शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

लौटना मुंबई नगरी....

पुणे में लगभग चार बरस और दो महीने बिताने के बाद आज अपनी 29 बरस पुरानी कर्मस्थली मुंबई लौट रहा हूं। मुंबई आना जाना पहले भी होता रहा है। 1989 से 1995 तक मैं अहमदाबाद में रहा था और तब मैं वहां से बहुत अमीर हो कर लौटा था। जि़ंदगी के सही मायनों में अमीर। वहां ढेरों मित्र बने, खूब घुमक्कड़ी की, ट्रैकिंग की, गुजराती भाषा सीखी और कई किताबों के अनुवाद किये थे। खूब मस्ती की थी और गम्भीर साहित्य पढ़ा था। शास्त्रीय संगीत सुनने और गुनने की तमीज वहीं आयी थी। वहीं रहते हुए सीखा था कि शनिवार की दोपहर से ले कर सोमवार की सुबह तक मौन कैसे रहा जा सकता है। एक बार नहीं, कर्इ बार।
एक तरह से वहीं रहते हुए लिखना शुरू हुआ था और पहला कहानी संग्रह वहीं रहते हुए आया था। तभी गुजरात साहित्य अकादमी बनी थी और आस पास और कोई कहानीकार न पा कर उन्होंने पहला साहित्य अकादमी सम्मान मुझे ही थमा दिया था। तब शहर में आने वाले अमूमन सभी साहित्याकारों के सम्मान में साहित्यिक जमावड़े मुझ छड़े के घर पर ही होते थे। हम यार दोस्त तो आपस में मिल कर धमाल मचाते ही थे।
शायद तब दो एक बातें मेरे पक्ष में थीं। एक तो उम्र तब चालीस से कम थी और मैं साहित्य का ककहरा सीख रहा था। अहमदाबाद जाते समय मेरे पास कुल जमा तीन कहानियों की जमा पूंजी थी। हंस में यह जादू नहीं टूटना चाहिये और धर्मयुग में अधूरी तस्वीर तब छपी ही थीं। वर्तमान साहित्य में उर्फ चंदरकला अहमदाबाद में रहते हुए ही आयी थी और मैं रातों रात उस वक्त का सबसे विवादास्पद लेखक बन चुका था। इस तरह से गुजरात ने मुझे बहुत कुछ‍ दिया था और जब मैं वहां से लौटा था तो बेशक कहानियां ज्यादा नहीं थीं मेरे पास लेकिन अगले दस बरस के लेखन के लायक कच्चा माल मेरे पास था और मैं उसी की पुडि़या बना बना कर लिखता छपता रहा। मैं दूसरी बार मुंबई में 1995 से 2005 तक रहा और नौकरी के चक्कर में बेहद व्यस्त रहने के बावजूद मेरी मूल, अनूदित और संपादित 17 किताबें आयीं।
लेकिन सच कहूं तो पुणे यानी पुण्य नगरी में पचास महीने बिता कर जाने के बाद भी मैं लगभग खाली हाथ ही वापिस जा रहा हूं। एक भी कहानी नहीं लिखी। बस, चार्ली चैप्लिन और चार्ल्स डार्विन के अनुवाद ही हो पाये। बेशक पढ़ा खूब और फिल्में भी खूब देखीं लेकिन मैं पुणे में कुछ नया लिखने, दोस्त बनाने, पुणे के भीतर उतरने और बहुत कुछ जानने आया था। हो ही नहीं पाया। मेरी झोली ही फटी निकली। अगर बाद में मेल मुलाकात के न्यौते आये भी तो मेरा अहं आड़े आ गया और नुक्सान में मैं ही रहा। मेरी बहुत अच्छी दोस्त सुनीता इस बात को ले कर आज तक मुझसे नाराज़ है कि मैं खुद आगे बढ़ कर मौके के अनुरूप अपने आपको प्रस्तुत क्यों नहीं कर पाता। ये अलग बहस का मुद्दा है।
हां, इस दौरान ब्लागों और इंटरनेट के जरिये एक बहुत बड़े पाठक वर्ग से जुड़ने का सुख मिला और एक नयी दुनिया से रू ब रू हुआ।
बेशक कुछ बातों का संतोष भी है कि मैं अपने ऑफिस में बेहतर तरीके से हिन्दी और साहित्य के लिए कुछ कर पाया। बैंकिंग महाविद्यालय में कहानी पाठ, नाटक, प्रेम चंद की 125वीं जयंती पर कई आयोजन, बैंकिंग विषयों पर राष्ट्रीय स्तर के 6 सेमिनार और 1000 से भी ज्यादा बैंकरों को कम्‍प्‍यूटर, अनुवाद और अब यूनिकोड का प्रशिक्षण संतोष देने वाले प्रसंग हैं। कहानी पाठ की परम्परा शायद बैंकिंग जगत में मैंने ही शुरू की हो। सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, शेखर जोशी, गोविंद मिश्र, मनहर चौहान, आबिद सुरती, ओमा शर्मा, दामोदर खड़से, रजनी गुप्त, अल्पना मिश्र और वंदना राग सरीखे कहानीकारों ने हमारे यहां कहानी पाठ करके अगर बैंकरों का दिल जीता तो राजेन्द्र यादव और वेद राही ने भी अपनी उपस्थिति से महाविद्यालय को गरिमा प्रदन की।
तो विदा पुणे नगरी, आना जाना तो लगा रहेगा लेकिन ये कचोट जरूर रहेगी कि जो कुछ सोच कर आया था, दिया नहीं तुमने मुझे।
फिर सही।

सोमवार, 8 जून 2009

कितना अच्‍छा दिन

सुबह सुहानी है। मौसम मीठा मीठा सा तराना छेड़े हुए है। आज का दिन हमारे लिए खास है। बड़ा बेटा अपनी पहली नौकरी पर गया है। नागपुर से बीटेक और आइआइएम, लखनऊ से एमबीए करने के बाद। मेरे खराब स्‍वास्‍थ्‍य के बावजूद मेरी हिम्‍मत बढ़ाने के लिए उसने मुझे अपने पैंट कमीज प्रेस करने के लिए दिये जो मैंने खुशी खुशी कर दिये। मुझे टाई की नॉट लगाने के लिए दी। मैंने लगा दी।
कई बरस पहले के दिन याद आ गये। बीस बरस पहले भी उसे स्‍कूल भेजने के दिन हम इतने ही उत्‍साह में थे। उसे तैयार कर रहे थे। तब बरसात हो रही थी और बेटा चिल्‍ला रहा था - जल्‍दी करो रेन कोट पहनाओ नहीं तो बरसात रुक जायेगी और रेनकोट पहनना बेकार हो जायेगा। आज भी बेशक मौसम वैसा ही है लेकिन बरसात नहीं है। शहर बेशक वही है। तब बंबई था अब मुंबई हो गया है।
वक्‍त कितनी तेजी से करवट बदलता है। पता ही नहीं चलता कब हम बूढ़े हो गये और बच्‍चे बड़े। कई बार हम बूढ़े होने से इनकार भी कर देते हैं। बस या राह में कोई अंकल कहे या मराठी या गुजराती में वढील यानी बुजुर्ग कहे तो नाराज हो जाते हैं। दिल्‍ली यात्रा में एक बस में इस बार कंडक्‍टर ने मेरी सफेद दाढ़ी देख कर मुझसे कहा कि सीनियर सिटीजन की सीट पर जो आदमी बैठा है उसे उठा कर आप बैठ जाओ लेकिन मैंने तकलीफ के बावजूद इनकार कर दिया कि सीनियर सिटीजन का हक मांगने लायक तो नहीं ही हुआ। खड़ा रहा। तब कंडक्‍टर खुद उठ कर उस आदमी तक गया और मेरे लिए सीट खाली करायी। तब बैठा।
एक और मजेदार किस्‍सा हुआ। मेरी एक मित्र है - फोन वाली मित्र। कभी मिले नहीं। मिलेंगे भी नहीं, पता नहीं। अक्‍सर बातें करते हैं। पढ़ाती है। अक्‍सर मेरी सलाह लेती रहती है और अपने सुख दुख बांटती है। उसे कुछ काम की सलाह दी होगी तो बेहद खुश थी। कहने लगी कि सूरज तुम्‍हें कुछ देना चाहती हूं - मना मत करना। मैं हैरान, फोन पर भला क्‍या देगी। उसने फोन पर किस करने की आवाज निकाली और कहा - ये स्‍वीट किस मेरी तरफ से। मैं हँसने लगा। बोली - हँसे क्‍यों। मैंने जवाब दिया कि मैं अट्ठावन बरस की उम्र में फोन पर इश्‍क लड़ा रहा हूं और पप्पियां पा रहा हूं। मेरे पिता जी जब इस उम्र में थे तो पेंशन का हिसाब लगाते रहते थे, तब उनके चार बच्‍चों की शादी हो चुकी थी और उनके चार पांच पोते पोती थे। ये बात 1985 की है और वे ये सब करने की सोच भी नहीं सकते थे। हम न केवल कर रहे हैं बल्कि ये उम्‍मीद भी करते हैं कि अभी तो ये सब चलते रहना है।
हमें पता है कि बेटा कभी कभार पी लेता है या सिगरेट के कश ले लेता है। छ: बरस हास्‍टलों में रहा और जिस तरह के माहौल में, अकेलेपन में और पढ़ाई के तनावों में रहा हम समझ सकते हैं कि कई बार इन चीजों से बचना मुश्किल होता है। लेकिन उसने जब भी पी, मम्‍मी को फोन पर बता दिया कि आज थोड़ी सी ली है। हमें खबर रहती है। अब मैं उसे किस मुंह से मना करूं जब कि मैं खुद ये सारी हरकतें बीस बरस की उम्र से पहले शुरू कर चुका था।
वह बी टैक करके आया था और उसका घर पर पहला दिन था। हम बातें कर रहे थे और उसकी बहुत इच्‍छा थी कि मेरे साथ पहली बार बीयर पीये। वह घंटों से जद्दो जहद कर रहा था लेकिन कह नहीं पा रहा था। शायद नागपुर से तय करके आया था कि पीयेगा लेकिन कहे कैसे। तभी मैंने उससे कहा कि बेटे अब तुम ग्रेजुएट हो गये हो इस हिसाब से मेरे दोस्‍त हुए। हम अब बराबरी से बात कर सकते हैं। चलो बेटे तुम्‍हारे ग्रेजुएशन की खुशी में हम दोनों आज एक साथ बीयर पीयेंगे।
आप समझ नहीं सकते उसे इस बात से कितनी राहत मिली कि मैं अपने इस एक ही वाक्‍य से उसकी दुनिया में शामिल हो पाया और उसे अपनी दुनिया में ले आया।
उसी ने तब ये बात बतायी थी कि वह मुझसे बीयर पीने के लिए कहने के लिए दो दिन से कहना चाह रहा था। डर भी रहा था कि मैं पता नहीं कैसे रिएक्‍ट करूं। बेशक अब वह एमबीए हो कर आ गया है, आज पहला दिन है उसके जॉब का लेकिन हम दोनों ने दोबारा नहीं पी है एक साथ। जरूरत ही नहीं हुई।
कभी मेरे पिता ने भी मेरा संकोच इसी तरह से दूर किया था और मेरी तरफ दोस्‍ती का हाथ बढ़ाया था। मैं अपनी नौकरी के सिलसिले में 22 बरस की उम्र में घर से 2000 मील दूर हैदराबाद में तीन बरस तक रहा था और दोस्‍तों के साथ कभी कभार बैठने लगा था। तभी घर लौटने पर एक बार मेरे पिता ने कहा था कि अगर नहीं पीते हो तो बहुत अच्‍छी बात है और अगर पीते हो तो हमारी कम्‍पनी में पी सकते हो। हम तुम्‍हें अच्‍छी कम्‍पनी देंगे। तय था कि कभी उनके साथ बैठ कर पी जायेगी तो पूरे अनुशासित तरीके से और लिमिट में ही पी जायेगी। हम बाप बेटे (मैं और मेरे पिता) आज भी एक साथ बैठ कर पीते हैं लेकिन सारी मर्यादाओं में रहते हुए।
मैं नहीं चाहूंगा कि ये परम्‍परा आगे भी जारी रहे लेकिन आने वाले वक्‍त के बारे में कौन कह सकता है।

शुक्रवार, 22 मई 2009

कठपुतली का खेल

पिछले कुछ दिनों अस्पताल में रहना पड़ा तो पहले भी कई बार देखी फिल्म साउंड ऑफ म्यूजिक अपने लैपटॉप पर देख रहा था। फिल्म में एक दृश्य है जिसमें बच्चे घर पर ही अपने मेहमानों को कठपुतली का खेल दिखाते हैं। इस दृश्य को देख कर अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हमें अक्सर अपने मोहल्लों में ही न केवल कठपुतली के खेल देखने को मिल जाते थे बल्कि कई बार दो-चार पैसे में बायोस्कोप दिखाने वाले भी आते रहते थे। संगीत और गीत ऐसे सभी खेलों का अनिवार्य हिस्सा हुआ करता था। कई बार इन खेलों में विश्वसनीयता भरने के लिए पात्रों के अनुरूप कोई कहानी भी सुनायी जाती थी। बायोस्कोप वाले ये पुराना फिल्मी गीत जरूर गाते थे - देखो देखो देखो, बायोस्कोप देखो, दिल्ली का कुतुब मीनार देखो, लखनऊ का मीना बाजार देखो। एक लाइन शायद मोटी-सी धोबन के लिए भी हुआ करती थी।
वे सारे दिन हवा हो गये।
ये सारी चीजें हमारी स्मृतियों के साथ ही दफन हो जायेंगी। हो सकता है हमसे पहले वाली पीढ़ी के पास अपने-अपने बचपन की स्मृतियों का इनसे अलग कोई अनमोल खज़ाना हो। वह भी हम तक या हमारी बाद की पीढ़ी तक कहां पहुंचा है।
हमारा बचपन लकड़ी और मिट्टी के खिलौने से ही खेलते बीता है। गुल्ली डंडा, चकरी, कंचे, लट्टू, गेंद तड़ी, लुका-छिपी, पतंग उड़ाना और लूटना, आइस-पाइस, पुराने कपड़ों से जोड़-तोड़ कर बनायी गयी गेंद और कुछ ऐसे खेल जिनमें कुछ भी पल्ले से लगता नहीं था। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा हो जाये। पेड़ों पर चढ़ना तो सबके हिस्से में आता ही था, दूसरों के बगीचों में फल पकने का इंतज़ार भला कौन कर पाता था। अगर आसपास तालाब हुआ तो तैराकी की ट्रेनिंग तो सेंत-मेंत में ही मिल जाया करती थी। किराये की साइकिल की दुकानें हर मौहल्ले में हुआ करती थीं जहां दो आने में घंटा भर चलाने के लिए छोटी साइकिल किराये पर मिल जाया करती थी।
वे दिन भी हवा हुए।
दस-पन्दह बरस पहले तक बच्चों के हाथ में चाहे जैसे भी हों, खिलौने नज़र आ जाते थे। इलैक्ट्रानिक या बैटरी से चलने वाले। फिर वीडियो गेम का वक्त आया। यानी ऐसे खेल जो आप मशीन से ही खेलते हैं, अकेले खेलते हैं और घर बैठे खेलते हैं।
वे दिन भी गये।
वक्त बीतने के साथ-साथ मिल-जुल कर खेलने वाले खेल कम होते गये। हमारी कॉलोनी में बच्चे बेशक शाम के वक्त एक साथ खेलते और शोर करते नज़र आते हैं लेकिन वे बेहद संयत और अनुशासित तरीके से खेल रहे होते हैं।
आजकल के बच्चे खेलों के मामले में और अकेले हो गये हैं। वे मोबाइल पर या पीसी पर गेम खेलते नज़र आते हैं जिनमें सारे रोमांच तो होते हैं, बस नहीं होती तो खेल भावना या खुद खेलने का अहसास। मोबाइल ने तो सबको इतना अकेला कर दिया है कि सोच कर ही डर लगता है।
बच्चे या तो मोबाइल पर गेम खेल रहे होते हैं या फिर ईयर फोन कानों में ठूंसे अपनी अपनी पसंद का संगीत सुनते नज़र आते हैं। आपस में संवाद की तो गुंजाइश ही नहीं रही है। सब कुछ एसएमएस के जरिये। जब संवाद नहीं होगा तो झगड़े भी नहीं होंगे और जब झगड़े नहीं होंगे तो सहनशक्ति कैसे बढ़ेगी, त्याग की भावना कहां से आयेगी। लेने के अलावा देने के सुख का कैसे पता चलेगा। रूठने मनाने की रस्में कैसे अदा होंगी।
हमें याद आता है हमारे खेल न सिर्फ खेल होते थे, बल्कि जीवन के कई जरूरी पाठ सीखने के मैदान भी होते थे। कितने तो झगड़े होते थे। कई बार सिर फुट्टौवल की नौबत आ जाती थी और मां-बापों को बीच में आना पड़ता
था। मज़े की बात ये होती थी कि बच्चों के झगड़ों में बड़ों के बीच नाराज़गी महीनों चलती थी लेकिन बच्चे अगली सुबह फिर वही एक होते थे और गलबहियां डाले वही मस्ती कर रहे होते थे।
रामलीला हमारे बचपन का अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थी। रामलीला बेशक दस बजे शुरू होती हो, साढ़े आठ बजते ही हम झुंड के झुंड बच्चे अपनी अपनी दरी और शॉल वगैरह ले कर सबसे आगे बैठने के चक्कर में निकल पड़ते थे और आखिरी सीन के बाद ही लौटते थे। घर वापिस आने की यात्रा भी बेहद रोमांच भरी होती थी। कई लोग बाहर सड़कों पर अपनी चारपाइयों पर सोये नज़र आते थे तो उन्हें चारपाइयों समेत उठा कर दूसरी जगह ले जा कर छोड़ आना हमारा प्रिय शगल होता था। गर्मियों की रातों में तो हम ये काम बहुत मज़े से करते थे।
हमारे बच्चे इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे कि हम खुद इसी तरह पूरे बचपन गली-मुहल्ले में या छतों पर चारपाइयां डाल कर सोते रहे हैं। गर्मियों में रात आने से पहले आँगन में या छतों पर पानी का छिड़काव करना ज़रूरी काम हुआ करता था।
वे दिन भी हवा हुए।
मेरे बच्चे अब बड़े हो चले। मुंबई महानगर में रहे हैं और कॉलोनियों में ही रहते आये हैं तो लकड़ी और मिट्टी के खिलौने, गुल्ली डंडा, चकरी, कंचे, लट्टू, गेंद तड़ी वगैरह उन्हें झोपड़पट्टी के बच्चों वाले खेल लगते रहे। ये चीज़ें अब मिलती भी नहीं। पेड़ों पर चढ़ना उन्हें आता नहीं, ट्यूशनों के चक्कर में कभी भी स्विमिंग सीखने के लिए समय नहीं निकाल पाये। कभी पतंग उड़ाने का मूड हुआ भी तो बिल्डिंग का वाचमैन छत की चाबी ही नहीं देता। हर बार रह जाता है। हां, साइकिल जरूर चला लेते हैं। मुंबई में आपको हर कालोनी में न चलायी जा रही साइकिलों की अच्छी खासी कब्रगाह जरूर नज़र आ जायेगी। हम उस दो आने की किराये की साइकिल पर घंटे भर में पूरे शहर का चक्कर लगा आते थे, अब बच्चे साइकिल ले कर बाहर सड़क पर जाने के बारे में सोच ही नहीं सकते। ट्रैफिक इतना कि आदमी सही सलामत सड़क पार कर ले तो बहुत बड़ी बात है।
कुछ बरस हुए, छोटे बेटे का लट्टू खेलने का मन हुआ। किसी दोस्त को खेलते देख कर आया होगा। यकीन मानिये, बाजार में रंगीन और लाइट वाले प्लास्टिक के लट्टू तो बहुत थे लेकिन रस्‍सी लपेट का हथेली पर भी खेला जा सकने वाले लकड़ी के लट्टू की खोज ने मुझे नाकों चने चबवा दिये। हम खिलौनों की कम से कम पचास दुकानों पर तो गये ही होंगे। कई दिन के बाद मिला लट्टू झोपड़पट्टी की एक दुकान में लेकिन तब तक बच्चे का लट्टू खेलने की इच्छा ही मर चुकी थी।
वे लट्टू भी हवा हुए।

