बुधवार, 12 अगस्त 2009

खब्‍बू दिवस

आज एक बार फिर आपसे खब्‍बू दिवस यानी लेफ्ट हैंडर्स डे पर बात कर रहा हूं। पिछले बरस इसी दिन आपसे खब्‍बुओं के बारे में ढेर सारी बातें शेयर की थीं। आज कुछ और बातें।
पिछले दिनों कुछ ब्‍लागर्स मेरे घर आये थे तो खब्‍बुओं की दास्‍तान चली और सबने अपने अपने खब्‍बू अनुभव सुनाये। कुछ मित्र हैरान थे कि हम अपने ही खब्‍बू साथियों के बारे में कितना कम जानते हैं। उनकी तकलीफें, जरूरतें, उनकी सुविधाएं और उनकी परेशानियां हम हमेशा अनदेखी कर जाते हैं।
कल जयपुर से मेरे मित्र प्रेम चंद गांधी का फोन आया था। वे राजस्‍थान में रहने वाले किसी खब्‍बू लेखक के बारे में जानना चाह रहे थे। सचमुच हमारे पास इस बात के कोई आंकड़े नहीं हैं कि कितने हिन्‍दी लेखक वामपंथी विचार धारा के होते हुए भी दायें हाथ से लिखते हैं और कितने नरम वादी होते हुए भी बायें हाथ्‍ा से लेखनी चलाते हैं। किसी के पास अगर खब्‍बू लेखकों के आंकड़े हों तो जरूर शेयर करें। अगर आप खुद खब्‍बू लेखक हैं तो भी बतायें।
चलिये आपको खब्‍बू संसार की एक मनोरजंक यात्रा कराते हैं-
ये अमरीकी राष्‍ट्रपति खब्‍बू थे - James A. Garfield (1831-1881) बीसवें, Herbert Hoover, (1874-1964) इकतीसवें, Harry S. Truman, (1884-1972) तेतीसवें, Gerald Ford, (1913-2006) अड़तीसवें, Ronald Reagan, (1911-2004) चालीसवें, George H.W. Bush, (1924-) इकतालीसवें, Bill Clinton, (1946- ) बयालीसवें।
ज्‍यादातर खब्‍बू ड्राइवर पहली ही बार में ड्राइविंग टैस्‍ट पास कर लेते हैं।
गुजरात में ही आपको सबसे ज्‍यादा खब्‍बू डाक्‍टर मिलेंगे। गुजरात में आपको कई पति पत्‍नी दोनों ही खब्‍बू मिल जायेंगे।
गुजरात में मैंने देखा कि कक्षाओं में कम से कम पांच सीटें ऐसी होती हैं जिन पर खब्‍बू बैठ सकें।
दुनिया भर के खब्‍बुओं को एक मंच पर लाने के लिए एक वेबसाइट है lefthandersday.com
इस साइट पर कोई भी खब्‍बू सदस्‍य फ्री में सदस्‍य बन सकता है।
ये साइट तरह तरह की प्रतियोगिताएं, सर्वेक्षण्‍ा आदि आयोजित करती है।
खब्‍बुओं की जरूरतें बेशक वही होती हैं जो सज्‍जुओं की होती हैं लेकिन उनके हाथ की करामात अलग होती है। ढेरों चीजें हैं जो हम रोजाना इस्‍तेमाल करते हैं' कैंची, कटर, रसोई का सामान, कीबोर्ड, गिटार, माउस यानि सब कुछ। ऐसे में कोई दुकान भी तो होगी जो इनका ख्‍याल रखे और सबकुछ खब्‍बुओं को ही बेचे।
ये दुकान है - http://www.anythinglefthanded.co.uk वहां सिर्फ और सिर्फ खब्‍बुओं द्वारा इस्‍तेमाल की जाने वाली चीजें मिलती हैं।
अक्‍सर जुड़वा बच्‍चों में से एक खब्‍बू होता है।
हकलाना और डाइलेक्सिया जैसे रोग खब्‍बुओं के हिस्‍से में ज्‍यादा आते हैं क्‍योंकि उन्‍हें ठोक पीट कर सज्‍जू बनाने की कोशिश्‍ों सबसे ज्‍यादा होती हैं।
खब्‍बू बेशक हर क्षेत्र कला, खेल, लेखन और संगीत में उत्‍कृष्‍ट होते हैं लेकिन वे आम तौर पर हॉकी खिलाड़ी नहीं होते। क्‍यों का जवाब आप खुद सोचें।
तो आज खब्‍बू दिवस पर सभी खब्‍बुओं को प्‍यार भरा सलाम
सूरज

