<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009</id><updated>2012-01-05T10:11:15.928-08:00</updated><category term='दाढ़ी प्रसंग'/><category term='विकीसोर्स पर उपन्‍यास'/><category term='स्‍वागत'/><category term='भ्रमण'/><category term='संस्‍मरण्'/><category term='लघुकथा'/><category term='घुमक्‍कड़ी'/><category term='विदाई'/><category term='बचपन'/><category term='संस्‍मरण'/><category term='बधाई'/><category term='नवागत का स्‍वागत'/><category term='हाले मरीज'/><category term='कहानी'/><category term='सुनो कहानी'/><category term='खब्‍बू दिवस'/><category term='मुलाकात'/><category term='परिचर्चा'/><category term='विदा पुणे'/><category term='किताबें'/><category term='प्रसंगवश'/><category term='जिंदगीनामा'/><category term='लघु कथा'/><category term='मुलाहिजा फर्माइये'/><category term='विनम्र श्रृद्धांजलि'/><category term='एक अनुरोध'/><category term='स्‍मरण'/><category term='साक्षात्‍कार'/><category term='सवाल जवाब'/><category term='शहरनामा'/><category term='अनुरोध'/><category term='स्‍मृति'/><category term='खबर'/><title type='text'>कथाकार</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>56</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-1310750608234823709</id><published>2011-12-28T08:19:00.000-08:00</published><updated>2011-12-28T08:26:56.152-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विदाई'/><title type='text'>विदा हो गयीं किताबें बेटियों की तरह</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/-KFEs8iUguW8/TvtDHEQfyzI/AAAAAAAABEw/Z9nQWwswUbE/s1600/suraj%2Bbooks.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/-KFEs8iUguW8/TvtDHEQfyzI/AAAAAAAABEw/Z9nQWwswUbE/s200/suraj%2Bbooks.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5691216342793833266" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज का दिन हमारे लिए खास मायने रखता है। दूसरे शहरों में जाने वाली किताबों के पार्सल आज रवाना हो गये। स्थानीय बेटियां तो चौबीस और पच्चीस दिसम्बर को पहले ही विदा हो चुकी थीं। ये सोच कर बहुत सुख मिल रहा है कि हमारी सभी बेटियों को अच्छे, पढ़़े लिखे घर-बार मिल रहे हैं। कुछ साहित्यकारों के घर गयी हैं तो कुछ नवोदित लेखकों और ब्लागरों के घर। अलग-अलग स्कूलों में बच्चों के संग-साथ रहने के लिए सबसे ज्यादा किताबें गयी हैं। कुछ एनजीओ दूर दराज के इलाकों में गरीब, ज़रूरतमंद और पढ़ाकू बच्चों के लिए पुस्तकालय और वाचनालय चलाते हैं। वे इन किताबों का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं। &lt;br /&gt;हमारी अपनी बेटियां नहीं हैं। यही सही। किताबों को बेटियों की तरह विदा करने का सुख तो पाया जा सकता है। हम बेहद खुश हैं। बेहद। मैंने हर किताब पर एक मोहर लगायी है कि उसे पढ़ने के बाद किसी और पुस्तक प्रेमी को दे दिया जाये। विश्वास कर रहा हूं जिनके घर में भी ये किताबें पहुंचेंगी, वे मेरी इस बात का मान रखेंगे और किताबों को नये पाठकों तक पहुंचाने के मिशन में सार्थक भूमिका निभायेंगे।&lt;br /&gt;अभी भी हिंदी और अंग्रेजी की तीन-चार सौ किताबें हैं जो अपनी विदाई की तारीख की राह देख रही हैं। आने वाले दिनों में मैं लगातार यात्राओं पर रहूंगा। बाद में उनकी विदाई की तारीख तय पाऊंगा। यह भी बाद में तय हो पायेगा कि किस किताब को किसके घर जाना है।&lt;br /&gt;आमीन&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-1310750608234823709?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/1310750608234823709/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=1310750608234823709&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/1310750608234823709'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/1310750608234823709'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2011/12/blog-post_28.html' title='विदा हो गयीं किताबें बेटियों की तरह'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/-KFEs8iUguW8/TvtDHEQfyzI/AAAAAAAABEw/Z9nQWwswUbE/s72-c/suraj%2Bbooks.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-2260139639022608077</id><published>2011-12-16T23:32:00.000-08:00</published><updated>2011-12-16T23:36:48.851-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किताबें'/><title type='text'>अच्छी किताबें पतुरिया की तरह होती हैं।</title><content type='html'>मैंने मन बना लिया है कि अपने जीवन की सबसे बड़ी, अमूल्य और प्रिय पूंजी अपनी किताबों को अपने घर से विदा कर दूं। वे जहां  भी जायें, नये पाठकों के बीच प्यार का, ज्ञान का और अनुभव का खजाना उसी तरह से खुले हाथों बांटती चलें जिस तरह से वे मुझे और मेरे बच्चों को बरसों से समृद्ध करती रही हैं। उन किताबों ने मेरे घर पर अपना काम पूरा कर लिया है बेशक ये कचोट रहेगी कि दोबारा मन होने पर उन्हें नहीं पढ़ पाऊंगा लेकिन ये तसल्ली भी है कि उनकी जगह पर नयी किताबों का भी नम्बर आ पायेगा जो पढ़े जाने की कब से राह तक रही हैं। &lt;br /&gt;लाखों रुपये की कीमत दे कर कहां कहां से जुटायी, लायी, मंगायी और एकाध बार चुरायी गयी मेरी लगभग 4000 किताबों में से हरेक के साथ अलग कहानी जुड़ी हुई है। अब सब मेरी स्मृंतियों का हिस्सा बन जायेंगी। कहानी, उपन्यास, जीवनियां, आत्मकथाएं, बच्चों की किताबें, अमूल्य शब्द कोष, एनसाइक्लोपीडिया, भेंट में मिली किताबें, यूं ही आ गयी किताबें, ‍रेफरेंस बुक्स सब कुछ तो है इनमें।&lt;br /&gt;ये किताबें पुस्तकालयों, वाचनालयों, जरूरतमंद विद्यार्थियों, घनघोर पाठकों और पुस्‍तक प्रेमियों तक पहुंचें, ऐसी मेरी कामना है। &lt;br /&gt;24 और 25 दिसम्बर 2011 को दिन में मुंबई और आस पास के मित्र मेरे घर एच 1/101 रिद्धि गार्डन, फिल्मि सिटी रोड, मालाड पूर्व आ कर अपनी पसंद की किताबें चुन सकते हैं। बाहर के पुस्तकालयों, वाचनालयों, जरूरतमंद विद्यार्थियों, घनघोर पाठकों और पुस्तक प्रेमियों को किताबें मंगाने की व्यवस्था खुद करनी होगी या डाक खर्च वहन करना होगा।&lt;br /&gt;मेरे प्रिय कथाकार रवीन्द्र कालिया जी ने एक बार कहा था कि अच्छी किताबें पतुरिया की तरह होती है जो अपने घर का रास्ता भूल जाती हैं और एक पाठक से दूसरे पाठक के घर भटकती फिरती हैं और खराब किताबें आपके घर के कोने में सजी संवरी अपने पहले पाठक के इंतजार में ही दम तोड़ देती हैं।&lt;br /&gt;कामना है कि मेरी किताबें पतुरिया की तरह खूब लम्बा जीवन और खूब सारे पाठक पायें।&lt;br /&gt;आमीन  &lt;br /&gt;mail@surajprakash.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-2260139639022608077?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/2260139639022608077/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=2260139639022608077&amp;isPopup=true' title='7 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/2260139639022608077'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/2260139639022608077'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2011/12/blog-post.html' title='अच्छी किताबें पतुरिया की तरह होती हैं।'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-8832339877549685168</id><published>2011-11-12T21:12:00.002-08:00</published><updated>2011-11-13T04:59:05.967-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कहानी'/><title type='text'>कहानी डरा हुआ आदमी</title><content type='html'>डरा हुआ आदमी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने अपनी कहानी का अंत ऐसा तो नहीं चाहा था। भला कौन लेखक चाहेगा कि जिस आदमी को कथा नायक बना कर उसने अरसा पहले कहानी लिखी थी, उसे न केवल लुंज-पुंज हालत में देखे बल्कि अपनी कहानी को आगे बढ़ाने पर मज़बूर भी होना पड़े। एक अच्छे-भले आदमी पर लिखी गयी ठीक-ठाक कहानी आगे जा कर ऐसे मोड़ लेगी, मैं कभी सोच भी नहीं सकता था। अपने कथा नायक की ये हालत देख कर अब न तो चुप रहा जा सकता है और न ही उसे इग्नोर करके चैन से रहा ही जा सकता है। &lt;br /&gt;मैं अभी-अभी बद्री प्रसाद जी से मिल कर आ रहा हूं। पिछले चार बरस से कौमा में पड़े हुए हैं। बेरसिया में। भोपाल से घंटे भर की दूरी पर। उनकी पत्नी  का घर है यहां। घर बेशक बद्री प्रसाद जी के पैसों से बना होगा, लेकिन कोठी के दरवाजे पर लगी नेम प्लेट तो यही बताती है कि इस कोठी की मालकिन उमा देवी हैं। &lt;br /&gt;बहुत तकलीफ हुई बद्री प्रसाद जी को इस हालत में देख कर। बेशक कोठी बहुत बड़ी और आलीशान बनी हुई है लेकिन बद्री प्रसाद जी को जिस कमरे में रखा गया है, वह न केवल बहुत छोटा है बल्कि ऐसा लगता है कि पहले और अब भी गोदाम की तरह ही इस्तेमाल होता रहा है। एक तरफ रजाइयों का ढेर, पुरानी किताबों की अल्मारियां, कोने में रखे अनाज के पीपे, अल्मारी के ऊपर रखा पुराने मॉडल का शायद इस्तेमाल न हो रहा टीवी और इन सबके बीच कॉमा की हालत में चार बरस से लेटे देश की सबसे बड़ी वित्तीय संस्था के रिटायर्ड जनरल मैनेजर। बेशक कमरे में एसी लगा हुआ है लेकिन वह जून के महीने में भी बंद है और कमरे में ताज़ी हवा आने का कोई ज़रिया नहीं है। मेज़ पर ढेर की ढेर दवाइयां रखीं हैं। डिब्बों और शीशियों पर जमी धूल की परत बता रही है कि अरसे से उन्हें हाथ भी नहीं लगाया गया है। कमरा इतना छोटा और लदा-फदा है कि दो आदमियों के खड़े होने की जगह भी मुश्किल से बचती है। &lt;br /&gt;इसी कबाड़खाने में बद्री प्रसाद जी पिछले चार बरस से पड़े हुए हैं। दीन दुनिया से परे। बेशक उमा जी बता रही हैं कि वे सबकी आवाज़ पहचानते हैं और मुस्क़रा कर रिस्पांस भी देते हैं, लेकिन हम उन्हें जिस हाल में देख रहे हैं, बेचारगी वाली हालत ही है उनकी। बेशक पांच मिनट पहले ही उनकी शेव बनायी गयी है और स्पांज भी किया गया है, और इस तैयारी के लिए हमें पौन घंटा इंतज़ार भी करवाया गया है, लेकिन इस बाहरी और दिखावटी ताज़गी के बावजूद साफ-साफ लग रहा है कि वे उपेक्षित हालत में ही पड़े हुए हैं। पता नहीं कब से। &lt;br /&gt;मैंने उन्हें कई बार पुकारा, पुरानी बातें याद दिलाने की कोशिशें कीं, उनके माथे पर देर तक हाथ रख कर उनके बाल सहलाता रहा, देर तक उनका हाथ थामे रहा लेकिन वे किसी भी तरह की पहचान से बहुत परे हैं। कोई रिस्पांस नहीं। मुंह उनका खुला रहा, लम्बी-लम्बी  सांसें लेते रहे वे और इस पूरे अरसे के दौरान उनकी पलकें तेज़ी से लगातार झपकती रहीं। &lt;br /&gt;मैं और नीरज लगभग बीस मिनट उनके पास खड़े रहे और इस पूरे अरसे के दौरान उमा जी पूरी कोशिश करती रहीं कि बद्री प्रसाद जी को मेरे आने के बारे में बता सकें। वे उन्हें  बंबई के दिनों की, नौकरी की, ऑफिस की याद दिलाती रहीं लेकिन बद्री प्रसाद जी सुनने की स्थिति में तो नहीं ही लग रहे हैं। सच तो ये है कि बद्री प्रसाद जी मेरी आवाज़ पहचानना तो दूर, अपनी पत्नी की आवाज़ भी नहीं सुन पा रहे। &lt;br /&gt;उमा जी बता रही हैं कि वे तो रोज़ सुबह सात बजे चली जाती हैं और आज दिन में घर पर हैं इसलिए बद्री प्रसाद जी कल्पना नहीं कर पा रहे कि मैं इस समय घर पर कैसे। कितना लचर तर्क है ये उमा जी का।  &lt;br /&gt;मैंने नीरज को इशारा किया और हम दोनों बाहर ड्राइंग रूम की तरफ आ गये। बाहर आते समय मैंने देखा कि बायीं तथा दायीं, दोनों तरफ दो बहुत बड़े-बड़े हवादार बेडरूम हैं। करीने से सजे हुए। दुमंजि़ला कोठी के आकार को देख कर तो ऐसा ही लग रहा है कि पूरे घर में कम से कम चार बेडरूम तो होने ही चाहिये। बद्री प्रसाद जी के कमरे की हालत देख कर मन कसैला हो आया। जीवन भर परिवार की तरफ से उपेक्षा और अकेलापन झेलने के बाद जब घर मिला भी तो किस हालत में। अपने ही घर में कितनी कम और खराब जगह आयी है उनके हिस्से में, वह भी इतनी गंभीर हालत में बीमार होने पर। &lt;br /&gt;मेरे भीतर गुस्सा सिर उठा रहा है। जैसे फट ही पडूंगा। जी में आया कि उमा जी को झिंझोड़ कर पूछूं कि हमने बद्री प्रसाद जी को आपके पास भला चंगा भेजा था, उनकी ये हालत आपने कैसे कर दी। बेशक रोग पर किसी का बस नहीं होता, कम से कम रोगी की देखभाल तो ढंग से की जानी चाहिये। वे बीमार होने के बावजूद किसी पर बोझ नहीं हैं, उनकी पेंशन है, अच्छा-खासा बैंक बैलेंस था, संस्थान की मेडिकल सुविधा इतनी अच्छी् है कि ....। &lt;br /&gt;मैंने नीरज का हाथ थामा है और किसी तरह से अपने गुस्से पर काबू पाने की कोशिश की है। बद्री प्रसाद जी से जुड़ी पुरानी सारी बातें याद आ रही हैं। बेसिलसिलेवार। बद्री प्रसाद जी पर तरस भी आ रहा है और गुस्सा भी कि उन्हों ने क्यों जानबूझ कर स्थितियों को इस हद तक बिगड़ने दिया कि कुछ भी उनके पक्ष में न रहा। अब तो वे न जीते में हैं न मरते में।