सूरज प्रकाश

मंगलवार, 12 मई 2009

बहुत निराश हुआ चालीस बरस बाद अपने स्‍कूल जा कर

बहुत बरसों से ये इच्‍छा थी कि अगली बार जब भी अपने शहर देहरादून जाऊं, उस गांधी स्‍कूल में जरूर जाऊं जहां से मैंने 1968 में हाईस्‍कूल पास किया था। बेशक 1974 में नौकरियों के चक्‍कर में हमेशा के लिए मैंने अपना शहर छोड़ दिया था और उसके बाद भी कुछ बरस तक वहां रहा था, छठे छमाहे वहां जाने के बावजूद स्‍कूल के अंदर कभी जाना नहीं हो पाया था। कभी स्‍कूल बंद होता था तो कभी मेरे पास ही टाइम का टोटा होता था।
मैं कभी बहुत अच्‍छा विद्यार्थी नहीं रहा था। उस समय के चलन के हिसाब से हम सब बच्‍चे मास्‍टरों की वज‍ह बेवजह मार खाते ही बड़े होते रहे और अगली कक्षाओं में जाते रहे। लेकिन कुछ था जो इतने बरसों से मुझे हॉंट कर रहा था कि उस सारे माहौल को एक बार फिर महसूस करना है जहां से निकल कर मैं यहाँ तक पहुंचा हूं। बेशक कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार पाया साहित्‍य या नौकरी में या जीवन में लेकिन जो भी बना हूं, नींव पड़ने का सिलसिला तो उसी स्‍कूल में शुरू हुआ था।
कुछ खट्टी मीठी यादें थीं जो ताज़ा कर लेना चाहता था और भले की कुछ देर के लिए ही सही, उस पुराने माहौल में वक्‍त गुज़ारना चाहता था।
इस बार तय कर लिया था कि जाना ही है। मैंने कन्‍फर्म करने के लिहाज से प्रधानाचार्य का नाम पता किया था और उन्‍हें खत डाला था कि इस तरह मैं एक पूर्व विद्यार्थी के नाते स्‍कूल आना और बच्‍चों से मिलना बतियाना चाहता हूं। जाने से पन्‍द्रह बीस रोज पहले उप प्रधानाचार्य का फोन भी आ गया था और उन्‍होंने इस बात पर बहुत खुशी जाहिर की थी। कहा था कि पहुंचने पर मैं उन्‍हें सूचित कर दूं।
तय दिन की सुबह तक मेरे पास कोई जानकारी नहीं थी कि मुझे कितने बजे पहुंचना है वहां। मजबूरन इंटरनेट से बीएसएनएल की मदद से प्रिंसिपल के घर का नम्‍बर खोजा और उन्‍हें याद दिलाया कि मैंने उन्‍हें आने के बारे में खत लिखा था। थोड़ी देर माथापच्‍ची करने पर उन्‍हें याद आ गया। बोले कभी भी चले आओ। मैं हैरान हुआ, मैंने अपने पत्र में लिखा भी था और उप प्रधानाचार्य को फोन पर भी बताया था कि मैं बच्‍चों के बीच कुछ वक्‍त गुज़ारना चाहता हूं।
खैर, पुस्‍तकालय के‍ लिए और छोटी कक्षाओं के बच्‍चों के लिए भेंट स्‍वरूप देने के लिए खरीदी गयी किताबों का बैग संभाले में जब स्‍कूल के गेट पर पहुंचा तो याद आया कि दो मिनट की देरी हो जाने पर भी ये गेट हमारे लिए किस तरह से बंद हो जाया करता था और प्रार्थना की सारी औपचारिकताएं निपट जाने के बाद ही खुलता था और दो बेंत मार खाने के बाद ही हमें अंदर आने दिया जाता था।
गेट लावारिस सा खुला हुआ था। किसी ने नहीं रोका मुझे।
प्रिंसिपल का कमरा भी गेट की तरह लावारिस तरीके से खुला था और भीतर बाहर कोई नहीं था। तब हम इस बात की कल्‍पना भी नहीं कर सकते थे। वैसे तो पूरा स्‍कूल ही मातमी तरीके से उजड़ा हुआ लग रहा था और साफ पता चल रहा था कि लापरवाही का साम्राज्‍य है। प्रिंसिपल के कमरे के दोनों तरफ दीवार पर बने दो ब्‍लैक बोर्ड अभी भी थे। याद करता हूं कितने बरसों तक मैंने बायें वाले बोर्ड पर अख़बार से देख कर समाचार लिखे होंगे। गैरी सोबर्स के एक ओवर में छ: छक्‍के लगाने का समाचार इस बोर्ड पर मैंने ही लिखा था।
तब हमारा स्‍कूल सप्‍ताह के छ: दिनों के हिसाब से छ: दलों में बंटा हुआ होता था। नाम याद करने की कोशिश करता हूं: नालंदा, विक्रमशिला, सांची, उत्‍तराखंड, वैशाली और .. बाकी एक नाम याद नहीं आ रहा। जिस दल का दिन हो, वह दायीं तरफ वाले बोर्ड पर अपने दल के पदाधिकारियों के नाम लिखता था और पूरे दिन अनुशासन और सफाई का काम संभालता था। स्‍कूल की सारी गतिविधियां दलों के बीच होती थीं। मैं जिस दल में भी रहा, बोर्ड पर खूब सजा कर लिखने की जिम्‍मेवारी मेरी हुआ करती थी। अब दोनों बोर्ड साफ थे। पता नहीं कब से कुछ भी न लिखा गया हो।
लाइब्रेरी की तरफ मुड़ा तो वहीं स्‍टाफ रूम नज़र आया। पांच सात जन बैठे हुए थे। मेज के सिरे पर बैठे सज्‍जन ही प्रधानाचार्य होंगे, ये सोच के मैंने प्रणाम किया और अपना परिचय दिया। उन्‍होंने पहचाना और भीतर आने का इशारा किया। संयोग से उनके साथ वाली सीट पर मेरे परिचित हिन्‍दी अध्‍यापक बैठे हुए थे। वे उठ खड़े हुए और दो चार मिनट में मेरी सारी उप‍लब्धियां गिना डालीं।
परिचय का दौर शुरू हुआ। पता चला कि इस समय कुल आठ अध्‍यापक हैं और करीब 300 विद्यार्थी। बाकी पार्ट टाइम। जबकि स्‍कूल में अब सीबीएससी सेलेबस पढ़ाया जाता है। मैं हैरान हुआ, उस वक्‍त हमारा स्‍कूल शहर का सबसे बढि़या स्‍कूल माना जाता था और वहां प्रवेश पा लेना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। तब पन्‍द्रह सौ विद्यार्थी और तीस पैंतीस अध्‍यापक तो रहे ही होंगे। सहस्रधारा नाम की वार्षिक पत्रिका भी निकलती थी जो हमें रिजल्‍ट के साथ दी जाती थी।
मैं डाउन मेमोरी लेन उतर चुका था और हर विषय के अध्‍यापक का नाम और उनके पढ़ाने के तरीके के बारे में बता रहा था। कितना कुछ तो था जो याद आ रहा था। स्‍टाफ रूम में जितने भी लोग बैठे थे, वे हमारे वक्‍त के कुछ अध्‍यापकों के साथ काम कर चुके थे। प्रिंसिपल भी। सब हैरान थे कि चालीस बरस बीत जाने के बाद भी मुझे सब कुछ जस का तस याद है। अब उन्‍हें मैं कैसे बताता कि हर लेखक के पास स्‍मृतियों का ऐसा खज़ाना होता है कि वह चाह कर भी नहीं भूल पाता। वह उसकी पूंजी होती है और वही लेखन के लिए कच्‍चा माल।
मैंने स्‍कूल का एक चक्‍कर लगाने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। हिन्‍दी अध्‍यापक और प्रिंसिपल साथ चले। सबसे पहले लाइब्रेरी। हमारे वक्‍त मंगला प्रसाद पंत हुआ करते थे लाइब्रेरियन। उन्‍हें गुज़रे सदियां बीत गयीं। अगला झटका मेरा इंतज़ार कर रहा था। लगा कि चालीस बरस से किताबों की अलमारियां खुली ही नहीं हैं। तालों में सदियों से बंद पुरानी किताबें न पढ़े जाने की अपनी हालत पर आंसू बहा रही थीं। स्‍कूल चल रहा था। न लाइब्रेरियन थे वहां न कोई बच्‍चा।
अगला क्‍लास रूम। एक और झटका बारहवीं क्‍लास के कमरे में। देखा बारहवीं के बच्‍चे अब स्‍टूल पर बैठ कर पढ़ते हैं। मुझे याद आता है हम इसी स्‍कूल में दूसरी तीसरी में भी बेंच पर बैठा करते थे। दसवीं तक आते आते तो सबको छोटी छोटी कुर्सियों पर बैठना होता था।
एक और झटका। जिस कमरे में हम पांचवीं कक्षा में बैठते थे, वहां अब पहली, तीसरी और पांचवीं की कक्षाएं एक साथ चल रही थीं। तीन कोनों में तीन कक्षाएं। पन्‍द्रह बीस बच्‍चे। मैं बेहद उदास हो गया। ये क्‍या हो गया है मेरे शानदार स्‍कूल को कि स्‍कूल के आधे से ज्‍यादा कमरों में ताले लगे हुए हैं और तीन कक्षाओं के बच्‍चे एक ही कमरे में पढ़ रहे हैं। मैंने बैग से बच्‍चों के लिए लायी सारी किताबें निकालीं और हैड मिस्‍ट्रेस को देते हुए कहा - ये बच्‍चों में बांट देना। वह हैरानी से मेरा चेहरा देखने लगी। मैंने हँसते हुए बताया कि इसी कमरे में पैंतालीस साल पहले मैंने पांचवीं कक्षा की पढ़ाई की थी। हैड मास्‍टर राम किशन की लातें खाते हुए। उन्‍हीं दिनों की याद में।
प्रिंसिपल अपना रोना रो रहे थे कि कोई सहयोग नहीं करता। फंड्स की कमी रहती है। ये कमी और वो कमी। सब बकवास। असली समस्‍या है कि अब हिन्‍दी स्‍कूलों में कोई अपने बच्‍चे भेजना ही नहीं चाहता। आप जितनी भी कोशिश कर लें, आपके हिस्‍से में वे ही बच्‍चे आयेंगे जिनके मॉं बाप महंगे स्‍कूलों की फीस एफोर्ड नहीं कर सकते।
हम पूरे उजाड़ स्‍कूल का चक्‍कर लगा कर वापिस आ गये था। कुछ कमरों से पढ़ाने की आवाज़ें आ रही थीं लेकिन न तो प्रिंसिपल ने ऐसा कोई संकेत दिया और न ही मेरी ही इच्‍छा हुई कि मैं बच्‍चों से बात करूं। कितना तो होमवर्क करके आया था। सोचा था कि पूरे स्‍कूल के बच्‍चों और मास्‍टरों को सभा कक्ष में इकट्ठा किया जायेगा जैसा कि हमारे वक्‍त होता था और मैं बच्‍चों को अपने पुराने दिन याद करते हुए ये बताऊंगा और वो बताऊंगा। उन्‍हें स्‍कूली किताबों के अलावा भी कुछ पढ़ने की सलाह दूंगा और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने के बारे में बताऊंगा। सब धरा रह गया। जबकि हिन्‍दी अध्‍यापक मेरे लेखन के बारे में अच्‍छी तरह जानते थे और मैं अपना परिचय पहले भेज चुका था। ये श्रीमान नौ बरस तक नौकरी से विदआउट पे रह कर मुंबई में गीतकार बनने के चक्‍कर में एडि़यां रगड़ते रहे। एक गीत लिखने का काम नहीं मिला। जुगाड़ करके दसेक किताबें छपवा ली हैं। अब ये जनाब पैगम्‍बर हो गये हैं और इसी नाम से नयी किताब आयी है इनकी। उपदेश देते हैं। किताब में तो घोषणा है ही और बता भी रहे हैं कि मानवता के भले के लिए उन्‍होंने जो किताब लिखी है, अगले दो हज़ार साल तक ऐसी‍ किताब नहीं लिखी जायेगी और दो हज़ार साल बाद आगे की किताब लिखने के लिए वे खुद जनम लेंगे। शायद स्‍कूल में बच्‍चे कम होने का कारण ये अध्‍यापक भी हों।
चाय पीने की इच्‍छा ही नहीं हुई। प्रिंसिपल को अपनी एक किताब भेंट की और स्‍कूल से बाहर आ गया हूं। लाइब्रेरी को देने के लिए जो किताबें लाया था, वापिस ले जा रहा हूं। जानता हूं, बच्‍चों तक कभी नहीं पहुंचेगी।
जिस कॉलेज से मार्निंग क्‍लासेस से बीए किया था, वहां भी आने के बारे में मैंने खत लिखा था और वहां से लिखित न्‍यौता भी आ गया था, लेकिन अब मैं कहीं नहीं जाना चाहता।
अतीत की एक ही यात्रा काफी है।

बुधवार, 11 मार्च 2009

युवा पुत्र की अकाल मौत से उपजे शून्‍य में घुटता परिवार

बेंगलूर में रहने वाले मेरे मित्र के जवान बेटे की पिछले बरस नवम्‍बर में रात के वक्‍त एक सड़क दुर्घटना में मृत्‍यु हो गयी थी। बेचारा डेढ़ घंटे तक सड़क पर घायल पड़ा रहा। मां परेशान हाल मोबाइल से उससे बात करने की कोशिश कर रही थी। तभी वहां से गुज़र रहे किसी मोटर साइकिल सवार ने उसके बजते मोबाइल की आवाज सुनी। वह रुका और उसका मोबाइल अटैंड किया। उसी व्‍यक्ति ने तब बताया कि आपका बेटा तो यहां बेहोश पड़ा हुआ है। मोटर साइकिल अलग पड़ी हुई है। माता पिता लपके उसकी बतायी जगह पर। तब तक वह भला आदमी एक दो लोगों की मदद से उसे पास के अस्‍पताल तक ले जा चुका था। वे उसके बताये अस्‍पताल की तरफ मुड़े।
बच्‍चा अभी भी बेहोश था और उसके सिर पर पीछे की तरफ से खून बह रहा था। रात ग्‍यारह बजे से लगभग बारह बजे तक अपनी तरफ से उसे होश में लाने, खून देने और इलाज शुरू करने की नाकाम को‍शिशें करने के बाद अस्‍पताल के स्‍टाफ ने हाथ खड़े कर दिये और उसे किसी बड़े अस्‍पताल ले जाने के लिए कह दिया। दूसरे बड़े अस्‍पताल में भी यही हुआ कि वे न तो लगातार बहता खून रोक पाये और न ही खून चढ़ा ही पाये हालांकि मेरे मित्र लगातार डाक्‍टरों को बताते रहे कि उनका ब्‍लड ग्रुप और बेटे का ब्‍लड ग्रुप एक ही है। डॉक्‍टर बार बार अंदरूनी चोटों की बात करते रहे और यही कहते रहे कि हम नब्‍ज ही नहीं पकड़ पर रहे हैं।
रात लगभग सवा एक बजे डॉक्‍टरों ने हाथ खड़े कर दिये और एक होनहार नौजवान अस्‍पताल में और डॉक्‍टरों की देखरेख में होने के बावजूद दम तोड़ गया।
जो लोग उसे अस्‍पताल ले कर गये थे उन्‍हीं में से एक ने बाद में बताया था कि उसने लड़के की मोटर साइकिल को डिवाइडर से टकराते और उसे गिरते देखा था और उसने उसी के मोबाइल से एम्‍बुलेंस के लिए 102 पर फोन भी किया था। लेकिन लगभग सवा घंटे तक कोई भी मदद उस तक नहीं पहुंच पायी थी। जिस जगह दुर्घटना हुई थी, वह बेंगलूर के अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर जाने वाली सड़क पर है लेकिन किसी ने भी रुक कर उसकी मदद नहीं की। वह चश्‍मदीद गवाह इस संभावना से भी इनकार नहीं करता कि शायद उसे किसी तेज चलते वाहन ने टक्‍कर मारी हो।
मेरे मित्र और उनका परिवार हक्‍का बक्‍का है और समझ नहीं पा रहा कि ये सब कैसे हो गया और वे कुछ भी नहीं कर पाये। वे दोनों अस्‍पतालों में डॉक्‍टरों के आगे हाथ जोड़ते, गिड़गिड़ाते रहे और ढंग से इलाज शुरू तक नहीं किया गया। सिर से बहते खून को रोकने के लिए भी कुछ नहीं किया गया।
शाश्‍वत मिश्र होनहार लड़का था और नौकरी करते हुए एमबीए कर रहा था। मात्र बाईस बरस की उम्र। बहुत सारे शून्‍य छोड़ गया है वह अपने पीछे। ये स्‍थायी सवाल तो हर बार की तरह है ही कि लोग बाग़ रोज़ाना सड़कों किसी वजह से दुर्घटनाग्रस्‍त हो गये लोगों की मदद करने में अब भी आगे नहीं आते। एंबुलेंस के लिए फोन किये जाने के बावजूद डेढ़ घंटे तक वह नहीं आती। डॉक्‍टर इस तरह के एमर्जेंसी मामलों में भी रूटीन तरीके से ही काम करते हैं और घायल की जान बचाने की कोशिश नहीं करते। मैं खुद पिछले अट्ठाईस बरस से मुंबई में देख रहा हूं कि लोकल ट्रेनों से होने वाली अलग अलग दुर्घटनाओं में घायल होने वाले सैकड़ों लोग स्‍टेशनों पर ही घंटों पड़े रहते हैं और उनमें से ज्‍यादातर इलाज के इंतजार में दम तोड़ देते हैं।
मेरे मित्र को कुछ और सवाल परेशान कर रहे हैं। ये सब हुआ कैसे। कहीं किसी ने .. लेकिन किसी भी आशंका या संभावना के लिए पुलिस को पक्‍का गवाह चाहिये।
मेरे दोस्‍त की एक और परेशानी है और वे कुछ भी तय नहीं कर पा रहे। जिस कम्‍पनी में शाश्‍वत काम पर लगा था, वहां के नियमों के अनुसार सभी कर्मचारियों की बीमा कराया जाता है। अब मेरे मित्र का संकट ये है कि बीमे में मिली इतनी बड़ी रकम का करें क्‍या। बेटे की जान की कीमत में मिली ये रकम उन्‍हें परेशान किये हुए है। वे शाश्‍वत के पिछले स्‍कूलों और कॉलेज में उसकी याद में स्‍कॉलरशिप शुरू करना चाहते हैं, अपने भूले बिसरे गांव में बच्‍चों के लिए कुछ करना चाहते हैं लेकिन बीमे की रकम निश्चित रूप से ज्‍यादा है और इस तरह की स्‍कालरशिप में पूरी राशि खर्च नहीं होगी। ये रकम उन्‍हें लगातार दबाव में रखे हुए है। वे कुछ करना चाहते हैं लेकिन तय नहीं कर पा रहे कि कैसे क्रिएटिव तरीके से इस राशि का सदुपयोग करें।
मुझे विश्‍वास है मेरे ब्‍लॉगर मित्र आगे आयेंगे और उन्‍हें कोई राह सुझायेंगे।

