शुक्रवार, 16 दिसम्बर 2011

अच्छी किताबें पतुरिया की तरह होती हैं।

मैंने मन बना लिया है कि अपने जीवन की सबसे बड़ी, अमूल्य और प्रिय पूंजी अपनी किताबों को अपने घर से विदा कर दूं। वे जहां भी जायें, नये पाठकों के बीच प्यार का, ज्ञान का और अनुभव का खजाना उसी तरह से खुले हाथों बांटती चलें जिस तरह से वे मुझे और मेरे बच्चों को बरसों से समृद्ध करती रही हैं। उन किताबों ने मेरे घर पर अपना काम पूरा कर लिया है बेशक ये कचोट रहेगी कि दोबारा मन होने पर उन्हें नहीं पढ़ पाऊंगा लेकिन ये तसल्ली भी है कि उनकी जगह पर नयी किताबों का भी नम्बर आ पायेगा जो पढ़े जाने की कब से राह तक रही हैं।
लाखों रुपये की कीमत दे कर कहां कहां से जुटायी, लायी, मंगायी और एकाध बार चुरायी गयी मेरी लगभग 4000 किताबों में से हरेक के साथ अलग कहानी जुड़ी हुई है। अब सब मेरी स्मृंतियों का हिस्सा बन जायेंगी। कहानी, उपन्यास, जीवनियां, आत्मकथाएं, बच्चों की किताबें, अमूल्य शब्द कोष, एनसाइक्लोपीडिया, भेंट में मिली किताबें, यूं ही आ गयी किताबें, ‍रेफरेंस बुक्स सब कुछ तो है इनमें।
ये किताबें पुस्तकालयों, वाचनालयों, जरूरतमंद विद्यार्थियों, घनघोर पाठकों और पुस्‍तक प्रेमियों तक पहुंचें, ऐसी मेरी कामना है।
24 और 25 दिसम्बर 2011 को दिन में मुंबई और आस पास के मित्र मेरे घर एच 1/101 रिद्धि गार्डन, फिल्मि सिटी रोड, मालाड पूर्व आ कर अपनी पसंद की किताबें चुन सकते हैं। बाहर के पुस्तकालयों, वाचनालयों, जरूरतमंद विद्यार्थियों, घनघोर पाठकों और पुस्तक प्रेमियों को किताबें मंगाने की व्यवस्था खुद करनी होगी या डाक खर्च वहन करना होगा।
मेरे प्रिय कथाकार रवीन्द्र कालिया जी ने एक बार कहा था कि अच्छी किताबें पतुरिया की तरह होती है जो अपने घर का रास्ता भूल जाती हैं और एक पाठक से दूसरे पाठक के घर भटकती फिरती हैं और खराब किताबें आपके घर के कोने में सजी संवरी अपने पहले पाठक के इंतजार में ही दम तोड़ देती हैं।
कामना है कि मेरी किताबें पतुरिया की तरह खूब लम्बा जीवन और खूब सारे पाठक पायें।
आमीन
mail@surajprakash.com

7 टिप्पणियाँ:

mahendrabhishma 19 दिसम्बर 2011 8:24 am  

yah ek abhinav pryoug he Sri suraj Prakash ji Dwara unhe kotish: prnam va sadhuvad ... Me Lucknow me rahta hoo or sari ki sari kitabo ki chahat rakhata hoo per esase Unke udeshy ki porti nahi hogi haa kuch kitabe me chahoonga or mob. se baat kar daak vyah kar pustke apne tak mangonga

वन्दना अवस्थी दुबे 23 दिसम्बर 2011 3:13 am  

मैं क्या करूं? क्या इतना लाचार तो मैने खुद को कभी नहीं पाया :( किताबें समेटने का इतना अच्छा मौका और मैं इस मौके से हज़ार किलोमीटर दूर :( :( बेचैनी सी होने लगी है पढ के. काश मुझे कुछ किताबें मिल सकतीं!!

रश्मि प्रभा... 25 दिसम्बर 2011 7:36 am  

किताबें ........ बिल्कुल वही भाव है ......जलेबीईईईईईई

दर्शन लाल बवेजा 25 दिसम्बर 2011 10:56 am  

बहुत बड़ा दिल है आपका
सही किया आपने

indianrj 26 दिसम्बर 2011 12:35 am  

सूरज सर, बहुत बड़ा दिल है आपका. हम तो बहुत दूर यहाँ दिल्ली में बैठे हैं और mumbaiwalon से फिलहाल ईर्ष्या कर रहे हैं. एकदम unique विचार है आपका किताबें देने का. किताबों के शोकीनों की तो मानो lottery ही खुल गई.

Praveen Trivedi 26 दिसम्बर 2011 2:42 am  

आयं हियाँ भी टापते ही रह गए !


कभी सूना था कि दिल्ली मेट्रो में एक समूह ऐसे लोगों का है कि वह किताबें पढकर वहीं छोड़ देते हैं ...और आगे के सफर में वही किताबें दूसरे पाठकों के हाथ से गुजरती हुई आगे कड़ी बढ़ती रहती है ....आपके बारे में साक्षात पढ़ उर्जावान हुआ !

anitakumar 26 दिसम्बर 2011 11:23 am  

काश हमें पहले पता लगा होता

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