मंगलवार, 30 जून 2015

असंतुष्ट समाज की भावनात्मक शरणस्थली है फेसबुक - सूरज प्रकाश

संवाद/साइबर समाज शास्त्र


सरल, आत्मीय, भावुक, मिलनसार और गर्मजोशी से भरे। यूँ कहिये कि हम जितने अच्छे गुण किसी आदर्श लेखक में तलाशने की फ़िराक में रहते हैं, वरिष्ठ कथाकार सूरज प्रकाश सर में वो सब जरूरत से ज्यादा ही और छलकते हुए हैं। उनसे मिलने पर उनकी सरलता और सहजता हमें बरबस अपनत्व से भरे पुराने लेखकों की याद दिलाती है। वे हैं भी वरिष्ठ लेखक लेकिन उनकी रचना भूमि न केवल नई बल्कि एक तरह से भविष्य की सर जमीं है। जी, हाँ हाल के पिछले ढाई तीन बरसों में उन्होंने ज्यादातर कहानियां साइबर जगत की पृष्ठभूमि पर लिखी हैं, जो न केवल पाठकों के द्वारा हाथों हाथ ली गयी हैं बल्कि हिंदी के तमाम लेखकों ने भी उनसे प्रेरित होकर इधर का रुझान किया है।
सोशल मीडिया खासकर फेसबुक में उनकी कई कहानियों ने मसलन एक कमजोर लड़की की कहानी, कोलाज और लहरों की बांसुरी ने खूब धूम मचाई है। सोचने वाली बात है कि आखिर व्यवहारिक धरातल पर बेहद बेचैन घटनाक्रम वाले देश में रहते हुए सूरज प्रकाश जी ने आभासी साइबर जगत को अपनी रचना भूमि क्यों बनाया? वास्तविक सामाजिक हलचलों की बजाये उन्हें आभासी समाज ने अपनी कहानी कहने के लिए आकर्षित क्यों किया? इन्हीं तमाम सवालों को लेकर लोकमित्र ने उनके मुंबई स्थित निवास एच-१ रिद्धि गार्डन, गोरेगांव ईस्‍ट में उनसे खूब लंबी बातचीत की। पेश हैं इस बातचीत के कुछ महत्वपूर्ण अंश।  
लोकमित्र - सूरज प्रकाश जी आप शायद हिंदी के अकेले बड़े कथाकार हैं जिसकी हाल के एक -दो सालों में आयी ज्यादातर कहानियों का प्लाट साइबर जगत से है ..मैं जानना चाहता हूँ कि क्या साइबर जगत यानी संचार की यह आभासी दुनिया और उसके तमाम सुख दुःख, आपके लिए वास्तविक जगत जितने ही महत्वपूर्ण हैं या उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, आखिर हाल के सालों में आपने साइबर जगत के प्लाट ही क्यों चुने हैं?
सूरज प्रकाश - इसका जवाब हम थोड़ा पीछे से देंगे कि उत्तर भारत में या कहीं भी भारत में मध्य वर्ग के लिए, खासकर लड़कियों और महिलाओं के लिए पहली बार आज़ादी का पैगाम लेकर मोबाइल आया था। मोबाइल ने पहली बार एक ऐसी आज़ादी दी, कि आप अपने पसंद के किसी भी व्यक्ति से बात कर सकती हैं। वह भी घर बैठे हुए। उसके पहले लड़कियों के पास ऐसी आज़ादी नहीं थी कि वो किसी से भी बात कर सकें। यहाँ तक कि भाई के दोस्त  के साथ भी नहीं। उन्हें घर के बाहर अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी। गोलगप्पे भी खाने हों तो किसी पुरुष सदस्य के साथ जाना ज़रूरी था। चाहे फिर वह 8 साल का छोटा भाई ही क्यों न हो।
         मोबाइल ने पहली बार महिला को यह आज़ादी दी कि वह बिना किसी की इजाज़त लिए किसी से बात कर सकती थी। वह भी इसके लिए घर के बाहर जाने का जोखिम लिए बिना भी। लेकिन मोबाइल की अपनी सीमाएं थीं। आप इससे एक समय में किसी एक व्यक्ति से ही बात कर सकते थे। जो आम तौर पर पहले से जानकार होता था। अजनबी से भी बात करने की संभावनाएं तो थीं मगर पकड़े जाने के जोखिम भी थे। कुछ और संकट भी थे मसलन रिचार्ज वगैरह। फिर भी मोबाइल संचार माध्यमों में से पहला वह माध्यम था जिसके जरिये घर की चारदीवारी में कैद रहने वाली भारतीय महिला घर के बाहर की दुनिया से जुड़ी।
