बृहस्पतिवार, 26 मई 2011

ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर चालीस बरस

पिछले दिनों पुणे में एक होटल में ठहरना हुआ। होटल एक मॉल की पांचवीं और छठी मंजि़ल पर था। पहली मंजि़ल से तीसरी मंजिल पर खाना-पीना, कुछ दुकानें और सिनेमाघर। इनके लिए लोग लिफ्ट का इस्तेमाल कम ही करते। चौथी मंजि़ल पर सिनेमाघरों के स्क्रीन के कारण लिफ्ट रुकती नहीं थी।
तो मैं होटल में आने-जाने के लिए जब भी लिफ्ट में गया, चाहे सुबह 6 बजे सैर पर जाने के लिए या देर रात कहीं से वापिस आने के लिए, लिफ्ट का बटन दबाते ही दरवाजा खुलता और मुझे उसके भीतर लिफ्टमैन खड़ा नज़र आता। दो-चार बार के बाद ही उसे पता चल गया था कि मैं होटल में रुका हूं तो वह बिना पूछे ही पांचवीं मंजिल का बटन दबा देता। उसे लिफ्ट के भीतर देखते ही मैं हर बार चौंक जाता और सोचने लगता – कितनी मुश्किल नौकरी है बेचारे की। होटल में कुल तीस कमरे हैं और दो लिफ्ट। ये तय है कि होटल में आने-जाने का समय आम तौर पर सुबह नौ-दस बजे और होटल के चैक-इन और चैक-आउट के समय ही ज्यादा होता होगा। ऐसे में जब लिफ्ट नहीं चल रही होती तो वह बेचारा किसी न किसी के द्वारा बटन दबाये जाने का इंतजार करता रहता होगा। खड़े-खड़े, क्योंकि लिफ्ट में स्‍टूल नहीं है। ये इंतज़ार कई-कई बार घंटों का भी रहता होगा। अगर वह लिफ्ट के बाहर भी खड़ा हो कर इंतज़ार करे तो एक तरफ होटल की लॉबी और दूसरी तरफ रिसेप्शन। वहां भी भला उससे बात करने वाला कौन होगा! वैसे भी लिफ्टमैन बेचारा सिर्फ फ्लोर नम्बर पूछने के अलावा बोलता ही कहां है। सुनने के नाम पर उसके हिस्से में लिफ्ट में कुछ पलों के लिए आये मुसाफिरों के आधे अधूरे वाक्य ही तो आते हैं जो हर मुसाफिर के जाने के बाद हमेशा के लिए आधे ही रह जाते हैं। लिफ्टमैन की पूरी जिंदगी ये आधे अधूरे वाक्य सुनते ही गुज़र जाती है। दुनिया भर के‍ लिफ्टमैन आधा-अधूरा सुनने और सिर्फ फ्लोर नम्बर पूछने के लिए अभिशप्त हैं।
पूछा था मैंने उस लिफ्टमैन से कि कितने घंटे की नौकरी है और कि क्या अजीब नहीं लगता बंद लिफ्ट में इस तरह से लगातार खड़े रहना और इंतज़ार करना कि कोई बटन दबाये तो लिफ्ट ऊपर या नीचे हो। वह झेंपी हुई हँसी हँसा था - साब, नौकरी यही है तो किससे शिकायत। दस घंटे की ड्यूटी होती है और बीच-बीच में रिलीवर आ जाता है। तब मैंने हिसाब लगाया था - यही लिफ्टमैन अकेला तो नहीं है जो लिफ्ट, यानी ढाई फुट X साढ़े तीन फुट की सुनसान जगह के भीतर खड़ा है। हमेशा बाहर से बटन दबाये जाने के इंतज़ार में। पुणे में ऐसे पचीसों इमारतें होंगी, महाराष्ट्र में सैकड़ों, पूरे देश में हजारों और पूरी दुनिया में लाखों जहां ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर एक न एक लिफ्टमैन खड़ा किसी न किसी के द्वारा बाहर से बटन दबाये जाने का इंतज़ार कर रहा होगा और ये इंतज़ार वह ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर तब तक करता रहेगा जब तक वह इस काम से रिटायर न हो जाये या उसे कोई बेहतर काम न मिल जाये। तब उसकी जगह कोई और वर्दीधारी, टाई लगाये दूसरा लिफ्टमैन आ जायेगा। अपनी उम्र के चालीस बरस वहां गुजारने के लिए। ढाई फुट X साढ़े तीन फुट की सुनसान जगह में। बाहर से बटन दबाये जाने के इंतज़ार में।
इससे पहले कि लिफ्टमैन मुझे सलाम करे, मैं दुनिया भर के ऐसे सारे लिफ्टमैनों को सलाम करता हूं।

सूरज प्रकाश

3 टिप्पणियाँ:

Gyandutt Pandey 27 मई 2011 1:36 am  

रेल गाड़ियां गिनने चलवाने का काम भी तो लिफ्टमैंन सरीखा है। अ ग्लोरीफाइड लिफ्ट मैन! :(

लगता है मैं खुद से सिम्पैथी करूं!

Gyandutt Pandey 27 मई 2011 1:39 am  

आप दुर्घटना के शिकार थे सूरज प्रकाश जी। अर्सा हो गया उस बात को। अब आप स्वस्थ हैं?

atulkushwaha 3 जून 2011 11:16 am  

Salute to them......and also you for best presentation...

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