&lt;br /&gt;उमा जी ने चाय पीने का आग्रह किया है जिसे मैंने गुस्से में मना कर दिया है लेकिन नीरज ने मेरा हाथ दबाया है और चाय के लिए हां कर दी है। मैंने नीरज की तरफ देखा, उसने मुझे चुप रहने का इशारा किया है। उमा जी एक पल के लिए भीतर गयी हैं चाय के लिए कहने तभी नीरज ने मुझे समझाने की कोशिश की है - आप चाय के लिए मना कर देते तो हमारे पास यहां एक पल के लिए भी रुकने का कोई कारण न रहता। आप खुद ही तो जानना चाहते हैं कि बद्री प्रसाद जी इस हालत तक कैसे पहुंचे। आपने जो कुछ बताया था, मुझे भी उनकी ये हालत देख कर और भी बातें जानने की इच्छा हो रही है। सब कुछ जानने का एक ही तरीका बचता है हमारे पास कि हम कुछ वक्त यहां और गुज़ारें। &lt;br /&gt;मैं नीरज की बात समझ गया हूं। अब हमारा मकसद चाय पीना नहीं, थोड़ी देर बैठ कर उमा जी से बद्री प्रसाद जी के बारे में कुछ और जानना है। ये तो हम देख ही चुके कि बद्री प्रसाद जी की देखभाल ठीक से नहीं हो रही है। यह बात उमा जी को बतायी भी जानी चाहिये। आखिर बद्री प्रसाद जी जिंदा तो हैं ही, बेशक कहने-सुनने या शिकायत करने से परे हैं। संस्थान की ओर से उनके कैशलेस इलाज की व्यवस्था तो है ही। &lt;br /&gt;मैं गहरी सोच में पड़ गया हूं। बेशक पता था कि बद्री प्रसाद जी पिछले चार बरस से कौमा में हैं, और उनसे मिलना सुखद तो नहीं ही होगा, लेकिन उन्हें  बेचारगी की इस हालत में देख कर मैं दहल गया हूं। रिटायरमेंट के दो महीने के भीतर ही तो उनके साथ ये हादसा हुआ था। मेरा कब से इधर आना टल रहा था। भोपाल कई बार आना हुआ लेकिन हर बार मीटिंग वगैरह में ही इतना समय निकल जाता था कि इस तरफ आना नहीं हो पाया। ऑफिस के कई लोग इस बीच बद्री प्रसाद जी को देखने आये। उनके निजी सचिव संजय तो एक बार पत्नी को भी ले कर आये थे और बुरी तरह से आहत हो कर लौटे थे। बता रहे थे संजय कि उस वक्त घर पर कोई नहीं था। एक नौकर था जो घर के कामकाज के अलावा बद्री प्रसाद जी की देखभाल भी करता था। नौकर ने ही संजय को बताया था कि स्पांज करने, दवा देने और लिक्विड डाइट देने का काम वही करता है। जिस वक्त संजय वहां पहुंचे थे तब तक बारह तो बज चुके होंगे लेकिन तब तक बद्री प्रसाद जी की सुध नहीं ली गयी थी। अस्त-व्यस्त से पड़े थे बद्री प्रसाद जी। लगता था मुंह भी नहीं धुलाया गया था तब तक उनका। संजय अपने प्रिय बॉस की ये हालत देख कर व्यथित हो गये थे और काफी देर तक बद्री प्रसाद जी का हाथ थामे रोते ही रहे थे। &lt;br /&gt;कई बरस पहले मैं जब भोपाल आया था तो उस वक्त बद्री प्रसाद जी भी आये थे। मैं पुणे से आया था और बद्री प्रसाद जी मुंबई से। एक सेमिनार के सिलसिले में। उन्हें  सेमिनार में सिर्फ भाग लेना था इसलिए उनके बोलने का मौका तो नहीं ही आया था। हालांकि तब हमारी दुआ-सलाम ही हो पायी थी और वे ठीक ही लग रहे थे लेकिन बाद में साथियों ने बताया था कि वे अकेले बेरसिया तक जाने की हालत में नहीं थे और उमा जी उन्हें लिवाने भोपाल में होटल तक आयीं थीं। तब तक उनकी हालत काफी बिगड़ चुकी थी लेकिन जैसी कि उनकी आदत थी, वे किसी को कुछ भी बताते नहीं थे। &lt;br /&gt;तो इस बार जब भोपाल आने का प्रोग्राम बन रहा था तो नीरज से मिलने की भी बात थी। नये लिखने वालों में नीरज ने तेजी से अपनी जगह बनायी है। खासकर ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर हाल ही में लिखे अपने ताज़ा उपन्यास से उसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है। नीरज ने जब अपने घर का पता बताते हुए बेरसिया बताया और ये बताया कि वहां तक कैसे पहुंचा जा सकता है तो मुझे याद आया कि अरे, बद्री प्रसाद जी का घर भी तो बेरसिया में ही है और उनकी पत्नी उमा जी बरसों से वहां पढ़ा रही हैं। पूछने पर नीरज ने ही बताया कि वह खुद उमा जी का स्टूडेंट रह चुका है और उनके दोनों लड़कों को भी जानता है, अलबत्ता बद्री प्रसाद जी के बारे में वह कुछ नहीं जानता था। जब मैंने नीरज को बताया कि मैं वहां बद्री प्रसाद जी से भी मिलना चाहूंगा तो उसने आश्वस्त किया कि वह मैडम से बा‍त करके रखेगा और खुद भी मेरे साथ चला चलेगा।&lt;br /&gt;यहां आते समय मैंने नीरज को बद्री प्रसाद जी के बारे में विस्तार से बताया था कि किस तरह से सारा जीवन मुंबई में अकेले गुज़ारने के बाद बद्री प्रसाद जी घर आये भी तो किस हालत में! बद्री प्रसाद जी की इस हालत के पीछे बहुत हद तक उनकी पत्नी उमा जी ही दोषी हैं। अपनी टुच्ची-सी नौकरी की जिद के चलते वे जिंदगी भर खुद भी अकेली खटती रहीं और बद्री प्रसाद जी को भी पूरे छत्तीस बरस तक अकेले रहने पर मज़बूर किया। उमा जी के पास फिर भी अपना कहने को परिचित माहौल और दो बच्चे थे लेकिन उन्होंने बद्री प्रसाद जी के बारे में कभी नहीं सोचा कि वह आदमी मुंबई जैसे शहर में इतने लम्बे अरसे तक बिना परिवार के कैसे रह सकता है। नीरज को मैंने बताया था कि जीवन भर के अकेलेपन और खालीपन के चलते बद्री प्रसाद जी ने कई गंभीर रोग पाल लिये थे। फीयर साइकोसिस यानी डर के मरीज तो वे पहले से ही थे, भूलने की गंभीर बीमारी उन्हें हो गयी थी जिसके कारण वे हमेशा परेशान रहे और असहज जीवन जीने को मज़बूर रहे। डर के साथ-साथ वे असुरक्षा यानी इनसिक्युरिटी से बेहद आतंकित रहते थे। ये सारे डर उन्हें चैन से जीने नहीं देते थे।  &lt;br /&gt;यह सुन कर नीरज ने बताया था कि उमा जी भी अपने आप में एबनार्मल कैरेक्टर हैं। मिलेंगे तो खुद देखेंगे। लेकिन नीरज ने यह भी बता दिया था कि वैसे उनसे मिलने की उम्मीद कम ही है क्योंकि आजकल परीक्षाएं चल रही हैं और उमा जी यहां से सत्तर किमी दूर एक कॉलेज की प्रिंसिपल हैं। उनकी नौकरी इस बात की इजाज़त नहीं देती कि इन दिनों एक दिन के लिए भी अनुपस्थित रहा जाये। उमा जी के बारे में नीरज बता रहा था कि हिंदी में पीएचडी होने और एक कॉलेज की प्रिंसिपल होने के नाते उन्हें अक्सर शहर भर के हिंदी कार्यक्रमों में अध्यक्ष के रूप में बुलाया जाता है! जब अध्यक्षीय भाषण देने की उनकी बारी आती है तब तक वे भूल चुकी होती हैं कि उन्हें क्या करना है। मौका कोई भी हो वे हिंदी फिल्मों की तर्ज पर लिखे खुद के भजन गाने लगती हैं। या ट्रैक से उतर कर कुछ भी बोलने लगती हैं। और जब वे बोलने लगती हैं तो आज के विषय के छोड़ कर दुनिया कर हर विषय कवर करने की कोशिश करती हैं। ऐसे में आयोजकों की हालत खराब हो जाती है। बाहर के कार्यक्रमों में तो वे ये करती ही हैं, अपने कॉलेज में भी वे अपने लिखे ये भजन गाने के लिए बदनाम हैं। हद तो ये है कि इन भजनों की उनकी दो किताबें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। भूलने के मामले में भी वे अपने पति के आसपास ही ठहरती होंगी!&lt;br /&gt;और अपने इस भुलक्कड़ेपन का सुबूत उन्होंने हमारे यहां पर पहुंचते ही दे दिया था। हम हैरान हुए जब हमारे पहुंचने पर दरवाजा खुद उमा जी ने ही खोला था। नीरज की उनसे एक रात पहले ही बात हुई थी और उसने जब मेरे आने के बारे में बताया था तो वे यही बोलीं थीं कि उनका खुद का मिलना तो नहीं हो पायेगा, अलबत्ता, दोनों बच्चे दिन भर घर पर ही होते हैं। वे पापा से मिलवा देंगे।&lt;br /&gt;उमा जी नीरज को पहचान गयीं और उलाहना देने लगीं कि अरे तुम इतने बड़े लेखक बन गये हो और तुम्हारी कोई किताब हम तक नहीं पहुंची। नीरज ने उनके पैर छूए थे और मुस्करा कर रह गया था। लेकिन जब भीतर पहुंच कर बैठने के बाद नीरज ने उन्हें याद दिलाने की कोशिश की कि वह बीए में दो बरस तक उनसे हिंदी पढ़ चुका है तो उन्हें बिल्कुल भी याद नहीं आया था। अब वे नीरज का नाम भी भूल चुकी थीं। नीरज ने उन्हें कई घटनाएं याद दिलायीं लेकिन वे अपनी ही धुन में खोयी थीं। तभी नीरज ने मुझे इशारा किया था। उमा जी पंखे का स्विच ढूंढ रही थीं। उन्होंने एक-एक करके स्विच बोर्ड के सभी बटन दबाये थे। पंखा तब भी नहीं चला था। तब उन्होंने जाकर दूसरी दीवार पर लगे स्विच बोर्ड के बटन दबाने शुरू किये। तब पंखा चला था। हम हैरान हुए थे कि घर की मा‍लकिन को ये न पता हो कि ड्राइंगरूम में पंखे का स्विच कहां है तो सचमुच सीरियस बात है।&lt;br /&gt;चाय आ गयी है। उमा जी के पीछे पीछे एक दुबली-सी लड़की चाय की ट्रे थामे आयी है। चाय सिर्फ हम दोनों के लिए आयी है। आधा-आधा कप चाय और प्लेट में पार्ले ग्लूकोस के चार बिस्किट। इतने में भीतर से एक हट्टा-कट्टा आदमी आया है। हाथ जोड़ कर बताता है - मैं गौरव, बद्री प्रसाद जी का बड़ा लड़का। उम्र पैंतीस के करीब तो रही ही होगी गौरव की। पूछने पर बताता है कि वह एनीमेशन का काम करता है। पहले दोनों भाई, वह और छोटा भाई विवेक दोनों ही भोपाल में एक कम्पनी में काम करते थे लेकिन, वह भीतर की तरफ इशारा करते हुए बताता है, पापा के कारण अब दोनों ही जॉब छोड़ कर बच्चों को घर पर ही एनिमेशन सिखाते हैं।  &lt;br /&gt;अब मुझे लगने लगा है कि नीरज ने चाय के बहाने रुक कर सही फैसला लिया है। बेशक उमा जी से ज्यादा बातें न उगलवायी जा सकें, गौरव कुछ तो बोलेगा। पहला सवाल मैं उसी से पूछता हूं – किस डाक्टबर का इलाज चल रहा है?&lt;br /&gt;-इंदौर के एक डॉक्टर हैं, उन्हीं की सलाह पर दवाएं देते हैं।&lt;br /&gt;- मतलब, किसी बड़े अस्पताल से इलाज नहीं हो रहा, मैं हैरान रह गया हूं - और फिर भोपाल तो इतने पास है और इलाज की सुविधाएं भी बेहतर हैं भोपाल में?&lt;br /&gt;  - नहीं, वो क्या था कि जब चार साल पहले इलाज शुरू किया गया था तो जिस डॉक्टर से हम सलाह ले रहे थे, उन्हीं  की सलाह हमें ठीक लग रही है, सो डॉक्टर बदला नहीं। कभी भी बुलाने पर ये डॉक्टर इंदौर से खुद आ जाते हैं।&lt;br /&gt;- तो क्या कहते हैं इंदौर वाले ये डॉक्टर?&lt;br /&gt;- कहते तो कुछ नहीं, बस यही कि अब तो इनकी यही हालत रहने वाली है। गौरव बेशरमी से बोला है।&lt;br /&gt;- लेकिन अगर हालत पहले से बेहतर नहीं हो रही है तो कम से कम किसी और स्पेशलिस्ट को तो दिखाया जाना चाहिये था। क्या कोई काम्पलीकेशंस बढ़े भी हैं?&lt;br /&gt;- हां, पापा को पेरेलिसेस तो पहले से ही था, अब डॉक्टर बता रहे थे कि बायीं आंख में मोतियाबिंद भी हो गया है।&lt;br /&gt;- ओह! ये तो बहुत सीरियस बात है। आखिरी बार आप इन्हें इंदौर कब ले गये थे?&lt;br /&gt;- चार महीने पहले।&lt;br /&gt;- जरा पापा का मेडिकल इंशोरंस कार्ड दिखायेंगे? मैं अब पूरी पड़ताल कर लेना चाहता हूं कि आखिर माजरा क्या है।&lt;br /&gt;गौरव भीतर जा कर एक फोल्डर लाया है। मैं सिर्फ कार्ड देखना चाहता हूं। पति-पत्नी, दोनों के मेडिकल इंशोरेंस कार्ड हैं। किसी भी बड़े अस्पैताल में इलाज कराने के लिए सालाना कैशलेस लिमिट दो लाख चालीस हज़ार रुपये। अब मुझे बाहर के डॉक्टर से इलाज करवाने का कारण समझ में आने लगा है। कैशलेस सेटलमेंट में आपके हाथ में कुछ नहीं आता जबकि बाहर के डाक्ट‍र से आप मनचाहा बिल बनवा सकते हैं।&lt;br /&gt;- लेकिन ये इंदौर वाला डॉक्टर तो कैशलेस ट्रीटमेंट नहीं करता होगा।&lt;br /&gt;- हां, बिल देता है जो बहुत देर से पास होता है।&lt;br /&gt;- दवाइयां कैसे देते हैं?&lt;br /&gt;- लिक्विड डाइट के साथ&lt;br /&gt;- इंजेक्शन वगैरह भी लगते हैं?&lt;br /&gt;- हां जरूरत पड़ने पर लोकल डॉक्टर लगा जाता है।&lt;br /&gt;अब सारी बातें साफ होने लगी हैं। इस परिवार के लिए बद्री प्रसाद न पहले कोई मायने रखते थे, न अब रखते हैं। जीते हैं या मरते हैं इनकी बला से।&lt;br /&gt;मैं देख रहा हूं कि इस सारी बातचीत के दौरान उमा जी बिल्कुल चुप बैठी रही हैं। मेरा अगला सवाल दोनों से ही है - क्या आपको नहीं लगता कि बद्री प्रसाद जी को किसी खुली और हवादार जगह में लिटाया जाना चाहिये।&lt;br /&gt;जवाब उमा जी ने दिया है लेकिन ये मेरे सवाल का जवाब नहीं है। बता रही हैं - मौसम जब अच्छा होता है तो हम उन्हें  व्हील चेयर पर बिठा कर बाहर लाते हैं ना। तब उन्हें बहुत अच्छा लगता है। मुस्कुराते हैं तब और सबको पहचानते हैं।&lt;br /&gt;अब सवाल दोहराने का कोई मतलब नहीं है।&lt;br /&gt;मैं गौरव को बताता हूं - आप लोग म्यूजिक थेरेपी के बारे में तो जानते होंगे। स्ट‍डीज बताती हैं कि इस तरह के मरीजों को बेशक मामूली-सा ही सही, संगीत सुनने से फायदा होता है। कम से कम उनकी तनी हुई शिराओं को आराम पहुंचता है। आप लोग कोशिश कर सकते हैं, एक अच्छा सा म्यूजिक सिस्टम हो और उस पर मास्टर्स के गायन और वादन की  सीडी..&lt;br /&gt;नीरज ने  मेरी  बात  आगे  बढ़ायी है। कहा है - सर ठीक  कह रहे हैं। म्यू‍जिक ऐसी हालत में मरीज पर अच्छा असर डालता है। मेरे  साथ चलना। मैं अच्छा कलेक्शन दिलवा दूंगा।  &lt;br /&gt;गौरव तुरंत बोला है - हम बजाते हैं ना हनुमान चालीसा पापा के लिए। &lt;br /&gt;अब कहने-सुनने के लिए कुछ भी नहीं बचा है। किन मूर्खों से बात‍ कर रहा हूं मैं। मेरा गुस्सा फिर सिर उठाने लगा है। मैंने विषय बदला है - आप तो मुंबई कभी-कभी आ पाते होंगे, पढ़ाई वगैरह के कारण, तो वह जवाब देता है - हां, बहुत बार तो नहीं, लेकिन कभी-कभी ही जाना हो पाता था। बता रहा है वह - मैंने एनीमेशन को कोर्स पुणे से किया था और दो तीन-महीने जॉब भी मुंबई में किया, लेकिन जमा नहीं, इसलिए भोपाल आ गया था। मैं हैरान हुआ कि देश भर का लगभग 70 प्रतिशत एनीमेशन का काम मुंबई में होता है और इन जनाब को जमा नहीं।&lt;br /&gt;अगला सवाल मैं उमा जी से पूछता हूं - आप भी तो शायद कम ही जाती रही हैं वहां। वे निश्चिंत भाव से बताती हैं - हां, कम ही जा पाते थे हम मुंबई। हर बार नौकरी का कोई न कोई लफड़ा रहता ही था। &lt;br /&gt;मैंने बेशरमी से पूछ लिया है- मैंने बद्री प्रसाद जी को अक्सर अकेले ही रहते देखा है। एक बार वे खुद भी बता रहे थे कि वे पूरी जिंदगी अपने परिवार के साथ कुल मिला कर दो बरस भी नहीं रह पाये हैं! ये सच है क्या?&lt;br /&gt;उमा जी को इस चुभते सवाल की उम्मीद नहीं थी। जवाब गौरव ने दिया है। सरासर झूठा जवाब - दरअसल अंकल, पापा को अकेले रहना ही अच्छा लगता था। वे तो हमारे आने से डिस्टर्ब ही हो जाते थे। &lt;br /&gt;- लेकिन जब वे दो महीने के लिए पैर के इलाज के लिए अस्पाताल में थे तब भी आप में से कोई नहीं आया था?&lt;br /&gt;इस बार भी जवाब गौरव ने ही दिया है, जरा तुर्शी में आ कर - नहीं अंकल, ऐसा नहीं था, हम सब जरूर आते लेकिन पापा ने ही हमें खबर नहीं दी थी। हमें तो बहुत देर से पापा की बहन से पता चला था कि पापा अस्पताल में हैं और वे पापा की देखभाल के लिए नागपुर से वहां पहुंची थीं। हमें खुद खराब लगा था कि पापा ने हमें न बता कर अपनी बहन को बताया। जब तक हम पहुंचते पापा को घर लाया जा चुका था।&lt;br /&gt;- लेकिन उस वक्त तो शायद आप वहीं थे जब आपके पापा ऑफिस से घर नहीं आये थे और रात भर भटकते रहे थे।&lt;br /&gt; -हां, हम दोनों भाई तब पापा के पास मुंबई में ही थे। ऑफिस बंद होने के बाद जब ड्राइवर उन्हें लेने के लिए गया था तो पापा ऑफिस में ही थे। वह उनका ब्रीफकेस ले कर नीचे आने लगा तो पापा ने कहा था - मैं दस मिनट में नीचे आ रहा हूं। ब्रीफकेस खुद लेता आऊंगा, लेकिन जब एक घंटा बीत जाने के बाद भी पापा नीचे नहीं आये तो उन्हें  देखने के लिए ऊपर गया था, पापा का केबिन बंद था और वे कहीं नहीं थे। ड्राइवर परेशान हो कर घर आया था कि पापा कहीं किसी और के साथ न आ गये हों। उस दिन हम बहुत परेशान हुए थे। सब जगह ढूंढा था और पापा रात को बारह बजे लौटे थे। उन्हें बिलकुल भी याद नहीं था कि वे इतने समय तक कहां थे।&lt;br /&gt;अरे, गौरव तो बद्री प्रसाद जी के गुम होने की अलग ही कहानी बता रहा है। हमारी खुद की देखी और भोगी घटना तो अलग ही थी। पूरा ऑफिस इस घटना का गवाह था। &lt;br /&gt;  किस्सा कुछ इस तरह से था। उन दिनों उनकी पोस्टिंग वर्ल्ड ट्रेड सेंटर वाले ऑफिस में थी। घर लोवर परेल स्टेशन के पास था। घर से मिनिमिम फेयर पर टैक्सी की दूरी पर वर्ली नाका से एसी बस मिल जाती थी जो सीधे ऑफिस तक जाती थी। इस बस के कारण वे दोनों तरफ लोकल ट्रेन की तकलीफों से बच जाते थे। &lt;br /&gt;उस दिन पता नहीं क्या। हुआ, ऑफिस से वापिस आते समय वे वर्ली नाका पर बस से उतरना भूल गये और बस के आखिरी स्टॉप अंधेरी में लोखंडवाला तक चले गये। बस के अंतिम पड़ाव से वापिस आने का एक ही तरीका था कि उसी बस में वापिस आते। आये लेकिन इस बार भी बस से उतरना भूल गये और वापिस वर्ल्ड ट्रेड सेंटर जा पहुंचे। बस की ये आखिरी ट्रिप थी और रात के ग्यारह बजने को आये थे। संयोग से उन दिनों उनके बच्चे मुंबई आये हुए थे। पिता के लिए कम और तफरीह के लिए ज्यादा। मोबाइल का युग तब तक इतने बड़े पैमाने पर शुरू नहीं हुआ था। बद्री प्रसाद जी के पास तब मोबाइल नहीं था, होता भी तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्यों कि खुद उन्हें अपना मोबाइल बजने के बारे में पता नहीं चलता था। &lt;br /&gt;बच्चे जब बहुत परेशान हुए तो बद्री प्रसाद जी की डायरी में से देख कर दो-एक परिचित अधिकारियों को फोन किया। बद्री प्रसाद जी की हालत उन दिनों बहुत अच्छी नहीं चल रही थी। बेचारे अधिकारी अपनी कार ले कर ऑफिस गये, वाचमैन से कह सुन कर ऑफिस खुलवाया, एक-एक केबिन, बाथरूम खुलवा कर देखा, इस बीच बच्चे सभी अस्पतालों वगैरह में फोन करके पूछ चुके थे। बद्री प्रसाद जी कहीं नहीं थे। इस बीच कालोनी में भी सबको खबर हो चुकी थी। बद्री प्रसाद जी संस्थान के वरिष्ठ अधिकारी थे इसलिए सबका परेशान होना लाजमी था।&lt;br /&gt;उस रात बद्री प्रसाद जी अपना ब्रीफ केस झुलाते हुए रात ढाई बजे घर लौटे थे और उन्हें कुछ भी याद नहीं था कि वे अब तक कहां थे।&lt;br /&gt;भूलने की आदत तो उन्हें शुरू से ही थी लेकिन शुरू-शुरू में ये भूलना आम तौर पर वैसा ही होता था जैसा हर आम आदमी के साथ होता रहता है। मसलन कोई चीज़ रख कर भूल जाना या बैंक से पैसे निकालना भूल जाना और मजबूरन दोस्तों  से उधार लेना। लेकिन धीरे-धीरे ये रोग बढ़ने लगा और वे भूलने की लम्बी-लम्बी ईनिंग्स खेलने लगे। कभी ऑफिस पहुंच कर याद आता कि शायद प्रेस बंद करना भूल गये हैं तो कभी गैस बंद करना या फिर ताला बंद करना। कितनी ही बार ऐसा हुआ कि वे चर्चगेट से बोरिवली तक 50 किमी वापिस सिर्फ ये देखने के लिए गये कि प्रेस या गैस या फिर ताला ठीक से बंद करके आये थे या नहीं। चीजें रख कर भूल जाने में तो उन्हें जैसे महारत थी। &lt;br /&gt;एक बार एक बहुत ही ज़रूरी केस देख रहे थे। मंत्रालय से आया पत्र सामने रखा था। तभी फोन की घंटी बजी। किसी सीनियर ऑफिसर का फोन था। उस अधिकारी ने कोई फोन नम्बर बताया होगा जिस पर बद्री प्रसाद जी को बात करनी थी। आसपास और कोई कागज़ न देख कर बद्री प्रसाद जी ने वही पत्र उलटा किया और उसके दूसरी तरफ नम्बर लिख दिया। फोन वापिस रखने पर देखा कि मंत्रालय वाला पत्र गायब है। खूब ढूंढ मची। ऐसे स्टाफ की भी शामत आ गयी जो सुबह से उनके केबिन में नहीं आया था। मज़े की बात, वे अपनी मेज़ पर रखे कागजों पर किसी को हा‍थ नहीं लगाने दे रहे थे कि कोई वहीं देख कर खोज ले। कई घंटे बाद अचानक ही कागज पलटा तो खत सामने था। खैर, किसी तरह केस निपटाया गया और वह पत्र दूसरे कागजों के साथ संबंधित डेस्क पर चला गया। शाम को अचानक उस फोन नम्बर की दोबारा ज़रूरत पड़ी तो फोन नम्बर गायब था। इस बात की कल्पना करना मुश्किल नहीं है कि उस दिन उस फोन नम्बर ने बद्री प्रसाद जी को कितना रुलाया होगा।&lt;br /&gt;ऐसा ही एक और किस्सा याद आ रहा है मुझे। एक बार बद्री प्रसाद जी को व्याख्यान देने के लिए कहीं बाहर जाना था। पावर पाइंट प्रेजेंटेशन बना लिया था लेकिन पेन ड्राइव में सेव नहीं कर पा रहे थे। तभी उनके केबिन के सामने से कुछ स्टाफ सदस्य कैंटीन की तरफ जाते दिखायी दिये। बद्री प्रसाद जी ने उन्हें बुलाया और मदद के लिए कहा। उनमें से टाइपिस्ट साखरे ने अपना टिफिन बद्री प्रसाद जी की मेज पर रखा और पीसी पर काम करने लगा। इतने में बद्री प्रसाद जी ने अपनी मेज के कागज़ पत्तर संभाल कर अल्मारी में रखने शुरू किये। वैसे ही उन्हें जाने की देर हो रही थी। इस सफाई अभियान में साखरे का टिफिन बॉक्स गायब। जब उसने पेन ड्राइव बद्री प्रसाद जी को थमायी तो देखा, टिफिन बॉक्स कहीं नहीं है। बद्री प्रसाद जी से पूछा कि कहीं कागजों के साथ अल्मारी में तो नहीं रख दिया है। वे साफ मुकर गये कि उन्होंने कोई टिफिन बाक्स देखा ही नहीं। सबने लाख कहा कि वे सब लंच के लिए कैंटीन जा रहे थे और कि टिफिन साखरे के हाथ में था और वह आज मटन करी ले कर आया है। बद्री प्रसाद जी सबको हक्का बक्का छोड़ कर चल दिये! उस दिन साखरे को घर से मटन करी लाने के बावजूद कैंटीन के खराब खाने से गुज़ारा करना पड़ा।&lt;br /&gt;कुछ दिन बाद की बात है बद्री प्रसाद जी जब भी अपनी अल्मारी खोलते, उन्हें बदबू का भभका लगता, वे कागज वगैरह निकाल कर जल्दीर से अल्मारी बंद कर देते। कई दिन तक ये चलता रहा। वे अल्मारी खोलते और बंद करते रहे। एक दिन वे छुट्टी पर थे और एक जरूरी फाइल उनकी अल्मारी से निकाली जानी थी। चपरासी ने दो अधिकारियों की मौजूदगी में अल्मारी खोली। एक बार फिर तेज बदबू का भभका। तलाश करने पर मिला कई दिन पहले बद्री प्रसाद जी द्वारा बंद किया गया मटन करीवाला टि‍फिन बॉक्स।। पूरे टि‍फिन बॉक्स मे फफूंद लगी हुई थी। &lt;br /&gt;भूलने की आदत से उन्हें व्यक्तिगत रूप से तो परेशानियां होती ही थीं, वे कई बार संस्थान के लिए परेशानी का सबब बन जातीं। तब उनके लिए जवाब देना भारी पड़ जाता था। &lt;br /&gt;चेन्नै में एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रशिक्षण कार्यक्रम था जिसका उन्हें उद्घाटन करना था। इसी कार्यक्रम में दोपहर बाद उनका एक सत्र भी था। सब कुछ तय हो चुका था। पता नहीं कैसे हुआ कि अपनी चेन्नै विजिट के बारे में उन्होंने वहां दूसरे संस्थानों में कार्यरत कुछ मित्रों से बात की। उन मित्रों ने भी बद्री प्रसाद जी की मौजूदगी का फायदा उठाने के मकसद से अपने यहां उनके लिए व्याख्यान रख लिये और बद्री प्रसाद जी की सहमति भी ले ली। सहमति देते समय बद्री प्रसाद जी ने अपने कार्यक्रम का समय चेक करने की भी ज़रूरत नहीं समझी। ट्रेनिंग कार्यक्रम के उद्घाटन से पहले ही दोनों संस्थान वाले उनके मित्र गाडि़यां ले कर आ गये। अजीब स्थिति हो गयी। तीनों जगह बद्री प्रसाद जी ने एक ही समय दे दिया था। किसी तरह अपना कार्यक्रम निपटा कर वे दूसरे कार्यक्रम के लिए लपके। दूसरे से तीसरे के लिए और तीसरे से वापिस जब वे अपने कार्यक्रम में सत्र लेने के लिए आये तो पूरी तरह अस्तर-व्यस्त थे। उन्हें  याद नहीं था कि अपना ब्रीफकेस किस कार में छोड़ आये हैं और दूसरे संस्थानों से मिले गिफ्ट किस कार में रखे थे। सबसे बड़ी तकलीफ की बात ये रही उस दिन कि उन्हें बिलकुल भी याद नहीं आ रहा था कि इस सत्र में व्याख्या़न किस विषय पर लेना है। जब उन्हें सत्र के विषय के बारे में बताया गया तो उनकी तैयारी नहीं थी सत्र लेने की। बहुत खराब अनुभव रहा था उस दिन उनका और जवाब देना भारी पड़ गया था।&lt;br /&gt;अनंत किस्से हैं बद्री प्रसाद जी के जीवन से जुड़े। वे बेशक बहुत भले आदमी थे, कभी किसी का अहित नहीं चाहा, किया भी नहीं, लेकिन अपनी इन्हीं आदतों के कारण कभी भी बहुत लोकप्रिय या सफल अधिकारी नहीं बन पाये थे। वरिष्ठता बेशक उनके हिस्से में आयी लेकिन वरिष्ठता के साथ जुड़ा सम्मान उन्हें कभी नहीं मिला।  &lt;br /&gt;बातचीत का विषय एक बार फिर बदलने की नीयत से मैंने उमा जी से पूछा है -  आपकी शादी कब हुई थी? &lt;br /&gt;वे याद करने की कोशिश करती हैं- नवम्बर 1975 में।&lt;br /&gt;-प्रेम विवाह था क्या आप लोगों का?&lt;br /&gt;- नहीं, मैं तब दिल्ली में बीएड कर रही थी, बद्री प्रसाद जी की बड़ी बहन भी मेरे साथ पढ़ रही थी। उसी ने मुझे पसंद किया था और एक बार छुट्टियों में अपने साथ अपने घर ले गयी थी। तब ये भी वहीं आये हुए थे। सबकी सहमति से ही तब विवाह हुआ था। &lt;br /&gt;-बद्री प्रसाद जी तो शायद नागपुर की तरफ के रहने वाले हैं, आप कहां की हैं?&lt;br /&gt;-मैं छिंदवाड़ा की तरफ की हूं।&lt;br /&gt;मैंने यहां आते समय मैंने नीरज को बताया था कि 1992 के आसपास मैंने एक कहानी लिखी थी - फैसले। एक अधिकारी मुंबई में अपनी नौकरी के पहले दिन से ही अकेला रह रहा था। पहले वाजिब कारण थे कि उसके पास संस्थान की ओर से मिलने वाला घर नहीं था। वह खुद इधर-उधर गुज़ारा करके रह रहा था। परिवार कभी-कभार ही ला पाता। इस बीच उसकी पत्नी ने टाइम पास के लिए पहले तो एमए ज्वाइन कर लिया था, फिर कोई काम चलाऊ नौकरी भी पकड़ ली थी। इस बीच दो बच्चे भी हो चुके थे। तो मैडम का आना अलग-अलग कारणों से टलता चला गया था। और जब साहब को पंद्रह बरस के इंतज़ार के बाद सुकूनभरा फ्लैट मिला था तो भी वे उसे घर नहीं बना पाये थे। मैडम ने अब आने से साफ इनकार कर दिया था। कभी स्थायी होने का बहाना तो कभी हैड बनने का चांस। &lt;br /&gt;मेरा कथा नायक उन्हें समझा-समझा कर हार जाता है लेकिन वे नहीं आतीं। अंत में वह यही तय करता है कि अब भी वे नहीं मानीं तो वह तलाक ले लेगा।&lt;br /&gt;मेरी उस कहानी के कथा नायक बद्री प्रसाद ही थे।