       लेकिन जब फेसबुक आया तो अचानक यह आज़ादी बहुत बड़ी हो गयी। इसके जरिये आप पूरी दुनिया से जुड़ सकते थे। साथ ही यह भी खुद ही तय कर सकते थे कि अपनी पहचान छुपा कर जुड़ें या पहचान बताकर। फेसबुक में आप अपनी बात कह सकते हैं, सुन सकते हैं, राय रख सकते हैं, राय मांग सकते हैं, साझा कर सकते हैं, दखल दे सकते हैं। लब्बोलुआब यह कि फेसबुक ने अभिव्यक्ति की एक समूची वैकल्पिक दुनिया दी। मुझे एक तो बड़े पैमाने पर हुए इस सामाजिक बदलाव से जुड़ना जरूरी लगा और दूसरी बात जो मैंने पिछले दिनों एक गोष्ठी में कही थी कि हमें अपने समय के साथ चलना होगा। अगर हम अपने वक़्त के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते तो हमारा लेखन हमारे वक़्त को प्रतिबिम्बित नहीं करेगा।
          हिंदी में अधिकांश लेखन ऐसा ही है जो अपने वक़्त को प्रतिबिम्बित नहीं कर रहा। जबकि जीवन के दूसरे क्षेत्रों में यह प्रतिबिम्‍ब दिख रहा है। पत्रकारिता में, फिल्मों में इस आधुनिक संचार की, तकनीक की मौजूदगी दिखती है। क्योंकि शायद वहां इसकी जरूरत का दबाव है। लेकिन हिंदी साहित्य में अभी दूर दूर तक यह नहीं है। तीन साल पहले मैं जब रिटायर हुआ तो मेरे सामने फेसबुक की अनंत विस्तार वाली दुनिया खुली। मैंने देखा फेसबुक एक बड़ा दायरा है। लोग वही हैं, जो हम सब सामान्य लोग हैं। लेकिन यहाँ हमने अपने आपको पेश करने के तरीके बदले हैं। मेरे व्यक्तिगत परिचय में आखिर कितने लोग होंगे? दो सौ, तीन सौ हद से हद चार सौ। लेकिन फेसबुक की दुनिया के चलते मैं अनंत लोगों से जुड़ा हूँ। फेसबुक में मुझे दो चीजें बेहतर लगीं। पहली ये कि लोग कुछ कहना चाहते हैं। जो अभी तक वो किसी और से नहीं कह पा रहे थे। अगर आप किसी अंजान आदमी का भी उपयुक्त कंधा पाते हैं तो यहाँ अपनी बात कह डालते हैं। आपको डर नहीं लगता। यह इस माध्यम की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक आजादी है।
    दूसरी महत्वपूर्ण बात इस माध्यम की है रिकग्नीशन। आपको लगता है कि आपकी बात सुनी गयी जो घर में नहीं सुनी जा रही थी या जिनसे आपको अपेक्षा थी, वो लोग नहीं सुन रहे थे। ये दो चीजें हैं जो फेसबुक को बहुत लोकतांत्रिक और सर्वप्रिय बनाती हैं। ये बहुत बड़ी दुनिया है। लोगों को लगता है यहाँ अपनी बात कह देना जोखिम से रहित है। इसलिए लोग यहाँ अपनी बात शेयर करते हैं। मैंने एक बात और देखी है। फेसबुक में मौजूद ज्यादातर लोग असंतुष्ट हैं। ज्यादातर अपने जीवन से सुखी नहीं हैं। इसके कई कारण हैं। जिसमें बेमेल विवाह हैं। पति नहीं सुनता। पत्नी नहीं सुनती। उम्र का फर्क है। पत्नी की इच्छाएं बल्कि कहना चाहिए एक्‍सप्रेशन पति को माफिक नहीं आती और पति पत्नी को इस लायक नहीं समझता कि वह सब उससे शेयर कर तो वह बाहर अपने लिए एक दुनिया तलाशता है। हम सब जानते हैं कि हमारे जीवन में कुछ खाने खाली होते हैं। जहाँ भी माकूल मौका मिलता है, हम अपने इन खानों को भरने की कोशिश करते हैं।