गुरुवार, 19 फ़रवरी 2009

न सारे जीनियस दाढ़ी रखते हैं और न सारे दाढ़ी वाले जीनियस होते हैं

पिछले दिनों जनवरी 2009 के नया ज्ञानोदय के संपादकीय में श्री कालिया जी ने दाढ़ी, मीडियाकर और जीनियस को ले कर कुछ रोचक और कुछ अरोचक टिप्पाणियां की थीं। खुद दाढ़ी वाला होने के नाते मेरा ये फर्ज बनता था कि दाढ़ी और दाढ़ीजारों के पक्ष में कुछ कहूं। उन तक मेरी बात तो समय पर पहुंच गयी थी लेकिन फरवरी अंक में मेरी बात ढूंढे नज़र नहीं आयी। तो वही पत्र अविकल यहां पेश है।
आदरणीय कालिया जी
जनवरी संपादकीय में आपने एक ही पत्थर से तीन निशाने साध लिये हैं। मीडियाकर, जीनियस और दाढ़़ी वाले। आपने तीनों वर्गों में आपसी रिश्ते को भी उजागर करने की कोशिश की है और ये भी फतवा दे डाला है कि दाढ़ी चाहे जीनियस दिखने की चाह में मीडियाकर रखे या खास दिखने की चाह‍ में जीनियस, मूलत: आलसी होता है।
मैं नहीं जानता कि ये संपादकीय लिखते समय आपके सामने कौन से मीडियाकर, जीनियस या दाढ़ी वाले रहे होंगे, लेकिन संयोग से दाढ़ी वाला मैं भी हूं (जीनियस होने का कोई मुगालता नहीं) और इस वर्ग की सच्चाई शायद बेहतर ज्यादा जानता हूं।
सिर्फ आलस ही तो नहीं होता दाढ़ी रखने का कारण और न जीनियस या खास लगने की चाह ही आदमी को दाढ़ी रखने के लिए उकसाती है। बहुत कुछ होता है हर दाढ़ी के पीछे। हर दाढ़ी वाले के पीछे। कहा और अनकहा। कई बार असफल प्रेम भी या जीवन में और कोई असफलता भी। (छठे सातवें दशक की फिल्मों में देखिये या गाइड में देव आनंद।)
पहली बात तो दाढ़ी रखने के पक्ष में ये कि दाढ़ी रखने का फैसला उस उम्र में ही ले लिया जाता है जब दाढ़ी और मुहांसे एक साथ आने शुरू होते हैं। एक तो सत्रह अट्ठारह बरस में उन मुहांसों को छुपाने की चाह और रोज़ाना नाज़ुक और कोमल चेहरे पर उस्तरा फेरने से बचने की कोशिश ही आम तौर पर दाढ़ी बढ़ाने का फैसला करने में मदद करती है। बेशक अलग दिखने की चाह भी रहती ही है लेकिन जीनियस या खास लगने की कोशिश तो बिल्कुमल भी नहीं होती उस वक्त। हां, अगर कोई गर्ल फ्रेंड बन गयी हो उस वक्त तक‍ और कहीं भूले से दाढ़ी की तारीफ भी कर दे तो फिर कहना ही क्या। तब उस कच्ची और हर तरह के सपनों से भरी नाजुक उम्र में आप कहां तय कर पाते हैं कि खास तरह का साहित्यकार या पत्रकार या बुद्धि‍जीवी बनना है आगे चलकर कि दाढ़ी रख लें तो मदद मिलेगी या खास नज़र आने में मदद करेगी दाढ़ी।
एक बात और। जो उस उम्र में दाढ़ी रखने का फैसला कर लेते हैं फिर जिंदगी भर उसे निभाहते भी हैं। आपने कभी नहीं देखा होगा कि कोई आदमी तीस या पैंतीस बरस की उम्र में दाढ़ी रखने का फैसला करे और आजीवन रखे भी रहे। जबकि शुरू से ही दाढ़ी रखने वाले जब तक हो सके, इसे प्यार से निभाहते भी हैं और दाढ़ी की कद्र करना भी जानते हैं।
तब ये आपके व्यक्तित्व का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी होती है। आप चाहें तो भी इससे अलग नहीं हो सकते। हो ही नहीं सकते। मेरी मां शुरू के दस पन्द्रह बरस मेरे पीछे पड़ी रही कि मैं दाढ़ी हटा दूं लेकिन जब मैं सिर्फ मां की खुशी के लिए कभी दाढ़ी साफ करवा भी लेता था तो मां यही कहती थी कि तू दाढ़ी में ही ठीक लगता है। रख ले।
दाढ़ी रखना कहीं भी आलस का प्रतीक नहीं। दाढ़ी रखने वाले सौ में से मुश्किल से दो लोग आलस के कारण दाढ़ी रखते होंगे। दुनिया भर में दाढ़ी रखने का प्रचलन है। सदियों से। अलग अलग तरह की दाढ़ी। जितने दाढ़ी वाले उतनी तरह की दाढ़ी। पूरी आबादी में से सात प्रतिशत लोग दाढ़ी रखते हैं। अलग अलग कारणों से और ये दाढ़ी रखने वाले सारे लोग न तो जीनियस हैं और न मीडियाकर। (पता नहीं क्या सोचकर हमारे देवताओं की तस्वीरों में कुछ देवताओं को क्लीन शेव दिखाया जाता है और कुछ को मुच्छड़, अलबत्ता सारे ऋषि मुनि अनिवार्य रूप से दाढ़ी वाले होते हैं। हमारे राम और कृष्ण क्लीन शेव वाले और यीशु मसीह दाढ़ी वाले। रावण और दुर्योधन मूछों वाले।)
दाढ़ी रखना महंगा सौदा है। आप महीने भर में जितना समय और धन अपनी शेव कराने में खर्च करते होंगे उससे ज्यादा समय और धन दाढ़ी खुरचवाने में, ट्रिमिंग कराने में और उसकी साज सज्जा करने में खर्च करना पड़ता है हमें। कुछ नाम गिनाऊं। गुलज़ार साहब की दाढ़ी यूं ही बरसों से सिर्फ चार दिन वाली दाढ़ी नहीं लगती। आप अज्ञेय जी को देखें, ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, आलोक धन्वा, ज्ञानेन्द्र पति, प्रेम पाल शर्मा और ओमा शर्मा, सत्य नारायण, अरुण प्रकाश, सूरज प्रकाश, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, यासेर आराफात, फिदेल कास्त्रो , वीरेन्द्र जैन, निराला, रवीन्द्र नाथ टैगोर, तोलस्तोय, बहुत लम्बी सूची है और पूरी सूची देना न तो संभव है न जरूरी, किसी की भी दाढ़ी देखें, उसे करीने से सजाया संवारा गया है। अब तो बच्चन सीनियर भी कुछ अलग दिखने की चाह में अध दाढ़ी वाले हो गये है़ं।
आप दाढ़ी रखने के मामले में आलस कर ही नहीं सकते। हां, बाबा रामदेव और बापू आसाराम जरूर दाढ़ी पर उतना समय या धन नहीं लगाते होंगे जितना हमारे ओशो लगाते थे। उनकी दाढ़ी करीने से रखी गयी और भव्य लगती थी। श्री श्री श्री रविशंकर की दाढ़ी भी ओशो की धुन पर बनायी गयी रिमेक लगती है।
तो कालिया जी, मेरा ये ख्याल ही है कि कभी न कभी आपने भी किसी के कहने पर दाढ़ी रखी भी होगी और किसी के कहने पर हटायी भी होगी। आपके पुराने फोटो एलबम गवाह होंगे।
अब हमारी तो रह गयी, जो नहीं रख पाये वे जाने।
सादर
सूरज प्रकाश

सोमवार, 5 जनवरी 2009

कथाकार लवलीन नहीं रहीं




अभी थोड़ी देर पहले जयपुर से दुखद खबर मिली कि कथाकार लवलीन नहीं रहीं. वे मेरी बेहद प्रिय कथाकार और मित्र थीं. कई बार उनकी तकलीफों को देख कर मन व्याकुल हो जाया करता था लेकिन उनकी जिजीविषा देख कर यह आश्वासन भी रहता था कि ये लड़की अपनी जिंदगी खींच ले जायेगी. अपनी पूरी जिंदगी उसने मनों के हिसाब से गोलियां और दूसरी दवायें खायीं और टनों के हिसाब से मानसिक और शारीरिक तकलीफें झेलीं. हजारों के हिसाब से दोस्त बनाये और उतने ही उसके दुश्मन भी रहे होंगे. मेरा उससे लम्बा पत्र व्यवहार था. धर्मयुग में शहर में अकेली लड़की के एक दिन गुजारने को ले कर उसकी एक कहानी छपी थी 1994 के आसपास. मुझे बेहद पसंद थी वह कहानी. तब से उससे खतो किताबत चलती रही. वह दो बार हमारी मुंबई में हमारी पारिवारिक मेहमान रही. एक बार जब लवलीन विजय वर्मा कथा सम्मांन लेने के लिए मुंबई आयी थी तो भी हमारी मेहमान थी. तब मैं, धीरेन्द्र् अस्थाना, उसकी पत्नी ललिता, कवि मनोज शर्मा और उसकी पत्नी लवलीन के साथ गोराई बीच पर घूमने गये थे और पूरा दिन समंदर के किनारे बिताया था. खूब बातें की थीं, धमाल मचाया था और ढेर सारी बीयर पी थी. जब बीयर खत्म हो गयी थी तो हम जिस दुकान नुमा घर के आगे बैठे थे तो वहां और बीयर लेने के लिए गये तो पता चला कि और बीयर नहीं है लेकिन दुकानदार ने हमारा मस्ती भरा व्यवहार देख कर अपनी तरफ से शराब की नन्हीं वाली बोतलें भेंट की थीं. अगली बार जब लवलीन हमारे घर ठहरी थी तो मेरी पत्नी मधु ने उसका साक्षात्कार लिया था जो किसी पत्रिका में छपा था और http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sakshatkar/lovleen.htm पर भी पढ़ा जा सकता है.
जब मैं लवलीन के घर जयपुर गया था तो उसने और उसके पति और बिटिया ने जितनी आत्मीयता से मेरा ख्याल रखा था उसे मैं भूल नहीं सकता. बीमार होने के बावजूद वह मुझे लेने के लिए स्टेशन पर आयी थी और ढेर सारी बातें करती रही थी. कभी कभार हम फोन पर बात कर लिया करते थे. वह अपनी खराब सेहत को ले कर हमेशा तनाव में रहती और बताती कि उसका भी वही हाल होना है जो उसकी मां और भाई का हुआ था यानि बेवक्त मौत. उसे समझाने के लिए मेरे पास कभी भी माफिक शब्द नहीं होते थे क्योंकि जिस तरह की कठिन जिंदगी वो जी रही थी, सहानुभूति के कोई भी शब्द बेमानी होते.
वह अपनी खराब मानसिक और शारीरिक हालत के बावजूद कई मोर्चों पर लगातार डटी रहती थी. बिटिया के कैरियर को संवारने की योजनाएं बनाती रहती थी. लिखती रहती थी और सबसे जूझती रहती थी. लगातार सिगरेट पीना, नशे के उपाय करना उसकी जरूरत बन चुके थे और उसकी इन लतों ने उसे खासी बदनामी दिलायी. पर क्या करती वह. उसके हिस्से में जितने दुख लिखे थे उन्हें भोगने के लिए उसे कुछ तो चाहिये था जो उसे अपने आप को भूलने में भी मदद करे और तकलीफों से पार पाने की हिम्मत भी दे.
उसे मेरा उपन्यास देस बिराना बहुत पसंद था लेकिन उसने ये भी कहा था - सूरज ख्याल रखना, तुमने अपना बेहतरीन इस उपन्यास में उड़ेल दिया है. कहीं ऐसा न हो कि बाद में कुछ कहने के लिए बचे ही ना. तुमने सच कहा था लवलीन, उस किताब के बाद मेरे पास कहने के लिए कुछ भी तो नहीं रहा है. लिखना ही बंद हो चुका है. लेकिन लवलीन, मैं फिर लिखूंगा और तुम्हारे लम्बे संघर्ष से प्रेरणा ले कर लिखूंगा. तुम्हारी याद को बनाये रखने के लिए जरूर लिखूंगा.
सूरज

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

मैंने पढ़ी किताबें - 2008 में

मैंने पढ़ी किताबें और देखीं फिल्में
यहां मैं 2008 के दौरान पढ़ी गयी उन किताबों की फेहरिस्त दे रहा हूं जो मैंने खरीदीं या किसी न किसी बहाने मुझ तक पहुंचीं। कुछ किताबें पुस्तकालय से ले कर भी पढ़ी होंगी लेकिन उनके नाम अभी याद नहीं आ रहे। ऐसी किताबें भी 25 तो रही ही होंगी। मेरे दोस्ती पूछ सकते हैं कि 366 दिन में इतनी ज्यादा किताबें कैसे पढ़ी जा सकती हैं भला। इसकी दो वजहें रहीं। एक्सीडेंट के कारण चार महीने तक बिस्तर पर रहा और ठीक हो जाने के बाद भी ऑफिस और घर की 4 किमी की दूरी नापने के अलावा कहीं ज्यादा दूर तक नहीं गया। सिर्फ पढ़ता रहा और बेहतरीन फिल्में देखता रहा। कुछ किताबों के नाम याद नहीं आ रहे। ये किताबें दिल्ली में अस्पताल में पढीं थीं। पहले सोचा था कि फिल्मों की तरह इन किताबों को भी अपनी पसंद के हिसाब से एक से पांच तक स्टार दूंगा लेकिन उसमें सारे दोस्तों के नाराज हो जाने का खतरा था, इसलिए सिर्फ नाम दे रहा हूं। मेरे पास अभी भी 50 किताबें तो होंगी जो अभी पढ़ी जानी हैं। उनका जिक्र अगली बार।
देखी गयी कुछ यादगार फिल्मों के नाम भी दे रहा हूं। ज्यादातर‍ फिल्में घर पर देखीं हैं।
1. मोहब्बत का पेड़ प्रिया आनंद कहानी संग्रह
2. अंधेरा समुद्र परितोष चक्रवर्ती कहानी संग्रह
3. अन्या से अनन्या प्रभा खेतान आत्म कथा
4. अपवित्र आख्यान अब्दुल बिस्मिल्लाह उपन्यास
5. आइने सपने और वसंत सेना रवि बुले कहानी संग्रह
6. आखिरी अढाई दिन मीना कुमारी की जीवनी जीवनी
7. इच्छायें कुमार अम्बुंज कहानी संग्रह
8. इस जंगल में दामोदर खडसे कहानी संग्रह
9. उड़ान जितेन ठाकुर उपन्यास
10. उधर के लोग अजय नावरिया उपन्यास
11. उषा वर्मा की कहानियां कारावास कहानी संग्रह
12. उषा राजे सक्सेना की कहानियां कहानी संग्रह
13. ओ इजा शंभु नाथ सती उपन्यास
14. कठपुतलियां मनीषा कुलश्रेष्ठ कहानी संग्रह
15. कागजी़ बुर्ज मीरा कांत कहानी संग्रह
16. कागजी है पैरहन इस्मत चुगताई आत्म कथा
17. काशी का अस्सी काशी नाथ सिंह
18. किस्सा कोहेनूर पंखुरी सिन्हा कहानी संग्रह
19. कुइंया जान नासिरा शर्मा उपन्यास
20. कोई मेरा अपना सुषमा जगमोहन कहानी संग्रह
21. कोहरे में कैद रंग गोविंद मिश्र उपन्यास
22. कौन कुटिल हम जानी प्रेम जनमेजय व्यंग्‍य
23. खारा पानी पाकिस्तानी लेखक उपन्यास
24. गुडि़या भीतर गुडि़या मैत्रेयी पुष्पा आत्म कथा
25. गुलमेंहदी की झाडि़यां तरुण भटनागर कहानी संग्रह
26. गेशे जम्पा नीरजा माधव उपन्यास
27. घर बेघर कमल कुमार कहानी संग्रह
28. चिडि़या फिर नहीं चहकी आलोक मेहता कहानी संग्रह
29. छावनी में बेघर अल्पना मिश्र कहानी संग्रह
30. जंगल का जादू तिल तिल प्रत्यक्षा कहानी संग्रह
31. कहानी संग्रह जया जादवानी कहानी संग्रह
32. जानकी पुल प्रभात रंजन कहानी संग्रह
33. तिनका तिनके पास अनामिका उपन्यास
34. तूती की आवाज ह्रषिकेश सुलभ कहानी संग्रह
35. दस द्वारे का पींजरा अनामिका उपन्यास
36. दावानल नवीन जोशी उपन्यास
37. देवी नगारानी की किताब कविता
38. धुनों की यात्रा पंकज राग अध्ययन
39. धूल पौधों पर गोविंद मिश्र उपन्यास
40. नाम में क्या रखा है हरि भटनागर कहानी संग्रह
41. उपन्यास नीलाक्षी सिंह उपन्यास
42. नूर जहीर बड़ उरैये उपन्यास
43. पंकज मित्र हुडुकलुल्लुा कहानी संग्रह
44. फालतू के लोग राजेन्द्र राजन कहानी संग्रह
45. फूलों का बाड़ा मो आरिफ कहानी संग्रह
46. फ्रिज में औरत मुशर्रफ़ आलम जौकी कहानी संग्रह
47. बहत्त र मील अशोक बटकर (मराठी) उपन्यास
48. बूढ़ा चांद शर्मिला बोहरा जालान कहानी संग्रह
49. बॉस की पार्टी संजय कुंदन कहानी संग्रह
50. ब्रजेश शुक्ला मंडी उपन्यास
51. भया कबीर उदास उषा प्रियंवदा उपन्यास
52. भारतीय कहानियां ज्ञानपीठ कहानी संग्रह
53. भूलना चंदन पांडेय कहानी संग्रह
54. मधु कांकरियां सेज पर संस्कृाति उपन्यास
55. मीना कुमारी की शायरी शायरी
56. मेरे हिस्से का शहर सुधीर विद्यार्थी संस्मरण
57. यत्र तत्र सर्वत्र शरद जोशी
58. ये मेरी गज़लें अहमद फ़राज़ शायरी
59. रघू रेहन पर काशी नाथ सिंह उपन्यास
60. राग विराग संतोष चौबे उपन्यास
61. रेत भगवान दास मोरवाल उपन्यास
62. वह आदमी फ़ज़ल ताबिश उपन्यास
63. वहीं रुक जाते नरेन्द्र नागदेव
64. शराबी की सूक्तियां कृष्ण कल्पित कविता
65. संगम अंजना संधीर
66. सीढि़यां, मां और उसका देवता भगवान दास मोरवाल कहानी संग्रह
67. सूरज नंगा है प्रेम जनमेजय व्यंग्य
68. सोफिया तोलस्तोया की डायरी रचना समय अंक डायरी
69. प्रियदर्शन कहानी संग्रह
70. गोरीनाथ कहानी संग्रह
71. अशोक अग्रवाल यात्रा संस्मरण
72. रूप सिंह चंदेल उपन्यास
73. मनोज रूपड़ा उपन्यास
74. The Devil wears Prada Laure weisberger Novel
75. Istanbul Orhan pamuk Novel
76. Mayada Jean sasson Memoirs
77. Complete works Ruskin Bond Stories and Novels
78. Kite Runner Khalid Hossaine Novel
79. Bertrand Russel’s autobiography Bertrand Russel autobiography
80. Love In The Time Of Cholera Gabriel Garcia Marquez Novel
81. Snow Orhan Pamuk Novel Still reading
82. I Too Had Dream Verghese Kurien autobiography Still reading
83. The Motorcycle Diaries Ernesto “Che” Guevara Still reading
84. Living to tell the tale Gabriel Garcia Marquez reading
85. Long way to freedom Nelson Mandela autobiography Still reading
86. Shanta ram Gregory David Novel

