समय के यथार्थ को समझना और सहेजना ही लेखक का धर्म है। कमलेश्वर 8-12-2006...
तब मुझे जरा भी नहीं पता था कि यह उन्हें मैं आखिरी बार देख रही हूं।

यह रोचक ही रहा कि जितने दिन कमलेश्वर जी मंडी में रहे, सूरज चमकता रहा और सारा शहर धूप में नहाया रहा। पर उनके जाते ही धूप गायब... बर्फ, बारिश... ठंडा घना कोहरा।
क्या सचमुच यह धूप कमलेश्वर जी की आग की थी...?
प्रिया आनंद, दिव्य हिमाचल,
गुरुवार, 21 अगस्त 2008
लंदन में मुलाकात नवाज़ शरीफ़ से . . .
कथा यूके के सम्मान समारोह में शिरकत करने के लिए जब मैं जुलाई 2007 में लंदन की यात्रा पर गया तो मेरी बहुत पुरानी मित्र पाकिस्तान की कथा लेखिका नीलम बशीर से एक बार फिर मुलाकात हो गयी. वे हमेशा की तरह अमेरिका से पाकिस्तान या शायद पाकिस्तान से अमेरिका जा रही थीं और कथा यूके के आमंत्रण पर कथा सम्मान 2007 में शिरकत करने के लिए कुछ दिन के लिए लंदन में रुक गयीं थीं. कई बरस पहले उन्होंने लंदन में ही कथा यूके के एक सम्मान आयोजन में मेरे उपन्यास देस बिराना का लोकार्पण किया था. तब उन्होंने मंच से ये बात कही थी कि काश, मैं ये खूबसूरत किताब पढ़ पाती. इस बार ये सुखद संयोग हुआ कि मैं उन्हें अपने उपन्यास की ऑडियो सीडी भेंट कर पाया. ये दूसरा सुखद संयोग है कि इस ऑडियो को भी लंदन की एक संस्था एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स के साथ मिल कर कथा यूके ने ही तैयार करवाया है.
कथा सम्मान आयोजन से एक दिन पहले लंदन की घुमक्कड़ी का कार्यक्रम बना. घूमने जाने वालों में थे मैं, नीलम, 2007 की हमारी कथा सम्मान प्राप्त लेखिका महुआ माजी और अमेरिका से लौटते हुए खास तौर पर इस आयोजन के लिए लंदन रुके पत्रकार मित्र अजित राय. जब हम कथ यूके के कर्ता धर्ता तेजेन्द्र के घर से निकलने लगे तो नीलम ने बताया कि कराची से उसकी पत्रकार, कहानीकार मित्र ज़ाहिदा हिना भी लंदन आयी हुई हैं और बेकर स्ट्रीट के पास उनसे मुलाकात करनी है. ज़ाहिदा हिना हमारे लिए सुपरिचित नाम है और उन्हें हम हिन्दी में छपने वाले उनके कॉलमों और कहानियों की वज़ह से जानते ही हैं.
तय हुआ, सबसे पहले उनसे ही मिल लिया जाये. नीलम जी के पास जो पता था, उसे खोजने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई लेकिन जब हमने उस भव्य इमारत की दूसरी मंजिल तक नीचे से संदेश पहुंचाया तो पता चला कि ज़ाहिदा अभी मीटिंग में हैं और हमें कुछ देर इंतज़ार करना पड़ सकता है. उनके इंतज़ार में ऊपर जाने के बज़ाये हमने यही बेहतर समझा कि यहीं भीड़ भरे बाज़ार की रौनक में ही थोड़ी देर लुत्फ़ उठाते रहें. ये सोच कर हम मुड़े ही थे कि दूसरी मंजिल से उतर कर एक बेहद खूबसूरत शख्स़ लपकते हुए हमारे पीछे आये और कहने लगे कि आपको ज़ाहिदा ऊपर ही बुला रही हैं.
हम चारों चले उनके पीछे पीछे. हम जिस जगह ले जाये गये, दफ़तरनुमा कुछ लग रहा था. चहल पहल. लेकिन सब कुछ एक अनुशासित तरीके से. एक बड़े से कमरे में कुछ सोफे और कुछ कुर्सियां वगैरह रखे थे. वहीं हमें ले जाया गया. सामने मेज़ पर पीतल के एक खूबसूरत स्टैंड पर एक झंडा टिका हुआ था. नये और अपरिचित माहौल में होने के कारण हम तय नहीं कर पाये कि हम किस किस्म के दफ्तर में हैं और ये झंडा किस पार्टी का है. ज़ाहिदा हमें वहीं मिलीं. कुछ और लोग थे वहां बैठे हुए. उनसे दुआ सलाम हो ही रही थी कि सबके लिए कॉफ़ी आ गयी. हमने कॉफ़ी के पहले ही घूंट भरे होंगे कि कमरे में एक निहायत शरीफ़ और खूबसूरत से लगने वाले शख्स़ ने प्रवेश किया. इस गोरे चिट्टे शख्स़ को देखते ही लगा कि कहीं देखा हुआ है इसे.
उस शख्स़ ने ज्यों ही हाथ जोड़ कर नमस्कार किया, याद आया, अरे ये तो नवाज़ शरीफ़ हैं. पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधान मंत्री, जो अरसे से अपने मुल्क से दूर यहां निर्वासित जीवन जी रहे हैं.
सबसे आगे मैं ही बैठा था. पहले मुझसे हाथ मिलाया उन्होंने और आगे बढ़ते हुए सबसे दुआ सलाम करते हुए एक खाली कुर्सी पर आ विराजे. ज़ाहिदा ने सबसे पहले नीलम से उनका परिचय कराया. नवाज के लहज़े से लगा कि वे नीलम को तो नहीं, बेशक उनके अब्बा हुज़ूर को ज़रूर जानते रहे होंगे. बशीर सीनियर पाकिस्तान के साहित्य और पत्रकारिता जगत में खासा नाम रखते थे. उसके बाद अजित, महुआ और मेरा परिचय खुद नीलम ने दिया. जब नवाज़ साहब को पता चला कि हम लेखक और पत्रकार लोग हैं और भारत से आये हैं तो उनका लहज़ा एकदम मीठा हो गया और वे भारत पाकिस्तान के बीच मधुर संबंधों की, बेहतर रिश्तों की और हर तरह की दूरियां कम करने की बात करने लगे. अपनी बात में वज़न लाने के लिए उन्होंने पंजाबी में बुल्ले शा और दूसरे लोक कवियों को कोट करना शुरू कर दिया. हम वहां पर मेहमान थे और उनके नहीं, बल्कि उनकी मेहमान ज़ाहिदा के मेहमान थे. इसलिए जो कुछ भी कहा जा रहा था, उसे सुनने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे फिर भी मैंने कह ही दिया कि नवाज़ साहब, रिश्ते तो इधर बेहतर हुए ही हैं और ये कि ये तो दोनों तरु से लगातार चलने वाली प्रोसेस है और आप एक दिन में बेहतर रिज़ल्ट की उम्मीद नहीं कर सकते. नवाज़ साहब ने मेरी तरफ देखा, कुछ बुदबुदाये, इस बीच अजित ने भी इसी आशय की टिप्पणी की कि रिश्ते बेहतर बनाने के लिए तो आपस में विश्वास जीतना होता है और अवाम के बीच ज़मीनी काम करना पड़ता है.
तभी नवाज़ साहब ने जानना चाहा कि हम लंदन किस सिलसिले में आये हैं. उन्हें बताया गया कि लंदन की एक संस्था कथा यूके का साहित्य सम्मान लेने के लिए महुआ भारत से आयी हैं और कि अगले ही दिन हाउस आफ लार्ड्स में ये सम्मान दिया जाना है. वे ये जानकर बहुत खुश हुए और कहने लगे कि ये तो वाकई बहुत शानदार बात है कि लिटलेचर इस तरह से मुल्कों की सरहदें पार कर अपनी जगह बना रहा है. मज़े की बात, महुआ मैडम को अब तक पता नहीं था कि ये शख्स कौन हैं. कॉफ़ी पी जा चुकी थी और सबसे पहले नवाज़ ही उठे, हम सब का शुक्रिया अदा किया और हमसे इजाज़त चाही. अब जा कर महुआ जी ने अजित से पूछा कि कौन हैं ये शख्स तो अजित ने उनकी जिज्ञासा शांत करते हुए बताया कि ये पाकिस्तान के अपदस्थ प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ़ हैं. अब महुआ की हैरानी देखने लायक थी. तब तक नवाज़ कमरे से जा चुके थे.