  फेसबुक ऐसे तमाम लोगों के लिए शरणस्थली बनकर आया है। यहाँ वो अपनी बात कह भी रहे हैं, शेयर भी कर रहे हैं और सुन भी रहे हैं। जब मैं ऐसे लोगों के संपर्क में आया तो मुझे लगा कि अगर मैं किसी की बात सुनने के लिए कान देता हूँ तो मुझे बहुत सी कहानियां मिल सकती हैं और मुझे मिलीं। हाँ, मैं इसके लिए एक अच्छा श्रोता बना। पूरे मन से लोगों को सुना और पूरी जिम्मेदारी, ईमानदारी व संवेदना से सुनी हुई कहानी में कल्पना के रंग भरकर लोगों की उन कहानियों को लिखा। फेसबुक ने एक तो मुझे ये चीज दी। दूसरी बड़ी चीज मुझे फेसबुक ने बहुत सारे मित्र दिए। बहुत सारे पाठक दिए। बहुत ज्‍यादा पाठक नहीं थे। फेसबुक एक बड़ा पाठक जगत है। अभी एक पखवाड़े पहले मेरी कहानी लहरों की बांसुरी लमही पत्रिका में छपी। अब तक मैगजीन के जरिये मेरे पास कोई 20 प्रतिक्रियाएं ही आयी होंगी जबकि फेसबुक से पहले एक दो दिन में ही 100 से ज्यादा प्रतिक्रियाएं आ गयी हैं। इसलिए क्योंकि फेसबुक में बहुत बड़ा पाठक जगत है।
कुल जमा बात यह है कि अगर मैंने अपनी कहानियों के लिए इस दुनिया को चुना है तो इसके पीछे मेरी यह भी सोच थी कि ये क्षेत्र नया है। गैर पारंपरिक और तकनीकी है जिसकी मुझे समझ है। मैं कंप्यूटर पढाता रहा हूँ। एक और बात है मुझे मालूम है कि यह यानी जीवन में तकनीकी वर्चस्व आकर रहेगा। जब तक इससे बड़ा कोई दूसरा माध्यम नहीं आ जाता, अपने सारे गुणों अवगुणों के साथ तब तक यह नहीं जाने वाला। हमारे जीवन में यह रहने वाला है मैंने सोचा हमें इसका फायदा उठाना चाहिए। यह सब सोचते हुए मुझे महसूस हुआ कि मैं इस क्षेत्र में कंट्रीब्‍यूट कर सकता हूँ। 
लोकमित्र-सोशल मीडिया के बारे में आपकी इतनी विस्तृत अवधारणा सुनने के बाद मैं ठोस रूप में जानना चाहता हूँ कि आप फेसबुक को क्या मानते हैं?
सूरज प्रकाश –मैं फेसबुक को मोर्निंग वाक वाला एक बहुत बड़ा मैदान मानता हूँ जिसमें लोग घूम रहे हैं। यहाँ कुछ लोग एक बार नज़र आते हैं। कुछ लोग दो बार नज़र आते हैं। कुछ लोग बार बार नज़र आते हैं। जिनसे आप तंग भी हो जाते हैं कुछ लोगों से आपकी हाय हेलो होती है। कुछ लोगों से आप रुककर हालचाल भी पूछ लेते हैं। कुछ लोगों को आप गुलाब का फूल भी दे देते हैं। कुछ लोगों के साथ रुककर आप चाय भी पी लेते हैं। लेकिन है यह सैर का बागान ही जहाँ आप सुबह टहल रहे हैं। साथ ही अपने लिए उपयुक्त साथी भी तलाश रहे हैं। मिल भी रहे हैं। लोग आपस में जुड़ भी रहे हैं। कहने का मतलब यह कि फेसबुक भले वर्चुअल है, लेकिन वहां हैं तो हमीं लोग न। बल्कि फेसबुक में तो हम लोग ज्यादा खुलकर अपनी बात कह-सुन लेते हैं। रीयल में तो एक संकोच भी होता है।
लोकमित्र – क्या फेसबुक की अपनी कोई लैंगिक खासियत भी आपको नज़र आती है जिसे खास तौर पर या अलग से चिन्हित किया जा सके ?