&lt;br /&gt;नीरज ने तब एक बात कही थी कि आपकी कहानी तो वहीं ठिठकी रह गयी लेकिन आपका असली कथा नायक आगे निकल गया। अच्छा-बुरा जैसा भी जीवन उसने जीया, अब इतने बरसों के बाद फिर एक चुनौती की तरह आपके सामने है और कह रहा है कि न तो कहानी जीवन के नक्शे-कदम पर चलती है और न ही जीवन कहानी के सांचे में ढल कर चला करता है। अब हिम्मत है तो लिखो आगे की कहानी। बेशक मेरी कहानी तब इसी वाक्य के साथ खत्म हो गयी थी कि अगर उमा अब भी नहीं मानी तो वे तलाक ले लेंगे। लेकिन जीवन के कथा नायक को तो सचमुच अपना जीवन जीना था और जीया भी। &lt;br /&gt;असली जिंदगी में बद्री प्रसाद जी बेहद कमज़ोर निकले थे। वे हताश-निराश हो गये थे। डर उनके जीवन का स्थायी भाव था। तलाक के बारे में सोचने के बाद भी कुछ नहीं कर पाये थे, बेशक कार्मिक विभाग में जा कर नामिनेशन फार्म से बीवी का नाम कटवा कर अपनी विधवा बहन का नाम लिखवा आये थे। लेकिन कुछ ही अरसा बीता था कि ये दांव भी उलटा पड़ गया था। कार्मिक विभाग से बुलावा आया था कि ऑफिस के रिकार्ड से अनुसार आप शादीशुदा हैं। आपका न तो तलाक हुआ है और न ही आपकी पत्नी की मृत्यु् हुई है। संस्थान के नियमों के अनुसार आप अपनी पत्नी को उसके हक से वंचित नहीं कर सकते। मजबूरन उन्हें अपने नामिनेशन में बदलाव करना पड़ा था। &lt;br /&gt;पता नहीं कैसे ये खबर उमा जी तक पहुंच गयी थी। फिर तो जैसे तूफान आ गया था। उमा जी दनदनाती हुई आयीं थीं और बद्री प्रसाद की सात पीढि़यों का तर्पण कर गयीं थीं - उनकी हिम्मत कैसे हुई कि वे उनके होते किसी और को नामिनी बना लें।&lt;br /&gt;कितना अजीब संयोग है कि मैं अरसे बाद अपनी कहानी के आगे की घटनाओं को अपनी आंखों के सामने घटता देख रहा हूं। &lt;br /&gt;इस पूरे अरसे में यानी मुंबई में बद्री प्रसाद जी के प्रवास के पूरे छत्तीस बरस के अरसे में उनकी पत्नी और बच्चे उनके पास या वे अपनी पत्नी -बच्चों के पास मुश्किल से दो बरस के आसपास यानी पांच-सात सौ दिन रहे होंगे। ये बात मुझे बार-बार याद आ रही है और इस तरफ इशारा कर रही है कि बद्री प्रसाद जी के जीवन में जो भी बुरा घटा, उसकी पृष्ठभूमि में उनका यही अकेलापन रहा होगा। भयंकर अकेलापन और उससे भी ज्यादा मुंबई का तोड़ देने वाला खालीपन उनके जीवन में इतने गहरे प्रवेश कर गया था कि वे ताउम्र अकेलेपन और खालीपन से मिलीं दूसरी बीमारियां भी झेलते रहे। &lt;br /&gt;संयोग से छोटी जाति के होने के कारण एक स्थायी डर जीवन भर उनके साथ लगा रहा और उनकी मुसीबतें बढ़ाता रहा। बॉस का डर, डॉक्टर का डर, कुछ गलत फैसले न हो जायें, इस वजह से नौकरी जाने का डर, ये डर और वे डर। वे कभी खुल कर अपनी बात नहीं कह पाये। चाहे घर हो या ऑफिस, डर उनके कंधे पर वेताल की तरह बैठा रहा। जिस वर्ग और जिस दुनिया से वे आये थे, वहां की नियति ही डर थी। कभी खुल कर हँस पाना भी जिनके नसीब में नहीं होता, वे उसी वर्ग से ताल्लुक रखते थे। हमेशा पिटते आये थे सो यहां आ कर बेशक पिटे नहीं, लेकिन जिन स्थितियों का उन्हें सामना करना पड़ा, वे पिटने से भी बदतर थीं। वे अपने काम में माहिर थे। अगर रिज़र्व कोटे से उन्हें दो तीन पदोन्‍नक्‍तियां न भी मिलीं होतीं तो भी वे अपनी लियाकत से वहां तक पहुंचते ही। जब वे सीनियरटी और पदोन्नति के चलते विभागाध्यक्ष बने तो उनके सबसे सगे दोस्त और सलाहकार ही उनके सबसे बड़े दुश्मन बन गये। आसपास कोई बात करने वाला, सुख दु:ख शेयर करने वाला ही न रहा। अकेले तो वे पहले ही थे, अब किसी से संवाद की स्थिति भी न रही। &lt;br /&gt;डर, लगातार भूलने की आदत और महत्‍वपूर्ण बैठकों में अपने विभाग के हित की बात कह न पाने की उनकी हालत देख कर एक बार उनके वरिष्ठ अधिकारी ने साफ-साफ कह दिया कि खबरदार मेरे केबिन में आये या किसी बैठक में नज़र आये। वह वरिष्ठ अधिकारी संयोग से ब्राह्मण था। ऊपर वाले का डर तो था ही, सहारा देने के नाम पर उनके नीचे काम कर रहे दूसरे ब्राह्मण अधिकारी ने पलीता लगाया - आप चिंता न करो, बद्री प्रसाद जी, हम हैं ना, सब संभाल लेंगे। नीचे वाले अधिकारी चतुर थे। जानते थे कि जब तक बद्री प्रसाद हैं, हेड ऑफ डिपार्टमेंट बनने का चांस‍ मिलने से रहा। तो यूं ही सही, दो-ढाई बरस तक वे ही बद्री प्रसाद की जगह निर्णय लेते रहे और उनसे हस्ताक्षर कराते रहे। कहने को बेशक वे विभागाध्यक्ष थे, सारे के सारे निर्णय या तो ऊपर वाले लेते या नीचे वाले। हर महत्व‍पूर्ण बैठक के दिन उन्हें छुट्टी लेकर घर बैठने पर मज़बूर किया जाने लगा। इतनी उपेक्षा उनके हिस्से में आने लगी थी कि लोग बताते हैं कि उन दिनों उन्हें ऑफिस के वाश रूम में फूट-फूट कर रोते देखा जा सकता था। &lt;br /&gt;कभी-कभी उनके जीवन में बहार भी आ जाती लेकिन इस बहार की भी उन्हें बड़़ी कीमत चुकानी पड़ती और वे पहले से ज्यादा अकेले हो जाते। उन दिनों कम्यूटर में यूनिकोड फॉंट की नयी-नयी लहर थी। अब तक पूरी दुनिया में सभी भाषाओं के लिए स्थानीय रूप से विकसित फॉंट ही प्रयोग में लाये जा रहे थे जिनकी अपनी तकलीफें थीं। माइक्रोसॉफ्ट ने मानक फॉंट विकसित कर लिये थे जो आगे चल कर बहुत बड़ी क्रांति करने वाले थे। अभी इनमें शुरुआती दिक्क्तें थीं और इन्हें बाजार में उतारने की कोशिशें चल रही थीं। मैं संस्थान के जिस विभाग में था वहां वेबसाइट और न्यूजलेटर का काम होता था। यूनिकोड फॉंट वेबसाइट पर डालने के बारे में सोचा जा सकता था लेकिन चूंकि पेजमेकर अभी तक यूनिकोड फॉंट स्वीकार नहीं करता था इसलिए इसके लिए हां कहने में मेरी अपनी दिक्कतें थीं। न्यूजलेटर के लिए यूनिकोड में मैटर प्रेस को नहीं भेजा जा सकता था। कुछ और भी तकनीकी समस्याएं थीं जिन्हें फॉंट खरीदने से पहले निपटाया जाना था। बड़े पैमाने पर हिंदी में ये फॉंट प्राइवेट वेंडरों के जरिये बहुत ऊंची कीमत पर बेचे जा रहे थे। वेंडर चाहता था कि एक बार हम हां कर दें तो वेबसाइट यूनिकोड में कन्वर्ट कर दी जायेगी और तब पूरी इंडस्ट्री में मैसेज जाता और उनके लिए प्राडक्ट बेचना आसान हो जाता। &lt;br /&gt;दूसरी तरफ बद्री प्रसाद जी संस्थान के उस विभाग के मुखिया थे जहां से इस आशय का एक पत्र पूरे उद्योग की तरफ जाता और वेंडर की चांदी हो जाती। सबकी निगाह मेरी तरफ थी लेकिन मैं इतने महंगे प्राडक्ट की खरीद से पहले हर तरह की तसल्ली कर लेना चाहता था। मेरी बेरुखी देख कर वेंडर ने अपनी सेल्स गर्ल्स को बद्री प्रसाद जी के पास भेजना शुरू कर दिया। वे जा कर सुबह-सुबह उनके केबिन में बैठ जातीं और यूनिकोड फांट का राग अलापना शुरू कर देतीं। सदियों से भूखे-प्यासे बद्री प्रसाद को एक-साथ दोनों ही लड़कियां भाने लगीं और वे भी उन्हें दिन भर बिठाये रखने लगे। अब उनके आते ही केबिन के बाहर की बत्ती लाल हो जाती और चाय और स्नैक्‍स के दौर चलते रहते। ऐसी बैठकों का समापन अक्सर ऑफिस के सामने बने एसी रेस्तरां में शानदार लंच के साथ होता। इसमें दोनों लड़कियां तो होती हीं कभी मूड आये तो बद्री प्रसाद जी किसी कलीग को भी शामिल कर लेते। लड़कियों को भला क्या एतराज हो सकता था। पूरे उद्योग में यूनिकोड की धारा बद्री प्रसाद के हस्ताक्षर वाले पत्र से ही बहनी थी। इस मामले में अड़चन सिर्फ एक ही थी कि मेरे विभाग की हरी झंडी उनका काम आसान कर देती जो कि मैं नहीं कर रहा था। इसलिए मुझसे नाराज़गी लाज़मी थी। &lt;br /&gt;संयोग कुछ ऐसे बने कि वह कम्पनी ही बंद हो गयी और माइक्रोसाफ्ट ने अपनी नीति बदल कर यूनिकोड फांट बेचने के दूसरे हथकंडे अपना लिये। इसके बाकी जो परिणाम हुए सो हुए, एक परिणाम ये ज़रूर हुआ कि बद्री प्रसाद जी यूनिकोडमय हो गये और हर मीटिंग में, हर मंच से, हर मुलाकात में और हर ब्रीफिंग में यूनिकोड की ही माला जपने लगे। वे अक्सर भूल जाते कि उन्हें व्याख्यान देने किसी और विषय पर बुलाया गया है लेकिन वे बात शुरू ही यूनिकोड से करते। बड़ी विचित्र स्थिति सामने आ जाती कि माइक्रोफाइनांस के सेमिनार के उद्घाटन भाषण में वे यूनिकोड फांट पर बोलना शुरू कर देते। ऐसा एक दो नहीं, हर बार होने लगा। बेशक उन्हें प्रोटोकॉल के चलते बुलाया तो जाता था, भाषण नहीं देने दिया जाता था। &lt;br /&gt;इससे दु:खद स्थिति और क्या हो सकती थी कि माइक्रोसाफ्ट की उदार नीतियों के चलते भारत में यूनिकोड फांट को आये और लोकप्रिय हुए कम से कम सात बरस बीत चुके थे और इसमें बद्री प्रसाद जी का योगदान बहुत कम ही रहा था, वे अपनी सेवा निवृत्ति के समय दिये जाने वाले अंतिम विदाई भाषण में यूनिकोड और केवल यूनिकोड पर भाषण देते रहे थे।  &lt;br /&gt;उनके मन में गहरे तक घर किये बैठे डर का ये आलम था कि वे आजीवन ज़रूरी और गैर-ज़रूरी कारणों से डरे ही रहे। कई बार तो उनके डर इतने बेबुनियाद कारणों से होते थे कि सामने वाले को झल्लाहट होने लगती थी कि वे इन डरों से उबर क्यों नहीं जाते। बेशक उनका बीपी नार्मल था और उन्हें डाइबीटीज भी नहीं थी लेकिन फिर भी वे डॉक्टर के पास जाने से हमेशा कतराते। कोई भी रोग हो जाये, टालते रहते थे। मुझे तो लगता है कि अगर वे अपने डर, असुरक्षा भावना, भूलने की भयंकर बीमारी वगैरह को लेकर किसी अच्छे डाक्टर के पास गये होते या ले जाये गये होते तो वे ज़रूर चंगे हो जाते। लेकिन अपनी सारी तकलीफें छुपाये रखना ही उन्हें माफिक आता था। &lt;br /&gt;पैर के जख्म वाले मामले में भी ये ऐसा ही हुआ। अगर ऑफिस वालों ने उनके पैर से खून टपकता न देख लिया होता और उन्हें एक तरह से जबरदस्ती उठा कर अस्पताल भर्ती न करवाया होता तो तय था, गैंगरीन की वजह से उनका पैर ही काटने का नौबत आ जाती।&lt;br /&gt;अस्पताल में ही उन्होंने डाक्टर के सामने पहली बार माना था कि पैर का ये जख्म उन्हें साल भर से था। ऑफिस वाले भी उन्हें लंगड़ाता देख कर समझा-समझा कर हार चुके थे कि वे ढंग से अपना इलाज क्यों नहीं कराते। केबिन में अकेले होते ही वे अपना जख्मी पैर खुजाना शुरू कर देते और किसी को आते देखते ही पैंट नीचे कर लेते। बताने वाले बताते हैं कि उनके मोजे जख्म से चिपक गये थे और कई बार वे बिना मोजे बदले ऑफिस आते थे। लेकिन न किसी को बताते थे और न ही इलाज कराते थे। वे डरते थे कि कहीं डाक्टर दस बीमारियां और न बता दे। पैर वाले जख्म के कारण उन्हें पूरे दो महीने अस्पताल में रहना पड़ा था और इस पूरे अरसे में खबर किये जाने के बावजूद उनके बीवी-बच्चे उनके पास नहीं आये थे। अलबत्ता, गांव से उनकी विधवा बहन और एक भतीजा आ कर ज़रूर रहे थे। पता चला था कि वही भतीजा आज भी नौकर की हैसियत से उनके पास रह कर उनकी सेवा कर रहा है।&lt;br /&gt;ऐसा बहुत कम होता था कि उनका आत्म सम्मान ज़ोर मारता और वे अपने बलबूते पर कुछ करना चाहते। कभी-कभार सफल भी हो जाते लेकिन अधिकतर मामलों में उन्हें मुंह की खानी पड़ती। वे पहले की तुलना में और कमज़ोर हो जाते। उनके विभाग में दूसरे केन्द्र से एक अधिकारी ट्रांसफर हो कर आया था। उसका ध्यान ऑफिस के काम में कम और अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के प्रदर्शन में ज्यादा लगता था। कुछ रटे-रटाये श्लोकों और धार्मिक ग्रंथों से उद्धरणों के बल पर वह अपनी दुकानदारी चलाये रहता। ऑफिस के नीचे जिस दुकान से वह पान खाता था, वहां पर भी उसने इन्हीं हथकंडों के बल पर मुफ्त पान का जुगाड़ कर रखा था। ऑफिस के काम से जहां भी जाता, पहले लोगों का भविष्य बताना शुरू कर देता, बाद में काम की बा‍त करता। वह डींग हांकता था कि वह हजारों मील दूर से भी शक्तियों का आह्वान कर सकता है और इन शक्तियों के बल पर किसी की भी मदद कर सकता है। इन तथाकथित शक्तियों के बल पर उसने ऑफिस में इतने चेले चांटे बना लिये थे कि उससे वरिष्ठ एक महिला अधिकारी ने अपना ट्रांसफर रुकवाने की गुहार करते हुए सबके सामने इन योगीराज के चरण स्पर्श कर लिये थे।  &lt;br /&gt;जब उसने देखा कि विभागाध्यक्ष हर तरह से अक्षम, लुंज-पुंज और डरे हुए हैं तो वह अपना रक्षा कवच ले कर उनकी मदद करने जा पहुंचा। बद्री प्रसाद जी की मदद करने के कई फायदे थे। काम से छुट्टी, किसी से डरने की ज़रूरत नहीं और अब ट्रांसफर का कोई डर नहीं। दूसरों पर रौब डालने में भी ये तरकीब काम आने वाली थी। बद्री प्रसाद जी उसके झांसे में आ गये थे और उसके कहे अनुसार ही अब सारे केस निपटाये जाते। कहा तो ये भी जाता है कि पैर का इलाज न कराने के पीछे भी इन्‍हीं योगीराज की सलाह काम कर रही थी। बद्री प्रसाद जी को इन्‍होंने एक अंगूठी पहनने की सलाह दी थी और बदले में एक कोरा चेक ले लिया था। वही उन्हें बताता कि किस बैठक में न जाना बेहतर रहेगा और किस केस पर किस तरह का निर्णय लेना या न लेना उनके हित में रहेगा। रहेगा। कई दिनों तक परोक्ष रूप में योगीराज ही ऑफिस चलाता रहा। जब कुछ बेहद संगीन गलत फैसले हो गये और रिपोर्ट ऊपर तक पहुंची तो योगीराज का दूसरे सेक्शन में ट्रांसफर कर दिया गया। बद्री प्रसाद जी अड़ गये कि वे योगीराज को रिलीव नहीं करेंगे। तनातनी इतनी बढ़ गयी कि खुद बद्री प्रसाद की जी नौकरी पर आ बनी। मैनेजमेंट उनसे वैसे ही खफा था लेकिन मामला कहीं दलित उत्पीड़न का न बन जाये, इसलिए चुप था लेकिन अब बद्री प्रसाद जी के कुछ फैसले संस्थान के हितों के खिलाफ जाने लगे तो आर या पार का फैसला लिया गया। तब कहीं जा कर योगीराज बाहर हुए।&lt;br /&gt;कोई अंत नहीं है बद्री प्रसाद जी के किस्सों का। यहां बद्री प्रसाद जी के घर पर बैठे हुए कितनी ही बातें बेसिलसिलेवार याद आ रही हैं। अब उमा जी और गौरव जिस तरह‍ से हमें झूठ की एक अलग ही दुनिया में ले जा रहे हैं, हमें नहीं लगता, हम चाह कर भी बद्री प्रसाद जी की बेहतरी के लिए कुछ करवा पायेंगे।