फिल्में जो देखीं – अधिकतर घर पर
1. After the rehearsal Ingmar Bergman
2. Benhur
3. Black diamond
4. Carry on spying
5. Casino royale
6. Come September
7. Confidentially yours
8. डोर
9. GiGi
10. La double vie
11. Le eclisse
12. Lolita
13. North by north west Alfred Hitchcock
14. Old man and the sea
15. On golden pond
16. Persona Ingmar Bergman
17. Phantom of liberty
18. Piano teacher
19. Private ryan
20. Promised land
21. Sweet November
22. The men of honour
23. The outsider
24. To kill a mocking bird
25. Virdiana
26. War and peace
27. Wild strawberries Ingmar Bergman
28. अनाड़ी राजकपूर
29. आग राजकपूर
30. आह राजकपूर
31. खुदा के लिए पाकिस्तानी
32. गॉड तुस्सी ग्रेट हो हिन्दी‍
33. चार्ली चैप्लिन की कई फिल्में
34. चीनी कम हिन्दी
35. चोरी चोरी राजकपूर
36. जागते रहो राजकपूर
37. जिस देश में गंगा बहती है राजकपूर
38. जॉनी गद्दार हिन्दी
39. टिंग्या् मराठी
40. तीसरी कसम राजकपूर
41. द नेमसेक
42. द लास्टै लायर हिन्दी
43. धरम हिन्दी
44. फैशन हिन्दी
45. बरसात राजकपूर
46. बाजी देव आनंद
47. ब्लैआक एंड व्हा्इट हिन्दी
48. भागम भाग
49. भेजा फ्राई
50. मनोरमा 6 फुट नीचे
51. मेरे बाप पहले आप
52. राम चंद पा‍किस्तानी
53. रॉक ऑन
54. वेडनेसडे
55. शराबी देव आनंद
56. प्रतिमा बांग्ला
57. वारिस शाह पंजाबी
58. खामोशी हिन्दी

गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

अंग्रेजी फिल्में देखने के लिए अंग्रेजी जानना जरूरी नहीं है मनोज रूपड़ा के लिए





बात शायद १९९९ के मुंबई फि़ल्म फेस्टिवल की है। तब तक उसका मुंबई से स्थायी रूप से मोहभंग नही हुआ था और वह अपनी रोजी रोटी मुंबई में ही कमा खा रहा था। उन दिनों मेरा ऑफिस मुंबई में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुआ करता था और फि़ल्म फेस्टिवल के सीज़न टिकट मेरे ऑफिस के रास्ते में ही यशवंत राव चौहान हॉल में मिलने वाले थे। हमने तय किया कि किसी शनिवार को वहां जाकर लेते आएंगे। काउंटर पर जो अंग्रेजीदां लड़की बैठी थी, उसने फार्म उसकी तरफ बढ़ाया और अंग्रेजी में ही कहा कि इसे भर दीजिए और साथ में दो फोटोग्राफ दे दीजिए। उसने अपनी सदाबहार स्टाइल में कहा कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती। ये सुनते ही वह लड़की झटके से अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। उसे कुछ सूझा ही नहीं कि क्या कहे। उसके सामने फैशनेबल कपड़े पहने एक खूबसूरत नौजवान खड़ा है जो फि़ल्म फेस्टिवल देखने की चाह रखता है और जब उसे इसके लिए फार्म भरने के लिए कहा जाता है तो बताता है कि उसे अंग्रेजी नहीं आती। उसने बट, हाउ जैसे कुछ शब्दों के सहारे जानना चाहा कि फिर आप ये फि़ल्में! तब हमारे नौजवान दोस्त ने उस लड़की से कहा था कि अंग्रेजी क्या, किसी भी भाषा की फि़ल्‍में देखने के लिए अंग्रेजी जानने की ज़रूरत नहीं होती।
यह खूबसूरत नौजवान था मनोज रूपड़ा। उसे सचमुच अंग्रेजी बोलना, पढ़ना या लिखना आज भी नहीं आता, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उसने जितनी संख्या में अंग्रेजी की और दुनिया भर की दूसरी भाषाओं की फि़ल्में देखी होंगी, शायद ही किसी हिंदी कहानीकार ने देखी होंगी। और मैं यह शर्त भी बद सकता हूं कि जिस अधिकार और आत्‍मविश्वास के साथ वह दुनिया की किसी भी भाषा की फि़ल्म के क्राफ्ट, शिल्प, कैमरावर्क, स्क्रिप्ट और दूसरे तकनीकी पक्षों पर बात कर सकता है, शायद ही कोई और समकालीन कहानीकार कर सकता है। उसने पहली संगमन गोष्‍ठी में आज से पंद्रह बरस पहले समांतर फि़ल्मों पर कोई तीस पेज का गंभीर लेख पढ़कर सुनाया था।
अब जब फि़ल्मों की बात चल रही है तो पहले यही बात पूरी कर ली जाए। अभी पिछले दिनों पुणे में इंटरनेशनल फि़ल्म फेस्टिवल सम्पन्‍न हुआ। मैंने मनोज को इसके बारे में बताया तो उसने तुरंत अपने फोटो भेज दिए कि उसके लिए भी सीज़न टिकट बुक करवा रखूं। वह पूरे हफ्ते के लिए आएगा। इसी फेस्टिवल के लिए दिल्ली से मेरे बहुत पुराने दोस्त और कथाकार सुरेश उनियाल भी आ रहे थे। पुणे में ही स्थायी रूप से बस चुके विश्व सिनेमा पर अथॅारिटी समझे जाने वाले हमारे दोस्त मनमोहन चड्ढा तो थे ही। हमने एक साथ खूब फि़ल्में देखीं, खूब धमाल किया और देखी गई और न देखी गई फि़ल्मों पर खूब बहस भी की। इसी फेस्टिवल में हमने एक ऐसी फि़ल्म देखी, जिसके बारे में मैंने मनोज से ही सुना था और इसके बारे में इंटरनेट से और जानकारी खंगाली थी। (मनोज यह फि़ल्म पहले देख चुका था और उसका आगामी उपन्‍यास भी इसी फि़ल्म से गहरा ताल्लुक रखता है।) यह फि़ल्म थी १९२७ में प्रदर्शित हुई फिट्ज़ लैंग की मेट्रोपॉलिस।। ढाई घंटे की यह मूक फि़ल्म कई मायनों में अद्भुत थी और अपने वक्त से बहुत आगे की बात कहती थी। पूंजी और श्रम के बीच के टकराव, आदमी को पूरी तरह से निचोड़कर रख देने वाली दैत्या कार मशीनें, आदमी और मशीन की लड़ाई, डबल रोल, रोबो की कल्पना और उसके ज़रिए हमशक्‍ल नेगेटिव पात्र का सृजन, कल्पनातीत स्‍पेशल इफेक्‍टृस वग़ैरह फि़ल्म निर्देशक आज से अस्सी साल पहले परदे पर साकार कर चुका था। इस फेस्टिवल में हमने जितनी फि़ल्में देखीं, उनमें मादाम बावेरी और मैट्रोपोलिस सबसे अच्छी रहीं।
फि़ल्मों का चस्का मनोज को दुर्ग के दिनों से है। उन दिनों वह दुर्ग में प्रगतिशील लेखक संघ का अध्यक्ष हुआ करता था। मध्‍य प्रदेश में उन दिनों तक एक सिलसिला चला करता था महत्व फलां फलां। इसके अंतर्गत रचनाकारों पर केन्द्रित कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। भीष्म साहनी आदि पर हो चुके थे और दुर्ग में ‘महत्‍व नामवर सिंह’ के आयोजन की रूपरेखा बनायी गई थी। इस काम के लिए एक लाख का बजट था। बताया गया कि कोई व्यापारी धन देगा। स्थानीय इकाई के अध्‍यक्ष होने के नाते मनोज ने इसका विरोध किया और कहा कि मजदूर विरोधी पूंजीपति के पैसे से इस कार्यक्रम को वे नहीं होने देंगे। इसके बजाए कम खर्चे पर कोई फि़ल्‍म आधारित कार्यक्रम रखा जाए। संस्था में दो गुट बन गए। ज़्रयादातर सदस्य ‘महत्व नामवर सिंह’ के पक्ष में। मनोज ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और अकेले अपने बलबूते पर फि़ल्म आधारित कार्यक्रम की तैयारियां की। फि़ल्मों पर बात करने और कुछ चुनींदा फि़ल्में दिखाने के लिए प्रख्यात फि़ल्म हस्ती सतीश बहादुर को आमंत्रित किया गया। संयोग ऐसा बना कि आयोजन में भाग लेने के लिए कोई भी नहीं आया। बेशक सतीशजी अपने तामझाम के साथ वहां पहुंच गए थे।
निराश कर देने वाले ऐसे मुश्किल पलों में भी कुछ सुंदर, कुछ शिव छुपा हुआ था। मनोज अकेले ही पूरे अरसे तक सतीश बहादुर से फि़ल्मों की बारीकियों का गंभीर अध्ययन करता रहा। उनके द्वारा लाई गईं दुर्लभ फि़ल्मों का इकलौता दर्शक बना रहा और उन पर बात करता रहा। बेशक बीच-बीच में दो चार लोग आते जाते रहे होंगे, लेकिन कुल मिलाकर ये पूरा सिलसिला वन टू वन ही रहा। शायद सतीशजी को भी न पहले न बाद में इस जैसा समर्पित विद्यार्थी कभी मिला होगा। उन्हीं की सिफारिश पर बाद में मनोज ने पटना में प्रकाश झा की पंद्रह दिवसीय कार्यशाला में सक्रिय भागीदारी की और फि़ल्म की भाषा को और गहराई से पढ़ा। बाद में ‘महत्व नामवर सिंह’ भी हुआ जिसमें मनोज नहीं गया, बेशक नामवरजी उसके बारे में पूछताछ करते रहे।
मनोज पर यह बात सिर्फ़ फि़ल्मों के बारे में ही लागू नहीं होती। वह मध्य प्रदेश की लोक कलाओं और लोक कलाकारों से भी नज़दीकी से जुड़ा रहा है और उन पर भी पूरे अधि‍कार के साथ बात कर सकता है। वह नाचा के महान कलाकार मदन निषाद का मुरीद है और उन्हें दुनिया के किसी भी कलाकार की तुलना में श्रेष्ठ मानता है। उसे इस बात का भी बेहद अफसोस है कि मदन निषाद की कला उनके साथ ही ख़त्म हो गई है। न केवल लोक कलाओं से बल्कि नाटक से भी उसका नाता रहा है और उसने देवेन्द्र् राज अंकुर के निर्देशन में नाटकों में काम भी किया है।
मनोज के यही स्कूल रहे हैं जहां बेशक अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी, लेकिन जीवन के सारे असली पाठ मनोज ने इन्हीं पाठशालाओं से सीखे हैं। वाचिक परंपरा कह लें या चीज़ों को देखने परखने की गहरी दृष्टि और लगन, मनोज ने स्कूली पढ़ाई की कमी इसी तरह पूरी की है। मनोज ने पढ़ा भी ख़ूब है। जो कुछ हिन्दीं के ज़रिए उस तक पहुंचा, उसने उसे आत्मसात किया है। अब ये बात अलग है कि एक्ट्रा ट्यूटोरियल के नाम पर मनोज ने कुछ बदमाशियां, कुछ हरमज़दगियां और कुछ आउट ऑफ़ कोर्स की चीज़ें भी सीखीं और इफरात में सीखीं। ये बातें भी मनोज के सम्पूंर्ण व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं। बेशक सामने वाले को हवा भी नहीं लगती कि ये सामने गैलिस वाली पैंट और अजीब सी कमीज़ पहने या परदे के कपड़े की पैंट और उस पर सुर्ख लाल कमीज पहने भोला सा लड़का खड़ा है, जो किसी भी परिचित या अपरिचित व्यक्ति से बात तक करने में संकोच करता है, और मुश्किल से ही सामने वाले से संवाद स्थापित कर पाता है, दरअसल खेला खाया है और जीवन के हर तरह के अनुभव ले चुका असली इंसान है।
लेकिन एक बात है। जब अनुभव लेने की बात आती है या जीवन के किन्हीं दुर्लभ पलों का आनंद लेने की बात आती है तो मनोज के सामने बस वही पल होते हैं। उसमें लेखक के रूप में उस अनुभव से गुज़रने की ललक कहीं नहीं मिलती कि घर जाकर इस अनुभव को एक धांसू कहानी में ढालना है। मनोज की इसी बात पर मैं जी जान से फि़दा हूं। उसका कहना है कि जो लोग हर वक्त लेखक बने रहते हैं, न तो जीवन का आनंद ले पाते हैं और न ही स्थायी किस्म का लेखन ही कर पाते हैं। भोगा हुआ सबकुछ कहानी का कच्चा माल नहीं होना चाहिए। कुछ ऐसा भी हो जिसमें आपने भरपूर आनंद लिया हो। उसे लिखने का कोई मतलब नहीं होता। लेखक को बहुत कुछ पाठक पर भी छोड़ देना चाहिए और सबकुछ जस का तस उसके सामने नहीं परोस देना चाहिए कि अख़बार की ख़बर और कहानी में फ़र्क किया ही न जा सके। यही वजह है कि उसकी कोई भी कहानी-पता है कल क्या हुआ मार्का नहीं है। मनोज यह भी मानता है कि कभी भी पाठक को कम करके मत आंको। वह भी लेखक के समाज का ही बाशिंदा है और हो सकता है लेखक से ज्यादा संवेदनशील हो और च़ीजों को बेहतर तरीके से जानता हो।
एक बार मनोज देर रात मुंबई में वीटी स्टेशन के पास मटरगश्ती कर रहा था। उसका सामना वहीं चौराहे पर बैठे कुछ आवारा छोकरों के साथ हो गया। वे लड़के दीन दुनिया से ठुकराये गए थे और उन्होंने अपने आप को नशे की दुनिया के हवाले कर रखा था। मनोज भी रोमांच के चक्कर में उनमें जा बैठा और जल्द ही उनके साथ घुल मिल गया। अब मनोज एक दूसरी ही दुनिया में था। वह कई घंटे उनके साथ रहा और उनके बीच में से ही एक बनकर रहा। वहीं पर उन बच्चों के बारे में रोंगटे खड़े कर देने वाले कई सच उसके सामने आए लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसने मेरे या अपने अभिन्न मित्र आनंद हर्षुल के अलावा किसी और से ये अनुभव बांटे हों या इस पर कुछ लिखा हो।
लेखन और आनंद या जि़न्दगी को भरपूर जीना उसके लिए अलग अलग चीज़ें हैं और उनमें कोई घालमेल नहीं। मैं कितने ही ऐसे रचनाकारों को जानता हूं जिन्हों ने रात को घटी घटना पर सुबह सुबह ही कहानी लिखकर पहली ही डाक से किसी प्रिय संपादक के पास रवाना भी कर दी। यह बात दीगर है कि इस तरह की रचना कितनी देर के लिए और किस तरह प्रभाव छोड़ती है।
मनोज ने कार्ल मार्क्स और दूसरा विश्व साहित्य भट्ठी के आगे बैठे हुए कढ़ाई में दूध औंटाते हुए पढ़ा है। मुझे नहीं पता कि किन वजहों से उसकी स्कूली पढ़ाई छूटी होगी, लेकिन एक बात तय है कि मनोज ने गोर्की की तरह जो कुछ जीवन की पाठशालाओं में सीखा है, हमारे देश के किसी स्कूल की न हैसियत थी और न है कि उसे वह सबकुछ सिखा सकता जो उसने स्कूल से बाहर रहकर सीखा है। यही उसके जीवन की असली पाठशालाएं है।
मनोज जब छठी कक्षा में ही था तो उसे जुए की लत लग गयी। दोस्तों के साथ चितपट नाम का जुआ खेलना मनोज को बहुत भाता था। एक दिन इसी चक्कर में शहर के गांधी चोराहे पर मनोज चार दोस्तों के साथ जुआ खेल रहा था तभी एक लड़के के पिता वहां आ पहुंचे। तब मनोज की जो पिटाई हुई, उसकी टीस वह आज भी याद करता है। जुआ तो हमेशा के लिए छूटा ही, स्कूल भी तभी छूट गया था।
एक और बार मनोज बुरी तरह से पिटते-पिटते बचा। दुर्ग में एक व्यापारी हैं जिनका शराब बनाने का कारखाना है। उनका सचिव था रमा शंकर तिवारी जो जनवादी लेखक संघ का पदाधिकारी था और मनोज का दोस्त। था। एक बार व्यापारी के यहां कोई पारिवारिक आयोजन था जिसमें सभी २५०० मज़दूरों को खाना खिलाना था। दारू का इंतज़ाम तो उनकी तरफ से था ही। तिवारीजी ने यारी-दोस्ती में खाना खिलाने का ठेका मनोज को दिलवा दिया। मनोज ने मज़दूरों की खान-पान की आदतों और उससे पहले पिलाई जाने वाली मुफ्त की शराब को देखते हुए २५०० की बजाये ३५०० लोगों के खाने का इंतज़ाम किया। ५०० मज़दूरों की पहली पंगत खाना खाने बैठी और जितना भी खाना तैयार था, सारा का सारा खा गयी। अब अगली पंगत बैठने के लिए तैयार लेकिन खाना भी नहीं और खाना तैयार करने के लिए सामान भी नहीं। हंगामा मच गया। मज़दूर शराब तो वैसे ही पिये हुए थे, तोड़-फोड़ पर उतर आये। मज़दूरों ने रसोई वाले हिस्सेी में हल्ला बोल दिया। सारे कारीगर प्राण बचाते भागे। पहले तो मनोज भी भागा लेकिन उसे लगा कि उसके भागने से कहीं हालत और न बिगड़ जायें, उसने सबको शांत करते हुए उन पांच छ: सौ मज़दूरों के जमावड़े के सामने माइक के जरिये भाषण देना शुरू कर दिया। मनोज साफ झूठ बोल गया और कहा कि ग़लती खाना बनाने वाले ठेकेदार की नहीं है। ठेकेदार को तो सामान दिया गया था और सिर्फ़ खाना तैयार करके खिलाने का काम सौंपा गया था। अब मज़दूरों का गुस्सा उस व्यापारी पर। उनके खिलाफ नारेबाज़ी होने लगी, नेता लोग आये और कारखाने में हड़ताल की घोषणा हो गयी। जब उस व्यापारी को पता चला कि एक तो मनोज ने सबको खाना नहीं खिलाया और ऊपर से झूठ बोलकर मज़दूरों को उनके खिलाफ भड़का कर हड़ताल भी करवा दी है तो रात को मनोज की पेशी हुई। मनोज ने साफ-साफ कह दिया कि जितने के लिए कहा गया था उससे ज्‍यादा खाना अगर सदियों से भूखे आपके ५०० मज़दूर खा गये तो मैं क्या करूं। अब मज़दूरों के हाथों पिटने से बचने के लिए कुछ तो करना ही था। जो भी सूझा मैंने बोल दिया।
मनोज से मेरी पहली मुलाक़ात १९९२ में कानपुर में पहले संगमन के मौके पर हुई थी। बेशक वह मौका मेरे लिए एक हादसे की तरह था। कुछ ही दिनों पहले मैं ‘वर्तमान साहित्‍य’ में अपनी विवादास्‍पद कहानी ‘उर्फ़ चंदरकला’ की वजह से सारे ज़माने की दुश्‍मनी मोल ले चुका था। कहानी सबसे ज़ेहन में ताजा थी। अब हुआ यह कि पहले संगमन के पहले सत्र का संचालन राजेन्द्र राव कर रहे थे। अध्यक्षता राजेन्द्र यादव कर रहे थे और मेरी यही वाली कहानी वे लौटा चुके थे। राजेन्द्र राव ने आव देखा न ताव, सत्र की शुरुआत में ही इस कहानी पर पिल पड़े। मुझे ही सबसे पहले बोलने के लिए आमंत्रित भी कर लिया। वे मुझे सबसे पहले बोलने के लिए आमंत्रित करने वाले हैं, यह मुझे पता नहीं था। किसी भी आयोजन में जाने का ये मेरा पहला ही मौका था। इस हिसाब से मैं सबसे पहली बार ही मिल रहा था। कुल जमा चार-पांच कहानियों की ही पूंजी थी मेरी। नर्वस मैं पहले से था, बाक़ी रही सही कसर रावजी ने पूरी कर दी। इस तरह की धज्जियां उखाड़ने वाली ओपनिंग से मैं गड़बड़ा गया और पता नहीं क्या-क्या बोलने लगा। दो चार मिनट तक बक-बक करने के बाद मैं बैठ गया। ये संगमन की शुरुआत थी जो मैंने बहुत ही बोदे ढंग से की थी। वहीं पर मैं अपनी कथाकार मित्र सुमति अय्यर से पहली और आखि़री बार मिला था। उनसे बरसों से पत्राचार था। कथाकार मित्र अमरीक सिंह दीप से भी लम्बी दोस्ती की शुरुआत वहीं से हुई थी। और वहीं पर मेरी पहली मुलाक़ात मनोज रूपड़ा से हुई।
शाम बहुत ही नाटकीय थी। रात किसी होटल में दैनिक जागरण की तरफ से डिनर का इंतज़ाम था और उससे पहले कहीं तरल गरल का आयोजन था, जिसके लिए चार बजते न बजते गुपचुप रूप से ख़ास दरबारियों को न्योते दिए जाने लगे थे।
जहां हमें ठहराया गया था, वहीं पर शाम के वक्त जयनंदन और मनोज से मेरा विधिवत परिचय हुआ और हम उसी पल दोस्त बन गए। मनोज ने मेरी कहानी पढ़ रखी थी और उसने कहा था कि राजेन्‍द्र राव तुम्हारी इस कहानी की इस तरह से बखिया उधेड़ने से पहले अपनी ‘कीर्तन’ कहानी का जिक्र करना क्यों भूल गए। उसमें वे कौन से मूल्यों की स्थापना की बात कर रहे थे। उसकी बातों से मेरा दिन भर का बिगड़ा मूड संभला था। तो हुआ यह कि कमरे में कई साहित्यरकार मित्र थे जो शाम वाले जमावड़े में न्योते नहीं गए थे और अलग अलग समूहों में बैठे शाम गुज़ारने का जुगाड़ बिठा रहे थे। तभी मनोज ने बताया कि उसके पास हाफ के करीब रम है, अगर कोई उसके साथ शेयर करना चाहे तो स्वागत है। अब मुझे ठीक से याद नहीं कि उस हाफ में से जयनंदन, मनोज और मेरे अलावा किस किस के गिलास भरे गए थे, लेकिन इतना याद है कि यह बैठक मनोज और जयनंदन के साथ एक लम्बीब दोस्ती की शुरुआत थी। बाद में जब मनोज अपने काम धंधे के सिलसिले में मुंबई आया तो हम अक्सर मिलते रहे। फोन पर बातें होती रहतीं। कभी कभार बैठकी भी जम जाती। अब मनोज के नागपुर चले जाने के बाद मैं जब भी वहां जाता हूं, वह मेरे लिए भरपूर समय निकालता है। फोन पर अक्सर बात होती ही रहती हैं।
जब पांचवां इन्दु शर्मा कथा सम्मान देने की बात चल रही थी, तब तक इस सम्मान के कर्ता धर्ता और मेरे मित्र तेजेन्द्र शर्मा पारिवारिक कारणों से लंदन जा चुके थे और उनकी हार्दिक इच्छा थी कि कैसे भी हो यह सम्मान चलते रहना चाहिए। वे इसकी सारी जि़म्मेवारी मुझे सौंप गए थे। संस्था की पहली पुस्तक बंबई-एक का सम्पादन भी मैं ही कर रहा था। तेजेन्द्र के लंदन होने के कारण इतना बड़ा आयोजन करने में मेरे सामने दिक्कतें तो आ ही रही थीं।
उन्हीं दिनों मनोज ने बताया कि उसे लंदन में ही अपनी मन पसंद का बहुत बढि़या काम मिल रहा है और वह कैसे भी करके लंदन जाना चाहता है। पासपोर्ट बनवाने के लिए उसने मेरी मदद मांगी थी। शायद घर के पते के प्रमाण को लेकर कुछ तकलीफ आ रही थी।
एक दूसरा संयोग यह हुआ कि तेजेन्द्र ने मुझसे पूछा कि क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस बार यह सम्मान लंदन में ही दिया जाए। टिकट का इंतजाम वह कर देगा। मेहमान को अपने घर पर ठहरा भी देगा और थोड़ा बहुत लंदन घुमा भी देगा। लेकिन इसमें भी दिक्कतें थीं। बेशक तेजेन्द्र ने अपने पल्ले से बैंक में इतनी राशि जमा कर रखी थी कि कम से कम दो आयोजन आराम से किए जा सकें, लेकिन एहतियात के तौर पर आयोजन का सारा खर्च स्मारिका छाप कर पूरा किया जाता था। आयोजन लंदन में करने के अपने संकट थे, पूरी व्यवस्था यहीं से करनी होती। सिर्फ़ आयोजन वहां होता। स्मारिका छपवाने से भिजवाने तक। दूसरी बात, उन दिनों कथा सम्मान की शील्डा एक्रेलिका के एक बहुत बड़े बॉक्स में हुआ करती थी। उसे बनवा कर लंदन भिजवाना। और भी कई दिक्कतें थी़।
तेजेन्द्र ने इसका भी समाधान खोजा कि क्यों न ये सारी चीज़ें सम्मान पाने वाला लेखक अपने साथ लंदन लेता आए। पता नहीं क्यों मुझे यह बात हज़म नहीं हुई कि किसी रचनाकार से पूछें कि भई हम तुम्हें लंदन ले जाकर सम्मानित करना चाहते हैं, लेकिन तुम्हें सारा ताम झाम अपने साथ ख़ुद ही लंदन ले जाना होगा।
जब यह तय हो चुका था कि यह सम्मान मनोज रूपड़ा को उसके कहानी संग्रह ‘दफ़न और अन्य कहानियां’ पर दिया जा रहा है और वह ख़ुद लंदन जाने की जुगाड़ में है तो तेजेन्द्र ने कई बार मुझसे कहा कि मैं मनोज से बात करके देखूं। अगर वो राजी है तो हम उसे लंदन में सम्मानित करने की सोच सकते हैं। लेकिन मैं ही संकोच कर गया। मेरे अपने डर थे। मनोज अपना यार-दोस्त है। ख़ुद का सम्मान करवाने के लिए लंदन तक शील्ड ले जाने का बुरा नहीं मानेगा, लेकिन आने वाले वर्षों में सम्मानित होने वाले रचनाकार मुंबई के नहीं होंगे और हो सकता है, परिचित भी न हों। किसी से भी ये कहना कि अपने सम्मान का सामान लंदन लेकर जाओ, मुझे ठीक नहीं लग रहा था। मुझे यह भी डर था कि हिन्दीन साहित्य जगत इस प्रस्ताव का ख़ूब माखौल उड़ाएगा। फिर भी आज लगता है कि अगर मैंने मनोज से पूछ ही लिया होता तो शायद वह लंदन जाकर कथा सम्मान लेने वाला पहला लेखक बनता। क्या पता शील्ड वग़ैरह भिजवाने का कोई और इंतजाम हो गया होता और ये भी तो हो सकता था कि एक बार पासपोर्ट बन जाने और लंदन पहुंच जाने के बाद वहां उसे मनपसंद काम मिल गया होता और इस समय वह नागपुर के बजाय लंदन के किसी बाज़ार में जलेबियां छान रहा होता। लेकिन अब ये सब ख़्याली पुलाव पकाने का कोई मतलब नहीं। मनोज रूपड़ा ने मुंबई में ही पांचवां इन्दु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त किया था और उसके बाद संयोग ऐसा बना कि अगले ही वर्ष से ये सम्मान कथा यूके के तत्वावधान में लंदन में ही दिया जा रहा है और मज़े की बात कि किसी भी सम्मा्नित लेखक को कुछ भी नहीं ले जाना होता। सारी व्यवस्था आपने आप हो जाती है।
वरिष्ठ कथाकार गोविन्द मिश्र जी के हाथों से सम्मान लेते समय मनोज ने बहुत ही कम शब्दों में अपनी बात कही थी लेकिन जो कुछ कहा था, वह मायने रखता है। उसने कहा था कि आमतौर पर सम्मानों के साथ कोई न कोई विवाद जुड़ा रहता है लेकिन यह सम्मान लेने में उसे कोई संकोच नहीं हो रहा है क्योंकि ये सम्मान एक लेखक द्वारा अपनी स्वर्गीय लेखिका पत्नी की याद में तीसरे लेखक को दिया जा रहा है और ये एक ईमानदार कोशिश है। मनोज ने अपने इस जुमले पर ख़ूब तालियां बटोरी थीं।
श्रीगंगानगर में २००४ में आयोजित संगमन में एक मज़ेदार किस्सा हुआ। आयोजन की दूसरी शाम की बात है। तरल गरल का इंतजाम किया गया था और कई रचनाकार जुट आए थे। कुछ बुलाए, कुछ बिन बुलाए। दस बारह लोग तो रहे ही होंगे। से रा यात्री, विभांशु दिव्याल, प्रियंवद, कमलेश भट्ट कमल, अमरीक सिंह दीप, ओमा शर्मा, मनोज रूपड़ा आनंद हर्षुल, मोहनदास नैमिशराय, हरि नारायण, देवेन्द्र और मैं वहां थे। शायद संजीव भी थे। दो एक और रहे होंगे। पीने वाले पी रहे थे और सूफी लोग बातें कर रहे थे। जिस तरह की बातें इस तरह के जमावड़े में पीते पिलाते वक्त होती हैं, वही हो रही थीं। तभी मनोज ने बताना शुरू किया कि किस तरह वह पुणे में एक देवदासी के सम्पर्क में आया था और देवदासियों के जीवन को नज़दीक से जानने के मकसद से वह उसके साथ कर्नाटक में कहीं दूर उसके गांव गया था। उसके परिवार से मिला था और उसके घर के सदस्य की तरह वहां दो तीन महीने रहा था। मनोज अपनी रौ में बात किए जा रहा था। तभी नैमिशरायजी ने टोककर उससे देवदासी के बारे में सवाल पूछे कि वह कैसी थी। उसका घरबार कैसा था। क्या उसके पति को और घरवालों को एतराज़ नहीं हुआ, वहां उसके जाने से। उसके बच्चों मां बाप वग़ैरह के बारे में उन्होंने कुछ सवाल पूछे। शायद एकाध सवाल सेक्स को लेकर भी पूछा। यहां मैं एक बात बता दूं कि देवदासियों पर नैमिशरायजी का एक उपन्यास ‘आज बाज़ार बंद है’ कुछ ही दिनों पहले आया था। उस वक्त तो मनोज ने गोलमाल उत्तार दे दिए थे उनके सवालों के, लेकिन बाद में मुझसे अफसोस के साथ कहा कि देवदासियों के जीवन पर पूरा उपन्यास लिखने के बाद वे पूछ रहे हैं कि देवदासी होती क्या है! आखि़र इस तरह के लेखन के क्या मायने होते हैं।
मनोज बेहतरीन कारीगर हैं। शब्द शिल्पी तो वो है ही। कई तरह की मिठाइयां और नमकीन बनाने के प्रयोग करता रहता है। वह दोनों जगह सफल हैं। लेखन में भी और धंधे में भी। हाल में ही उसने नागपुर में अपनी देखरेख में अपना ख़ूबसूरत घर भी बनवाया है। उसमें उसने लेखकों के लिए अलग से दो कमरे बनावाए हैं, जहां कोई भी लेखक (लेखिका भी) आराम से दो चार दिन गुज़ार सकता है।
लेकिन एक बात है। मनोज थोड़ा सा शेख चिल्ली भी है। जिस काम की उसे कोई समझ नहीं होती, उसमें भी हाथ डालकर दो चार लाख रुपये गंवाना उसे बहुत अच्छा लगता है। उसने कई धंधे शुरू किए और तगड़ा घाटा उठाने के बाद बंद भी किए। एक बार उसने मंबई से १६० किलोमीटर दूर रसगुल्ले बनाने का कारखाना लगवाया था। पता नहीं कितने बने और कितने बिके, लेकिन हमेशा की तरह उसने ख़ूब घाटा उठाकर धंधा बंद कर दिया। सीधा वह इतना है कि उसे आसानी से बुद्धू बनाकर उससे पैसे झटके जा सकते हैं। मुंबई के पांच सात बरस के प्रवास में कम से कम उसे १५ लाख रुपये का चूना तो लोगों ने लगाया ही होगा। लोगबाग उससे माल सप्लाई करने के बहाने पैसे ले जाते हैं और दोबारा कम से कम इस जनम में वे अपना चेहरा नहीं ही दिखाते। एक नहीं कई हैं जिन्होने बाकायदा मनोज रूपड़ा को दुहा है और कई बार दुहा है।
वह नुकसान उठाने के लिए हमेशा तैयार रहता है और नुकसान उठाने के लिए नये नये तरीके ढूंढता रहता है। ये मनोज के साथ ही हो सकता है कि उसे दस लाख की कीमत पर एक ऐसा मकान बेच दिया गया हो, जो पहले ही दो आदमियों को बेचा जा चुका था। मनोज के हाथ में आश्वासन तक नहीं आया कि इसके बदले तुम्हे दूसरा मकान दे देते हैं।
एक और मज़ेदार किस्सा हुआ उसके साथ। घाटकोपर में उसके कारखाने मे पास ही दोपहर के वक्त कोई लड़का घबराया हुआ आया और लोगों से कहने लगा कि मुझे कहीं छुपा लो, गुंडे मेरे पीछे लगे हैं। जब उसे पानी वानी पिलाया गया तो उसने बताया कि उसकी पांच लाख की लाटरी लगी है और गुंडे टिकट छीनने की फिराक में हैं और वह जान बचाता फिर रहा है। बहुत डरते डरते उसने लाटरी की टिकट और अख़बार में छपा लाटरी का परिणाम दिखाया जिसमें पहला ईनाम उसी नम्ब र पर था। उस लड़के ने तब कहा कि वह कैसे भी करके इस टिकट से जान छुड़ाना चाहता है ताकि उसकी जान बची रहे। आखि़र सामूहिक रूप से सौदा पटा और शायद तीन लाख में कुछ लोगों ने मिलकर उससे वह टिकट ख़रीद लिया। अपने मनोज भाई भी उनमें से एक थे, बल्कि सबसे आगे थे।
जब ईनाम का दावा करने के लिए टिकट पेश किया गया तो पता चला कि ये स्कैन करके प्रिंट किया हुआ डुप्लीकेट टिकट था और इसी टिकट पर ईनाम के पांच दावेदार पहले ही आ चुके हैं।
तो ऐसे हैं अपने मनोज भाई। यारों के यार। खाने पीने और खिलाने पिलाने के शौकीन। घुमक्कड़ी का कोई मौका नहीं छोड़ते। उसकी घुम्मकड़ी का ये आलम था कि जब दुर्ग में दुकान पर बैठता था तो जब भी मन करे, गल्ले में से पैसे निकाले, शटर गिराए और घर में बिना बताए कहीं भी अकेले ही घूमने निकल जाया करते। बाद में जब स्वर्गीय कथाकार पूरन हार्डी का साथ मिला तो दूर दूर की यात्राएं कीं। उसके साथ घूमने की वजहें भी थीं। पूरन रेल्वे में था और मनोज के लिए डुप्लिकेट रेल्वे पास का इंतजाम कर दिया करता था। एक बार इसी तरह वह गोवा जा पहुंचा और मस्ती मारता रहा। पास में जितने पैसे थे, खत्म हो गए। उन्हीं दिनों गोवा में हबीब तनवीर साहब के नाटकों का उत्सव चल रहा था। मनोज साहब उसका लालच कैसे छोड़ें ! अटैची होटल के रिसेप्शन पर रखी थी। हफ्ते भर वहीं रखी रही। तो ढूंढते ढांढते मनोजजी को समुद्र तट पर एक मज़ार मिल गई। रात के डेरे की समस्या हल हुई। थोड़ा बहुत पेट में डालकर नाटक देखते। वापसी की यात्रा बिना टिकट के हुई। बस, पकड़े नहीं गए।
मनोज की एक बहुत अच्छी आदत है कि बस में ट्रेन में चीज़े भूल जाएंगे। मेरे घर रात गुजारी (मेरे घर का मतलब मेरा ही घर है, कहीं और नहीं) तो पर्स वहीं भूल जाएंगे। पता नहीं बस टिकट का इंतज़ाम कैसे करते होंगे। बसों में सामान भूलने में तो जनाब को महारत हासिल है। अपनी बनाई मिठाइयां और नमकीन तो हर बार बस में ही छोड़ आते हैं। एक बार राजकोट में ट्रेन में मनोज की अटैची चोरी चली गई। अब क्या हो! शायद पैसे भी उसी में थे। राजकोट से अहमदाबाद आए और वहां से भोपाल। देखते क्या हैं कि एक आदमी सामने ही उनकी अटैची लिए जा रहा है। मनोज को लगा कि यार ये अटैची तो जानी पहचानी लग रही है। फिर याद आया कि ये तो अपनी ही है जो परसों राजकोट में चोरी चली गई थी। उस भले आदमी को रोका, उससे झगड़ा हुआ, उसे अटैची के भीतर की सारी चीज़ों के बारे में बताया, तभी उसे वापिस ले सके।
लेकिन हर बार मनोज किस्मत के इतने धनी नहीं होते। जो खो गया उसे भुलाता चला गया। कभी मनोज से पूछूंगा कि जब गुमशुदा चीज़ों की गिनती सौ तक पहुंच जाए तो बताना। गुमशुदा शतक मनाएंगे।
मनोज ख़ूब पढ़ते हैं और किताबें ख़रीदकर पढ़ते हैं। जब से नागपुर गए हैं, संगीत के कार्यक्रमों में ज़्यादा जाने लगे हैं। और अब तो अपनी प्यारी और बहुत हंसमुख पत्नी मीता और उससे भी ज़्यादा प्या़री और नटखट बच्चियों आर्मी और प्रीतू को भी साथ ले जाने लगे हैं। वे नागपुर में पढ़ रहे मेरे बेटे के लोकल गार्जियन हैं और यदा कदा अपना फ़र्ज़ निभाते रहते हैं। हिन्दी के सभी छोटे बड़े लेखक मनोज के दोस्त हैं, लेकिन सगे दोस्तर आनंद हर्षुल और जयशंकर ही हैं।
उसकी एक बहुत अच्छी बात है कि वह जिस दोस्त के घर भी जाता है, वहां घर परिवार के सदस्य की तरह रह लेता है। कम से कम चीज़ों में गुज़ारा कर लेता है। खाने-पीने के कोई नखरे नहीं करता। ऐसे में मेज़बान दोस्त की पत्नी की तारीफ उसका काम और आसान कर देती है।
मनोज की प्रेमिकाओं के बारे में मुझे पता नहीं है। वैसे वह बीच बीच में न्यूज़ीलैंड का जिक्र करता रहता है कि कभी वहां जाना है। इस बार जब वह फि़ल्में देखने पुणे आया तो नागपुर स्टेशन पर उसने रास्ते में पढ़ने के लिए जानते हैं क्या ख़रीदा? दुनिया का नक्शा। सत्रह घंटे की यात्रा में वह उसमें न्यूज़ीलैंड ही खोजता रहा। वह सवेरे चार बजे मेरे घर पहुंचा था। उसने पहला काम ये किया कि मुझे नक्शा देते हुए न्यूज़ीलैंड खोजकर दिखाने को कहा। जब उसने देखा कि न्यू्ज़ीलैंड तो भारत से बहुत दूर है तो थोड़ा निराश हो गया था।
मनोज ने बहुत कम लिखा है। शायद पंद्रह बरस में पंद्रह कहानियां और पिछले दिनों पहला उपन्यास। लेकिन जो भी लिखा है, उसे यूं ही दरकिनार नहीं किया जा सकता। अभी उसे एक बहुत लम्बी पारी खेलनी है। लेखन की, यारबाशी की और अपनी तरह से अपनी शर्तों पर जीवन जीने की भी। उसकी इच्छा है कि अगले जन्म में वह भी मेरी तरह रिज़र्व बैंक की नौकरी करे, जहां खूब यात्राएं होती हैं और बकौल मनोज सारी सुविधाओं के बावजूद काम धेले का नहीं करना पड़ता। कहावत है कि अपने बच्चे और दूसरे की बीवी सबको अच्छी लगती है। मनोज ने इस सूची में मेरी नौकरी को भी शामिल कर लिया है।
ज़हे नसीब !
सूरज प्रकाश
अप्रैल 2005

