बुधवार, 21 अक्तूबर 2009

नमक के बहाने

पुणे में वह मेरा आखिरी दिन था। लगभग पचास महीने वहां बिताने के बाद मैं मुंबई वा‍पिस जा रहा था। जो दो एक दावतनामे थे, वे निपट चुके थे। मैं वहां अपने आखिरी दिनों में होटलों में ही खाना खा रहा था। बेशक सामान बाद में ले जाता, मैं अगली सुबह वापिस जा रहा था। धीरे धीरे ही सही सारी किताबों की पैकिंग मैंने खुद की थी और बाकी सामान मेरा नौकर मोहिते पैक करता रहा था। रसोई समेटने का काम वही कर रहा था। डिब्‍बे वगैरह खाली करके मसाले, दालें और दूसरी चीजें उसे ले जाने के लिए मैंने कह दिया था। उसे ये जरूर कह दिया था कि थोड़ा सा नमक, काली मिर्च और मक्‍खन का एक पैकेट वह आखिरी दिन तक खुले रखे रहे। रसोई का बाकी सामान या तो पैक कर दे या अपने घर ले जाये।
तो जिस दिन का किस्‍सा है ये, अचानक झमाझम बरसात शुरू हो गयी। तीन चार घंटे लगातार पानी बरसता ही रहा। कार शाम को ही मुंबई भिजवा चुका था। अब कैसे भी करके होटल खाना खाने नहीं जाया जा सकता था। पैर के दूसरे ऑपरेशन के बाद बैकम शू पहन कर चलता था। बहुत ज्‍यादा चलना मना था और इस बरसात में इतना महंगा जूता बरबाद तो नहीं ही किया जा सकता था। साढ़े नौ बजने को आये थे। बरसात जैसे रात भर होने का परमिट ले कर आयी थी। मैं बार बार बाल्‍कनी में आता और बरसात का जायजा लेता। ऑटो वैसे भी दिन में नहीं मिलता, रात के वक्‍त मिलने के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता था।
जब ये तय हो गया कि बरसात तो नहीं ही रुकने वाली, मैंने घर पर ही कुछ बनाना तय किया। अब मुझे ये नहीं पता था कि मोहिते ने किस कार्टन में क्‍या पैक किया है या खाने का सामान कुछ छोड़ा भी है या नहीं। संयोग से तीन चार कार्टन खंगालने के बाद प्रेशर कुकर, चावल और मूंग मिल गये। सोचा मैंने, पहले दाल चावल ही भिगो लिये जायें फिर मसाले तलाश किये जायें।
मैंने आधे घंटे की मेहनत के बाद लगभग सारे कार्टन खोल डाले लेकिन नमक कहीं नहीं था। फ्रिज में रखा थोड़ा सा मक्‍खन जरूर मिल गया। नमक सहित सारे मसाले ले जाये जा चुके थे। अब क्‍या हो। भूख अपनी जगह कायम थी और बरसात अपनी जगह। नमक लाने के लिए बाजार तक जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। मैं जिस इमारत में रहता था उसके आठ फ्लैट्स में मेरे अलावा चार और आफिसर्स रहते थे। बाकी फ्लैट्स खाली थे। एक ही संस्‍थान में होने और एक ही इमारत में रहने के बावजूद उनसे संबंध ऐसे नहीं थे कि पहली बार उनके घर जा कर नमक मांग सकूं। सामने वाली बिल्डिंग में गेस्‍ट हाउस था और उसके पीछे वाली इमारत तक कभी गया ही नहीं था। बेशक वहां भी हमारे ही संस्‍थान के ही लोग रहते थे।
अब फीकी खिचड़ी तो नहीं ही खायी जा सकती थी। चम्‍मच भर नमक का सवाल था जो मैं हल नहीं कर पा रहा था। काफी देर तक अंदर बाहर होता रहा कि क्‍या करूं। अपने आप पर, अपने वक्‍त पर और अपनी जीवन शैली पर अफसोस होता रहा कि चम्‍मच भर नमक लायक संबंध भी नहीं रहे हैं हमारे। बार बार संकोच आड़े आता रहा और मैं नमक नमक जपता रहा।