&lt;br /&gt;मैं और नीरज वापिस लौट रहे हैं। पता है मुझे अब इस तरफ कभी आना नहीं होगा। बद्री प्रसाद जी से यही आखिरी मुलाकात है। देर-सबेर हमारे पास बद्री प्रसाद जी के न रहने की खबर ही आयेगी और हम ऑफिस में दो मिनट का मौन धारण कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि देंगे, उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें करेंगे, उनके लिए अफसोस जाहिर करेंगे और इस तरह से अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेंगे। और इस तरह बद्री प्रसाद जी हमारी स्मृतियों में से हमेशा के लिए चले जायेंगे। &lt;br /&gt;नीरज का भी यही मानना है कि वह बेशक यहां से तीन गली छोड़ कर रहता है, शायद ही वह दोबारा यहां आने की हिम्मत जुटा पायेगा।&lt;br /&gt;......&lt;br /&gt;15 सितम्बर 2011&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-8832339877549685168?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/8832339877549685168/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=8832339877549685168&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/8832339877549685168'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/8832339877549685168'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2011/11/blog-post.html' title='कहानी डरा हुआ आदमी'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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है। जब से वे अस्पाताल में थे, हम रोज़ सुबह दुआएं करते थे कि आज का दिन भी उनके लिए ठीक-ठाक बल्कि पहले से बेहतर गुज़रे और वे जल्द चंगे हो कर वापिस अपने घर लौट आयें। अपना भरपूर जीवन जीयें। हम कि‍तना चाहते रहे कि वे ज्ञानपीठ सम्मान पूरी सज-धज के साथ लेते, हम सब उन अविस्मरणीय पलों के साक्षी बनते जब वे ज्ञानपीठ सम्मान लेने के बाद मंद-मंद मुस्कुराते हुए अपना चुटीला भाषण पढ़ते और हम सब ठहाके लगाते हुए अपने प्रिय रचनाकार के शब्द-शब्द को सम्मानित होते देखते। लेकिन ऐसा नहीं होना था। &lt;br /&gt;राग दरबारी मेरी प्रिय पुस्तकों में से एक थी। जब भी किसी नये पाठक को कोई किताब उपहार में देने की बात आती, वह किताब राग दरबारी ही होती और किताब पाने वाला हमेशा-हमेशा के लिए इस बात का अहसान मानता कि कितनी अच्छी  किताब से वह हिंदी साहित्य पढ़ने की शुरुआत कर रहा है। राग दरबारी कहीं से भी पढ़ना शुरू करो, हर बार नये अर्थ खोलती थी। पचासों बार उसके शब्द-शब्द का आनंद लिया होगा।&lt;br /&gt; श्रीलाल शुक्ल जी से मेरी रू ब रू दो ही मुलाकातें थीं! दोनों ही मुलाकातें उनके घर पर। दोनों ही यादगार मुलाकातें। पहली बार कई बरस पहले अखिलेश जी भरी बरसात में रात के वक्त उनके घर पर ले गये थे। मैंने आदरवश उनके पैर छूए थे तो वे नाराज़ होते हुए से बोले थे कि ये क्या करते हो, हम जिस किस्म की विचारधारा का लेखन करते हैं, उसमें ये पैर-वैर छूना नहीं चलता लेकिन मैं उन्हें कैसे बताता कि उनके जैसे कथा मनीषी के पैर छू कर ही आदर दिखाया जा सकता है और उनसे आशीर्वाद पाया जा सकता है।&lt;br /&gt;दूसरी बार कोई चार बरस पहले लखनऊ जाने पर उनके घर गया था। मेरे साथ मेरे बैंक के वरिष्ठ अधिकारी श्याम सुंदर जी थे। श्याम सुंदर जी तमिल भाषी हैं लेकिन कई भाषाएं जानते हैं, हिंदी में कविता करते हैं और सबसे बड़ी बात राग दरबारी उनकी भी प्रिय पुस्तक थी। उस वक्त संयोग से शुक्लि जी घर पर अकेले थे। मैं हैरान हुआ मैं उनकी स्मृति में अभी भी बना हुआ था। उन्होंने मुझे कथा दशक नाम के कहानी संग्रह की भी याद दिलायी। मैंने इस संग्रह का कथा यूके के लिए संपादन किया था। इसमें कथा यूके के इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित दस रचनाकारों की कहानियां हैं। शायद श्रीलाल शुक्ल जी ने साक्षात्कार पत्रिका में अपने किसी इंटरव्यू में इस किताब की तारीफ भी की थी। इस मुलाकात में उन्होंने कहा था कि मैं उन्हें ये किताब दोबारा भेज दूं। मैं ये जान कर भी हैरान हुआ था कि उन्होंने मेरी कहानियां भी पढ़ रखी थीं।&lt;br /&gt;तभी वे चुटकी लेते हुए बोले थे – आप लोग आये हैं और घर पर कोई भी नहीं है। देर से आयेंगे। कैसे खातिरदारी करूं। चाय बनाने में कई झंझट हैं। गैस जलाओ, चाय का भगोना खोजो, फिर पत्ती, चीनी, दूध सब जुटाओ, छानो, कपों में डालो, फिर कुछ साथ में खाने के लिए चाहिये, ये सब नहीं हो पायेगा। ऐसा करो, व्हिस्की ले लो थोड़ी थोड़ी। मैं तो लूंगा नहीं, डॉक्टर ने मना कर रखा है, तुम्हारे लिए ले आता हूं। एक दम आसान है पैग बनाना। गिलास लो, जितनी लेनी है डालो, सोडा, पानी, बर्फ कुछ भी चलता है और पैग तैयार। &lt;br /&gt;उस दिन हमने बेशक उनके बनाये पैग नहीं लिये थे लेकिन इतने बड़े रचनाकार के सहज, सौम्य और पारदर्शी व्यक्तित्व से अभिभूत हो कर लौटे थे।&lt;br /&gt;मेरी विनम्र श्रृद्धांजलि &lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-4260847334612201875?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/4260847334612201875/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=4260847334612201875&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/4260847334612201875'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/4260847334612201875'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='श्रीलाल शुक्ल  जी का 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type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=7214126451088993195&amp;isPopup=true' title='0 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7214126451088993195'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7214126451088993195'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title='मेरा साक्षात्‍कार'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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कि मैं होटल में रुका हूं तो वह बिना पूछे ही पांचवीं मंजिल का बटन दबा देता। उसे लिफ्ट के भीतर देखते ही मैं हर बार चौंक जाता और सोचने लगता – कितनी मुश्किल नौकरी है बेचारे की। होटल में कुल तीस कमरे हैं और दो लिफ्ट। ये तय है कि होटल में आने-जाने का समय आम तौर पर सुबह नौ-दस बजे और होटल के चैक-इन और चैक-आउट के समय ही ज्यादा होता होगा। ऐसे में जब लिफ्ट नहीं चल रही होती तो वह बेचारा किसी न किसी के द्वारा बटन दबाये जाने का इंतजार करता रहता होगा। खड़े-खड़े, क्योंकि लिफ्ट में स्‍टूल नहीं है। ये इंतज़ार कई-कई बार घंटों का भी रहता होगा। अगर वह लिफ्ट के बाहर भी खड़ा हो कर इंतज़ार करे तो एक तरफ होटल की लॉबी और दूसरी तरफ रिसेप्शन। वहां भी भला उससे बात करने वाला कौन होगा! वैसे भी लिफ्टमैन बेचारा सिर्फ फ्लोर नम्बर पूछने के अलावा बोलता ही कहां है। सुनने के नाम पर उसके हिस्से में लिफ्ट में कुछ पलों के लिए आये मुसाफिरों के आधे अधूरे वाक्य ही तो आते हैं जो हर मुसाफिर के जाने के बाद हमेशा के लिए आधे ही रह जाते हैं। लिफ्टमैन की पूरी जिंदगी ये आधे अधूरे वाक्य सुनते ही गुज़र जाती है। दुनिया भर के‍ लिफ्टमैन आधा-अधूरा सुनने और सिर्फ फ्लोर नम्बर पूछने के लिए अभिशप्त हैं। &lt;br /&gt;पूछा था मैंने उस लिफ्टमैन से कि कितने घंटे की नौकरी है और कि क्या अजीब नहीं लगता बंद लिफ्ट में इस तरह से लगातार खड़े रहना और इंतज़ार करना कि कोई बटन दबाये तो लिफ्ट ऊपर या नीचे हो। वह झेंपी हुई हँसी हँसा था - साब, नौकरी यही है तो किससे शिकायत। दस घंटे की ड्यूटी होती है और बीच-बीच में रिलीवर आ जाता है। तब मैंने हिसाब लगाया था - यही लिफ्टमैन अकेला तो नहीं है जो लिफ्ट, यानी ढाई फुट X साढ़े तीन फुट की सुनसान जगह के भीतर खड़ा है। हमेशा बाहर से बटन दबाये जाने के इंतज़ार में। पुणे में ऐसे पचीसों इमारतें होंगी, महाराष्ट्र में सैकड़ों, पूरे देश में हजारों और पूरी दुनिया में लाखों जहां ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर एक न एक लिफ्टमैन खड़ा किसी न किसी के द्वारा बाहर से बटन दबाये जाने का इंतज़ार कर रहा होगा और ये इंतज़ार वह ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर तब तक करता रहेगा जब तक वह इस काम से रिटायर न हो जाये या उसे कोई बेहतर काम न मिल जाये। तब उसकी जगह कोई और वर्दीधारी, टाई लगाये दूसरा लिफ्टमैन आ जायेगा। अपनी उम्र के चालीस बरस वहां गुजारने के लिए। ढाई फुट X साढ़े तीन फुट की सुनसान जगह में।  बाहर से बटन दबाये जाने के इंतज़ार में।&lt;br /&gt;इससे पहले कि लिफ्टमैन मुझे सलाम करे, मैं दुनिया भर के ऐसे सारे लिफ्टमैनों को सलाम करता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-3739659792952214477?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/3739659792952214477/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=3739659792952214477&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/3739659792952214477'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/3739659792952214477'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2011/05/x.html' title='ढाई फुट X साढ़े तीन फुट के भीतर चालीस बरस'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-2392233755978279054</id><published>2011-01-31T22:01:00.000-08:00</published><updated>2011-01-31T22:25:13.918-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='घुमक्‍कड़ी'/><title type='text'>अस्सी के कासी और काशी का अस्सी मुंबई में और साथ में पप्पू की चाय की दुकान भी।</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TUenNWyeBEI/AAAAAAAAAus/mUp16MxUbPU/s1600/IMG0205A.jpg"&gt;&lt;img style="cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TUenNWyeBEI/AAAAAAAAAus/mUp16MxUbPU/s200/IMG0205A.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5568603312164308034" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TUembNrzuII/AAAAAAAAAuk/xBEJ60mZDis/s1600/IMG0199A.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TUembNrzuII/AAAAAAAAAuk/xBEJ60mZDis/s200/IMG0199A.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5568602450726992002" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TUelnQ8o-rI/AAAAAAAAAuc/lhrbzaeb6n4/s1600/IMG0201A.jpg"&gt;&lt;img style="float:right; margin:0 0 10px 10px;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 150px;" src="http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TUelnQ8o-rI/AAAAAAAAAuc/lhrbzaeb6n4/s200/IMG0201A.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5568601558249700018" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दृश्य एक – बनारस - अस्सी - पप्पू की चाय की दुकान। वक्त  सवेरे साढ़े दस बजे के आसपास।&lt;br /&gt;दिन - रविवार, 30 जनवरी 2011। दुकान के भीतर सामने वाली बेंच पर कथाकार, प्रोफेसर, डॉक्टर, अड्डेबाज और सबके चहेते लेखक काशीनाथ सिंह और अस्सी के आदिवासी पत्रकार सुमंत मिश्र चाय लड़ा रहे हैं। दूसरी मेज पर न जाने कौन-कौन न जाने क्या-क्या बतिया रहे हैं, सुनाई नहीं पड़ रहा। दिखायी बेशक दे रहा है कि चोंच से चोंच लड़ाये तीन जन कुछ खिचड़ी-सी पका रहे हैं। अभी-अभी दुकान के ठीक सामने एक जीप आ कर रुकी है जिसकी छत पर एक मुर्दा बड़े करीने से बंधा है। पूरी शानौ-शौकत के साथ। ये तो तय है, मुर्दा जो है, अपने आप जीप की छत पर चढ़ कर पूरी शानौ-शौकत के साथ नहीं बंधा होगा। उसे बांधा गया होगा। जीप का ड्राइवर जो है, हरे चश्मे में शोहदा-सा लगने वाला जवान, जीप बीच बाजार में खड़ी करके न जाने कहां लुप्त हो गया है। बाकी बाजार में रविवार के दिन वाली गहमा-गहमी अपनी जगह पर कायम है। &lt;br /&gt;तभी सुमंत अपना मोबाइल निकालते हैं और अपने यार राकेश का नम्बर मिलाते हैं। राकेश को बताते हैं कि पप्पू की दुकान में बैठे हैं। आ जाओ, एक चाय तुम्हारे साथ भी लड़ जाये। राकेश बताते हैं कि बस, अभी आते हैं। थोड़ी देर में सुमंत का मोबाइल बजता है। देखते हैं – लाइन पर राकेश हैं। परेशान हैं राकेश – यार कहां हो तुम। मैं पप्पू की दुकान के बाहर खड़ा हूं। भीतर तीन बार झांक कर देख लिया। कहां जमे हो। हँसते हैं सुमंत – यार ज़रा अच्छी तरह से देखो, हम डॉक्टर काशीनाथ सिंह के साथ सामने ही तो बैठे हैं – पप्पू के पीछे। राकेश फिर परेशान – यार पहेलियां क्यों  बुझा रहे हो। अभी कल ही तो तुमसे बात हुई थी। मुंबई में थे तुम। आज भों.... के.. पप्पू की दुकान का हवाला दे रहे हो और नज़र नहीं आ रहे। &lt;br /&gt;बात ही कुछ ऐसी है। ये तो भई सच है कि सुमंत और डॉक साब सचमुच पप्पू की दुकान में बैठे हैं और ये भी सच है कि राकेश भी पप्पू की दुकान के बाहर खड़ा परेशान हो रहा है। लेकिन दोनों ही एक दूजे को नहीं देख पा रहे! राकेश की तरह आपको भी हम और परेशान नहीं करते और भेद खोल ही देते हैं।