रविवार, 16 नवंबर 2008

मेरा उपन्‍यास सुनो . . ..

कुछ दिन पहले मैंने आपको बताया था कि मेरे मित्र और विख्‍यात ब्‍लागर रवि रतनामी जी ने अपने सदाबाहर ब्‍लाग http://rachanakar.blogspot.com/ पर मेरे उपन्‍यास देस बिराना को ई बुक के रूप में डाला है। वे मेरे द्वारा अनूदित चार्ली चैप्‍लिन की आत्‍म कथा और चार्ल्‍स डार्विन की आत्‍म कथा को पहले ही ई बुक्‍स के रूप में अपने पाठकों को भेंट कर चुके थे।

अब वे मेरे इसी उपन्‍यास देस बिराना की आडियो रिकार्डिंग पेश कर रहे हैं। रिकार्डिंग लगभग 10 घंटे की है। बाकी जानकारी आपको इस लिंक http://rachanakar.blogspot.com/2008/11/3.html पर मिल जायेगी।
सूरज प्रकाश

मंगलवार, 4 नवंबर 2008

आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा

आप बोलेंगे हिन्‍दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा
जी हां, अब बाजार में एक ऐसा औजार आ गया है कि आप बोलेंगे हिन्दी में और कम्‍प्‍यूटर टाइप करेगा. आपसे बोलने में गलती होगी तो उसे दोबारा बोलने पर ठीक भी कर देगा. इतना ही नहीं, आपके प्री रिकार्डेड संदेश, भाषण या बोले गये टैक्‍स्‍ट को भी उसी बहादुरी के साथ टाइप करके आपको थमा देगा. ये पैकेज आपके लिए एडिटिंग करेगा, अलाइनमेंट करेगा, आउटपुट में मूल डॉक्यूमेंट का फार्मेट बनाये रखेगा शब्‍द जोड़ने, हटाने देगा, अपडेट करने देगा, और आपको शब्देकोश की सुविधा के अलावा पर्यायवाची शब्द भी देगा.
है ना मजेदार ख्याल कि आप चांदनी रात में अपनी बाल्‍कनी में अकेले बैठे बीयर के घूंट ले रहे हैं और हैड फोन लगाये अपनी कहानी, ग़ज़ल, उपन्यास या कुछ भी अपने पीसी को डिक्टेशन दे रहे हैं. एक नज़ारा और भी हो सकता है कि जो कुछ कहना है हमें हैड फोन लगा कर पीसी के सामने कह दें. एडि‍टिंग बाद में होती रहेगी.
और भी कई नज़ारे हो सकते हैं, सारे प्रेम वार्तालाप, मंत्री जी के भाषण, संतों की वाणी, बीवी या हस्‍बैंड के गुस्से भरे अलफाज़ जस के तस बोलते हुए टाइप होते चलें. न मुकरने की आशंका न भूलने का डर. कितना अच्छा कि हिन्दी टाइप करने के लिए लिखना पढ़़ना आना जरूरी नहीं. कोई भी अपने पीसी से ये काम ले सकता है. सेक्रेटरी नहीं आयी तो परवाह नहीं, वाचांतर पैकेज है ना....
ये वाचांतर पैकेज आपके लिए कई बरस की रिसर्च के बाद ले कर आये हैं पुणे की सीडैक के वैज्ञानिक. कीमत पूरे सेट की सिर्फ 5900 रुपये. मंगाने या ज्यादा जानकारी के लिए देखें www.cdac.in या सम्पर्क करें अजय जी से ajai@cdac.in पर या उनसे फोन 9371034560 पर बात करें
सूरज प्रकाश

शनिवार, 25 अक्टूबर 2008

उदंती.कॉम का स्‍वागत

हमारी एक मित्र हैं रत्‍ना वर्मा। रायपुर में रहती हैं और बरसों तक वहां इतवारी पत्रिका संभालती रही हैं। इधर वे एक बहुत ही शानदार पत्रिका ले कर हाजिर हुई हैं। नाम है उदंती.com।
आप निश्चित ही उदंती का मतलब भी पूछना चाहेंगे। मैंने भी पूछा था। उदंती दरअसल रायपुर के पास बहने वाली एक नदी का नाम है और इस नदी के तट पर इसी नाम का एक पक्षी विहार है।
36 पन्‍ने की इस पत्रिका की कई खासियतें हैं। पहली तो यही ही ये वेब पर udanti.com पर उपलब्‍ध होने के अलावा सचमुच की पत्रिका के रूप में प्रकाशित भी होती है। अब तक इसके तीन अंक आ चुके हैं। पत्रिका की दूसरी खूबी है इसका उत्‍तम कला पक्ष। शानदार आर्ट पेपर पर छपी पत्रिका का एक एक पन्‍ना जिन मेहनत और कलात्‍मक अभिरुचि से संजोया गया है, उसका बयान नहीं किया जा सकता।
तीसरा उल्‍लेखीय पक्ष इस पत्रिका का ये है कि इसमें लोककलाओं, कलाओं, लोक जीवन और संस्‍कृति को, चाहे वह छत्‍तीसगढ़ की हो या कहीं और की, खास तौर पर कलात्‍मक ढंग से सामने लाने की कोशिश की गयी है। रत्‍ना जी जल्‍द ही पत्रिका के सेंट्रल स्‍प्रेड पर ग़ज़लें, कविताएं, गीत और लघुकथाएं शुरू करने वाली हैं।
पत्रिका का ग्राहक बनने और रचनाएं भेजने के लिए पता है- udanti.com@gmail.com। आप रत्‍ना जी से इस पते पर भी सम्‍पर्क कर सकते हैं-
संपादक उदंती.com
माती'ज गैलरी जीवन बीमा मार्ग पंढरी, रायपुर
छत्‍तीसगझ़ 492004

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

इंदु शर्मा कथा सम्मान 2009 के लिए नामांकन

20 अक्तूबर 2008

इंदु शर्मा कथा सम्मान 2009 के लिए नामांकन

प्रिय मित्र
आप जानते ही हैं कि पिछले चौदह बरस के दौरान इंदु शर्मा कथा सम्मान ने अपनी चयन प्रव्रिᆬया, पारदर्शिता तथा समकालीन श्रेष्ठ साहित्य के प्रति अपनी आस्था और सम्मान भावना के कारण न केवल राष्ट्रीय स्तर पर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ख्याति आर्जत की है। 1995 से 1999 तक मुंबई में इंदु शर्मा कथा सम्मान क्रमशः गीतांजलिश्री, धीरेन्द्र अस्थाना, अखिलेश, देवेन्द्र और मनोज रूपड़ा को दिये जाने के बाद से सम्मान कथा यूके के बैनर तले लंदन में सुश्री चित्रा मुद्गल, सर्वश्री संजीव, ज्ञान चतुर्वेदी, एस आर हरनोट, वी एन राय, प्रमोद कुमार तिवारी, असग़र वजाहत, महुआ माजी और नासिरा शर्मा को दिये गये।
पुरस्कार की चयन प्रक्रिया में औेर अधिक पारदर्शिता लाने की दृष्टि से हम हर वर्ष देश भर में हिन्दी के सभी वरिष्ठ और सम्मानित कथाकारों, संपादकों और प्रकाशकों आदि से अनुरोध करते आ रहे हैं कि वे पिछले तीन बरस में प्रकाशित अपनी पसंद की तीन पुस्तकों की अनुशंसा करें। इन्हीं अनुशंसाओं के आधार पर ही पिछले आठ बरस से ये सम्मान दिये जा रहे हैं।
आप जानते ही हैं कि इस सम्मान के अंतर्गत चयन किये गये रचनाकार को लंदन आने जाने का हवाई जहाज का टिकट, एयरपोर्ट टैक्स, वीजा शुल्क आदि दिये जाते हैं और लंदन में एक सप्ताह तक उनके घूमने और रहने की व्यवस्था की जाती है तथा एक भव्य समारोह में मुख्य अतिथि के हाथों शील्ड, सम्मान पत्र और श्रीफल आदि दिये जाते हैं। सम्मान कार्यक्रम आम तौर पर जून के आस पास होता है। यह मौसम लंदन के हिसाब से सबसे बढ़िया रहता है।
हम चाहते हैं कि इस पुरस्कार के लिए समकालीन श्रेष्ठ साहित्य की चयन प्रक्रिया में आप बराबर के सहभागी बनें। इधर के तीन बरसों (2006 से 2008) के दौरान प्रकाशित, चर्चित, प्रशंसित और आलोचकों और पाठकों द्वारा सराही गयी कहानी अथवा उपन्यास विधा की किन्हीं तीन ऐसी पुस्तकों के नाम सुझायें जो आपकी निगाह में पुरस्कार के योग्य ठहरती हों।
आपकी राय हमें पहली जनवरी 2009 तक मिल जाये तो हम आपके बहुत आभारी होंगे। वैसे तो हम आपके द्वारा सुझायी पुस्तकों के अलावा अपने स्वयं के अध्ययन के जरिये पुस्तकें खुद खरीदते हैं। कई बार कुछ महत्वपूर्ण पुस्तकें भी हमारी निगाह में आ नहीं पातीं या हमें मिल नहीं पातीं। यदि आपको लगे कि कोई खास किताब हम तक जरूर पहुंचे तो आप ऐसी पुस्तक के बारे में हमें बता सकते हैं या उसकी एक प्रति भिजवा सकते हैं। जरूरत की अन्य प्रतियां हम मूल्य दे कर मंगवा लेंगे।
त्यौेहारों की शुभकामनाओं सहित,
आपका ही

सूरज प्रकाश
कथा यूके के भारतीय प्रतिनिधि
09860094402

शुक्रवार, 12 सितंबर 2008

कबाड़खाना.ब्‍लागस्‍पाट.कॉम पर किताबों की दुनिया पर मेरी पोस्‍ट

अच्‍छी किताबें पाठकों की मोहताज नहीं होतीं - मेरी ये पोस्‍ट पढि़ये kabaadkhaana.blogspot.com पर. आपकी राय का इंत‍ज़ार रहेगा

सूरज प्रकाश

गुरुवार, 4 सितंबर 2008

17वीं पुण्‍य तिथि पर शरद जोशी को याद करते हुए


बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा लेखक होना बेहतर है.