हम भी निकलने के लिए उठे. ज़ाहिदा भी हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो गयीं. तभी शायद महुआ की तरफ से ये प्रस्ताव आया कि नवाज़ के साथ एक ग्रुप फोटो हो जाये. ज़ाहिदा से कहा गया और ज़ाहिदा ने अपने सम्पर्क खटखटाये. बात बन गयी और दो तीन मिनट के इंतज़ार के बाद नवाज़ फिर हाजिर थे. हम चाहते थे कि मेज़ पर रखे उनकी पार्टी के झंडे के पास खड़े हो कर फोटो खिंचवायें लेकिन वे कमरे के दरवाजे के पास परदे के आगे खड़े हो गये. फोटो सेशन हुआ. नवाज़ अब बेतकल्लुफ़ी से बात कर रहे थे. हम सब ने अपने अपने कैमरे से ग्रुप फोटो लिये. मैंने देखा कि हमने अपने कैमरों से तो तस्वीरें ली हीं, उनके बेटे और दामाद ने भी हम सब की तस्वीरें लीं.
नवाज़ ने हम सबसे पूछा कि हम हिन्दुस्तान के किन किन शहरों से आते हैं. जब मैंने बताया कि मेरे माता पिता तो पाकिस्तान से ही उजड़ कर भारत गये थे तो वे मुझसे ठेठ पंजाबी में ही बात करने लगे. महुआ ने अपने शहर रांची के बारे में बताते हुए अब चांस लिया और उन्हें बताया कि उनके जिस उपन्यास पर कथा यूके का ये सम्मान दिया जा रहा है, वह बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम पर आधारित है. नवाज़ साहब ने खुशी जाहिर की तो लगे हाथों महुआ ने उन्हें अगले दिन के सम्मान समारोह के लिए न्यौता दे डाला. नवाज़ भाई ने भी देर न की और अपने पालिटिकल सेक्रेटरी से कह दिया कि वह मुझे अपना ईमेल आइडी दे दें ताकि उस पर दावतनामा भेजा जा सके. बेशक मुझे उनके सेक्रेटरी ने अपने कमरे में ले जा कर अपना कार्ड दिया और कहा कि मैं ज़रूर से ज़रूर न्यौता भेज दूं. कुछ और भी लोगों ने अपने कार्ड दिये. ज़ाहिदा ने बाद में बताया कि कॉंफी सेशन में हमारे साथ नवाज़ साहब के भाई, बेटे और दामाद का भी बैठे थे.
नीचे उतरते समय मोहतरमा महुआ माजी बेहद खुश थीं कि पहले ही दिन एक मशहूर शख्स से मुलाकात हो गयी. उन्होंने तुरंत एक छोटा सा सपना देखा कि क्या ही शानदार होगा वो पल जब पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ़ लंदन के हाउस आफ लार्ड्स में भारत से आयी एक हिन्दी लेखिका महुआ माजी द्वारा बांग्ला देश के मुक्ति संग्राम पर लिखे गये हिन्दी उपन्यास को कथा यूके सम्मान से पुरस्कृत होते देखेंगे. उन्होंने मुझसे आग्रह किया कि उन्हें निमंत्रण पत्र ज़रूर ईमेल करूं.
अब मैं महुआ मैडम को कैसे बताता कि किसी एक राष्ट्र के प्रमुख के लिए दूसरे देश में, जिसमें उसने आश्रय ले रखा है, अपनाये जाने वाले प्रोटोकाल के कुछ नियम होते हैं और बेशक नवाज़ ने आपको खुश करने के लिए दावतनामा मांग लिया हो, वे एक आम आदमी की तरह हाथ में दावतनामा लिये लंदन के हाउस आफ लार्डस में सुरक्षा की औपचारिकताएं निभाते हुए आपके आयोजन में जाने से रहे. अलबत्ता, महुआ मैडम के चेहरे की रौनक दिन भर बनी रही और उनकी बातचीत में नवाज़ शरीफ़ लगातार बने रहे. शायद अगले दिन उन्होंने इंतज़ार भी किया हो और उनके आने की दुआ भी की हो. उनके ईमेल आइडी पर दावतनामा भेजने का तो सवाल ही नहीं था. अगर भेजा भी जाता तो नवाज़ साहब ने तो खैर क्या ही आना था इस कार्यक्रम में.
बुधवार, 13 अगस्त 2008
बायें हाथ से काम करने वालों का दिन
आज अखबार ने बताया कि आज लैफ्ट हैंडर्स डे है. जब भी इस तरह के डे की बात पढ़ता हूं तो यही अफसोस होता है कि बरस भर के बाकी दिन तो दूसरों के लिए लेकिन एक दिन आपका. अब चाहे मदर्स डे हो या फादर्स डे. साल में एक दिन आपका. भले ही अपने देश का करवा चौथ का व्रत ही क्यों न हो. बेचारे पति के हिस्से में पूरे बरस में एक ही दिन आता है. जवाब में आप ये भी कह सकते हैं कि बेचारी महिलाओं के हिस्से में भी तो बरस भर में एक ही वीमेंस डे आता है. बाकी दिन तो उन्हें कोई याद नहीं करता.
तो बात चल रही थी लैफ्ट हैंडर्स डे की. मेरे पिता बेशक खब्बू थे लेकिन बचपन में हुई पिटाई के कारण दायें हाथ से लिखने के अलावा जीवन भर अपने सारे काम बायें हाथ से करते रहे. चाहे टेबिल टेनिस खेलना हो, कैरम खेलना हो या खाना खाना हो.
यही हाल मेरे बड़े भाई का रहा. वे खब्बू होने के बावजूद लिखने सहित अपने सारे काम दायें हाथ से करने को मजबूर हुए और नतीजा ये हुआ कि वे जिंदगी में जितनी तरक्की कर सकते थे. नहीं कर पाये. औसत से कम वाली जिंदगी उनके हिस्से में आयी.
मेरा छोटा बेटा भी खब्बू है. लेकिन उसे अपने सारे काम बायें हाथ से करने की पूरी छूट है. बेशक वह गिटार दायें हाथ से बजा लेता है और पीसी पर माउस भी दायें हाथ से ही चलाता है. पीसी की वजह समझ में आती है कि पीसी पूरे घर का सांझा है और वह इस बात को ठीक नहीं समझता कि बार बार सेटिंग करके माउस को अपने लिए लैफ्ट हैंडर बनाये. बाकी काम वह बायें हाथ से ही करता है.
मुझे याद पड़ता है कि हमारे बचपन में खब्बुओं को मार मार कर सज्जू कर दिया जाता था. (पंजाबी में बायें हाथ को खब्बा और दायें हाथ को सज्जा हाथ कहते हैं). मजाल है आप कोई काम खब्बे हाथ से कर के दिखा दें. घर पर तो पिटाई होती ही थी. मास्टर लोग भी अपनी खुजली उन्हें मार मार कर मिटाते थे. दुनिया में पूरी जनसंख्या के तीस से पैंतीस प्रतिशत लोग खब्बू तो होते ही होंगे लेकिन ये भारत में ही और वो भी उत्तर भारत में ज्यादा होता है कि बायें हाथ से काम करने वाले को पीट पीट कर दायें हाथ से काम करने पर मजबूर किया जाता है. उसका मानसिक विकास तो रुकेगा ही जब आप प्रकृति के खिलाफ उस पर अपनी चलायेंगे.
