शनिवार, 9 मई 2015

दुख ही जीवन की कथा रही - निराला


• निराला जी (1896 -1961) अपने जीवन-काल में ही मिथक बन चुके थे। 
• सूर्यकान्त त्रिपाठी नाम के साथ जुड़ा निराला दरअसल पहले उनका छद्म नाम था जिससे वे मतवाला नामक पत्र में कॉलम लिखते थे। बाद में यह छद्मनाम ऐसा चर्चित हुआ कि उनके नाम का हिस्सा हो गया।
• निराला जी सफल कवि, उपन्यासकार, निबन्धकार और कहानीकार थे। उन्होंने कई रेखाचित्र भी बनाये। 
• निराला जी ने आनंद मठ, विष वृक्ष, कृष्णकांत का वसीयतनामा, कपालकुंडला, दुर्गेश नन्दिनी, राज सिंह, राजरानी, देवी चौधरानी, युगलांगुल्य, चन्द्रशेखर, रजनी, श्री रामकृष्ण वचनामृत, भरत में विवेकानंद तथा राजयोग का बांग्ला से हिन्दी में अनुवाद किया।
• 1918 के इन्फ्लुएन्जा में उनके तमाम सगे-सम्बन्धी दिवंगत हो गए, पत्नी भी। सिर्फ़ दो बच्चे ही बचे- बेटा रामकृष्ण और बेटी सरोज। 1935 में सरोज के निधन पर निराला ने चर्चित कविता 'सरोज-स्मृति' की रचना की थी।
• निराला ने जब मुक्त छंद में रचनाएँ लिखनी शुरू कीं तो बहुत विरोध हुआ। रबर छंद और केंचुआ छंद कहकर इसका मज़ाक उड़ाया गया। आज हिंदी कविता का यह मिज़ाज़ बन चुका है।
• निराला अपनी दानशीलता के लिए बहुत जाने जाते थे। अपना सर्वस्व दान करने की प्रवृत्ति से हमेशा तंगी में ही रहते रहे। 
• हिन्दी कविता में छायावाद के साथ ही प्रगतिवाद होते हुए नयी कविता और नवगीत काव्यांदोलन उनसे अपना जुड़ाव महसूस करते रहे।
• हिँदी में अकेले निराला पर जितनी कविताएँ लिखी गयी हैं उतनी शायद किसी एक व्यक्ति पर कविताएँ कहीं नहीं लिखी गयीं।
• उनमें विरोध का सामर्थ्य था और असहमति का साहस। इसीलिए वे जनता के कवि थे।
• जब गांधी जी का दौर था, हिंदी के ही सवाल पर निराला जी ने गांधी का विरोध किया और 'बापू तुम मुर्गी खाते यदि' जैसी व्यंग्य कविता लिखी। 
• उन्होंने नेहरू जी का विरोध किया और 'काले-काले बादल छाये न आये वीर जवाहर लाल' कविता लिखी।
• तमाम संघर्षों-विरोधों और समझौता-विहीन जीवन ने उन्हें मानसिक तौर पर तोड़ दिया था। लेखन के बूते आजीविका चलाने वाला यह कवि स्वतंत्रता मिलने के दौरान 1946 से 1949 तक कुछ भी न लिख सका। ये दिन विभाजन संत्रास के भी दिन थे। साहित्य में कई बार त्वरित प्रतिक्रिया नहीं होती। मौन भी मुखर होता है।
• उनके देहांत के बाद उनके पुत्र रामकृष्ण को 19 वर्ष तक प्रकाशकों से कॉपीराइट का मुकद्दमा लड़ना पड़ा। प्रकाशक जीवन भर शोषण करने के बाद कॉपीराइट स्वीकार नहीं कर रहे थे।
• 1979 में मुक़दमा जीतने के बाद सारा निराला साहित्य एक जगह जुटाया गया और नन्दकिशोर नवल के संपादन में राजकमल प्रकाशन से निराला-रचनावली 8 खण्डों में प्रकाशित हुई।
• निराला मांसाहारी थे किन्तु इससे परहेज़ करने वालों के प्रति बेहद सतर्क रहते थे। एक बार परम वैष्णव, राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त के आगमन पर वे उन्हें कमरे में बैठाकर गायब हो गए। क़रीब आधे घंटे बाद जब कमरे में आए तो उनके हाथों में एक पत्तल था और कंधे पर घड़ा। पूछे जाने पर बताया कि दद्दा (गुप्त जी) उनके यहाँ न कुछ खाते न पीते इसलिए वे गंगाजल से भरा घड़ा और फलाहारी बर्फी लेने चले गए थे।
• नेहरू जी के कहने पर निराला जी को 100 रुपये प्रतिमाह की मदद मिलनी तय हुई थी और यह भी तय हुआ कि यह राशि निराला को दी जायेगी तो वे इसे भी दान कर देंगे इसलिए कमलाशंकर सिंह जिनके यहाँ वे रहते थे, उन्हें दी जाती थी।
• दारागंज में वे आज भी देवता की तरह पूजे जाते हैं। दुकानों के नाम भी उनके नाम के साथ ही हैं जैसे दारागंज स्थित उनकी प्रतिमा के सामने निराला मिष्ठान भण्डार या निराला चाट भण्डार।
• निराला जी ने पत्नी के ज़ोर देने पर ही  हिन्दी सीखी थी। फिर बांग्‍ला में कविता लिखने के बजाय हिन्दी में कविता लिखना शुरू कर दिया।
• स्कूल में पढ़ने से अधिक उनकी रुचि घूमने, खेलने, तैरने और कुश्ती लड़ने इत्यादि में थी। संगीत में उनकी विशेष रुचि थी।
• एक वक्‍त था जब हजारों निराला प्रेमियों को राम की शक्‍ति पूजा कविता याद थी और वे गर्व से सुनाते थे।
यह पोस्‍ट निराला जी के प्रपौत्र विवेक निराला के सहयोग से तैयार की गयी है।

4 टिप्‍पणियां:

Alaknanda Singh ने कहा…

आपका ये प्रयास हमारे लिए बहुमूल्य थाती बना रहेगा... अद्भुत...

Alaknanda Singh ने कहा…

लेखकों के किस्से से अवगत कराकर आपने हमें कई ऐसे वृतांत बताए जो हमारे लिए थाती बनेंगे...

रमेश तैलंग ने कहा…

कहते हैं, जीवन में तीन चौथाई अज्ञान है पर मैं तो पूरा-का-पूरा अज्ञानी हूं..आप (सूरज प्रकाश) इतना कुछ लिख कर, बता कर सचमुच बड़ा उपकार कर रहे हैं हम जैसों पर..आपका ब्लोग मुझे समृद्ध कर रहा है, हृदय से आभार!

Naveen Kr Chourasia ने कहा…

बहुत ऱोचक और बहुमूल्य जानकारी आपके जरिये हमें उपलब्ध हो रहे हैं , हार्दिक शुभकामनायें ! आप हमारे ब्लॉग से जुड़े आपका अभिनंदन हैं - http:www.raj-meribaatein.blogspot.com