आदमी के पास अगर दो विकल्‍प हों कि वह या तो बड़ा अफसर बन जाये और खूब मज़े करे या फिर छोटा मोटा लेखक बन कर अपने मन की बात कहने की आज़ादी अपने पास रखे तो भई, बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा सा लेखक होना ज्‍यादा मायने रखता है. हो सकता है आपकी अफसरी आपको बहुत सारे फायदे देने की स्थिति में हो तो भी एक बात याद रखनी चाहिये कि एक न एक दिन अफसर को रिटायर होना होता है. इसका मतलब यही हुआ न कि अफसरी से मिलने वाले सारे फायदे एक झटके में बंद हो जायेंगे, जबकि लेखक कभी रिटायर नहीं होता. एक बार आप लेखक हो गये तो आप हमेशा लेखक ही होते हैं. अपने मन के राजा. आपको लिखने से कोई रिटायर नहीं कर सकता.
लेखक के पक्ष में एक और बात जाती है कि उसके नाम के आगे कभी स्‍वर्गीय नहीं लिखा जाता. हम कभी नहीं कहते कि हम स्‍वर्गीय कबीर के दोहे पढ़ रहे हैं या स्‍वर्गीय प्रेमचंद बहुत बड़े लेखक थे. लेखक सदा जीवित रहता है, भावी पीढियों की स्‍मृति में, मौखिक और लिखित विरासत में और वो लेखक ही होता है जो आने वाली पीढियों को अपने वक्‍त की सच्‍चाइयों के बारे में बताता है.
तो भाई मेरे, जब लेखक के हक के लिए, लेखक की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता के लिए और लेखक के सम्‍मान के लिए आपको पक्ष लेना हो तो आपको ऐसी अफसरी पर लात मार देनी चाहिये जो आपको ऐसा करने से रोके. आखिरकार लेखक ही तो है जो अपने वक्‍त को सबसे ज्‍यादा ईमानदारी के साथ महसूस करके कलमबद्ध करता है और कम से कम अपनी अपनी अभिव्‍यक्ति के मामले में झूठ नहीं बोलता.
ये और ऐसी कई बातें थीं तो शरद जोशी ने मुझसे उस वक्‍त कही थीं जब सचमुच मेरे सामने एक बहुत बड़ा संकट आ गया था कि मुझे तय करना था कि मुझे एक ईमानदार लेखक की अभिव्‍यक्ति की स्‍वंतत्रता के पक्ष में खड़ा होना है या अपनी अफसरी बचाने के लिए अपने आकाओं के सामने घुटने टेकने हैं.
एक बहुत बड़ा हादसा हो गया था. शरद जी का भरी सभा में अपमान हो गया था. बेशक सारे एपिसोड में सीधे सीधे मुझे दोषी करार दिया जा सकता था और दोष दिया भी गया था लेकिन एक के बाद एक सारी घटनाएं इस तरह होती चली गयीं मानों सब घटनाओं का सूत्र संचालक कोई और हो और सब कुछ सुनियोजित तरीके से कर रहा हो. मैं हतप्रभ था और समझ नहीं पा रहा था कि ऐसा कैसे हो गया और क्‍यों हो गया. बेशक शरद जी का अपमान हुआ था लेकिन मेरी भी नौकरी पर बन आयी थी.
हादसे के अगले दिन सुबह सुबह शरद जी के गोरेगांव स्थित घर जा कर जब मैं इस पूरे प्रकरण के लिए उनसे माफी मांगने आया था तो मैंने उनके सामने अपनी स्थिति स्‍पष्‍ट की थी और सिलसिलेवार पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया था तो बेहद व्‍यथित होने के बावजूद शरद जी ने मेरी पूरी बात सुनी थी, मेरे कंधे पर हाथ रखा था और पूरे हादसे को रफा दफा करते हुए नेहा से चाय लाने के लिए कहा था..
तब उन्‍होंने वे सारी बातें मुझसे कहीं थीं जो मैंने इस आलेख के शुरू में कही हैं.
ये शरद जी की प्‍यार भरी हौसला अफजाई का ही नतीजा था कि मैंने भी तय कर लिया था कि जो होता है होने दो, मैं अपने दफ्तर में वही बयान दूंगा जो शरद जी के पक्ष में हो, बेशक मेरी नौकरी पर आंच आती है तो आये..
जिस वक्‍त की ये घटना है उस वक्‍त तक मैंने लिखना शुरू भी नहीं किया था और लगभग 34 बरस का होने के बावजूद मेरी दो चार लघुकथाओं के अलावा मेरी कोई भी रचना कहीं भी प्रकाशित नहीं हुई थी. छटपटाहट थी लेकिन लिखना शुरू नहीं हो पाया था.. शरद जी से मैं इससे पहले भी एक दो बार मिल चुका था जब वे एक्‍सप्रेस समूह की हिन्‍दी पत्रिका के संपादक के रूप में काम कर रहे थे. तब भी उन्‍होंने मुझे कुछ न कुछ लिखते रहने के लिए प्रेरित किया था लेकिन मैं नहीं लिख पाया तो नहीं ही लिख पाया.
जिस घटना का मैं जिक्र कर रहा हूं, उस वक्‍त की है जब राजीव गांधी प्रधान मंत्री थे और वे देश भर में घूम घूम कर आम जनता की समस्‍याओं का परिचय पा रहे थे. इसी बात को ले कर शरद जी ने अपनी अत्‍यंत प्रसिद्ध और लोकप्रिय रचना पानी की समस्‍या को ले कर लिखी थी कि किस तरह से राजीव गांधी आम जनता से पानी को ले कर संवाद करते हैं.. मैंने मुंबई में चकल्‍लस के कार्यक्रम में ये रचना सुनी थी और बहुत प्रभावित हुआ था. उस दिन के चकल्‍लस में जितनी भी रचनाएं सुनायी गयी थीं, सबसे ज्‍यादा वाहवाही शरद जी ने अपनी इस रचना के कारण लूटी थी.
चकल्‍लस के शायद दस दिन बाद की बात होगी. हमारे संस्‍थान में एक राष्‍ट्रीय स्‍तर का कार्यक्रम होना था जिसके आयोजन की सारी जिम्‍मेवारी मेरी थी. कार्यक्रम बहुत बड़ा था और इससे जुड़े बीसियों काम थे जो मुझे ही करने थे. तभी मुझसे कहा गया कि इसी आयोजन में एक कवि सम्‍मेलन का भी आयोजन किया जाये और कुछ कवियों का रचना पाठ कराया जाये. मैंने अपनी समझ और अपने सम्‍पर्कों का सहारा लेते हुए शरद जी, शैल चतुर्वेदी, सुभाष काबरा, आस करण अटल और एक और कवि को रचना पाठ के लिए आमंत्रित किया था. शरद जी और शैल चतुर्वेदी जी को आमंत्रित करने मैं खुद उनके घर गया था. सब कुछ तय हो गया था.
मैं अपने आयोजन की तैयारियों में बुरी तरह से व्‍यस्‍त था. कार्यक्रम में मंच पर रिज़र्व बैंक के गवर्नर, उप गवर्नर, अन्‍य वरिष्‍ठ अधिकारी गण उपस्थित रहने वाले थे और सभागार में कई बैंकों के अध्‍यक्ष और दूसरे वरिष्‍ठ अधिकारी मौजूद होते.
कार्यक्रम के‍ दिन सुबह सुबह ही मुझे विभागाध्‍यक्ष ने बुलाया और पूछा कि कार्यक्रम में कौन कौन से कवि आ रहे हैं. मैं इस बारे में उन्‍हें पहले ही बता चुका था, एक बार फिर सूची दोहरा दी. तभी उन्‍होंने जो कुछ कहा, मेरे तो होश ही उड़ गये.
विभागाध्‍यक्ष महोदय ने बताया कि पिछली शाम ऑफिस बंद होने के बाद कार्यपालक निदेशक महोदय ने उन्‍हें बुलाया था और बुलाये जाने वाले कवियों के बारे में पूछा था. जब उन्‍हें बताया गया कि शरद जी भी आ रहे हैं तो कार्यपालक निदेशक ने स्‍पष्‍ट शब्‍दों में ये आदेश दिया कि देखें कहीं शरद जी अपनी पानी वाली रचना न सुना दें. सरकारी मंच का मामला है और कार्यक्रम में रिज़र्व बैंक सहित पूरा बैंकिंग क्षेत्र मौजूद होगा, इसलिए वे किसी भी किस्‍म का रिस्‍क‍ नहीं लेना चाहेंगे.
विभागाध्‍यक्ष महोदय अब चाहते थे कि मैं शरद जी को फोन करके कहूं कि वे बेशक आयें लेकिन पानी वाली रचना न पढ़ें. मेरे सामने एक बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ था. मैं जानता था कि जो काम मुझसे करने के लिए कहा जा रहा है. वह मैं कर ही नहीं सकता. शरद जी जैसे स्‍वाभिमानी व्‍यंग्‍यकार से ये कहना कि वे हमारे मंच से अलां रचना न पढ़ कर फलां रचना पढ़ें, मेरे लिए संभव ही नहीं था. मैं घंटे भर तक ऊभ चूभ होता रहा कि करूं तो क्‍या करूं. मुझे फिर केबिन में बुलवाया गया और पूछा गया कि क्‍या मैंने शरद जी तक संदेश पहुंचा दिया है. मैं टाल गया कि अभी मेरी बात नहीं हो पायी है. उनका नम्‍बर नहीं मिल रहा है.
उन दिनों हमारे विभाग में डाइरेक्‍ट टैलिफोन नहीं था और आपरेटर के जरिये नम्‍बर मांग कर किसी से बात करना बहुत धैर्य की मांग करता था. मैंने उस वक्‍त तो किसी वक्‍त टाला लेकिन कुछ न कुछ करना ही था मुझे.
मेरी डेस्‍क पर आयोजन की व्‍यवस्‍था से जुड़े कई काम अधूरे पड़े थे जो अगले दो तीन घंटे में पूरे करने थे. अब ऊपर से ये नयी जिम्‍मेवारी कि शरद जी से कहा जाये कि वे हमारे कार्यक्रम में पानी वाली रचना न सुनायें. सच तो ये था कि शरद जी से बिना बात किये भी मैं जानता था कि वे हमारे कार्यक्रम में पानी वाली रचना ही सुनायेंगे.
चूंकि उन्‍हें आमंत्रित मैंने ही किया था, ये काम भी मुझे ही करना था. उनसे साफ साफ कहना तो मेरे लिए असंभव ही था लेकिन बिना असली बात बताये उन्‍हें आने से मना तो किया ही जा सकता था. तभी मैंने तय कर लिया कि क्‍या करना है. मैंने शरद जी के घर का फोन नम्‍बर मांगा ताकि उनसे कह सकूं कि बेशक कवि सम्‍मेलन तो हो रहा है‍ लेकिन हम आपको चाह कर भी नहीं सुन पायेंगे.
यहां मेरे लिए हादसे की पहली किस्‍त इंतज़ार कर रही थी. बताया गया कि शरद जी दिल्‍ली गये हुए हैं और कि उनकी फ्लाइट लगभग डेढ़ बजे आयेगी और कि वे एयरपोर्ट से सीधे ही रिज़र्व बैंक के कार्यक्रम में जायेंगे. हो गयी मुसीबत. इसका मतलब मेरे पास शरद जी को कार्यक्रम में आने से रोकने का कोई रास्‍ता नहीं. वे सीधे कार्यक्रम के समय पर आयेंगे और सीधे आयोजन स्‍थल पर पहुंचेंगे तो उनसे क्‍या कहा जायेगा और कैसे कहा जायेगा, ये मेरी समझ से परे था.
मैंने अपने विभागाध्‍यक्ष को पूरी स्थिति से अवगत करा दिया और ये भी बता दिया कि मैं जो करना चाहता था, अब नहीं कर पाऊंगा. कर ही नहीं पाऊंगा.
मैं अभी कार्यक्रम की तैयारियों में फंसा ही हुआ था कि कई बार पूछा गया कि शरद जी का क्‍या हुआ. मैं क्‍या जवाब देता. मुख्‍य कार्यक्रम साढ़े तीन बजे शुरू होना था और मुझे दो बजे बताया गया कि कैसे भी करके किसी बाहरी एजेंसी के माध्‍यम से कवि सम्‍मेलन की आडियो रिकार्डिंग करायी जाये.
हमारे संस्‍थान की एक बहुत अच्‍छी परम्‍परा थी कि आपका पोर्टफो‍लियो है तो सारे काम आपको खुद ही करने होंगे. कोई भी मदद के लिए आगे नहीं आयेगा और न ही किसी को आपकी मदद के लिए कहा ही जायेगा. मरता क्‍या न करता, मैं एक दुकान से दूसरी दुकान में रिकार्डिंग की व्‍यवस्‍था कराने के लिए भागा भागा फिरा. अब तो इतने बरस बाद याद भी नहीं‍ कि इंतज़ाम हो भी पाया था या नहीं.
मुख्‍य कार्यक्रम शुरू हुआ. आधा निपट भी गया और बुलाये गये पांचों कवियों में से एक भी कवि का पता नहीं. कहीं सब के सब तो दिल्‍ली से नहीं आ रहे.. मैं परेशान हाल कभी लिफ्ट के पास तो कभी सभागृह के दरवाजे पर. कुल 5 लिफ्टें और कम्‍बख्‍त कोई भी ऊपर नहीं आ रही. मेरी हालत खराब. कार्यक्रम किसी भी पल खत्‍म हो सकता था और कवि सम्‍मेलन शुरू करना ही होता. एक भी कवि नहीं हमारे पास.
तभी एक लिफ्ट का दरवाजा खुला और एक कवि नज़र आये. मैं उन्‍हें फटाफट भीतर ले गया और उनसे फुसफुसाकर कहा कि अभी कोई भी नहीं आया है. बाकियों के आने तक आप मंच संभालिये. संचालन हमारे विभागाध्‍यक्ष महोदय कर रहे थे. उन्‍होंने ज्‍यों ही इकलौते कवि को देखा, उनके नाम की घोषणा की दी और कवि सम्‍मेलन शुरू. अब मैं फिर लिफ्टों के दरवाजों के पास खड़ा बेचैनी से हाथ मलते सोच रहा था कि अब मैं किसी भी अनहोनी को नहीं रोक सकता. किसी भी तरह से नहीं.
एक लिफ्ट का दरवाजा खुला. चार मूर्तियां नज़र आयीं. शैल जी, शरद जी, सुभाष काबरा जी और एक अन्‍य कवि. मेरी सांस में सांस तो आयी लेकिन अब मैं शरद जी से क्‍या कहूं और कैसे कहूं. किसी तरह उन्‍हें भीतर तक लिवा ले गया. अब जो होना है, हो कर रहेगा. शरद जी ने कुर्सी पर बैठते ही कहा, सूरज भाई एक गिलास पानी तो पिलवाओ. मैं लपका एक गिलास पानी के लिए. आसपास कोई चपरासी या टी बाय नज़र नहीं आया. मैं लाउंज तक भागा ताकि खुद ही पानी ला सकूं. जब तक मैं एक गिलास पानी ले कर आया, शरद जी के नाम की घोषणा हो चुकी थी. पानी पीया उन्‍होंने और मंच की तरफ चले.
तय था वे पानी वाली रचना सुनायेंगे. मेरी हालत खराब. इतनी सरस रचना सुनायी जा रही है और सभागृह में एकदम सन्‍नाटा. सिर्फ शरद जी की ओजपूर्ण आवाज़ सुनायी दे रही है.
गवर्नर महोदय ने उप गवर्नर महोदय की तरफ कनखियों से देखा. उप गवर्नर महोदय ने इसी निगाह से कार्यपालक निदेशक महोदय को देखा और कार्यपालक निदेशक महोदय ने अपनी तरफ से इस निगाह में योगदान देते हुए हमारे विभागाध्‍यक्ष को घूरा और आंखों ही आंखों में इशारा किया कि ये रचना पाठ बंद कराया जाये. हमारे विभागाध्‍यक्ष महोदय की निगाह निश्चित ही मुझ पर टिकनी थी और मेरे आगे कोई नहीं था. मैंने कंधे उचकाये – मैं कुछ नहीं कर सकता. मंच पर तो आप ही खड़े हैं..
एक बार फिर तेज़ निगाहों का आदान प्रदान हुआ और एक तरह से विभागाध्‍यक्ष को डांटा गया कि वे ये रचना पाठ बंद करायें. नहीं तो.. नहीं तो.. मैं आगे कल्‍पना नहीं कर पाया कि इस नहीं तो के कितने आयाम हैं. विभागाध्‍यक्ष डरते डरते शरद जी के पास जा कर खड़े हो गये लेकिन कुछ कह‍ने की हिम्‍मत नहीं कर पाये. यहां ये बताना प्रासंगिक होगा कि विभागाध्‍यक्ष खुद व्‍यंग्‍य कवि थे और दिल्‍ली में बरसों से कवि सम्‍मेलनों का सफल संचालन करते रहे थे. एक और कड़ी निगाह विभागाध्‍यक्ष की तरफ और उन्‍होंने धीरे से शरद जी से कहा कि आप कोई और रचना पढ़ लें, इसे न पढ़ें.
यही होना था. शरद जी हक्‍के बक्‍के. समझा नहीं पाये, क्‍या कहा जा रहा है उनसे.. फिर उन्‍होंने काग़ज़ समेटे और माइक पर ही कहा - ये तो आपको पहले बताना चाहिये था कि मुझे कौन सी रचना पढ़नी है और कौन सी नहीं, मैं पहले तय करता कि मुझे आना है या नहीं. मैं यही रचना पढूंगा या फिर कुछ नहीं पढूंगा.. बोलिये क्‍या कहते हैं...
एक लम्‍बा सन्‍नाटा. . . किसी के पास कोई शब्‍द नहीं.. कोई उपाय नहीं.. बिना शब्‍दों के ही सारा कारोबार हो रहा था.. अब शरद जी मंच से नीचे उतरे और सीधे सभागृह के बाहर..
अनहोनी हो चुकी थी.. मैं कुछ भी कहने की स्थिति में नहीं था.. हमारे एक वरिष्‍ठ अधिकारी जो कभी टाइम्‍स में पत्रकार रह चुके थे और कभी बंबई में शरद जी के साथ धोबी तलाव इलाके में एक लॉज में रह चुके थे, शरद जी को मनाने उनके पीछे लपके.
शरद जी बुरी तरह से आहत हो गये थे.. ये बताने का वक्‍त नहीं था कि ये सब क्‍यूंकर हुआ और इस स्थिति को कैसे भी करके टाला ही नहीं जा सका.
अगले दिन अखबारों में ये खबर थी. ऑफिस में मुझसे स्‍पष्‍टीकरण मांगा गया और मेरे लिए आने वाले दिन बहुत मुश्किल भरे रहे.. लेकिन शरद जी से‍ मिलने के बाद मेरी हिम्‍मत बढ़ी थी और मैं किसी भी अनचाही स्थिति के लिए अपने आपको तैयार कर चुका था.. शरद जी से उस मुलाकात के बाद ही मुझमें लिखने की हिम्‍मत आयी थी. अब मुझे लिखते हुए बीस बरस होने को आये.. शरद जी के वे शब्‍द आज भी हर बार कलम थामते हुए मेरे सामने सबसे पहले होते हैं‍ कि बहुत बड़े अफसर की तुलना में छोटा सा लेखक होना ज्‍यादा मायने रखता है.
मैं बेशक अपने संस्‍थान में मझोले कद का अफसर हूं लेकिन अपना परिचय छोटे मोटे लेखक के रूप में देना ही पसंद करता हूं. मुझे पता है,. जब तक चाहूं सक्रिय रह सकता हूं.. लेखन से रिटायरमेंट नहीं होता ना.... सूरज प्रकाश

शुक्रवार, 29 अगस्त 2008

कुछ अनछुए पल कमलेश्वर जी के साथ - प्रिया आनंद

ये रचना और साथ में चित्र मेरी टेलिफोन मित्र प्रिया आनंद ने हिमाचल प्रदेश से भेजे हैं. कमलेश्‍वर जी से जो भी मिला, उनका मुरीद हो गया. प्रिया मैडम ये दुर्लभ तस्‍वीरें मेरे ब्‍लाग के माध्‍यम से आप सब के साथ शे‍यर कर रही हैं. उनका स्‍वागत है.

सूरज प्रकाश

हिमाचल का एक प्यारा सा शहर मंडी

शिखर समारोह 2006 के एक दिन पहले वाली शाम मैं मंडी के ब्यूरो आफिस में थी। रात के दस बजे तक मैं और अजय (ब्यूरो) जागते ही रहे थे। संकन गार्डन के पुरातन घंटाघर से गजर की आवाज सुनाई दी, तो उस समय मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि कल बहुत सारे ऐसे लोगों को देखूंगी, जिन्हें अब तक मैंने सिर्फ पढ़ा था। शाम भी देर तक मैं और अजय इंदिरा मार्केट में घूमते रहे थे। इस मार्केट को देखकर अचानक ही लखनऊ के गड़बड़झाला बाजार की याद आ गई। कुछ-कुछ वैसा ही माहौल था। हम सीढियों से उतर कर संकन गार्डन में गए। मंडी के बुद्धिजीवियों, साहित्यकारों की यहां सबसे ज्यादा बैठकें होती हैं। वहां बात यही चल रही थी कि कल कमलेश्वर जी आने वाले हैं।
- कमलेश्वर नहीं... पहाड़ों में आग आ रही है। किसी ने कहा था।
रात उनसे मेरी फोन पर बात हई। मैंने कहा आपका मंडी में स्वागत है।
``मंडी आ तो गया हूं, पर यह पता नहीं लग रहा है कि पूर्व में हूं या पश्चिम में´´ हंसकर उन्होंने कहा था।
अगले दिन विपाशा सदन में लेखकों का यह महाकुंभ आरंभ हुआ।


चित्रा मुद्गल, प्रभाकर श्रोत्रिय, लीलाधर जगूड़ी, राजेंद्र प्रसाद पांडेय, राजी सेठ, जया जादवानी और भारतीय दूरदर्शन के प्रथम स्क्रिप्ट राइटर कमलेश्वर। उनके अलावा और भी साहित्यकार थे।
सत्र का विषय था - मैं क्यों लिखता हूं।


``मैं यह नहीं कहूंगा कि किसी लड़की ने मेरा दिल तोड़ा है, इसलिए लिखता हूं कमलेश्वर जी ने मंच पर घोषित किया... लोग हंस दिए। इसके बाद उन्होंने अपनी बात शुरू की। शब्द... शब्द जैसे मोतियों की लडियां पिरोई जा रही हों।
उन्होंने कहा - यह सिल्क रूट की तरह साहित्य संस्कृति का चौराहा है, इसलिए मंडी है।´´ बात चली तो यशपाल, गुलेरी से होकर ओरवेल पामुक तक आ गई।
एक के बाद एक साहित्यकार बोलते गए। सत्र समाप्त हुआ।
ब्रेकफास्ट के दौरान मुझे शरारत सूझी, मैंने अपनी दोस्त से कहा... चल कमलेश्वर जी को छकाते हैं। साथ-साथ चलते हमने उन्हें एक क्षण के लिए रोका और उनके अगल-बगल हो लिए... काफी करीब।

तस्वीर बीरबल शर्मा ने खींची और एक उम्दा शरारत उसने भी की। कैमरे का फोकस सिर्फ मुझ पर और कमलेश्वर जी पर ही रखा। यह उसी शरारत की तस्वीर है। यह तस्वीर शाम धुलकर आई तो लोगों ने कहा, ऐसा नूर तुम्हारे चेहरे पर कभी नहीं आया। कैसे कहती कि जिस सूरज की तपिश मेरे साथ थी यह रौनक उसी से आई थी।
कमलेश्वर जी ने गायत्री जी से मेरा परिचय करवाया।
डाइनिंग हाल तक हम फिर साथ-साथ ही रहे।
सामने मुख्यमंत्री और कमलेश्वर जी, इधर मैं, गायत्री जी तथा कुछ अन्य लोग। इसी बीच मेरे मित्र अशेष ने मेरे पास आकर कहा... सारे पत्रकार उधर खड़े होकर खा रहे हैं, तुम यहां क्यों बैठी हो...?
``आपके राज्य अतिथि मेरे आत्मीय हैं, इसलिए उन्होंने मुझे यहां बिठा रखा है´´, मैंने जवाब दिया था।
खाना खत्म हुआ, लोग धीरे-धीरे धूप में आ गए।
हम धूप में ही कुर्सियों पर बैठे... कमलेश्वर जी, गायत्री जी और मैं।
मैंने कमलेश्वर जी से कहा- आप आज के दिन के लिए मेरी डायरी पर कुछ लिख दें। मैंने डायरी उन्हें थमा कर कैमरा फोकस कर लिया। मेरी डायरी हाथ में थामे उन्होंने ब्यास दरिया के बहते पानी पर एक नजर डाली और फिर ऊंचे हरे पहाड़ों को देखा। उसी वक्त वह पल मैंने कैमरे में कैद कर लिया।
कमलेश्वर जी और गायत्री जी की यह उसी समय की तस्वीर है। मेरी डायरी पर उन्होंने लिखा-
प्रिया के लिए....।
अपने समय के यथार्थ को समझना और सहेजना ही लेखक का धर्म है। कमलेश्वर 8-12-2006...
तब मुझे जरा भी नहीं पता था कि यह उन्हें मैं आखिरी बार देख रही हूं।


यह रोचक ही रहा कि जितने दिन कमलेश्वर जी मंडी में रहे, सूरज चमकता रहा और सारा शहर धूप में नहाया रहा। पर उनके जाते ही धूप गायब... बर्फ, बारिश... ठंडा घना कोहरा।
क्या सचमुच यह धूप कमलेश्वर जी की आग की थी...?
प्रिया आनंद, दिव्‍य हिमाचल,

गुरुवार, 21 अगस्त 2008

लंदन में मुलाकात नवाज़ शरीफ़ से . . .