मैंने सिर्फ गुजरात में ही देखा कि क्लास में और ट्रेनिंग सेंटर्स में भी इनबिल्ट मेज वाली कुर्सियां लैफ्ट हैंडर्स के लिए भी होती हैं बेशक तीस में से पांच ही क्यों न हों. ये भी मैंने गुजरात में ही देखा कि कई पति पत्नी दोनों ही खब्बू हैं. कई कई तो डाक्टर भी.
कहा जाता है कि पहले के ज़माने में युद्धों में बायें हाथ से लड़ने वालों को तकलीफ होती थी. वे मरते भी ज्यादा थे क्योंकि सामने वाले के बायें हाथ में ढाल है और दायें में तलवार. वह अपने सीने की रक्षा करते हुए सामने वाले के सीने पर वार कर सकता था लेकिन खब्बू महाशय के बायें हाथ में तलवार और दायें हाथ में ढाल है. बेचारा दिल तो उनका भी बायीं तरफ ही रहता था. नतीजा यही हुआ कि लड़ाइयों की वजह से खब्बू ज्यादा शहीद होते रहे और दुनिया की जनसंख्या में उनका प्रतिशत भी कम हुआ. ये एक कारण हो सकता है.
मैं विदेशों की नहीं जानता कि वहां पर लैफ्ट हैंडर्स के साथ क्या व्यवहार होता है. लेकिन ये मानने में कोई हर्ज नहीं कि उन्हें सम्मान तो मिलता ही होगा उन्हें भी तभी तो वे लैफ्ट हैंडर्स डे मनाने की सोच सकते हैं. पिटाई तो उनकी वैसे भी नहीं होती. आइये जानें दुनिया के कुछ खास खास खब्बुओं के बारे में. जरा सोचिये, अगर इन सबको भी पीट पीट कर सज्जू बना दिया जाता तो क्या होता. ये है सूची – महात्मा गांधी, सिंकदर महान, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, बिस्मार्क, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज बुश सीनियर, जूलियस सीजर, लुइस कैरोल, चार्ली चैप्लिन, विंस्टन चर्चिल, बिल क्लिंटन, लियोनार्डो द विंची, अल्बर्ट आइंस्टीन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, ग्रेटा गार्बो, इलियास होव, निकोल किडमैन, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, सौरव गांगुली, वसीम अकरम, माइकल एंजेलो, मर्लिन मनरो, पेले, प्रिंस चार्ल्स, क्वीन विक्टोरिया, क्रिस्टोफर रीव, जिमी कोनर्स, टाम क्रूज, सिल्वेस्टर स्टेलोन, बीथोवन, एच जी वेल्स और अपने देश के बाप बेटा बच्चन जी.
है ना मजेदार लिस्ट.
आज के दिन सभी लैफ्ट हैंडर्स को सलाम.
सूरज प्रकाश
तो बात चल रही थी लैफ्ट हैंडर्स डे की. मेरे पिता बेशक खब्बू थे लेकिन बचपन में हुई पिटाई के कारण दायें हाथ से लिखने के अलावा जीवन भर अपने सारे काम बायें हाथ से करते रहे. चाहे टेबिल टेनिस खेलना हो, कैरम खेलना हो या खाना खाना हो.
यही हाल मेरे बड़े भाई का रहा. वे खब्बू होने के बावजूद लिखने सहित अपने सारे काम दायें हाथ से करने को मजबूर हुए और नतीजा ये हुआ कि वे जिंदगी में जितनी तरक्की कर सकते थे. नहीं कर पाये. औसत से कम वाली जिंदगी उनके हिस्से में आयी.
मेरा छोटा बेटा भी खब्बू है. लेकिन उसे अपने सारे काम बायें हाथ से करने की पूरी छूट है. बेशक वह गिटार दायें हाथ से बजा लेता है और पीसी पर माउस भी दायें हाथ से ही चलाता है. पीसी की वजह समझ में आती है कि पीसी पूरे घर का सांझा है और वह इस बात को ठीक नहीं समझता कि बार बार सेटिंग करके माउस को अपने लिए लैफ्ट हैंडर बनाये. बाकी काम वह बायें हाथ से ही करता है.
मुझे याद पड़ता है कि हमारे बचपन में खब्बुओं को मार मार कर सज्जू कर दिया जाता था. (पंजाबी में बायें हाथ को खब्बा और दायें हाथ को सज्जा हाथ कहते हैं). मजाल है आप कोई काम खब्बे हाथ से कर के दिखा दें. घर पर तो पिटाई होती ही थी. मास्टर लोग भी अपनी खुजली उन्हें मार मार कर मिटाते थे. दुनिया में पूरी जनसंख्या के तीस से पैंतीस प्रतिशत लोग खब्बू तो होते ही होंगे लेकिन ये भारत में ही और वो भी उत्तर भारत में ज्यादा होता है कि बायें हाथ से काम करने वाले को पीट पीट कर दायें हाथ से काम करने पर मजबूर किया जाता है. उसका मानसिक विकास तो रुकेगा ही जब आप प्रकृति के खिलाफ उस पर अपनी चलायेंगे.
मैंने सिर्फ गुजरात में ही देखा कि क्लास में और ट्रेनिंग सेंटर्स में भी इनबिल्ट मेज वाली कुर्सियां लैफ्ट हैंडर्स के लिए भी होती हैं बेशक तीस में से पांच ही क्यों न हों. ये भी मैंने गुजरात में ही देखा कि कई पति पत्नी दोनों ही खब्बू हैं. कई कई तो डाक्टर भी.
कहा जाता है कि पहले के ज़माने में युद्धों में बायें हाथ से लड़ने वालों को तकलीफ होती थी. वे मरते भी ज्यादा थे क्योंकि सामने वाले के बायें हाथ में ढाल है और दायें में तलवार. वह अपने सीने की रक्षा करते हुए सामने वाले के सीने पर वार कर सकता था लेकिन खब्बू महाशय के बायें हाथ में तलवार और दायें हाथ में ढाल है. बेचारा दिल तो उनका भी बायीं तरफ ही रहता था. नतीजा यही हुआ कि लड़ाइयों की वजह से खब्बू ज्यादा शहीद होते रहे और दुनिया की जनसंख्या में उनका प्रतिशत भी कम हुआ. ये एक कारण हो सकता है.
मैं विदेशों की नहीं जानता कि वहां पर लैफ्ट हैंडर्स के साथ क्या व्यवहार होता है. लेकिन ये मानने में कोई हर्ज नहीं कि उन्हें सम्मान तो मिलता ही होगा उन्हें भी तभी तो वे लैफ्ट हैंडर्स डे मनाने की सोच सकते हैं. पिटाई तो उनकी वैसे भी नहीं होती. आइये जानें दुनिया के कुछ खास खास खब्बुओं के बारे में. जरा सोचिये, अगर इन सबको भी पीट पीट कर सज्जू बना दिया जाता तो क्या होता. ये है सूची – महात्मा गांधी, सिंकदर महान, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, बिस्मार्क, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज बुश सीनियर, जूलियस सीजर, लुइस कैरोल, चार्ली चैप्लिन, विंस्टन चर्चिल, बिल क्लिंटन, लियोनार्डो द विंची, अल्बर्ट आइंस्टीन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, ग्रेटा गार्बो, इलियास होव, निकोल किडमैन, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, सौरव गांगुली, वसीम अकरम, माइकल एंजेलो, मर्लिन मनरो, पेले, प्रिंस चार्ल्स, क्वीन विक्टोरिया, क्रिस्टोफर रीव, जिमी कोनर्स, टाम क्रूज, सिल्वेस्टर स्टेलोन, बीथोवन, एच जी वेल्स और अपने देश के बाप बेटा बच्चन जी.
है ना मजेदार लिस्ट.
आज के दिन सभी लैफ्ट हैंडर्स को सलाम.