5 टिप्पणियाँ:

वजूद 12 अगस्त 2009 10:43 pm  

सूरज प्रकाश जी,

आपकी दी हुई जानकारी रोचक लगी. ब्लोगिस्तान में मैं भी नया ही हूँ, लेकिन लगता है कि आप मुझसे पुराने हैं. 'अपने बारे में' आपने लिखा है कि लिखना इस ब्लोगिस्तान में आने से शुरू हो जाए. यकीन मानिए सिर्फ माध्यम अलग है, लेकिन खुद को अभिव्यक्त करने या यूं कहें कि 'स्वान्तः सुखाय' के लिए या एक सशक्त माध्यम है.

बेनामी 13 अगस्त 2009 2:19 am  

blog ki dunia sach mein sirf swant sukhay ke liye hai.isko zyada log nahin padhate. surajprakash jaise writer ko kucch serious lekhan karna chahiye. 8-10 comments kucch nahin hota aur na hasil hota hai. ummeed hai ki aap bura na maante huye jald hi badhiya see kahani likhenge.

अर्शिया अली 13 अगस्त 2009 6:13 am  

जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई.
( Treasurer-S. T. )

परमजीत बाली 13 अगस्त 2009 7:37 am  

रोचक जानकारी के लिए आभार।

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi 15 अगस्त 2009 6:41 am  

बढिया जानकारी के लिए दिली शुक्रिया। दरअसल मेरे पास एक अखबार से फोन आया कि क्‍या आप ऐसे किसी लेखक को जानते हैं जो खब्‍बू हो। सच में मुझे पहली बार लगा कि हम अपने लेखक मित्रों के बारे में इतना भी नहीं जानते।
काफी जगह फोन करने के बाद पता चला कि प्रसिद्ध कथाकार और 'शेष' के संपादक हसन जमाल खब्‍बू हैं। कवि शायर दिनेश सिंदल दोनों हाथों से लिख सकते हैं। युवा लेखक मिहिर पण्‍ड्या भी खब्‍बू हैं।
मेरे आफिस में एक महिला सहकर्मी खब्‍बू हैं। कुछ वक्‍त पहले उन्‍हें कंप्‍यूटर काम करने बिठा दिया गया। उनके लिए बड़ी परेशानी की बात थी। वजह यह कि काम डाटा फीड करने का और की बोर्ड पर अंक दांए हाथ पर होते हैं। वो बिचारी बहुत परेशान हुईं तो मैंने सिस्‍टम वालों से कहा कि लेफ्ट हैंडर्स वाला की बोर्ड ला दीजिए। पता चला कि भारत में ऐसे की बोर्ड आते ही नहीं हैं।
महात्‍मा गांधी खूब लिखते थे और लिखते लिखते थक जाते थे। इसलिए उन्‍होंने दोनों हाथों से लिखना शुरू कर दिया था। जब दोनो हाथ भी थकने लगे तो गांधी जी ने पैरों से लिखने की भी कोशिशें की थीं।
आपने सही कहा मां-बाप जबर्दस्‍ती बच्‍चे को खब्‍बू से सज्‍जू बनाने की कोशिश करते हैं, जिसकी वजह से बच्‍चे में दूसरी कमजोरियां आ जाती हैं। जिन्‍हें ऐसी यातना से नहीं गुजरना पड़ता वे सामान्‍य जीवन जीते हैं।

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