कथा यूके के सम्‍मान समारोह में शिरकत करने के लिए जब मैं जुलाई 2007 में लंदन की यात्रा पर गया तो मेरी बहुत पुरानी मित्र पाकिस्‍तान की कथा लेखिका नीलम बशीर से एक बार फिर मुलाकात हो गयी. वे हमेशा की तरह अमेरिका से पाकिस्‍तान या शायद पाकिस्‍तान से अमेरिका जा रही थीं और कथा यूके के आमंत्रण पर कथा सम्‍मान 2007 में शिरकत करने के लिए कुछ दिन के लिए लंदन में रुक गयीं थीं. कई बरस पहले उन्‍होंने लंदन में ही कथा यूके के एक सम्‍मान आयोजन में मेरे उपन्‍यास देस बिराना का लोकार्पण किया था. तब उन्‍होंने मंच से ये बात कही थी कि काश, मैं ये खूबसूरत किताब पढ़ पाती. इस बार ये सुखद संयोग हुआ कि मैं उन्‍हें अपने उपन्‍यास की ऑडियो सीडी भेंट कर पाया. ये दूसरा सुखद संयोग है कि इस ऑडियो को भी लंदन की एक संस्‍था एशियन कम्‍यूनिटी आर्ट्स के साथ मिल कर कथा यूके ने ही तैयार करवाया है.
कथा सम्‍मान आयोजन से एक दिन पहले लंदन की घुमक्‍कड़ी का कार्यक्रम बना. घूमने जाने वालों में थे मैं, नीलम, 2007 की हमारी कथा सम्‍मान प्राप्‍त लेखिका महुआ माजी और अमेरिका से लौटते हुए खास तौर पर इस आयोजन के लिए लंदन रुके प‍त्रकार मित्र अजित राय. जब हम कथ यूके के कर्ता धर्ता तेजेन्‍द्र के घर से निकलने लगे तो नीलम ने बताया कि कराची से उसकी पत्रकार, कहानीकार मित्र ज़ाहिदा हिना भी लंदन आयी हुई हैं और बेकर स्‍ट्रीट के पास उनसे मुलाकात करनी है. ज़ाहिदा हिना हमारे लिए सुपरिचित नाम है और उन्‍हें हम हिन्‍दी में छपने वाले उनके कॉलमों और कहानियों की वज़ह से जानते ही हैं.
तय हुआ, सबसे पहले उनसे ही मिल लिया जाये. नीलम जी के पास जो पता था, उसे खोजने में कोई तकलीफ़ नहीं हुई लेकिन जब हमने उस भव्‍य इमारत की दूसरी मंजिल तक नीचे से संदेश पहुंचाया तो पता चला कि ज़ाहिदा अभी मीटिंग में हैं और हमें कुछ देर इंतज़ार करना पड़ सकता है. उनके इंतज़ार में ऊपर जाने के बज़ाये हमने यही बेहतर समझा कि यहीं भीड़ भरे बाज़ार की रौनक में ही थोड़ी देर लुत्‍फ़ उठाते रहें. ये सोच कर हम मुड़े ही थे कि दूसरी मंजिल से उतर कर एक बेहद खूबसूरत शख्‍स़ लपकते हुए हमारे पीछे आये और कहने लगे कि आपको ज़ाहिदा ऊपर ही बुला रही हैं.
हम चारों चले उनके पीछे पीछे. हम जिस जगह ले जाये गये, दफ़तरनुमा कुछ लग रहा था. चहल पहल. लेकिन सब कुछ एक अनुशासित तरीके से. एक बड़े से कमरे में कुछ सोफे और कुछ कुर्सियां वगैरह रखे थे. वहीं हमें ले जाया गया. सामने मेज़ पर पीतल के एक खूबसूरत स्‍टैंड पर एक झंडा टिका हुआ था. नये और अपरिचित माहौल में होने के कारण हम तय नहीं कर पाये कि हम किस किस्‍म के दफ्तर में हैं और ये झंडा किस पार्टी का है. ज़ाहिदा हमें वहीं मिलीं. कुछ और लोग थे वहां बैठे हुए. उनसे दुआ सलाम हो ही रही थी कि सबके लिए कॉफ़ी आ गयी. हमने कॉफ़ी के पहले ही घूंट भरे होंगे कि कमरे में एक निहायत शरीफ़ और खूबसूरत से लगने वाले शख्‍स़ ने प्रवेश किया. इस गोरे चिट्टे शख्‍स़ को देखते ही लगा कि कहीं देखा हुआ है इसे.
उस शख्‍स़ ने ज्‍यों ही हाथ जोड़ कर नमस्‍कार किया, याद आया, अरे ये तो नवाज़ शरीफ़ हैं. पाकिस्‍तान के अपदस्‍थ प्रधान मंत्री, जो अरसे से अपने मुल्‍क से दूर यहां निर्वासित जीवन जी रहे हैं.
सबसे आगे मैं ही बैठा था. पहले मुझसे हाथ मिलाया उन्‍होंने और आगे बढ़ते हुए सबसे दुआ सलाम करते हुए एक खाली कुर्सी पर आ विराजे. ज़ाहिदा ने सबसे पहले नीलम से उनका परिचय कराया. नवाज के लहज़े से लगा कि वे नीलम को तो नहीं, बेशक उनके अब्‍बा हुज़ूर को ज़रूर जानते रहे होंगे. बशीर सीनियर पाकिस्‍तान के साहित्‍य और पत्रकारिता जगत में खासा नाम रखते थे. उसके बाद अजित, महुआ और मेरा परिचय खुद नीलम ने दिया. जब नवाज़ साहब को पता चला कि हम लेखक और पत्रकार लोग हैं और भारत से आये हैं तो उनका लहज़ा एकदम मीठा हो गया और वे भारत पाकिस्‍तान के बीच मधुर संबंधों की, बेहतर रिश्‍तों की और हर तरह की दूरियां कम करने की बात करने लगे. अपनी बात में वज़न लाने के लिए उन्‍होंने पंजाबी में बुल्‍ले शा और दूसरे लोक कवियों को कोट करना शुरू कर दिया. हम वहां पर मेहमान थे और उनके नहीं, बल्कि उनकी मेहमान ज़ाहिदा के मेहमान थे. इसलिए जो कुछ भी कहा जा रहा था, उसे सुनने के अलावा कुछ नहीं कर सकते थे फिर भी मैंने कह ही दिया कि नवाज़ साहब, रिश्‍ते तो इधर बेहतर हुए ही हैं और ये कि ये तो दोनों तरु से लगातार चलने वाली प्रोसेस है और आप एक दिन में बेहतर रिज़ल्‍ट की उम्‍मीद नहीं कर सकते. नवाज़ साहब ने मेरी तरफ देखा, कुछ बुदबुदाये, इस बीच अजित ने भी इसी आशय की टिप्‍पणी की कि रिश्‍ते बेहतर बनाने के लिए तो आपस में विश्‍वास जीतना होता है और अवाम के बीच ज़मीनी काम करना पड़ता है.
तभी नवाज़ साहब ने जानना चाहा कि हम लंदन किस सिलसिले में आये हैं. उन्‍हें बताया गया कि लंदन की एक संस्‍था कथा यूके का साहित्‍य सम्‍मान लेने के लिए महुआ भारत से आयी हैं और कि अगले ही दिन हाउस आफ लार्ड्स में ये सम्‍मान दिया जाना है. वे ये जानकर बहुत खुश हुए और कहने लगे कि ये तो वाकई बहुत शानदार बात है कि लिटलेचर इस तरह से मुल्‍कों की सरहदें पार कर अपनी जगह बना रहा है. मज़े की बात, महुआ मैडम को अब तक पता नहीं था कि ये शख्‍स कौन हैं. कॉफ़ी पी जा चुकी थी और सबसे पहले नवाज़ ही उठे, हम सब का शुक्रिया अदा किया और हमसे इजाज़त चाही. अब जा कर महुआ जी ने अजित से पूछा कि कौन हैं ये शख्‍स तो अजित ने उनकी जिज्ञासा शांत करते हुए बताया कि ये पाकिस्‍तान के अपदस्‍थ प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ़ हैं. अब महुआ की हैरानी देखने लायक थी. तब तक नवाज़ कमरे से जा चुके थे.
हम भी निकलने के लिए उठे. ज़ाहिदा भी हमारे साथ चलने के लिए तैयार हो गयीं. तभी शायद महुआ की तरफ से ये प्रस्‍ताव आया कि नवाज़ के साथ एक ग्रुप फोटो हो जाये. ज़ाहिदा से कहा गया और ज़ाहिदा ने अपने सम्‍पर्क खटखटाये. बात बन गयी और दो तीन मिनट के इंतज़ार के बाद नवाज़ फिर हाजिर थे. हम चाहते थे कि मेज़ पर रखे उनकी पार्टी के झंडे के पास खड़े हो कर फोटो खिंचवायें लेकिन वे कमरे के दरवाजे के पास परदे के आगे खड़े हो गये. फोटो सेशन हुआ. नवाज़ अब बेतकल्‍लुफ़ी से बात कर रहे थे. हम सब ने अपने अपने कैमरे से ग्रुप फोटो लिये. मैंने देखा कि हमने अपने कैमरों से तो तस्‍वीरें ली हीं, उनके बेटे और दामाद ने भी हम सब की तस्‍वीरें लीं.
नवाज़ ने हम सबसे पूछा कि हम हिन्‍दुस्‍तान के किन किन शहरों से आते हैं. जब मैंने बताया कि मेरे माता पिता तो पाकिस्‍तान से ही उजड़ कर भारत गये थे तो वे मुझसे ठेठ पंजाबी में ही बात करने लगे. महुआ ने अपने शहर रांची के बारे में बताते हुए अब चांस लिया और उन्‍हें बताया कि उनके जिस उपन्‍यास पर कथा यूके का ये सम्‍मान दिया जा रहा है, वह बांग्‍ला देश के मुक्ति संग्राम पर आधारित है. नवाज़ साहब ने खुशी जाहिर की तो लगे हाथों महुआ ने उन्‍हें अगले दिन के सम्‍मान समारोह के लिए न्‍यौता दे डाला. नवाज़ भाई ने भी देर न की और अपने पालिटिकल सेक्रेटरी से कह दिया कि वह मुझे अपना ईमेल आइडी दे दें ताकि उस पर दावतनामा भेजा जा सके. बेशक मुझे उनके सेक्रेटरी ने अपने कमरे में ले जा कर अपना कार्ड दिया और कहा कि मैं ज़रूर से ज़रूर न्‍यौता भेज दूं. कुछ और भी लोगों ने अपने कार्ड दिये. ज़ाहिदा ने बाद में बताया कि कॉंफी सेशन में हमारे साथ नवाज़ साहब के भाई, बेटे और दामाद का भी बैठे थे.
नीचे उतरते समय मोहतरमा महुआ माजी बेहद खुश थीं कि पहले ही दिन एक मशहूर शख्‍स से मुलाकात हो गयी. उन्‍होंने तुरंत एक छोटा सा सपना देखा कि क्‍या ही शानदार होगा वो पल जब पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधान मंत्री नवाज़ शरीफ़ लंदन के हाउस आफ लार्ड्स में भारत से आयी एक हिन्‍दी लेखिका महुआ माजी द्वारा बांग्‍ला देश के मु‍क्ति संग्राम पर लिखे गये हिन्‍दी उपन्‍यास को कथा यूके सम्‍मान से पुरस्‍कृत होते देखेंगे. उन्‍होंने मुझसे आग्रह किया कि उन्‍हें निमंत्रण पत्र ज़रूर ईमेल करूं.
अब मैं महुआ मैडम को कैसे बताता कि किसी एक राष्‍ट्र के प्रमुख के लिए दूसरे देश में, जिसमें उसने आश्रय ले रखा है, अपनाये जाने वाले प्रोटोकाल के कुछ नियम होते हैं और बेशक नवाज़ ने आपको खुश करने के लिए दावतनामा मांग लिया हो, वे एक आम आदमी की तरह हाथ में दावतनामा लिये लंदन के हाउस आफ लार्डस में सुरक्षा की औपचारिकताएं निभाते हुए आपके आयोजन में जाने से रहे. अलबत्ता, महुआ मैडम के चेहरे की रौनक दिन भर बनी रही और उनकी बातचीत में नवाज़ शरीफ़ लगातार बने रहे. शायद अगले दिन उन्‍होंने इंतज़ार भी किया हो और उनके आने की दुआ भी की हो. उनके ईमेल आइडी पर दावतनामा भेजने का तो सवाल ही नहीं था. अगर भेजा भी जाता तो नवाज़ साहब ने तो खैर क्‍या ही आना था इस कार्यक्रम में.

बुधवार, 13 अगस्त 2008

बायें हाथ से काम करने वालों का दिन

आज अखबार ने बताया कि आज लैफ्ट हैंडर्स डे है. जब भी इस तरह के डे की बात पढ़ता हूं तो यही अफसोस होता है‍ कि बरस भर के बाकी दिन तो दूसरों के लिए लेकिन एक दिन आपका. अब चाहे मदर्स डे हो या फादर्स डे. साल में एक दिन आपका. भले ही अपने देश का करवा चौथ का व्रत ही क्‍यों न हो. बेचारे पति के हिस्‍से में पूरे बरस में एक ही दिन आता है. जवाब में आप ये भी कह सकते हैं कि बेचारी महिलाओं के हिस्‍से में भी तो बरस भर में एक ही वीमेंस डे आता है. बाकी दिन तो उन्‍हें कोई याद नहीं करता.
तो बात चल रही थी लैफ्ट हैंडर्स डे की. मेरे पिता बेशक खब्‍बू थे लेकिन बचपन में हुई पिटाई के कारण दायें हाथ से लिखने के अलावा जीवन भर अपने सारे काम बायें हाथ से करते रहे. चाहे टेबिल टेनिस खेलना हो, कैरम खेलना हो या खाना खाना हो.
यही हाल मेरे बड़े भाई का रहा. वे खब्‍बू होने के बावजूद लिखने सहित अपने सारे काम दायें हाथ से करने को मजबूर हुए और नतीजा ये हुआ कि वे जिंदगी में जितनी तरक्‍की कर सकते थे. नहीं कर पाये. औसत से कम वाली जिंदगी उनके हिस्‍से में आयी.
मेरा छोटा बेटा भी खब्‍बू है. लेकिन उसे अपने सारे काम बायें हा‍थ से करने की पूरी छूट है. बेशक वह गिटार दायें हाथ से बजा लेता है और पीसी पर माउस भी दायें हाथ से ही चलाता है. पीसी की वजह समझ में आती है कि पीसी पूरे घर का सांझा है और वह इस बात को ठीक नहीं समझता कि बार बार सेटिंग करके माउस को अपने लिए लैफ्ट हैंडर बनाये. बाकी काम वह बायें हाथ से ही करता है.
मुझे याद पड़ता है कि हमारे बचपन में खब्‍बुओं को मार मार कर सज्‍जू कर दिया जाता था. (पंजाबी में बायें हाथ को खब्‍बा और दायें हाथ को सज्‍जा हाथ कहते हैं). मजाल है आप कोई काम खब्‍बे हाथ से कर के दिखा दें. घर पर तो पिटाई होती ही थी. मास्‍टर लोग भी अपनी खुजली उन्‍हें मार मार कर मिटाते थे. दुनिया में पूरी जनसंख्‍या के तीस से पैंतीस प्रतिशत लोग खब्‍बू तो होते ही होंगे लेकिन ये भारत में ही और वो भी उत्‍तर भारत में ज्‍यादा होता है‍ कि बायें हाथ से काम करने वाले को पीट पीट कर दायें हाथ से काम करने पर मजबूर किया जाता है. उसका मानसिक विकास तो रुकेगा ही जब आप प्रकृति के खिलाफ उस पर अपनी चलायेंगे.
मैंने सिर्फ गुजरात में ही देखा कि क्‍लास में और ट्रेनिंग सेंटर्स में भी इनबिल्‍ट मेज वाली कुर्सियां लैफ्ट हैंडर्स के लिए भी होती हैं बेशक तीस में से पांच ही क्‍यों न हों. ये भी मैंने गुजरात में ही देखा कि कई पति पत्‍नी दोनों ही खब्‍बू हैं. कई कई तो डाक्‍टर भी.
कहा जाता है कि पहले के ज़माने में युद्धों में बायें हाथ से लड़ने वालों को तकलीफ होती थी. वे मरते भी ज्‍यादा थे क्‍यों‍कि सामने वाले के बायें हाथ में ढाल है और दायें में तलवार. वह अपने सीने की रक्षा करते हुए सामने वाले के सीने पर वार कर सकता था लेकिन खब्‍बू महाशय के बायें हाथ में तलवार और दायें हाथ में ढाल है. बेचारा दिल तो उनका भी बायीं तरफ ही रहता था. नतीजा यही हुआ कि लड़ाइयों की वजह से खब्‍बू ज्‍यादा शहीद होते रहे और दुनिया की जनसंख्‍या में उनका प्रतिशत भी कम हुआ. ये एक कारण हो सकता है.
मैं विदेशों की नहीं जानता कि वहां पर लैफ्ट हैंडर्स के साथ क्‍या व्‍यवहार होता है. लेकिन ये मानने में कोई हर्ज नहीं कि उन्‍हें सम्‍मान तो मिलता ही होगा उन्‍हें भी तभी तो वे लैफ्ट हैंडर्स डे मनाने की सोच सकते हैं. पिटाई तो उनकी वैसे भी नहीं होती. आइये जानें दुनिया के कुछ खास खास खब्‍बुओं के बारे में. जरा सोचिये, अगर इन सबको भी पीट पीट कर सज्‍जू बना दिया जाता तो क्‍या होता. ये है सूची – महात्‍मा गांधी, सिंकदर महान, हैंस क्रिश्चियन एंडरसन, बिस्‍मार्क, नेपोलियन बोनापार्ट, जॉर्ज बुश सीनियर, जूलियस सीजर, लुइस कैरोल, चार्ली चैप्लिन, विंस्‍टन चर्चिल, बिल क्लिंटन, लियोनार्डो द विंची, अल्‍बर्ट आइंस्‍टीन, बेंजामिन फ्रेंकलिन, ग्रेटा गार्बो, इलियास होव, निकोल किडमैन, गैरी सोबर्स, ब्रायन लारा, सौरव गांगुली, वसीम अकरम, माइकल एंजेलो, मर्लिन मनरो, पेले, प्रिंस चार्ल्‍स, क्‍वीन विक्‍टोरिया, क्रिस्‍टोफर रीव, जिमी कोनर्स, टाम क्रूज, सिल्‍वेस्‍टर स्‍टेलोन, बीथोवन, एच जी वेल्‍स और अपने देश के बाप बेटा बच्‍चन जी.
है ना मजेदार लिस्‍ट.
आज के दिन सभी लैफ्ट हैंडर्स को सलाम.

सूरज प्रकाश