सूरज प्रकाश
शुक्रवार, 20 जून 2008
जयपुर में कहानी पाठ- कुछ नोट्स
पिछले दिनों जयपुर जाना हुआ. पहले तो मीटिंग की तारीख तय न हो पाने की वज़ह से जाना टलता रहा फिर बम धमाकों की वज़ह से जाना टला. मीटिंग तो अपनी जगह थी लेकिन मेरे ध्यान में जयपुर के वे सभी साहित्यकार और पत्रकार मित्र थे जो मेरे आने की खबर पा कर लगभग रोज़ाना ही पूछ लेते थे कि कब पहुंच रहा हूं. व्यक्तिगत मुलाकात सिर्फ तीन ही रचनाकारों से थी. प्रेम चंद गांधी से सात आठ बरस पहले मुंबई में आधे दिन के लिए मिला था और वे तभी से मेरे मित्र बन गये थे. फारुख आफरीदी और कृष्ण कल्पित से बाबरी मस्जिद हादसे से एक दिन पहले बाड़मेर में मुलाकात हुई थी और रंगकर्मी सत्य नारायण पुरोहित तो मुंबई में हमारे ही संस्थान में थे और मुंबई प्रवास के अपने अंतिम बरसों में कई खूबसूरत शामें हमने एक साथ गुज़ारी थीं. मेजर रतन जांगिड़ से कई बार फोन पर ही बात हुई थी. वे सबसे ज्यादा उत्साहित लग रहे थे.
मैं खुद इस विजि़ट को ले कर बेहद उत्साहित था कि इन सबसे तो मुलाकात तो होगी ही, कई नये दूसरे रचनाकारों से भी मुलाकात हो जायेगी. लवलीन से मिलना हमेशा सुख देता है बेशक स्वास्थ्य के चलते वे ही बातचीत में पूरी तरह शामिल नहीं हो पातीं और बाद में अफसोस करती रहती हैं कि कुछ अनकहा रह गया. मैं हैरान था कि जिस दिन मुझे जयपुर पहुंचना था, मेरे कहानी पाठ की खबर कई अखबारों में छपी हुई थी. और तो और युवा पत्रकार और ग़ज़लकार डॉ. दुष्यंत ने तो मेरे पहुंचने से पहले मेरी रचनाएं छाप कर शहर को मेरा परिचय दे दिया था. जनवादी पत्रकार संघ के कार्यालय में उस समय लाइट नहीं थी लेकिन सभी साहित्यकार और साहित्य प्रेमी इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार नज़र आ रहे थे कि आंगन में ही कुर्सियां डाल कर संवाद कर लेंगे. संयोग से बत्ती आ गयी और कायर्क्रम शुरू हुआ.
मेरे लिए पिछले कई बरसों में शायद ये पहला मौका था जब मैं श्रोताओं के सामने कहानी पाठ कर रहा था. मुंबई में हमने मराठी कथा कथन से कुछ नहीं सीखा और वहां हिन्दी कहानी पाठ आम तौर पर नहीं ही होते. कवि गोष्ठियां बेशक महीने मे साढ़े सात हो जाती हैं. मुंबई में अपने सत्ताइस बरस के प्रवास में मैंने शायद दो ही बार कहानी सुनायी है. पुणे में भी रहते हुए तीन बरस हो गये हैं, वहां भी इस तरह की कोई परम्परा नहीं है. बेशक मैंने अपने बैंकिंग महाविद्यालय में इस परम्परा की शुरुआत की है और हमारे यहां शेखर जोशी, गोविंद मिश्र, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, मनहर चौहान, ओमा शर्मा, सूर्य बाला, सुधा अरोड़ा, अल्पना मिश्र, वंदना राग आदि कहानी पाठ कर चुके हैं. शायद हमारा संस्थान ही अकेला ऐसा संस्थान है जहां कहानी पाठ के लिए सम्मानजनक राशि दी जाती है.
विषयांतर हो गया.
जयपुर के इस कहानी पाठ में तीस के करीब मित्र थे. वरिष्ठ रचनाकार नंद भारद्वाज की अध्यक्षता में हुई इस गोष्ठी में तय तो ये हुआ था कि मैं महानगर पर कुछ लघु कथाएं और एक कहानी सुनाऊंगा लेकिन कार्यक्रम देर से शुरू होने के बावजूद सबके अनुरोध मैंने अपनी विवादास्पद कहानी उर्फ़ चंदरकला भी सुनायी. मैं हैरान था कि मित्रों ने रचनापाठ का सुख तो उठाया ही, बाद में रवनाओं पर विस्तार से बात भी की. मैं इस बात से भी हैरान था कि बेशक में कई रचनाकारों से पहली बार मिल रहा था, ज्यादातर मित्रों ने मेरी कहानियां और अनूदित रचनाएं पढ़ रखी थीं. राजा राम भादू, रमेश खत्री, रंगकर्मी अशोक राही, और दूसरे सभी मित्र बहुत प्यार से मिले.
ये कहानी पाठ मेरे लिए कई सुखद अनुभव ले कर आया. इतने सारे रचनाकारों से एक साथ मिलना, बात करना और स्थायी संबंध बनना किसी भी रचनाकार के लिए आजीवन न भूलने वाले अनुभव होते हैं. मैं जिस बैंक में बैठक के सिलसिले में गया था, वहां के मेरे अधिकारी मित्र इस बात को ले कर हैरान थे कि पहली बार मिलने पर भी मुझे इतना प्यार और सम्मान मिल रहा है. मैंने उन्हें बताया कि रचनाकार के लिए कोई भी शहर पराया नहीं होता अगर वहां उसका एक भी रचनाकार दोस्त या पाठक रहता हो. तब सारा शहर उसका अपना हो जाता है. रमेश खत्री जी को लगा कि अभी मेरा कुछ और दोहन किया जा सकता है. अगले दिन उन्होंने न केवल रेडियो स्टेशन पर किताबों का सिकुड़ता संसार पर हमारी परिचर्चा आयोजित करा डाली, अपनी स्टेशन डाइरेक्टर मिसेज माथुर से और अन्य सहकर्मियों से सार्थक बातचीत का मौका भी दिया.
भाई फारुख अफरीदी के बारे में क्या कहूं. जब तक मेरे साथ रहे, और सबसे ज्यादा देर तक रहे, उनका डिजिटल कैमरा, उनका टेप रिकार्डर और उनके इंटरव्यू के सवाल लगातार चलते रहे.
मैं अक्सर कहा करता हूं कि बहुत बड़ा अफसर बनने की तुलना में छोटा सा लेखक होना हमेशा बेहतर होता है. एक तो लेखक कभी रिटायर नहीं होता और दूसरे, उसके नाम के आगे कभी स्वर्गीय नहीं लगता. जयपुर जैसी विजिट के बाद इस बात को आगे बढ़ाते हुए ये भी कहा जा सकता है कि वह कभी भी किसी भी शहर में अकेला नहीं होता. एक दोस्त काफी होता है पूरे शहर से उसका परिचय कराने के लिए.
गुरुवार, 29 मई 2008
हमें आपकी आवाज़ चाहिये.
हमारे एक प्रिय दोस्त विदेश से एक इंटरनेट हिन्दी रेडियो चलाते हैं. इस रेडियो पर आप शायरों की आवाज़ में उनकी ग़ज़लें, कवियों की आवाज़ में उनकी कविताएं और गीत सुन सकते हैं. कुछ प्रोफेशन गायकों ने भी अपनी आवाज़ में दूसरे रचनाकारों की रचनाओं के लिए दी है.
हमें आपकी आवाज़ चाहिये.
गीतों के लिए, कहानियों के लिए, लघु कथाओं के लिए और रेडियो पर प्रस्तुत की जा सकने वाली किसी भी रचना के लिए.
बेशक इसमें फिलहाल नहीं जुड़ा हुआ है लेकिन आपको ये सुख तो मिलेगा कि आपने एक अच्छी रचना को अपनी आवाज़ दी है और उसे दुनिया भर में कभी भी कहीं भी सुना जा सकता है. आपका नाम तो आपकी आवाज़ के साथ रहेगा ही.