सूरज प्रकाश – फेसबुक में आम तौर पर पति पत्नियों की शिकायत नहीं करते। पत्नियां करती हैं। मैं उनकी बात बहुत धैर्य से सुनता हूँ। उन्हें सही रास्ता दिखाने की कोशिश करता हूँ। एक तरह से उनकी काउंसलिंग करता हूँ। मैं ये देखकर हैरान रहता हूँ कि लोग अपनी बात करने और कहने के लिए कैसे कैसे तरीके ढूंढते हैं? छिपकर बातें करते हैं। मैं एक ऐसी महिला को भी जानता हूँ जो फेसबुक में तीन नामों से सक्रिय है। तीनों मुझसे मुखातिब होती है। अपने दो नामों के बारे में तो उसने मुझे खुद ही बता रखा है। तीसरे के बारे में मैं जान गया हूँ। लेकिन मुझे कभी इससे आपत्ति नहीं रही। मुझे लगता है अपने आपको एक्सप्रेस करना चाहती है तो कोई बात नहीं। कहीं वह कविता के जरिये ऐसा कर रही है कहीं कहानी के जरिये। कहीं किसी और रूप में कुल मिलाकर देखा जाये तो वह खुद को व्यक्त करने के लिए ही बेचैन है। दरअसल फेसबुक एक ऐसा माध्यम है, जहाँ आपको इंस्टेंट रिएक्शन मिलता है। अच्छा है या बुरा। मगर रिजल्ट आपको चटपट मिलता है। इन सारी बातों के चलते ही मैं इसकी तरफ आकर्षित हुआ। मुझे लगा हाँ, मेरे लिए यह उपयुक्त माध्यम है। मैं यहाँ अपनी बात बेहतर ढंग से कह पाऊंगा।
लोकमित्र – फेसबुक की पृष्ठभूमि वाली आपकी ज्यादातर कहानियों की मुख्य किरदार महिलाएं है। हर कहानी एक तरह से देखा जाये तो नायिका प्रधान है। इसका कारण क्या है?
सूरज प्रकाश -मुझे लगता है मैं महिला मनोविज्ञान को बेहतर ढंग से समझ पाता हूँ। सिर्फ फेसबुक की कहानियों में ही नहीं मेरी वैसी भी कहानियों में आम तौर पर मुख्य किरदार महिला का ही है। मेरी ज्यादातर कहानियां किसी महिला के इर्द गिर्द ही बुनी गयी हैं। मेरा यह भी मानना है कि किसी महिला के पास ही बहुत कुछ कहने के लिए भी है, कुछ देने के लिए भी है, समाज को बेहतर बनाने के लिए भी है। बस उसे मौका मिलना चाहिए। मुझे लगता है, उसे यह मौका मिलना ही चाहिए। महिला के अन्दर अपनी बात कहने के लिए बेचैनी है। एक सकारात्मक बेचैनी। उसके पास यूज़ ऑफ़ एनर्जी भी है। वह ऊर्जा को सही तरीके से चैनलाइज कर सकती है। दखल दे सकती है। मैं इसीलिए महिला को ज्यादा आदर  की नज़र से देखता हूँ। मुझे लगता है एक महिला ही होती है, जिससे आप अपने मन की बात कह भी सकते हैं और उसकी बात सुन भी सकते हैं। जो तमाम बातें दो पुरुष आपस में नहीं कर सकते। ईगो है। दूसरे क्राइसेस भी हैं। ऐसे में मेरे लिए यही उपाय बचता है कि मैं महिलाओं से बातें करूँ। मैं उन्हें इसके लिए तैयार भी कर लेता हूँ। इसीलिए मेरी ज्‍यादातर कहानियों में मुख्य किरदार महिलाओं का है।
लोकमित्र - मैं समझता हूँ संचार क्रांति और सूचना क्रांति के तमाम दावों के बावजूद अभी भी भारत जैसे देश में एक बहुत छोटा सा तबका ही है जिसने फेसबुक या सोशल नेट वर्किंग की दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। मेरी उत्सुकता या जिज्ञासा आपसे यह जानने की है कि इस बेहद सीमित दुनिया तक पहुंचकर आप कैसे यह मान लेते हैं कि आप अपने दौर से रूबरू हैं? जबकि साहित्य के बारे में यह समझा जाता है की यह अपने युग के शोषितों, वंचितों का हमदर्द मंच होता है? भारत में इन वंचितों की बहुत बड़ी तादाद है। दुनिया के समूचे निरक्षरों में तकरीबन 35% भारत में रहते हैं। दुनिया के तमाम गरीब लोगों में से लगभग आधे भारत में हैं। क्या आप फेसबुक या सोशल मीडिया के जरिये इन तक पहुँच पाते हैं? और अगर नहीं तो क्यों न माना जाए कि आप एक बड़े और असली हिन्दुस्तान को जानते ही नहीं?  