&lt;br /&gt;चमत्कार ये हुआ है कि एक तरफ तो काशी की अस्सी वाले अपने कसिया बाबू मुंबई पधारे हुए हैं और दूसरा ‍चमत्कार ये हुआ है कि काशी का पूरा का पूरा अस्सी, पप्पू की दुकान सहित मुंबई में शिफ्ट हो गया है। पता मुकाम नोट करें – केयर ऑफ क्रॉसवर्ल्ड  प्रोडक्शंस, फिल्म सिटी, गोरेगांव पूर्व, मुंबई। आज तक ये कभी न हुआ था कि किसी शहर का पूरा का पूरा मौहल्ला, अपने पूरे तामझाम के साथ, अपने पूरेपन और पुरानेपन के साथ और पूरी पहचान और विश्वसनीयता के साथ नये पते पर शिफ्ट हो जाये। लेकिन ये हुआ है और सचमुच हुआ है। और जहां तक पप्पू  की चाय की दुकान का सवाल है, काशीनाथ जी और सुमंत जी जिस बेंच पर बैठे हैं वह उन्हीं के पृष्ठ भागों की गरमी बीसियों बरस से महसूस करती और झेलती रही है, सांस लेती रही है और जिस मेज पर बैठे वे लम्बे, मैले और पुराने से कांच के गिलासों में चाय पी रहे हैं, वे सचमुच पप्पू की दुकान का साजो-सामान है। इन मेज पर न केवल इन दोनों के, बल्कि पप्पू की दुकान में पहले दिन से ले कर आज तक आने वाले दुकान में आने वाले हर शख्स की उंगलियों के निशान देखे जा सकते हैं। पप्पू के सामने जो केतली रखी है, जो चाय का, दूध भगौना रखा है, चाय छानने वाली छलनी रखी है, उसके पीछे लकड़ी के पुराने शोकेस पर भांग की जो गोलियां रखी हैं, वे सब की सब पप्पू की ही हैं। पूरे पप्पूपने के साथ। &lt;br /&gt;आप आपको यहां टहलते हुए एक पल के लिए भी नहीं लगेगा कि आप अस्सी् में नहीं हैं या पप्पू की दुकान में नहीं हैं। न केवल पप्पू  की दुकान, अगल-बगल की सारी दुकानें, पतली गलियां, गलियों में बसे बहुत पुराने घर, सांड़, ठेले, रिक्शे, रिक्शे वाले, पुराने छज्जे, पान की दुकानें, हकीम की दुकानें सब कुछ जैसे अस्सी से उठा लाया गया है और हम हैरान हो रहे हैं कि ये हुआ तो हुआ कैसे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कमाल किया है श्री विनय तिवारी की फिल्म कंपनी क्रासवर्ड प्रोडक्शकन के बैनर तले बन रही फिल्म् ने। फिल्म का नाम है - काशी का अस्सी। इसी फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में अस्सी मुंबई आ पहुंचा है। और सेट पर इतनी विश्वसनीयता लाने के लिए हनुमान की तरह पूरा का पूरा मौहल्ला ही उठा लाने का अद्भुत काम भला प्रसिद्ध साहित्य अनुरागी, मर्मज्ञ निर्देशक और कला पारखी डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी और उनकी शानदार टीम के सिवा और कौन कर सकता है। &lt;br /&gt;काशी का अस्सी पर डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी के निर्देशन पर बन रही फिल्म अपने आप में कई मायनों में मील का पत्थर साबित होगी। एक ऐसी रचना पर फिल्म बनाने की सोचना और पहल करना जिसके फार्मेट को ले कर ही दस बरस से बहस चली आ रही हो कि ये आखिर है किस चिडि़या का नाम। इसे उपन्यास के खाते में डालें, लम्बी कहानियां मानें, संस्‍मरण मानें, या रिपोर्ताज। तो ऐसी विकट रचना पर जब मुख्य धारा के कलाकारों को लेते हुए डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने फिल्म बनाने का बीड़ा उठाया, अपनी कला टीम को लेकर बनारस के अस्सी घाट पर डेरा डाले रहे, ग्राफ और तस्वीरें बनाते रहे, सड़कों और गलियों की चौड़ाई तक नापी और इस सब का नतीजा ये है कि आप अस्सी के किसी आदिवासी की आंखों पर पट्टी बांध कर उसे मुंबई की फिल्म सिटी में बने अस्सी  के बाजार के या पिछली गली के सेट पर छोड़ दें और उसकी आंखों पर से पट्टी हटायें तो वह पक्के तौर पर अपने आपको अस्सी में ही मानेगा और वही करेगा जो वह अस्सी् पर करता है। &lt;br /&gt;ये तो बात हुई अस्सी की। अपने डॉक साहब को जब इस फिल्म् की शूटिंग के सिलसिले में पिछले दिनों मुंबई बुलाया गया और वे वहां खुद जा कर पप्पू की दुकान की चाय पी कर आये तो सचमुच अभिभूत थे। ऐसा डेडिकेशन, ऐसी तन्मयता, ऐसा टीम वर्क कि हर अभिनेता, हर टैक्नीशियन साला भों .. के..से कम बात ही नहीं कर रहा जो कि बनारस का तकिया कलाम है। बताते हैं वे कि किसी अभिनेता से अनजाने में भों.. वाले कह दिया तो उसे तुरंत सुधार दिया गया कि ये भों.. वाले नहीं भों .. के..है। सही बोलिये। &lt;br /&gt;काशीनाथ जी परसों प्रेस से बात कर रहे थे। पूछा गया कि जो काम हो रहा है, उस पर क्या कहते हैं तो वे बोले कि मुझे डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी पर पूरा भरोसा है और वे सत्यजित राय के बाद पहले निर्देशक हैं जो रचना के साथ इतनी ईमानदारी से ट्रीट कर रहे हैं। एक सवाल के जवाब में उन्होंने ये भी कहा कि वे पूरी फिल्म से लेखक के अलावा किसी भी स्तर पर नहीं जुड़े हैं और फिल्मे प्रोडक्श्न के किसी भी काम में टांग नहीं अडा़येंगे। &lt;br /&gt;  दूसरी तरफ डॉक्टर चंद्र प्रकाश द्विवेदी ऐसी कृति पर काम करते हुए अभिभूत हैं। बताया उन्होंने- बीस बार पटकथा पर काम किया है। कुछ शूटिंग यहां और लगभग बीस दिन की शूटिंग बनारस में होगी। बेहद उत्साहित हैं वे भी और शास्त्री जी की भूमिका अदा कर रहे सन्नी देवल भी। कन्नी की भूमिका में रवि किशन हैं। सब जैसे बनारस के जीवन को जी रहे हैं। हाव भाव में, कॉस्ट्यूम में, संवाद के लहजे में और जीवन में। जो अभिनेता पप्पू बना है, बता रहा था कि वह कई दिन तक पप्पू का चाय बनाना देखता रहा। वह शर्त लगाने को तैयार है कि वह जब पप्पू की जगह बैठ कर चाय बनाता है तो ठीक उसी के स्वाद वाली चाय बनाता है। &lt;br /&gt;तो भइया जी, आप सब का भी पप्पू का चाय की दुकान पर स्वागत है। बाद में पान भी बगल वाली दुकान से। पप्पू  की दुकान के सारे आदिवासी पात्र आपको दुकान के भीतर बैठे या बाहर खड़े मिल ही जायेंगे।&lt;br /&gt;पुनश्च: जो मित्र अस्सी के बारे में नहीं जानते या वहां कभी पप्पू की दुकान में नहीं गये हैं तो उनके लिए डॉक्टर काशी नाथ सिंह की किताब काशी का अस्सी के पहले पन्ने  का ये अंश: शहर बनारस के दक्खिनी छोर पर गंगा किनारे बसा ऐतिहासिक मुहल्ला अस्सी। अस्सी चौराहे पर भीड़-भाड़ वाली चाय की एक दुकान। इस दुकान में रात-दिन बहसों में उलझते, लड़ते-झगड़ते गाली गालौज करते कुछ स्वनामधन्य  अखाडि़ये बैठकबाज। न कभी उनकी बहसें खत्म‍ होती हैं, न सुबह-शाम। जिन्हें  आना हों आयें, जाना हो जायें। &lt;br /&gt;और यह भी – अस्सी  बनारस का मुहल्ला नहीं है। अस्सी अष्टाध्यायी है और बनारस उसका भाष्य। &lt;br /&gt;और पप्पू  की दुकान सेमिनार हॉल है। संसद है। अखाड़ा है। अड्डा है।  काम वालों और बेकार, सबके लिए विश्राम स्थली है। जो भी एक बार पप्पू की दुकान में गया, वहीं का हो कर रह गया और बाकी पूरी दुनिया के लिए बेकार हो गया। तो यह जो फिल्म  बन रही है, काशी का अस्सी़, इसका मुगल गार्डन भी यही पप्पू  की दुकान है और दरबार हाल भी सही है। &lt;br /&gt;www.surajprakash.com&lt;br /&gt;09930991424&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-2392233755978279054?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/2392233755978279054/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=2392233755978279054&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/2392233755978279054'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/2392233755978279054'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='अस्सी के कासी और काशी का अस्सी मुंबई में और साथ में पप्पू की चाय की दुकान भी।'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TUenNWyeBEI/AAAAAAAAAus/mUp16MxUbPU/s72-c/IMG0205A.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-8811312616505802831</id><published>2010-08-29T01:30:00.000-07:00</published><updated>2010-08-29T01:42:56.785-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रसंगवश'/><title type='text'>कहानी की चोरी और चोरी की कहानी</title><content type='html'>कथाकार तेजेन्‍द्र शर्मा ने कुछ दिन पहले एक ई-मेल भेज कर सब दोस्तों को बताया था कि कहानीकार राजीव तनेजा ने उन्हें बताया है कि किसी ने उनकी (राजीव तनेजा की) चार कहानियां चुरा ली हैं। तेजेन्द्र जी ने इस मुद्दे को सार्वजनिक करते हुए मित्रों से इस मामले से जुड़े नैतिकता, अनैतिकता, चोरी और सीनाजोरी, मूल लेखक के प्रति आभार मानने जैसे सवालों के जवाब चाहे हैं और एक तरह से इस मामले पर रोचक बहस छेड़ी है।&lt;br /&gt;कुल मिला कर किस्सा मज़ेदार है और इस पर बहस की जा सकती है।&lt;br /&gt;शायद तेईस चौबीस बरस पहले की बात रही होगी। तब कमलेश्वर जी गंगा नाम की एक पत्रिका के संपादक हुआ करते थे। उसी गंगा में एक दिन गरमागरम मुद्दा उछला। प्रसिद्ध कहानीकार, नाटककार और उपन्यासकार स्वदेश दीपक जी ने एक बांग्ला लेखक (इस समय लेखक का नाम याद नहीं आ रहा है।) पर आरोप लगाया था कि उस लेखक ने दीपक जी की कहानी बाल भगवान (बाद में इस कहानी पर नाटक भी आया था।) को चुराया है और उस पर बांग्ला में देवशिशु नाम से कहानी लिखी है।&lt;br /&gt;कमलेश्वर जी ने इसे एक सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाया और अपनी पत्रिका के जरिये एक तरह की मुहिम शुरू कर दी कि इस तरह की साहित्यिक चोरी के खिलाफ क्या किया जाना चाहिये। कमलेश्वर जी ने यहां तक किया था कि पाठकों को दीपक जी के पक्ष में मुफ्त पत्र तक भेजने की सुविधा दे डाली थी और इन पत्रों का भुगतान गंगा पत्रिका द्वारा किया जाता।&lt;br /&gt;बाद में पता चला था कि देवशिशु के लेखक की बहुत पहले इसी नाम से इसी कहानी पर आधारित बांग्ला फिल्म भी आ चुकी थी। वे फिल्में अलग नाम से बनाते थे और लेखन अलग नाम से करते थे। अब चोरी का मामला उलटा पड़ चुका था और नये मोड़ के हिसाब से बाल भगवान की कहानी देवशिशु से चुरायी गयी थी।&lt;br /&gt;मुझे ठीक से याद नहीं कि बाद में पूरे मामले का क्या हुआ लेकिन राजीव तनेजा के मामले से उस मामले की याद हो आना स्वाभाविक ही था।&lt;br /&gt;फिलहाल इसी मामले पर बात करें। न तो राजीव जी ने और न ही तेजेन्द्र ने ही बताया है‍ कि कहानी (एक नहीं चार कहानियां) किस स्तर पर चुरायी गयीं। हम यहां चार स्थितियों की कल्पना कर सकते हैं।&lt;br /&gt;स्थिति एक : राजीव जी किसी दारू पार्टी में अपने कहानीकार दोस्तों को अपनी नयी कहानियों के प्लॉट सुना रहे थे और ये प्लॉट ही पहली बार दूसरे लेखक या लेखकों की कहानियों के रूप में सामने आये। नशा उतरने पर या अपने प्लाटों पर दूसरे के बसे घरों को देख कर (खोसला का घोंसला) उन्होंने पाया कि वे लुट चुके हैं।&lt;br /&gt;स्थिति दो : राजीव जी अपनी कहानियां लिख चुके थे और किन्हीं मित्रों को पढ़ने या सुधारने के लिए दीं और ये कहानियां वापसी में राजीव के घर का पता भूल कर अलग अलग पत्रिकाओं के दफ्तर में जा पहुंची और बेवफा सनम की तरह दूसरे लेखकों का वरण करके उनके नाम से छप गयीं। &lt;br /&gt;स्थिति तीन : ये भी हो सकता है कि राजीव जी ने अपनी कहानियां टाइप करने के लिए किसी टाइपिस्ट को दी हों और पैसों के अभाव में अपनी कहानियां वहां से उठवा न पाये हों। अब टाइपिस्ट ने अपना मेहनताना वसूल करने के लिए सिर्फ टाइपिंग की कीमत पर ये कहानियां किसी दूसरे लेखक को टिका दी हों (दर्जी आम तौर पर यही करते हैं।) ये भी हो सकता है कि टाइपिस्ट खुद उभरता लेखक रहा हो और कहानियां अपने नाम से छपवा डाली हों।&lt;br /&gt;स्थिति चार : राजीव जी की छपी हुई कहानियां ही किसी पहलवान छाप लेखक ने अपने नाम से दूसरी पत्रिकाओं में छपवा ली हों। क्या कर लेगा राजीव।&lt;br /&gt;हो सकता है मेरे पाठकों को इसके अलावा कोई और स्थिति भी सूझ रही हो। मुझे जरूर बतायें।&lt;br /&gt;ऐसा मेरे साथ भी हो चुका है। एक ही कहानी की दो बार चोरी। अलग अलग भाषाओं में। &lt;br /&gt;बताता हूं आपको।&lt;br /&gt;1989 में हँस में मेरी कहानी ये जादू नहीं टूटना चा‍हिये छपी थी। कहानी काफी चर्चित रही और कई भाषाओं में अनूदित हुई। शायद 1998 की बात होगी। मेरे एक गुजराती मित्र, जो मेरी ये कहानी गुजराती में पहले ही पढ़ चुके थे, ने फोन करके बताया कि ये कहानी भारतीय विद्या भवन की गुजराती पत्रिका नवनीत में छपी है और मूल लेखक की जगह किसी मुसलमान लेखक का नाम है। हिंदी से अनुवाद में बेशक किसी गुजराती अनुवादक का नाम है। मेरे मित्र ने जब उस कहानी की फोटोकापी मुझे दी तो मैं हैरान रह गया। कहानी के अंजर पंजर ढीले कर दिये गये थे। कहानी की अंतिम पंक्ति जो पूरी कहानी की दिशा तय करती थी और मेरे लिए और पाठक के लिए भी बहुत मायने रखती थी, बदली जा चुकी थी। मैंने बहुत निराश हो कर नवनीत के संपादक को पत्र लिखा और अपने पत्र के साथ अपनी मूल कहानी, गुजराती में पहले से अनूदित पाठ और अब नवनीत में छपी कहानी की कापी भेजी और जानना चाहा कि किसी भी रचना का अनुवाद छापने के लिए उनके क्या नियम हैं।