आपकी ओर से सहमति मिलने पर वे आपको ईमेल से रचना भेजेंगे और आप अपने कम्प्यूर पर ऑडियो सिस्टम में उसे रिकार्ड करके वापिस भेजेंगे.
तो आप तैयार हैं अपनी आवाज़ को दुनिया भर तक पहुंचाने के लिए
मुझे ईमेल करें.
kathaakar@gmail.com
soorajprakaash@gmail.com
हमें आपकी आवाज़ चाहिये.
गीतों के लिए, कहानियों के लिए, लघु कथाओं के लिए और रेडियो पर प्रस्तुत की जा सकने वाली किसी भी रचना के लिए.
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सोमवार, 19 मई 2008
महानगर की कथाएं - एक रास्ता यह भी
"सुन री, अगले हफ्ते से बजाज सेंटर में चाइनीज और ओरिएंटल कुकरी की क्लासेस शुरू हो रही है। बहुत मन कर रहा हैं मेरा ओरिएंटल खाना बनाना सीखने का लेकिन जाऊं कैसे?
"क्यों, क्या परेशानी है?"
"परेशानी सिर्फ इतनी सी है मेरी बिल्लो रानी कि ये क्लासेस पूरे चालीस दिन की हैं और सवेरे दस से तीन बजे तक चलने वाली हैं। अब इस शौक को पूरा करने के लिए डेढ़ महीने की छुट्टी लेना कोई बहुत बड़ी समझदारी की बात तो नहीं होगी ना।"
"हम तेरी मुफ्त की छुट्टी का इंतजाम कर दें तो बता क्या ईनाम देगी।"
" सच . . . तू जो कहे . . . जहाँ तू कहे शानदार पार्टी मेरी तरफ से। बता कैसे मिलेगी मुझे छुट्टी?"
"मिलेगी बाबा . . . . जरा धैर्य से। पहले मेरे दो तीन सवालों के जवाब दे। कितने बच्चे हैं तेरे?"
"एक ही तो है केतन . . . . क्यों?"
"कोई सवाल नहीं। अच्छा ये बता ओर बच्चा तो नहीं पैदा करना है तुझे?"
"अभी तक तो सोचा नहीं। हां भी और नहीं भी।"
"कोई बात नहीं। ऐसा कर, कल ही तू जा कर अपना एडमिशन करवा लेना।"
" दैट्स ग्रेट। लेकिन छुट्टी।"
"छुट्टी मिलेगी आपको एमटीपी का एक लैटर दे कर। पूरे पैंतालीस दिन की। दो बार ली जा सकती है। मिसकैरिज के लिए कोई सबूत थोड़े ही चाहिये।"
"अरे वाह, मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था। मैं कल ही अपनी गायनॉक से बात करती हूँ।"
"सिर्फ अपने लिए नहीं, मेरे लिए भी बात करना। मैं भी . . . ।"
"यू टू ब्रूटस।"
"क्यों, क्या परेशानी है?"
"परेशानी सिर्फ इतनी सी है मेरी बिल्लो रानी कि ये क्लासेस पूरे चालीस दिन की हैं और सवेरे दस से तीन बजे तक चलने वाली हैं। अब इस शौक को पूरा करने के लिए डेढ़ महीने की छुट्टी लेना कोई बहुत बड़ी समझदारी की बात तो नहीं होगी ना।"
"हम तेरी मुफ्त की छुट्टी का इंतजाम कर दें तो बता क्या ईनाम देगी।"
" सच . . . तू जो कहे . . . जहाँ तू कहे शानदार पार्टी मेरी तरफ से। बता कैसे मिलेगी मुझे छुट्टी?"
"मिलेगी बाबा . . . . जरा धैर्य से। पहले मेरे दो तीन सवालों के जवाब दे। कितने बच्चे हैं तेरे?"
"एक ही तो है केतन . . . . क्यों?"
"कोई सवाल नहीं। अच्छा ये बता ओर बच्चा तो नहीं पैदा करना है तुझे?"
"अभी तक तो सोचा नहीं। हां भी और नहीं भी।"
"कोई बात नहीं। ऐसा कर, कल ही तू जा कर अपना एडमिशन करवा लेना।"
" दैट्स ग्रेट। लेकिन छुट्टी।"
"छुट्टी मिलेगी आपको एमटीपी का एक लैटर दे कर। पूरे पैंतालीस दिन की। दो बार ली जा सकती है। मिसकैरिज के लिए कोई सबूत थोड़े ही चाहिये।"
"अरे वाह, मैंने तो कभी सोचा भी नहीं था। मैं कल ही अपनी गायनॉक से बात करती हूँ।"
"सिर्फ अपने लिए नहीं, मेरे लिए भी बात करना। मैं भी . . . ।"
"यू टू ब्रूटस।"
बुधवार, 7 मई 2008
महानगर की कथाएं - एक विकल्प यह भी
-हाय, करूणा, आज कित्ते दिन बाद दिख रही है तू? मुझे लगा या तो नौकरी बदल ली तूने या ट्रेन?
- कुछ नहीं बदला शुभदा, सब कुछ वही है, बस जरा होम फ्रंट पर जूझ रही थी, इसलिए रोज ही ये ट्रेन मिस हो जाती थी।
- क्यों क्या हुआ? सब ठीक तो है ना?
- वही सास ससुर का पुराना लफड़ा। होम टाउन में अच्छा खासा घर है। पूरी जिंदगी वहीं गुजारने के बाद वहाँ अब मन नहीं लगता सो चले आते हैं यहाँ। हम दोनों की मामूली सी नौकरी, छोटा सा फ्लैट और तीन बच्चे। मैं तो कंटाल जाती हूँ उनके आने से। समझ में नहीं आता क्या करूँ।
- एक बात बता, तेरे ससुर क्या करते थे रिटायरमेंट से पहले?
-सरकारी दफ्तर में स्टोरकीपर थे।
-उनकी सेहत कैसी है?
-ठीक ही है।
-उन दोनों में से कोई बिस्तर पर तो नहीं है?
-नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है। बस, बुढ़ापे की परेशानियाँ है, बाकी तो . . . . ।
-और तेरा सरकारी मकान है। तेरे ही नाम है ना . . . . तेरे हस्बैंड की तो प्राइवेट नौकरी है . . . ?
- हाँ है तो . . . . ।
-और तेरे ससुर की पेंशन तो 1500 से ज्यादा ही होगी?
-हाँ होगी कोई 2300 के करीब।
- बिलकुल ठीक। और तू रोज रोज के यहाँ टिकने से बचना चाहती है?
- चाहती तो हूँ, लेकिन मेरी चलती ही कहाँ है। घर में उनकी तरफदारी करने के लिए बैठा है ना श्रवण कुमार।
-अब तेरी ही चलेगी। एक काम कर। अपने ऑफिस में एक गुमनाम शिकायत डलवा दे कि तेरे नॉन डिपेंडेंट सास ससुर बिना ऑफिस की परमिशन के तेरे घर में रह रहे हैं। तेरे ऑफिस वाले तुझे एक मेमो इश्यू कर देंगे, बस। सास ससुर के सामने रोने धोने का नाटक कर देना . . . .कि किसी पड़ोसी ने शिकायत कर दी है। मैं क्या करूँ? ऐसी हालत में वे जायेंगे ही।
-सच, क्या कोई ऐसा रूल है?
-रूल है भी और नहीं भी। लेकिन इस मेमो से डर तो पैदा किया ही जा सकता है।
- लेकिन शिकायत डालेगा कौन?