सूरज प्रकाश – देखिये पहली बात तो यह कि आपने इस लंबे चौड़े सवाल में जो मूलतः दो सवाल फोकस किये हैं, मैं आपके इन दोनों ही सवालों से सहमत नहीं हूँ ..! पहले मैं साहित्यिक मंच वाले सवाल पर आता हूँ। मेरी बात आप एक उदाहरण से समझिये। दैनिक जागरण अखबार के अपने एक करोड़ पाठक हैं जैसा कि वह दावा करता है। लेकिन हिंदी की कोई आम साहित्यिक किताब की 300 प्रतियाँ छपती हैं। कविता की तो महज 100 प्रतियाँ ही छपती हैं। हमारे पास हिंदी साहित्य का पाठक ही नहीं है। हिंदी का पाठक हमसे रूठा हुआ है या समझिये रूठ गया है। इसकी बहुत सारी वजहें हैं। मगर सच्चाई यही है कि हिंदी साहित्य में पाठक है ही नहीं। बाकी दूसरी भाषाओं में पाठक हैं। मराठी में हैं, गुजराती में हैं, बांग्ला में हैं, मलयालम में हैं। मगर हिंदी में नहीं हैं। इसके बहुत सारे कारण हैं। हिंदी पाठक तक किताबें पहुँचती ही नहीं या पहुंचने ही नहीं दी जातीं। 
दूसरी बात मैं स्पष्ट कर दूँ कि अगर आपको लगता है कि साहित्य सबके लिए है तो यह कभी भी सबके लिए नहीं होता और न ही कभी था। ठीक है एक दौर में लोगों ने बाबू देवकीनंदन खत्री जैसों को पढने के लिए हिंदी सीखी थी। लेकिन तब एकमात्र साहित्य ही था और कुछ भी नहीं था। जबकि इस समय हमारे पास तमाम विकल्प हैं। सबसे बड़ा विकल्प है मोबाइल। यह हमारे पांच सौ काम करता है बल्कि उससे भी ज्यादा करता है तो ऐसे में मैं कहूँगा कि साहित्य तो पहले भी हाशिये में था। लेकिन सुखद हैरानी होगी की मोबाइल के जरिये भी, नेट के जरिये भी, सोशल मीडिया के जरिये भी साहित्य को जगह दी जा रही है। साहित्य को इन नए साधनों से विस्तार मिल रहा है। इनमें ऑडियो भी है। इनमें ई-बुक्‍स भी है। एक बात और समझ लीजिये हमेशा लोगों की चॉइस रही है। ठीक है कि हमारे यहाँ शौचालय कम और मोबाइल ज्यादा हैं लेकिन ठीक है सबकी अपनी अपनी पसंद है। मैंने बहुत बड़े बड़े अफसरों को वीडियो गेम खेलते देखा है। जो अपनी एनर्जी का कहीं और बेहतर इस्तेमाल कर सकते थे। लेकिन मैंने उन्हें वीडियो गेम खेलते देखा है। इसका मतलब है कि उनका राजनीति से, साहित्य से, सोशल कमिटमेंट से कोई वास्ता नहीं है। वो छोटे बच्चे हैं। उनके दिमाग में अभी भी वह बच्चा है जो वीडियो गेम खेल रहा है।
लेकिन मैंने देखा है कि फेसबुक ने, सोशल मीडिया ने बहुत सारे साहित्यकार तैयार किये हैं। अगर आप देखें तो फेसबुक में हर तीसरा आदमी कवि है। पढता भी है लिखता भी है और कहीं कमेंट भी करता है। इसका मतलब है कि एक्‍सप्रेशन है उसमें। जो पहले नहीं था। पहले मैं एक कहानी लिखता था। लिफाफा तैयार करता था। सम्पादक के पास भेजता था। दो महीने बाद जाकर सूचना मिलती थी कि कहानी छप रही है या नहीं छप रही। छह महीने बाद साल भर बाद कहानी छपती थी। मुझे याद है सारिका में मेरी एक कहानी 7 साल बाद छपी थी। कैन यू इमेजिन 7 साल बाद। जबकि मेरे दोस्त वहां हुआ करते थे। अब ये है कि आप लिखिए और दो मिनट में आप कहानी भी छाप लीजिये अपने आप। ठीक है फेसबुक में सम्पादन नहीं होता। लेकिन फेसबुक में, व्हाट्स अप में बहुत सारे साहित्यिक ग्रुप बने हैं, जहाँ हम चीजें शेयर करते हैं। तो कहने का मतलब यह कि एक मंच मिला है अगर हम इसका बेहतर इस्तेमाल करें तो हमें लगता है हम साहित्य के लिए जगह निकाल रहे हैं जो पहले नहीं थी।