इसी अंदर बाहर की चहलकदमी में अपने बचपन के कितने ही ऐसे प्रसंग याद आते रहे जब मां ने हमारी पसंद का कुछ नहीं बनाया होता था तो पूरे मोहल्‍ले की रसोई हमारे लिए अपनी होती थी और हम किसी भी पड़ोसी के घर में जा कर खाना खा सकते थे। पूरे मोहल्‍ले की रसोई हमारे लिए सांझी होती थी। मजाल है किसी घर में कोई खास पकवान बना हो और वह दस घरों में सबके हिस्‍से में न आये। बिना नमक वाली इस झमाझम बरसात में ये भी शिद्दत से याद आया कि छोटा सा एक तंदूर पूरे मोहल्‍ले में सिर्फ हमारे घर में था और जिस दिन हमारी मां दोपहर के वक्‍त तंदूर तपाने का फैसला करती, आस पास के दस घरों में पहले खबर कर दी जाती और मोहल्‍ले की सारी चाचियां मासियां तंदूर को गरम बनाये रखने के वास्‍ते अपने हिस्‍से की दो चार लकडि़यां और गूंथे आटे की परात ले कर आ जातीं। हम बच्‍चों की मौज हो जाती। उसी छोटे से तंदूर में से बारी बारी से सोंधी सोंधी गंध लिये कभी मिस्‍सी रोटी निकल रही है, तो कभी प्‍याज के परौंठे निकल रहे हैं। मक्‍की की रोटी निकल रही है और रात की बची दाल डाल कर बनाये गये परौंठे भी। अगर किसी बच्‍चे को अपनी मां के हाथ की सादी रोटी पसंद नहीं है तो किसी भी चाची की परात में से अपनी मन पसंद रोटी ले लो। खुशी खुशी मिलेगी। खाना बनाना निपट जाने के बाद तंदूर की बाकी बची आंच का इस्‍तेमाल मिट्टी की हांडी में उड़द और चने की दाल बनाने के लिए किया जाता था और ज़रूरी नहीं कि ये दाल हमारी ही बन रही हो। जिसका मन आये, दाल की हाड़ी चढ़ा सकती थी। आखिर ये दाल भी तो चार घरों में पहुंचती ही थी।
सब दिन हवा हुए। मैं अपने बचपन के यानी चालीस पैंतालीस साल पहले के दिल याद कर रहा था और सोच रहा था कि या तो भूखा सोउँ या फीकी खिचड़ी खाऊं। नमक मांग कर लाने की हिम्‍मत नहीं ही हुई।
तभी एक चमत्‍कार हुआ। रात दस बजे की पाली वाला सिक्‍युरिटी गार्ड आ चुका था और जाने वाले गार्ड से चार्ज ले रहा था। उसने मेरी बाल्‍कनी की तरफ देखा और आदतन मुझे सलाम किया। सलाम के जवाब में मैंने उसे ऊपर आने का इशारा किया। जब वह ऊपर आया तो मैंने उसे अपनी समस्‍या बतायी। हैरानी की बात, गार्ड को मालूम था कि मोहिते नमक सहित सारे मसाले और दूसरा सामान कल ही अपने घर ले गया है। गार्ड ने खुशी खुशी मेरे लिए बाजार से नमक लाना मंजूर किया और मैंने पुणे में बितायी अपनी आखिरी रात नमक वाली खिचड़ी खायी।
गार्ड बेशक भरी बरसात में भीगते हुए मेरे लिए नमक ले कर आया था, उस नमक की अपनी सीमा थी। उस नमक में सिर्फ खिचड़ी को नमकीन कर सकने का गुण था। जीवन को लवणयुक्‍त बनाने का गुण उसमें नहीं था। मिल बांट कर जीवन जीने से जो लवण आता है हमारे हिस्‍से में, सारे मतभेदों के बावजूद जो नमक हमारी मर्यादा को ढंके रहता है, हमारी चार कमजोरियों पर पर्दा किये रहता है जो साझा नमक, ये वो नमक नहीं था।
क्‍या अब भी कहीं मिलता है वो नमक। मिले तो बताना।
सूरज प्रकाश