-अरे, टाइप करके खुद ही डाल दे। कहे तो मैं ही डाल दूँ। मैंने भी अपने सास–ससुर से ऐसे ही छुटकारा पाया है।
मंगलवार, 29 अप्रैल 2008
महानगर की कथाएं - एक और विकल्पहीन
उस स्कूल की हैडमिस्ट्रेस रोज ही देखती है कि मिसेज मनचन्दा स्कूल का समय खत्म हो जाने के बाद भी स्कूल में ही बैठी रहती हैं और लाइब्रेरी वगैरह में समय गुजारती हैं। वे आती भी सबसे पहले हैं। बाकि अध्यापिकाएं तो जितनी देर से आती हैं उतनी ही जल्दी जाने की हड़बड़ी में होती हैं। अगर मैनेजमेन्ट ने हर अध्यापिका के लिये कम से कम पांच घण्टे स्कूल में रहने की शर्त न लगा रखी होती तो कई अध्यापिकाएं तो अपने दो तीन पीरियड पढ़ा कर ही फूट लेतीं।
मिसेज मनचन्दा ने हाल ही में यह स्कूल ज्वाइन किया है। वे सुन्दर हैं, जवान हैं और सबसे बड़ी बात, बाकि अध्यापिकाओं की तुलना में उनके पास डिग्री भी बड़ी है, बेशक वेतन उनका इतना मामूली है कि महीने भर आने जाने का ऑटोरिक्शा का भाड़ा भी न निकले।
आखिर पूछ ही लिया प्रधानाध्यापिका ने उनसे।
मिसेज मनचन्दा ने ठण्डी सांस भर कर जवाब दिया है - आपका पूछना सही है। दरअसल मेरा घर बहुत छोटा है, एक ही कमरे का मकान। उसी में हमारे साथ रिश्ते का हमारा जवान देवर रहता है। रात पाली में काम करता है. मेरे पति शाम सात बजे तक ही आ पाते हैं लेकिन देवर सारा दिन घर पर रहता है। अब मैं कैसे बताऊं कि सारा दिन घर से बाहर रहने के लिये ही ये नौकरी कर रही हूं। बेशक इस नौकरी से मेरे हाथ में एक भी पैसा नहीं आता, फिर भी किसी तरह के दैहिक शोषण की आशंका से बची रहती हूं। न सही दैहिक शोषण का डर, सारा दिन उस निठल्ले की चाकरी तो नहीं बजानी पड़ती। घर पर उनकी मौजूदगी में तो मैं घड़ी भर लेट कर कमर तक सीधी करने की कल्पना नहीं कर पाती।
सोमवार, 21 अप्रैल 2008
महानगर की कथाएं- एक – विकल्पहीन
वे बहुत सारे हैं। अलग अलग उम्र के लेकिन लगभग सभी रिटायर्ड या अपना सब कुछ बच्चों को सौंप कर दीन दुनिया से, सांसारिक दायित्वों से मुक्त। सवेरे दस बजते न बजते वे धीरे–धीरे आ जुटते हैं यहाँ और सारा दिन यहीं गुजारते हैं। मुंबई के एक बहुत ही सम्पन्न उपनगर भयंदर में स्टेशन के बाहर, वेस्ट की तरफ। रेलवे ट्रैक के किनारे गिट्टी पत्थरों के ढेर पर उनकी महफिल जमती है और दिन भर जमी ही रहती है। यहाँ अखबार पढ़े जाते हैं, समाचारों पर बहस होती है, सुख दुख सुने सुनाये जाते हैं और मिल जुल कर जितनी भी जुट पाये, दो चार बार चाय पी जाती है, पत्ते खेले जाते हैं और शेयरों के दामों में उतार चढ़ावों पर, अकेले दुकेले बूढ़ों की हत्या पर, बलात्कार के मामलों और राजनैतिक उठापटक पर चिंता व्यक्त की जाती है। सिर्फ बरसात के दिनों में या तेज गर्मी के दिनों में व्यवधान होता है उन लोगों के बैठने में।
कंकरीट के इस जंगल में कोई पार्क, हरा भरा पेड़ या कुंए की कोई जगत नहीं हैं, नहीं तो यह चौपाल वहीं जमती। वे दिन भर आती जाती ट्रेनों को देखते रहते हैं और इस तरह से अपना वक्त गुजारते हैं। शाम ढलने पर वे एक–एक करके जाने लगते हैं। एक बार फिर यहाँ पर लौट कर आने के लिए।
उनके दिन इसी तरह से गुजर रहे हैं। आगे भी उन्हें यहीं बैठकर इसी तरह से पत्ते खेलते हुए बातें करते हुए और मिल जुल कर कटिंग चाय पीते हुए दिन गुजारने हैं।
ये बूढ़े, सब के सब बूढ़े अच्छे घरों से आते हैं और सबके अपने घर–बार हैं। बरसों बरस आपने सारे के सारे दिन यहाँ स्टेशन के बाहर, रेलवे की रोड़ी की ढेरी पर आम तौर पर धूप बरसात या खराब मौसम की परवाह न करते हुए बिताने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं।
किसी का घर इतना छोटा है कि अगर वे दिन भर घर पर ही जमे रहें तो बहू बेटियों को नहाने तक ही तकलीफ हो जाये। मजबूरन उन्हें बाहर आना ही पड़ता है ताकि बहू बेटियों की परदेदारी बनी रहे। किसी का बेशक घर बड़ा है लेकिन उसमें रहने वालों के दिल बहुत छोटे हैं और उनमें इतनी सी भी जगह नहीं बची है कि घर के ये बुजुर्ग, जिन्होंने अपना सारा जीवन उनके लिए होम कर दिया और आज उनके बच्चे किसी न किसी इज्जतदार काम धंधे से लगे हुए हैं, उनके लिए अब इतनी भी जगह नहीं बची है कि वे आराम से अपने घर पर ही रह कर, पोतों के साथ खेलते हुए, सुख दुख के दिन आराम से गुजार सके। गुंजाइश ही नहीं बची है, इसलिए रोज रोज की किच किच से बचने के लिए यहाँ चले आते हैं। यहाँ तो सब उन जैसे ही तो हैं। किसी से भी कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।
बेशक वे आपस में नहीं जानते कि कौन कहाँ रहता है, कइयों के तो पूरे नाम भी नहीं मालूम होते उन्हें, लेकिन फिर भी सब ठीक ठाक चलता रहता है।
बस, संकट एक ही है। अगर उनमें से कोई अचानक आना बंद कर दे तो बाकी लोगों को सच्चाई का पता भी नहीं चल पाता।
बेशक थोड़े दिन बाद कोई नया बूढ़ा आ कर उस ग्रुप में शामिल हो जाता है।
भयंदर में ही रहने वाले मेरे मार्क्सवादी दोस्त हृदयेश मयंक इसे पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते हैं जहाँ किसी भी अनुत्पादक व्यक्ति या वस्तु का यही हश्र होता है – कूड़े का ढेर। दोस्त की दोस्त जानें लेकिन सच यही है कि इस देश के हर घर में एक अदद बूढ़ा है जो समाज से, जीवन से, परिवार से और अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह रिटायर कर दिया गया है और वह अपने आखिरी दिन अपने शहर में सड़क या रेल की पटरी के किनारे पत्थर–गिट्टियों पर बैठ कर बिताने को मजबूर है।
कंकरीट के इस जंगल में कोई पार्क, हरा भरा पेड़ या कुंए की कोई जगत नहीं हैं, नहीं तो यह चौपाल वहीं जमती। वे दिन भर आती जाती ट्रेनों को देखते रहते हैं और इस तरह से अपना वक्त गुजारते हैं। शाम ढलने पर वे एक–एक करके जाने लगते हैं। एक बार फिर यहाँ पर लौट कर आने के लिए।
उनके दिन इसी तरह से गुजर रहे हैं। आगे भी उन्हें यहीं बैठकर इसी तरह से पत्ते खेलते हुए बातें करते हुए और मिल जुल कर कटिंग चाय पीते हुए दिन गुजारने हैं।
ये बूढ़े, सब के सब बूढ़े अच्छे घरों से आते हैं और सबके अपने घर–बार हैं। बरसों बरस आपने सारे के सारे दिन यहाँ स्टेशन के बाहर, रेलवे की रोड़ी की ढेरी पर आम तौर पर धूप बरसात या खराब मौसम की परवाह न करते हुए बिताने के पीछे एक नहीं कई वजहें हैं।