लोकमित्र - आपकी सारी बात सही हैं। मेरे सवाल का तात्पर्य सिर्फ यह था कि सोशल मीडिया के दायरे में समाज का जो एक बहुत बड़ा तबका नहीं है, वह आपसे छूट रहा है क्योंकि आप यहीं सक्रिय हैं। मैं जानना चाहता हूँ उसके लिए भी कभी आपको कसक होती है?
सूरज प्रकाश - कहीं नहीं छूट रहा। साहित्य पहले भी हाशिये में था। साहित्य आज भी हाशिये में है।
लोकमित्र - आप कहना चाह रहे हैं कि साहित्य पहले भी उन तक नहीं पहुँच रहा था आज भी नहीं पहुँच रहा बस बात इतनी है?
सूरज प्रकाश – बात पहुँचने की नहीं है। बात प्रियोरटी की है। साहित्य पहले भी उनकी प्रियोरटी में नहीं था, आज भी नहीं है। मैं आपसे एक छोटी से बात कहता हूँ। आप दिल्ली में रहते हैं। किसी दिन संडे को अपने मोहल्ले में एक सर्वे कीजिए या किसी दूसरे मोहल्ले में। आप सौ घर जाइए और उन घरों के लोगों से पूछिए कि उनके घर में स्कूलों, कालेजों या पढाई लिखाई की किताबों के अलावा और कितनी किताबें हैं। मेरा दावा है आपको 10 घर भी ऐसे नहीं मिलेंगे कि जहां अकादमिक पढ़ाई लिखाई के अलावा कोई दूसरी किताबें भी मिलें। हम बच्चों को बीस हज़ार रुपये का मोबाइल तो खरीदकर दे देते हैं। हर महीने उसमें 200-400 रुपये का रिचार्ज भी करा देते हैं। पर कभी किताब नहीं देते। हिंदी भाषा भाषी के पास पढ़ने का संस्कार ही नहीं है। मुफ्त में भी पढ़ने का संस्कार नहीं है, पैसे से खरीदकर पढ़ने का तो है ही नहीं। किताबें उपहार में नहीं दी जातीं। पहले तो खरीदी ही नहीं जातीं। कोई खरीदकर भी दे दे तो पढ़ी नहीं जातीं। प्रकाशक का ये दोष है कि वह पाठक तक किताब पहुंचाने का कोई प्रयास नहीं करता। बल्कि कहना चाहिए पहुँचने भी नहीं देता।
            लेखक की यह समस्या है कि वह पाठक तक पहुंचे कैसे? ऐसे में यही बचता है कि आप फेसबुक के जरिये या सोशल मीडिया के जरिये ऐसे लोगों को ढूंढें। साहित्य के पाठक तैयार करें। दरअसल हमारे यहाँ पढने या जानने कि कोई जिज्ञासा ही नहीं है। अब तो एक बहाना यह हो गया है न पढ़ने के लिए कि सब कुछ तो इंटरनेट में मौजूद है। दरअसल आम हिंदी भाषा भाषी समाज ने कभी भी खुद को कलाओं से, साहित्य से, एक्सप्रेशन से नहीं जोड़ा है। आम आदमी ने तो बिलकुल भी नहीं जोड़ा है। आपको हैरानी होगी कि इस समाज में अभी भी कोई लड़की उपन्यास पढ़े तो उसे अय्याशी माना जाता है। उपन्यास पढ़ना लिखना तो बहुत दूर की बात है। कोई लड़की उपन्यास पढ़ती है तो उसके घर वाले ही हिकारत से कहेंगे सारा दिन नावेल पढ़ती रहती है। यानी उपन्यास पढना भी एक अच्छी बात नहीं मानी जाती। 
लोकमित्र - आखिर पढ़ने के मामले में हिंदी समाज इतना रुखा, इतना निरपेक्ष, इतना जड़ विहीन क्यों है ?
सूरज प्रकाश - दरअसल हुआ क्या हमारे यहाँ जितने भी विदेशी हमले हुए वो पंजाब की तरफ से हुए। ऐसे में हमारी प्रियारिटी सारी औरतों की इज्ज़त बचाने या लड़ने में या फिर उनको रसद पहुंचाने में लगी रही।
लोकमित्र - चलो पंजाब हरियाणा के लिए तो ये बात मान लेते हैं लेकिन उत्तर प्रदेश तो पंजाब नहीं है। फिर वहाँ भी ऐसी ही जड़ता क्यों है? 
सूरज प्रकाश – नहीं लोक साहित्य में वहां थोड़ी सी सजगता है बाकी मुख्य धारा के साहित्य में वही उदासीनता है। हाँ, बिहार में है इस तरह की चेतना। पता नहीं नालंदा की धरती होने की वजह से है या किसी और वजह से।