10 टिप्पणियाँ:

kisalaya 21 अक्तूबर 2009 4:40 am  

Aapne bhaauk kar diya . wo purane din yaad aa gaye .
bhai sahab ab to namak bhi haram hone laga hai .
Achhe sansmaran ke liye shukriya .

राजीव तनेजा 21 अक्तूबर 2009 10:21 am  

आपके साथ-साथ मुझे भी अपने पुराने दिन याद आ गए...

रोचक प्रसंग

संगीता पुरी 21 अक्तूबर 2009 11:48 am  

कई दिक्‍कतों के बावजूद पूणे में अंतिम दिन आपको नमक वाली खिचडी खाने को मिल ही गयी .. नमक के बहाने या आपके संस्‍मरण के बहाने हमलोगों को एक बढिया पोस्‍ट पढने को मिली !!

neelima sukhija arora 22 अक्तूबर 2009 2:59 am  

नमक के बहाने जिन्दगी की एक कड़वी सच्चाई सामने ला दी आपने

शरद कोकास 24 अक्तूबर 2009 5:18 pm  

क्या कहूँ सूरज प्रकाश जी .. आपकी ज़िन्दगी के उन दिनों मे घुले नमक के स्वाद को महसूस कर रहा हूँ। इस स्वाद का स्मरण न होता तो आप जी पाते ? हम बिसरे हुए उस स्वाद की तलाश मे दर-ब-दर भटकते हैं और कई बार वर्तमान के फीकेपन से घबराकर मर जाने के बारे मे सोचते है । बरसों बाद ज़िन्दगी का असली स्वाद लेते हुए सोचो तो लगता है .. असली स्वाद को तो हम बरसों पीछे छोड़ आये है अब जो है वह तो सिर्फ स्वाद का भ्रम है ।

Bhoopendra a media man 29 अक्तूबर 2009 5:48 am  

namak to ek bahana hai sir ji vastav me bade saharo ki busy life style me ab logo ka milana julna ek dushre ke shukh dukh ko janana samajhana sahayog karana ye bate sapna ban chuki hai. so adamee kisee se milta hai to kam is karan se log antarmukhee hote ja rahe hai. aap ka lekh is disha me pathko ko jaroor jagroop karega.

Bhoopendra a media man 29 अक्तूबर 2009 5:50 am  

beshak saharo kee martee huyee sabhayata par prahar kiya hai aapne. samaj ko bahut kuch sheekhane ko millega.

naveen kumar naithani 3 नवम्बर 2009 8:12 am  

नमक कथा देखने के बाद नवेन्दु(जब वे महर्षी नहीं हुए थे)की पंक्तियां याद आ गयी हैं
खाने में जितना भी स्वाद था
सब नमक की वजह से था
तारीफ में कही गयी तमाम बातों में
किसी ने उसका जिक्र तक नहीं किया

anup 27 नवम्बर 2009 3:25 am  

शहर ने अपने हिस्‍से का नमक आपकी झोली में डाल ही दिया. अब आप शहर के इस नमक को भूल नहीं सकते.

anuj 2 दिसम्बर 2009 6:36 pm  

sooraj bhai, kahani to achchhi hai lekin namak ke bahaane aap jo kehna chahte thhe wo baat hi dab kar reh gayi hai. Doosre detail ki bajaye yedi 'mohalle' wale prasang per khil kar aate to baat aur achchhi banti. Anyway, aapko badhai.
--anuj, Delhi

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