किसी का घर इतना छोटा है कि अगर वे दिन भर घर पर ही जमे रहें तो बहू बेटियों को नहाने तक ही तकलीफ हो जाये। मजबूरन उन्हें बाहर आना ही पड़ता है ताकि बहू बेटियों की परदेदारी बनी रहे। किसी का बेशक घर बड़ा है लेकिन उसमें रहने वालों के दिल बहुत छोटे हैं और उनमें इतनी सी भी जगह नहीं बची है कि घर के ये बुजुर्ग, जिन्होंने अपना सारा जीवन उनके लिए होम कर दिया और आज उनके बच्चे किसी न किसी इज्जतदार काम धंधे से लगे हुए हैं, उनके लिए अब इतनी भी जगह नहीं बची है कि वे आराम से अपने घर पर ही रह कर, पोतों के साथ खेलते हुए, सुख दुख के दिन आराम से गुजार सके। गुंजाइश ही नहीं बची है, इसलिए रोज रोज की किच किच से बचने के लिए यहाँ चले आते हैं। यहाँ तो सब उन जैसे ही तो हैं। किसी से भी कुछ भी छुपा हुआ नहीं है।
बेशक वे आपस में नहीं जानते कि कौन कहाँ रहता है, कइयों के तो पूरे नाम भी नहीं मालूम होते उन्हें, लेकिन फिर भी सब ठीक ठाक चलता रहता है।
बस, संकट एक ही है। अगर उनमें से कोई अचानक आना बंद कर दे तो बाकी लोगों को सच्चाई का पता भी नहीं चल पाता।
बेशक थोड़े दिन बाद कोई नया बूढ़ा आ कर उस ग्रुप में शामिल हो जाता है।
भयंदर में ही रहने वाले मेरे मार्क्सवादी दोस्त हृदयेश मयंक इसे पूंजीवादी व्यवस्था की देन मानते हैं जहाँ किसी भी अनुत्पादक व्यक्ति या वस्तु का यही हश्र होता है – कूड़े का ढेर। दोस्त की दोस्त जानें लेकिन सच यही है कि इस देश के हर घर में एक अदद बूढ़ा है जो समाज से, जीवन से, परिवार से और अपने आसपास की दुनिया से पूरी तरह रिटायर कर दिया गया है और वह अपने आखिरी दिन अपने शहर में सड़क या रेल की पटरी के किनारे पत्थर–गिट्टियों पर बैठ कर बिताने को मजबूर है।
गुरुवार, 10 अप्रैल 2008
मेरा उपन्यास देस बिराना विकिसोर्स पर
मित्रो
विकीसोर्स पर बहुत कम हिन्दी साहित्य उपलब्ध है. बेशक बहुत से हिन्दी रचनाकारों की स्तरीय रचनाएं ब्लागों में या इधर उधर बिखरी हुई हैं. हम सब को मिल कर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि हमारा साहित्य किसी कॉमन प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध हो. इसी दिशा में एक प्रयास करते हुए आज मैंने अपना उपन्यास देस बिराना इस पते पर डाला है -
http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE
बेहद पठनीय और सहज भाषा शैली में रचा गया यह मार्मिक उपन्यास एक ऐसे अकेले लड़के की कथा लेकर चलता है जिसे किन्हीं कारणों के चलते सिर्फ चौदह साल की मासूम उम्र में घर छोड़ना पड़ता है, लेकिन आगे पढ़ने की ललक, कुछ कर दिखाने की तमन्ना और उसके मन में बसा हुआ घर का आतंक उसे बहुत भटकाते हैं।
यह अपने तरह का पहला उपन्यास है जो एक साथ ज़िंदगी के कई प्रश्नों से बारीकी से जूझता है। अकेलापन क्या होता है, और घर से बाहर रहने वाले के लिए घर क्या मायने रखता है, बाहर की ज़िंदगी और घर की ज़िंदगी और आगे बढ़ने की ललक आदमी को सफल तो बना देती है लेकिन उसे किन किन मोर्चों पर क्या क्या खोना पड़ता है, इन सब सवालों की यह उपन्यास बहुत ही बारीकी से पड़ताल करता है। इसी उपन्यास से हमें पता चलता है कि भारत से बाहर की चमकीली दुनिया दरअसल कितनी फीकी और बदरंग है तथा लंदन में भारतीय समुदाय की असलियत क्या है। यह उपन्यास एमपी3 में ऑडियो में भी उपलब्ध है)
सूरज प्रकाश
विकीसोर्स पर बहुत कम हिन्दी साहित्य उपलब्ध है. बेशक बहुत से हिन्दी रचनाकारों की स्तरीय रचनाएं ब्लागों में या इधर उधर बिखरी हुई हैं. हम सब को मिल कर इस बात की कोशिश करनी चाहिये कि हमारा साहित्य किसी कॉमन प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध हो. इसी दिशा में एक प्रयास करते हुए आज मैंने अपना उपन्यास देस बिराना इस पते पर डाला है -
http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%A6%E0%A5%87%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE
बेहद पठनीय और सहज भाषा शैली में रचा गया यह मार्मिक उपन्यास एक ऐसे अकेले लड़के की कथा लेकर चलता है जिसे किन्हीं कारणों के चलते सिर्फ चौदह साल की मासूम उम्र में घर छोड़ना पड़ता है, लेकिन आगे पढ़ने की ललक, कुछ कर दिखाने की तमन्ना और उसके मन में बसा हुआ घर का आतंक उसे बहुत भटकाते हैं।
यह अपने तरह का पहला उपन्यास है जो एक साथ ज़िंदगी के कई प्रश्नों से बारीकी से जूझता है। अकेलापन क्या होता है, और घर से बाहर रहने वाले के लिए घर क्या मायने रखता है, बाहर की ज़िंदगी और घर की ज़िंदगी और आगे बढ़ने की ललक आदमी को सफल तो बना देती है लेकिन उसे किन किन मोर्चों पर क्या क्या खोना पड़ता है, इन सब सवालों की यह उपन्यास बहुत ही बारीकी से पड़ताल करता है। इसी उपन्यास से हमें पता चलता है कि भारत से बाहर की चमकीली दुनिया दरअसल कितनी फीकी और बदरंग है तथा लंदन में भारतीय समुदाय की असलियत क्या है। यह उपन्यास एमपी3 में ऑडियो में भी उपलब्ध है)
सूरज प्रकाश
रविवार, 6 अप्रैल 2008
सोमवार, 31 मार्च 2008
मेरे बचपन का शहर देहरादून
लिखो यहां वहां http://www.likhoyahanvahan.blogspot.com/ में आज पढ़ें मेरे बचपन का शहर देहरादून जो आज भी मेरी सांस सांस में बसता है.
बचपन तो सबका सांझा ही होता है और जब हमें दूसरों के बचपन के जरिये अपने बचपन में झांकने का मौका मिलता है तो हम कह उठते हैं- स्साला . . ये ही हम भी करते रहे हैं. . तो लीजिये एक झलक मेरे बचपन की..
सूरज प्रकाश
बचपन तो सबका सांझा ही होता है और जब हमें दूसरों के बचपन के जरिये अपने बचपन में झांकने का मौका मिलता है तो हम कह उठते हैं- स्साला . . ये ही हम भी करते रहे हैं. . तो लीजिये एक झलक मेरे बचपन की..
सूरज प्रकाश
गुरुवार, 27 मार्च 2008
कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में
http://kabaadkhaana.blogspot.com/ में आज पढ़ें मेरी एक सरस पोस्ट - कैसे मिलती थी शराब अहमदाबाद में.
आपको जरूर नशा आयेगा
सूरज प्रकाश
आपको जरूर नशा आयेगा
सूरज प्रकाश
सोमवार, 24 मार्च 2008
लौट कर आना ही होगा
आज मैं तीन महीने और पन्द्रह दिन के बाद पुणे में अपनी नौकरी पर वापिस आ गया हूं. 10 दिसम्बर 2007 को दिल्ली में हुए सड़क हादसे की वजह से मैं बिस्तर पर था और कभी कभार पोस्ट पर आ पाता था.