&lt;br /&gt;ये सरासर चोरी का मामला था।&lt;br /&gt;जब कई दिन तक कोई जवाब नहीं आया तो मैंने फोन पर ही बात की। उनके उत्तर गोल मोल थे और कहीं से भी मुझे संतुष्ट न कर सके। हार कर मैंने अनुवादक का पता और फोन नम्बर मांगा। अनुवादक ने जो कुछ बताया, उस पर सिर ही धुना जा सकता था। मैंने भी वही किया। अनुवादक ने बताया कि वह राह चलते फुटपाथ से रद्दी में हिंदी पत्रिकाएं खरीदता है और कोई कहानी अच्छी लगने पर उसका अनुवाद कर लेता है। ये कहानी उसने सरिता नाम की मैगजीन के‍ किसी पुराने अंक से ली थी। जब मैंने पूछा कि हिंदी में कहानी क्या इसी रूप में और इसी अंत के साथ छपी थी और क्या वे मुझे सरिता का वह अंक दे सकते हैं। अनुवादक के जवाब किसी भी लेखक को आत्म हत्या करने के लिए प्रेरित कर सकते थे। मैंने वह नहीं की। उसने बताया कि वह अनुवादक के रूप में अपनी जिम्मेवारी समझता है और जो खुद उसे अच्छा नहीं लगता या समझ में नहीं आता, उसे बदल डालता है और अपने हिसाब से तय करता है कि कहानी का अंत क्या होना चाहिये। मेरी कहानी के साथ भी उसने यही किया। &lt;br /&gt;जहां तक सरिता का वह अंक मुझे देने की बात थी, अनुवादक महोदय ने बताया कि वे अपना काम हो जाने के बाद पत्रिकाओं को वापिस रद्दी में बेच देते हैं।&lt;br /&gt;अब मेरे पास अपनी ही कहानी, जो किसी और के नाम से सरिता में छप चुकी थी, पढने का एक ही जरिया था कि पिछले 10 बरस के सरिता के सभी पुराने अंक खंगालूं और चोर लेखक को और सरिता के संपादक मंडल को प्रणाम करूं। ये सब करना संभव नहीं होता। मैंने भी नहीं किया। सरिता, चोर लेखक और चोर अनुवादक को बधाई दी जिन्होंने बेशक मेरी कहानी को खराब करके ही सही, और पाठक दिये।&lt;br /&gt;हमारे आफिस में कर्मचारियों के लिए हर बरस पत्रिकाएं छापी जाती हैं। इस बार एक वरिष्ठ कर्मचारी ने बच्चन जी की एक चर्चित कविता अपने नाम से छपने के लिए दी। मैंने उस नवोदित कवि से पूछा कि ये कविता बच्चन जी के नाम से छपेगी, कर्मचारी के नाम से छपेगी या दोनों के नाम से। जवाब में हुआ ये कि कर्मचारी ने चपरासी को भेज कर कविता वापिस मंगवा ली।&lt;br /&gt;राजीव जी, मन छोटा न करें। हम मायानगरी मुंबई में रहते हैं और रोज़ाना पचासों गीतों, आइडियाज़, धुनों, सिचुएशनों, पूरी की पूरी फिल्म की चोरी की घटनाएं सुनते पढ़ते हैं। चोरी तो होती ही है और जब चोरी एक बार से ज्यादा बार होती है, ये तय करना मुश्किल हो जाता है कि पहले चोरी किसने की। पहले अ ने अंग्रेजी धुन चुरायी और फिर ब ने अ द्वारा चुरायी धुन को अपनी बना कर अपना कहा या उसने भी मूल अंग्रेजी से चुरायी फिर अपना कहा, कहना मुश्किल होता है।&lt;br /&gt;राजीव जी, किसी ने आपका आइडिया चुराया तो क्या चुराया। विश्व भर के लेखक सदियों से चले आ रहे उन्हीं ग्यारह आइडियाज़ में से अपने काम का आइडिया ले कर पूरा जीवन लेखन करते हैं। अब आप ही बतायें कि मेरे घर में मौजूद बूढ़े पिता पर लिखी गयी मेरी कहानी गोविंद मिश्र द्वारा अपने पिता पर लिखी गयी कहानी से बहुत जुदा कैसे हो सकती है जबकि सच तो ये है दो अलग अलग घरों में दो अलग अलग बूढ़े एक ही वक्त को कमोबेश एक ही तरीके से जी रहे हैं। सिर्फ कहानी का ट्रीटमेंट ही एक कहानी को दूसरी कहानी से अलग करता है।&lt;br /&gt;छपी हुई कहानी चुरायी, पढ़ने के लिए या टाइपिंग के लिए दी कहानी अपने नाम से छपवा ली तो आपके पास तो प्रूफ होगा कहानी को अपना कहने के लिए। चढ़ बैठिये, चोर के सीने पर और कीजिये एक्सपोज उसे।&lt;br /&gt;बात खत्म करने से पहले अपनी ही एक और कहानी का उदाहरण देता हूं। मैंने अपनी पत्थर दिल कहानी 1992 में लिखी थी और मेरा आरोप है कि बी आर चोपड़ा जी ने इस कहानी के लिखे जाने से 25 बरस पहले ही इस पर अपनी मशहूर फिल्म गुमराह बना ली थी। बेशक उसमें फिल्मी लटके झटके डालने के लिए बहुत सारे चेंजेज किये थे। ये बात अलग है कि गुमराह मैंने पहली बार पिछले हफ्ते ही देखी और बी आर चोपड़ा ने मेरी कहानी शायद ही पढ़ी हो। बेशक उनकी फिल्म और मेरी कहानी की बेसिक थीम एक ही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज प्रकाश 09930991424&lt;br /&gt;www.surajprakash.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-8811312616505802831?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/8811312616505802831/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=8811312616505802831&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/8811312616505802831'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/8811312616505802831'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2010/08/blog-post.html' title='कहानी की चोरी और चोरी की कहानी'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-7523874023006468567</id><published>2010-06-06T21:30:00.000-07:00</published><updated>2010-06-06T21:33:39.459-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नवागत का स्‍वागत'/><title type='text'>मेरी नयी किताब - दाढ़ी में तिनका</title><content type='html'>&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TAx2ldF1kjI/AAAAAAAAAlc/N4bk-29ULaE/s1600/darhi+mein+tinakaaa.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 95px;" src="http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TAx2ldF1kjI/AAAAAAAAAlc/N4bk-29ULaE/s200/darhi+mein+tinakaaa.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5479885232439398962" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;प्रिय मित्र &lt;br /&gt;बहुत बरसों के बाद मेरी एक मूल किताब आ रही है – दाढ़ी में तिनका। इसमें आप बहुत कुछ पायेंगे- यार दोस्‍त, घुमक्‍कड़ी, शहरनामे, जीवन की खट्टी मीठी बातें, कुछ वरिष्‍ठ जनों से मुलाकात और मेरी नज़र में मैं खुद। &lt;br /&gt;मेधाबुक्‍स, एक्‍स 11,  नवीन शाहदरा, दिल्‍ली 110032, फोन नम्‍बर 9891022477 से इसी हफ्ते आने वाली इस किताब की कीमत है सिर्फ 300 रुपये। कुल पृष्‍ठ हैं लगभग 240। &lt;br /&gt;सूरज प्रकाश &lt;br /&gt;09930991424&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-7523874023006468567?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/7523874023006468567/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=7523874023006468567&amp;isPopup=true' title='1 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7523874023006468567'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7523874023006468567'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2010/06/blog-post.html' title='मेरी नयी किताब - दाढ़ी में तिनका'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/TAx2ldF1kjI/AAAAAAAAAlc/N4bk-29ULaE/s72-c/darhi+mein+tinakaaa.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-2810948432095897287</id><published>2010-01-25T22:32:00.000-08:00</published><updated>2010-01-25T22:36:22.694-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रसंगवश'/><title type='text'>60वां गणतंत्रता दिवस - दुष्‍यंत के दस सवाल</title><content type='html'>पिछले दिनों जयपुर के मेरे मित्र दुष्‍यंत ने अपने अखबार के आज के अंक के लिए मुझसे 10 सवाल पूछे। यही सवाल हम सब अपने आप से भी पूछ सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आजादी के समय मेरा परिवार क्या था और मेरा बचपन कैसे गुजरा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं 1952 में पैदा हुआ। होश संभालने पर पाया कि हमारा परिवार पूर्वी पाकिस्‍तान से उजड़ कर आया था। वे लोग बेशक वहां पर भी सम्‍पन्‍न तो नहीं थे लेकिन यहां आने के बाद वे एक तरह से सड़क पर थे और मेरी पिछली पीढ़ी को अपने पैर जमाने में बीसियों बरस लग गये। अब उजड़ी बिखरी पीढ़ी का वारिस होने का सबसे बड़ा खामियाजा जो मेरी पीढ़ी को विरासत में मिला वह था, आत्‍म विश्‍वास की कमी और हीनता बोध। सामान्‍य विश्‍वास हासिल करने में मेरी उम्र ही गुजर गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2. मैंने जो काम कर रहा हूं। क्यों चुना? मेरा पुश्तैनी था, मजबूरी थी और&lt;br /&gt;कोई संसाधन नहीं थे या मेरी दिली इच्छा थी इसलिए यह किया?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बताते थे कि मेरे दादा मिस्‍त्री थे। घर में पिता सबसे बड़े। आजादी के समय उनके 5 भाई बहन पढ़ ही रहे थे सो मेरे पिता की क्‍लर्की पर कई बरस तक पूरा परिवार लदा रहा। संयोग से हम भी 6 भाई बहन। पिता के हिस्‍से में आगे और पीछे की दोनों पीढि़यों का बोझ आया। हम सब भाइयों के हिस्‍से में भी औसत पढ़ाई और औसत जीवन ही आया। सिर्फ मैं जिद करके अपने जीवन को अपने तरीके जी पाया। अब दो एक भाई ठीक जीवन जी रहे हैं। मेरा जीवन, मेरी नौकरी, मेरा लेखन और मेरा परिवार सब मेरी खुद की कमाई है। जी तोड़ मेहनत से ये सब मैंने हासिल किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3. मुझे क्यों लगता है या नहीं लगता है कि इस देश समानता के अधिकार के&lt;br /&gt;तहत मुझे आगे बढऩे के समान मौके मिले या नहीं मिले?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेशक मेरे आगे बढ़ने में कोई रुकावट नहीं आयी लेकिन सबके नसीब इतने अच्‍छे नहीं होते कि अपनी पसंद की जीवन भी मिले, नौकरी भी मिले और तसल्‍ली भी मिले। लेकिन मेरा बचपन भी विहीन बचपन ही तो था जब हम सारी चीजों को हसरत भरी निगाह से देखा करते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4. किस दिन मुझे महसूस हुआ कि मैं इस देश का जिम्मेदार नागरिक हूं? एक&lt;br /&gt;आजाद देश में हूं और मुझे गर्व है कि मैं भारतीय हूं?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मेरे पास कोई चाइस तो नहीं है कि अपने देश में रहते हुए किसी और देश का जिम्‍मेदार नागरिक कहलाऊं लेकिन पिछले बरसों से हमारे देश में भंयकर अवमूल्‍यन हुआ है, हर क्षेत्र में। आज के वक्‍त की सबसे बड़ी तकलीफ यही है कि भाग दौड़, आपा धापी, तकनीकी उन्‍नयन के नाम पर अंधी दौड़ और तथाकथित टार्गेट के नाम पर जो कुछ भी हो रहा है दुनिया भर में और खास तौर पर भारत में, उसमें आम आदमी कहीं नहीं है। उसे कोई नहीं पूछ रहा जबकि सारे के सारे नाटक उसी के नाम पर, उसी के हित के नाम पर और उसी की जेब काट कर हो रहे हैं। सारे महानगर ऐसे लाखों लोगों से भरे पड़े हैं जिनके लिए दो जून की रोटी जुटाना, एक गिलास पानी जुटाना और एक कप चाय जुटाना तक मुहाल हो रहा है़। आम आदमी से सब कुछ छीन लिया गया है। पीने का पानी तक। कई बार चौराहों पर बेचारगी से घूमते गांव वासियों को देखता हूं तो सोच में पड़ जाता हूं कि बेचारा गांव की तकलीफों, बेरोजगारी, भुखमरी और जहालत से भाग कर यहां आया है तो उसे एक गिलास पानी पीने के लिए और एक कप चाय पीने के लिए कितने लोगों के आगे हाथ फैलाना पड़ेगा! उस भले आदमी से उसका चेहरा ही छीन लिया गया है। ये सब हुआ है जीवन के हर क्षेत्र में आये अवमूल्‍यन के कारण। जब तक इस देश में हत्‍यारे मुख्‍यमंत्री बनते रहेंगे और रिश्‍वतखोर केंद्रीय मंत्री, हम कैसे उम्‍मीद करें एक ही साल में कोई क्रांतिकारी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक अथवा राजनीतिक स्तर पर  कोई तब्दीलियाँ होंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5. कब बुरा लगा कि मैं इस देश में पैदा क्यों हुआ? कोई घटना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसी कोई स्‍मृति नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6. मुझे क्या बात अक्सर ऐसी लगती है कि मैं अपने बच्चों के लिए सुरक्षित&lt;br /&gt;भविष्य छोडऩे में कामयाब रहूंगा या नहीं रहूंगा? पैसा, सुरक्षा,&lt;br /&gt;ईमानदारी, हैल्थ से जुड़े विचार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो कुछ मैं अपनी भावी पीढ़ी को दे कर जाऊंगा, वे सब उनका हक है और मेरी कोशिश भी है कि उन्‍हें हमसे बेहतर जीवन मिले। लेकिन चीजें बहुत तेजी से बदल रही हैं।  कल की कौन जाने!