लोकमित्र - कहने का मतलब आपने साइबर की दुनिया बहुत सोच समझकर चुनी है ?
सूरज प्रकाश - जी हाँ, मेरा मानना है कि इसके जरिये मैं ज्यादा लोगों तक पहुँच सकता हूँ।
लोकमित्र - साइबर जगत कमोबेश पूरी दुनिया के लिए एक जैसा है? तो क्यों न माना जाये साइबर साहित्य में पूरी दुनिया में एक समरूपता होगी?
सूरज प्रकाश - देखिये हम एक रिमोट युग में जी रहे हैं। ये बड़ा खतरनाक यंत्र है। जब हमारे पास एक चैनल हुआ करता था तब हम पूरा चैनल देखते थे। सुबह से शाम तक। जब रेडियो हुआ करता था तो हम रात का आखिरी गाना यानी राष्ट्र गीत तक सुना करते थे। लेकिन जैसे जैसे चॉइस आयी, चयन आया, हम चैनल बदलते हैं। ...और अक्सर ऐसा होता है कि सारे चैनल देखकर हम वापस आ जाते हैं और बंद कर देते हैं। हम  कहते हैं कि कुछ मन का दिखा ही नहीं है। फेसबुक में भी यही है कि हम तेजी से चैनल बदलते रहते हैं। अगर आप कुछ पोस्ट करें साहित्य में तो वह, वहां नहीं पढ़ा जाएगा लेकिन यदि आप लिंक दे दें कि इसके जरिये यहाँ पहुँचिये तो जो इच्छुक हैं वो पहुँचते हैं। लेकिन फेसबुक के भी तमाम संकट हैं जैसे यहाँ सब कुछ परोसा जा रहा है। मैंने क्या खाया। मैंने क्या पीया। मेरी टांग कैसे टूटी। कहने का मतलब ..सब कुछ। यह एक प्रकार की अति है और फेसबुक इस तरह की अति का शिकार है क्योंकि यह सर्वसुलभ है और मुफ्त है। जिस दिन पैसे लगने लगेंगे लोग बंद कर देंगे। लेकिन तमाम लोग सीरियस भी हैं।
मैं नहीं मानता कि साइबर जगत के साहित्य से कोई भू मंडलीय समरूपता आने वाली है क्योंकि सबके अपने निजी अनुभव हैं और वो अनुभव साइबर जगत के ही नहीं हैं उसके बाहर के हैं। लोगों का यानी लेखकों और रचनाकारों के साइबर जगत में भी अलग अलग विचार समूह हैं या कहें दोस्त समूह हैं। ठीक वैसे ही जैसे साइबर जगत की मौजूदगी के पहले थे। इसलिए मुझे नहीं लगता कि किसी रूसी, अमरीकी, केन्यन और हिन्दुस्तानी लेखक का लेखन एक जैसा हो जाएगा क्योंकि वो सब साइबर जगत में सक्रिय हैं। ये विविधता आज की ही तरह कल के कहीं ज्यादा सक्रिय साइबर समाज में भी बनी रहेगी। ये भी बात मानकर चलिए कि कई धाराएं हमेशा एक साथ चलती हैं। कई उम्र के पाठक एक ही समय में पढ़ रहे होते हैं तो कई उम्र के लेखक भी एक ही समय में सक्रिय होते हैं। एक ही समय में कई किस्म की विचारधाराएँ भी सक्रिय होती हैं। सब अपने अपने पसंद की चीजों को ढूंढ लेते हैं, छांट लेते हैं। कहने का मतलब यह कि यह विविधता बनी रहेगी। हाँ मैं यह जरूर कहूँगा साइबर जीवन में या साइबर संस्कृति में इंटरेक्‍शन काफी बढ़ा है। और मैं इसे बहुत पॉजिटिव मानता हूँ। इसके जरिये आपको ऐसे ऐसे सच मालूम होते हैं जिनकी आप कल्पना नहीं कर सकते। इससे आप बहुत अनुभव सम्‍पन्‍न होते हैं।
लोकमित्र - जैसे जीवन शैली के रोग पैदा हो गए हैं वैसे ही कई बार नहीं लगता कि साइबर जगत में अतिशय निकटता से भी कुछ रोग पैदा हो गए हैं जिनमें से ज्यादातर नकली हैं या कहें कि इस माध्यम की देन ज्यादा लगते हैं।