इस पूरे अरसे के दौरान सभी ब्लागी मित्रों ने मेरे शीघ्र स्वस्थ होने के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजीं और लगातार मेरा हाल पूछते रहे. मैं आप सब के प्रति आभारी हूं.
ये बेशक एक नया परिवार है लेकिन जिस तरह से बिल्कुल अनजान और अपरिचित मित्रों और पाठकों ने अपनी शुभकामनाएं भेजीं. उससे बहुत अच्छा लगा और ये विश्वास जगा कि प्रिंट मीडिया में हमने जो अपने पाठक खो दिये थे, ब्लागों की दुनिया उससे सौ गुना ज्यादा पाठक ले कर हमारे सामने है. सभी अपने और सभी आपसे संवाद करने के लिए तैयार
एक बार पुनः नमन.
हर सोमवार एक कहानी के साथ मेरे दूसरे ब्लाग soorajprakash.blogspot.com पर भी आपका स्वागत है.
सूरज प्रकाश
इस पूरे अरसे के दौरान सभी ब्लागी मित्रों ने मेरे शीघ्र स्वस्थ होने के लिए अपनी शुभकामनाएं भेजीं और लगातार मेरा हाल पूछते रहे. मैं आप सब के प्रति आभारी हूं.
ये बेशक एक नया परिवार है लेकिन जिस तरह से बिल्कुल अनजान और अपरिचित मित्रों और पाठकों ने अपनी शुभकामनाएं भेजीं. उससे बहुत अच्छा लगा और ये विश्वास जगा कि प्रिंट मीडिया में हमने जो अपने पाठक खो दिये थे, ब्लागों की दुनिया उससे सौ गुना ज्यादा पाठक ले कर हमारे सामने है. सभी अपने और सभी आपसे संवाद करने के लिए तैयार
एक बार पुनः नमन.
हर सोमवार एक कहानी के साथ मेरे दूसरे ब्लाग soorajprakash.blogspot.com पर भी आपका स्वागत है.
सूरज प्रकाश
रविवार, 16 मार्च 2008
लघु कथा- कमीशन
उस दफ्तर में ज्वाइन करते ही मुझे वहां के सब तौर तरीके समझा दिये गये थे. मसलन छोटे मामलों में कितना लेना है और बड़े मामलों में कितनी मलाई काटनी है. यह रकम किस किस के बीच और किस अनुपात में बांटी जानी है, ये सारी बातें समझा दी गयी थीं. किस पार्टी से सावधान रहना है और किन पार्टियों की फाइलें दाब के बैठ जाना है, ये सारे सूत्र मुझे रटा दिये गये थे.
मैं डर रहा था, ये सब कैसे कर पाऊंगा, अगर कहीं पकड़ा गया या परिचितों, यार दोस्तों ने यह बात कहीं सरेआम की दी तो, लेकिन भीतर कहीं खुश भी था कि ऊपर की आमदनी वाली नौकरी है. खूब गुलछर्रे उड़ायेंगे. उधर पिताजी अलग खुश थे कि लड़का सेल्स टैक्स में लग गया है. हर साल इस महकमे को जो चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है, उससे तो बचेंगे.
सब कुछ ठीक चलने लगा था. मैं वहां के सारे दांव पेंच सीख गया था. बेशर्मी से मैं भी उस तालाब में नंगा हो गया था औरी पूरी मुस्तैदी से अपना और अपने से ऊपर वालों का घर भरने लगा था.
तभी पिताजी ने अपनी दुकान की सेल्स टैक्स की फाइल मुझे दी ताकि केस क्लीयर कराया जा सके. हालांकि एरिया के हिसाब से केस मुझे ही डील करना था. लेकिन मेरे साथी और अफसर कहीं गलत अर्थ न ले लें, मैंने वह फाइल अपने साथी को थमा दी ओर सारी बात बता दी.
जब उसने केस अंदर भेजा तो उसे बुलावा आया. वह जब केबिन से निकला तो उसका चेहरा तमतमाया हुआ था. बहुत पूछने पर उसने इतना ही बताया कि बॉस ने केस क्लीयर तो कर दिया है, पर यह पूछ रहे थे कि क्या ये केस सचमुच तुम्हारे पिताजी का है या यूं ही पूरा कमीशन अकेले खाने के लिए उसे बाप बना लिया है.
सूरज प्रकाश
मैं डर रहा था, ये सब कैसे कर पाऊंगा, अगर कहीं पकड़ा गया या परिचितों, यार दोस्तों ने यह बात कहीं सरेआम की दी तो, लेकिन भीतर कहीं खुश भी था कि ऊपर की आमदनी वाली नौकरी है. खूब गुलछर्रे उड़ायेंगे. उधर पिताजी अलग खुश थे कि लड़का सेल्स टैक्स में लग गया है. हर साल इस महकमे को जो चढ़ावा चढ़ाना पड़ता है, उससे तो बचेंगे.
सब कुछ ठीक चलने लगा था. मैं वहां के सारे दांव पेंच सीख गया था. बेशर्मी से मैं भी उस तालाब में नंगा हो गया था औरी पूरी मुस्तैदी से अपना और अपने से ऊपर वालों का घर भरने लगा था.
तभी पिताजी ने अपनी दुकान की सेल्स टैक्स की फाइल मुझे दी ताकि केस क्लीयर कराया जा सके. हालांकि एरिया के हिसाब से केस मुझे ही डील करना था. लेकिन मेरे साथी और अफसर कहीं गलत अर्थ न ले लें, मैंने वह फाइल अपने साथी को थमा दी ओर सारी बात बता दी.
जब उसने केस अंदर भेजा तो उसे बुलावा आया. वह जब केबिन से निकला तो उसका चेहरा तमतमाया हुआ था. बहुत पूछने पर उसने इतना ही बताया कि बॉस ने केस क्लीयर तो कर दिया है, पर यह पूछ रहे थे कि क्या ये केस सचमुच तुम्हारे पिताजी का है या यूं ही पूरा कमीशन अकेले खाने के लिए उसे बाप बना लिया है.
सूरज प्रकाश
बुधवार, 12 मार्च 2008
न्यू यार्क का विश्व हिन्दी सम्मेलन - माया मिली न राम
विश्व हिन्दी सम्मेलन जुलाई 07 के तीसरे सप्ताह में न्यूयार्क में आयोजित किया गया था और जिन लोगों ने उसमें हिस्सेदारी की थी, उनके कटु अनुभव अरसे तक मीडिया में छाये रहे थे. ये अनुभव हर तरह के थे. अव्यवस्था से ले कर सम्मेलन में भाव न दिये जाने तक, लेकिन जो लोग किन्हीं कारणों से वहां नहीं जा पाये थे उनमें से कुछ का अलग ही दुखड़ा है. सम्मेलन में हिस्सेदारी के लिए मई 07 में विदेश मंत्रालय के हिन्दी विभाग में जमा कराये गये चार हजार रुपये मंत्रालय ने अब तक वापिस नहीं किये हैं हालांकि इस संबंध में उन्हें समय रहते जून 2008 में ही सूचित किया गया था. पत्र या ईमेल का कोई जवाब नहीं दिया जाता और फोन करने पर यही उत्तर मिलता है कि अभी और समय लगेगा और इस समय लगने के पीछे इतनी लम्बी कहानी सुनायी जाती है कि आप एसटीडी का बिल बढ़ने के डर से खुद ही फोन काट दें.
कैसा है ये विभाग जिसे पैसे लौटाने जैसे मामूली काम के लिए नौ महीने का समय कम पड़ रहा है.
सूरज प्रकाश, लेखक, अनुवादक और पत्रकार,
एच1/101 रिद्धी गार्डन, फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व मुंबई 97
कैसा है ये विभाग जिसे पैसे लौटाने जैसे मामूली काम के लिए नौ महीने का समय कम पड़ रहा है.
सूरज प्रकाश, लेखक, अनुवादक और पत्रकार,
एच1/101 रिद्धी गार्डन, फिल्म सिटी रोड, मालाड पूर्व मुंबई 97
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