सूरज प्रकाश [मुस्कुराते हुए] हर बार सही भी नहीं, हर बार गलत भी नहीं। दोनों चीजें हैं। लेकिन आम तौर पर दुःख ज्यादा है और वह वास्तविक है। कोई सुनने वाला नहीं है। आप किसी पार्क चले जाइए वहां बहुत सारे बूढ़े चुपचाप बैठे मिल जायेंगे। ये जब भी बात करते हैं आप पायेंगे कि अपने दुखों की बात करते हैं। दरअसल उनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है, लेकिन उन्हें कोई सुनने वाला नहीं है। फेसबुक आपको सुनने वाला देता है। आपको इससे बहुत बड़ी राहत मिलती है कि आपको कोई सुन रहा है। ठीक है लोग झूठ बोल रहे हैं लेकिन सारे लोग झूठ नहीं बोल रहे। सारे लोग सच भी नहीं बोल रहे। ये भी बात है इस इन्ट्रेक्शन से कुछ बिगड़न भी होगी। आभासी दुनिया में मिलने वाले मन के साथी से आप वास्तविक दुनिया में भी मिलते हैं। आप बेकाबू भी हो सकते हैं। आप धोखा भी दे सकते हैं। कई बार इससे क्राइम भी होता है।
लोकमित्र - क्या ऐसा वक़्त आएगा जब साइबर जगत भी अमर पात्र देगा जैसे प्रिंट के होरी और धनिया हैं?
सूरज प्रकाश - हम होरी और प्रेमचंद के युग को नहीं जी रहे। हाँ, साइबर जगत अपने युग के बड़े पात्र देगा। लेकिन जरूरी नहीं है कि उनकी तुलना अतीत के महान पात्रों से संभव ही हो सके। मेरी कहानी लहरों की बांसुरी एक टर्निंग पॉइंट हो सकती है। इसमें आज़ादी का एक बिगुल है। आज महिलाएं बहुत मुखर होकर अपनी बात कह रही हैं। ऐसे पात्र इसी दौर से ही निकल सकते हैं। संचार का यह निर्णायक युग है। स्त्री को इससे बहुत फायदा हो रहा है। वह निरंतर आजाद हो रही है। पुरुष उसे आज़ादी दे रहा है। बल्कि मैं कहूँगा उसे देनी पड़ रही है। भले वह अपनी बीवी को नहीं दे रहा पर किसी और की बीवी को दे रहा है। दरअसल यह खुली हवा में सांस लेने का मामला है। साइबर जगत के जरिये बड़े पैमाने में औरतों को खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला है। यह पहला ऐसा मौका घर के भीतर रह रही औरत को मिला है कि चाहे तो वह पूरी दुनिया में शामिल हो जाए चाहे तो इसे बाय बाय कह दे। यह इस आभासी दुनिया की सबसे बड़ी वास्तविक ताकत है। मैं एक बात और कहना चाहता हूँ कि तमाम ओछेपन के बावजूद, तमाम शॉर्टकट के बावजूद, फेसबुक या सोशल मीडिया हमें बेहतर दुनिया की ओर ले जा रहा है। क्योंकि अज्ञानता से यहाँ आपका काम नहीं चल सकता। आपको अपडेट होना ही पड़ता है। सोशल मीडिया हमें अंधकार से बाहर निकाल रहा है। ..और महिलायें इस मुहिम की हिरावल हैं।
mail@surajprakash
09930991424

लोकमित्र गौतम lokmitragautam@gmail.com

5 टिप्‍पणियां:

सुनील गज्जाणी ने कहा…

sir saadar pranam , bhut kuch seekhne ko miltaa aap ko padhne se
pranam

मनोज भारती ने कहा…

यह बातचीत बहुत अच्छी लगी।

Narendra Pratap Singh ने कहा…

बचपन में और बाद में भी मैंने गोर्की की माँ को पढ़ा।ऐसी कोई और रचना नहीं है।यह सर्वकालिक सर्वश्रेष्ठ है।
इधर मैंने कुछ दिन पहले रती नाथ भादुड़ी की *ढोढाय चरित मानस *(रेनू जी के साहित्यिक गुर)पढ़ी थी।वह भी विलक्छन किताब है। हो सके तो ऐसी पुस्तकों का सार -संछेप देने की कृपा करें।बहुत सुन्दर होगा।

kdcharan iamindna ने कहा…

अच्छी बातचीत...बहुत सारे अनुभव।

kdcharan iamindna ने कहा…

सार्थक बातचीत। पढ़कर अच्छा लगा।