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7. साठ साल में मैंने यह मान लिया है कि इस देश में ईमानदारी के सहारे&lt;br /&gt;रहने पर तकलीफ होती है या खुशी मिलती है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीए में अर्थशास्‍त्र पढ़ाते हुए एक सिद्धांत हमें पढ़ाया गया था कि बुरी मुद्रा अच्‍छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। मतलब ये कि अगर आपकी जेब में दस रुपये का पुराना नोट हो और कहीं से आपके हाथ में दस रुपये का नया नोट आये तो आप जेब में रखे पुराने नोट की जगह नया नोट रख लेंगे और जेब वाला पुराना नोट सर्कुलेशलन में डाल देंगे। हर आदमी यही करता है और सारे नये नोट जेबों में चले जाते हैं और बेचारे पुराने नोट जस तक तस सर्कुलेशलन में बने रहते हैं बल्कि इनमें लोगों की जेब से निकले पुराने नोट भी शामिल हो जाते हैं। आज जीवन के हर क्षेत्र में यही हो रहा है। सब कुछ जो अच्‍छा है, स्‍तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है। कभी स्‍वेच्‍छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते। आज हमारे आस पास जो कुछ भी चलन में है, वह औसत है, बुरा है और कचरा है। हम उसे ढो रहे हैं क्‍योंकि बेहतर के विकल्‍प हमने खुद ही चलन से बाहर कर दिये हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8. मेरे लिए देश में तीन खूबियां क्या है? जो दुनिया में कहीं नहीं पाई जाती?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब क्‍या तो गिनती गिनें। खूबियों की भी कमी नहीं और खासियतों की भी कमी नहीं। बात ये है कि हमारी पीढ़ी को जो कुछ मिला, पिछली पीढ़ी के पास नहीं था इसलिए झगड़े थे। आज की पीढ़ी के पास सबकुछ है लेकिन धैर्य या संतोष नहीं है1 बात मूल्‍य बदलने की भी है। हमारी पीढ़ी तक शादी के बाहर या इतर या शादी से पहले सैक्‍स बहुत खराब बात मानी जाती थी। आज सैक्‍स जीवन की एक शैली है, बस, सुरक्षित तरीके से कीजिये। ये खूबियां दुनिया से हमारे पास आ गयीं, अब क्‍या देस और क्‍या परदेस।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9. मेरे देश में तीन खामियां क्या हैं, जो दाग हैं इसके नाम पर।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनैतिक कंगलापन, आम आदमी यानी जनसंख्‍या के एक बड़े हिस्‍से की कोई परवाह नहीं और भ्रष्‍टाचार।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10. दस साल बाद के भारत की मेरी कल्पना क्या है?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप आने वाले कल की बात नहीं कर सकते। दस साल बाद की क्‍या कहें। बेशक हम चांद पर हो सकते हैं लेकिन व्‍यक्ति का सुकून, अपनापन आत्‍मीयता और परिवार सब बलि चढ़ जायेंगे। आदमी और अकेला और मशीनी होता जायेगा। &lt;br /&gt;mail@surajprakash.com&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-2810948432095897287?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/2810948432095897287/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=2810948432095897287&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/2810948432095897287'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/2810948432095897287'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2010/01/60.html' title='60वां गणतंत्रता दिवस - दुष्‍यंत के दस सवाल'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-7230440823209197924</id><published>2009-10-21T03:51:00.000-07:00</published><updated>2009-10-21T03:57:07.162-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रसंगवश'/><title type='text'>नमक के बहाने</title><content type='html'>पुणे में वह मेरा आखिरी दिन था। लगभग पचास महीने वहां बिताने के बाद मैं मुंबई वा‍पिस जा रहा था। जो दो एक दावतनामे थे, वे निपट चुके थे। मैं वहां अपने आखिरी दिनों में होटलों में ही खाना खा रहा था। बेशक सामान बाद में ले जाता, मैं अगली सुबह वापिस जा रहा था। धीरे धीरे ही सही सारी किताबों की पैकिंग मैंने खुद की थी और बाकी सामान मेरा नौकर मोहिते पैक करता रहा था। रसोई समेटने का काम वही कर रहा था। डिब्‍बे वगैरह खाली करके मसाले, दालें और दूसरी चीजें उसे ले जाने के लिए मैंने कह दिया था। उसे ये जरूर कह दिया था कि थोड़ा सा नमक, काली मिर्च और मक्‍खन का एक पैकेट वह आखिरी दिन तक खुले रखे रहे। रसोई का बाकी सामान या तो पैक कर दे या अपने घर ले जाये।&lt;br /&gt;तो जिस दिन का किस्‍सा है ये, अचानक झमाझम बरसात शुरू हो गयी। तीन चार घंटे लगातार पानी बरसता ही रहा। कार शाम को ही मुंबई भिजवा चुका था। अब कैसे भी करके होटल खाना खाने नहीं जाया जा सकता था। पैर के दूसरे ऑपरेशन के बाद बैकम शू पहन कर चलता था। बहुत ज्‍यादा चलना मना था और इस बरसात में इतना महंगा जूता बरबाद तो नहीं ही किया जा सकता था। साढ़े नौ बजने को आये थे। बरसात जैसे रात भर होने का परमिट ले कर आयी थी। मैं बार बार बाल्‍कनी में आता और बरसात का जायजा लेता। ऑटो वैसे भी दिन में नहीं मिलता, रात के वक्‍त मिलने के बारे में सोचा ही नहीं जा सकता था। &lt;br /&gt;जब ये तय हो गया कि बरसात तो नहीं ही रुकने वाली, मैंने घर पर ही कुछ बनाना तय किया। अब मुझे ये नहीं पता था कि मोहिते ने किस कार्टन में क्‍या पैक किया है या खाने का सामान कुछ छोड़ा भी है या नहीं। संयोग से तीन चार कार्टन खंगालने के बाद प्रेशर कुकर, चावल और मूंग मिल गये। सोचा मैंने, पहले दाल चावल ही भिगो लिये जायें फिर मसाले तलाश किये जायें।&lt;br /&gt;मैंने आधे घंटे की मेहनत के बाद लगभग सारे कार्टन खोल डाले लेकिन नमक कहीं नहीं था। फ्रिज में रखा थोड़ा सा मक्‍खन जरूर मिल गया। नमक सहित सारे मसाले ले जाये जा चुके थे। अब क्‍या हो। भूख अपनी जगह कायम थी और बरसात अपनी जगह। नमक लाने के लिए बाजार तक जाने के बारे में सोच भी नहीं सकता था। मैं जिस इमारत में रहता था उसके आठ फ्लैट्स में मेरे अलावा चार और आफिसर्स रहते थे। बाकी फ्लैट्स खाली थे। एक ही संस्‍थान में होने और एक ही इमारत में रहने के बावजूद उनसे संबंध ऐसे नहीं थे कि पहली बार उनके घर जा कर नमक मांग सकूं। सामने वाली बिल्डिंग में गेस्‍ट हाउस था और उसके पीछे वाली इमारत तक कभी गया ही नहीं था। बेशक वहां भी हमारे ही संस्‍थान के ही लोग रहते थे।&lt;br /&gt;अब फीकी खिचड़ी तो नहीं ही खायी जा सकती थी। चम्‍मच भर नमक का सवाल था जो मैं हल नहीं कर पा रहा था। काफी देर तक अंदर बाहर होता रहा कि क्‍या करूं। अपने आप पर, अपने वक्‍त पर और अपनी जीवन शैली पर अफसोस होता रहा कि चम्‍मच भर नमक लायक संबंध भी नहीं रहे हैं हमारे। बार बार संकोच आड़े आता रहा और मैं नमक नमक जपता रहा।  &lt;br /&gt;इसी अंदर बाहर की चहलकदमी में अपने बचपन के कितने ही ऐसे प्रसंग याद आते रहे जब मां ने हमारी पसंद का कुछ नहीं बनाया होता था तो पूरे मोहल्‍ले की रसोई हमारे लिए अपनी होती थी और हम किसी भी पड़ोसी के घर में जा कर खाना खा सकते थे। पूरे मोहल्‍ले की रसोई हमारे लिए सांझी होती थी। मजाल है किसी घर में कोई खास पकवान बना हो और वह दस घरों में सबके हिस्‍से में न आये। बिना नमक वाली इस झमाझम बरसात में ये भी शिद्दत से याद आया कि छोटा सा एक तंदूर पूरे मोहल्‍ले में सिर्फ हमारे घर में था और जिस दिन हमारी मां दोपहर के वक्‍त तंदूर तपाने का फैसला करती, आस पास के दस घरों में पहले खबर कर दी जाती और मोहल्‍ले की सारी चाचियां मासियां तंदूर को गरम बनाये रखने के वास्‍ते अपने हिस्‍से की दो चार लकडि़यां और गूंथे आटे की परात ले कर आ जातीं। हम बच्‍चों की मौज हो जाती। उसी छोटे से तंदूर में से बारी बारी से सोंधी सोंधी गंध लिये कभी मिस्‍सी रोटी निकल रही है, तो कभी प्‍याज के परौंठे निकल रहे हैं। मक्‍की की रोटी निकल रही है और रात की बची दाल डाल कर बनाये गये परौंठे भी। अगर किसी बच्‍चे को अपनी मां के हाथ की सादी रोटी पसंद नहीं है तो किसी भी चाची की परात में से अपनी मन पसंद रोटी ले लो। खुशी खुशी मिलेगी। खाना बनाना निपट जाने के बाद तंदूर की बाकी बची आंच का इस्‍तेमाल मिट्टी की हांडी में उड़द और चने की दाल बनाने के लिए किया जाता था और ज़रूरी नहीं कि ये दाल हमारी ही बन रही हो। जिसका मन आये, दाल की हाड़ी चढ़ा सकती थी। आखिर ये दाल भी तो चार घरों में पहुंचती ही थी। &lt;br /&gt;सब दिन हवा हुए। मैं अपने बचपन के यानी चालीस पैंतालीस साल पहले के दिल याद कर रहा था और सोच रहा था कि या तो भूखा सोउँ या फीकी खिचड़ी खाऊं। नमक मांग कर लाने की हिम्‍मत नहीं ही हुई। &lt;br /&gt;तभी एक चमत्‍कार हुआ। रात दस बजे की पाली वाला सिक्‍युरिटी गार्ड आ चुका था और जाने वाले गार्ड से चार्ज ले रहा था। उसने मेरी बाल्‍कनी की तरफ देखा और आदतन मुझे सलाम किया। सलाम के जवाब में मैंने उसे ऊपर आने का इशारा किया। जब वह ऊपर आया तो मैंने उसे अपनी समस्‍या बतायी। हैरानी की बात, गार्ड को मालूम था कि मोहिते नमक सहित सारे मसाले और दूसरा सामान कल ही अपने घर ले गया है। गार्ड ने खुशी खुशी मेरे लिए बाजार से नमक लाना मंजूर किया और मैंने पुणे में बितायी अपनी आखिरी रात नमक वाली खिचड़ी खायी। &lt;br /&gt;गार्ड बेशक भरी बरसात में भीगते हुए मेरे लिए नमक ले कर आया था, उस नमक की अपनी सीमा थी। उस नमक में सिर्फ खिचड़ी को नमकीन कर सकने का गुण था। जीवन को लवणयुक्‍त बनाने का गुण उसमें नहीं था। मिल बांट कर जीवन जीने से जो लवण आता है हमारे हिस्‍से में, सारे मतभेदों के बावजूद जो नमक हमारी मर्यादा को ढंके रहता है, हमारी चार कमजोरियों पर पर्दा किये रहता है जो साझा नमक, ये वो नमक नहीं था।  &lt;br /&gt;क्‍या अब भी कहीं मिलता है वो नमक। मिले तो बताना। &lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-7230440823209197924?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/7230440823209197924/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=7230440823209197924&amp;isPopup=true' title='10 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7230440823209197924'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7230440823209197924'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/10/blog-post_21.html' title='नमक के बहाने'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-5260459178404101811</id><published>2009-10-04T04:28:00.000-07:00</published><updated>2009-10-04T04:33:53.034-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='परिचर्चा'/><title type='text'>प्रवासी साहित्‍य का अंधकार युग या स्‍वर्ण युग</title><content type='html'>इधर हंस के ताजा अंक में पत्रकार अजित राय का एक लेख प्रवासी साहित्‍य का अंधकार युग छपा है। ये लेख कई ब्‍लागों पर भी मौजूद है और पक्ष विपक्ष में कई टिप्पणियां बटोर रहा है। नुक्‍कड़ ब्‍लाग पर पर इसे http://nukkadh.blogspot.com/2009/09/blog-post_7078.html &lt;br /&gt; पर पढ़ा जा सकता है। चूंकि ये लेख हिन्‍दी अधिकारियों, विदेशों में काम कर रहे राजनयिकों से ले कर वहां के साहित्‍यकारों आदि सभी को लपेटे में लेता है, स्‍वाभाविक है कि इस लेख को ले कर व्‍यापक प्रतिक्रिया हो रही हैं। कल 3 अक्‍तूबर 2009 को लंदनवासी लेखक तेजेन्‍द्र शर्मा इंटरनेट की पत्रिका साहित्‍यशिल्‍पी में इस लेख पर अपना जवाब ले कर हाजिर हो गये। यहां पर है ये जवाब। http://www.sahityashilpi.com/2009/10/blog-post_3443.html &lt;br /&gt;मजे़ की बात कि कुछ लोग अजित राय का लेख पढ़ कर उसके पक्ष में लिख चुके थे, वे तेजेन्‍द्र का पक्ष पढ़ कर तय नहीं कर पा रहे कि किसकी बात ज्‍यादा सही है। &lt;br /&gt;भला हम कैसे चुप रहें। हम भी अपने ब्‍लाग पर इस बहस को आगे बढ़ाने के मूड में हैं। &lt;br /&gt;सबसे पहले तो मुझे अजित के और तेजेन्‍द्र के लेख के शीर्षक से ही एतराज़ है। वक्‍त हमें इस बात की इजाज़त नहीं देता कि अपने ही वक्‍त को अंधकारमय या स्‍वर्ण युग घोषित कर दें। भला हम अपने ही वक्‍त के प्रवक्‍ता कब से होने लग गये। पहले कुछ बातें हंस में छपे अजित राय के लेख पर। &lt;br /&gt;अजित जी ने एक ही लाठी से सबको हांका है और लेख के आखिर तक पता नहीं चलता कि उनकी खुंदक आखिर है किसके प्रति। ये तय है कि वे अपने इस लेख में किसी एक मुद्दे पर बात न करके हवा में लट्ठ चला रहे हैं और अपनी ही जंग हंसाई करवा रहे हैं। &lt;br /&gt;उन्‍होंने केन्‍द्र सरकार और राज्‍य सरकारों में कार्यरत हिन्‍दी अधिकारी (उनकी जानकारी के लिए राज्‍य सरकारों में हिन्‍दी अधिकारी नहीं होते) से ले कर राजनयिक और विदेशों में तैनात सभी को शिकार बनाया है। वे पहले हिन्‍दी अधिकारियों को लतियाते हुए आगे चल चल कर पूरी जमात को ही पीटते चले गये हैं। आखिरी लाठी उन्‍होंने प्रवासी हिन्‍दी पर चलायी है। &lt;br /&gt;माना हिन्‍दी अधिकारियों की कौम खराब है हरामखोर है, मौज मज़ा करती है और पता नहीं हिन्‍दी के विकास के अलावा क्‍या क्‍या करती है लेकिन वे साहित्‍य की जिस मुख्‍य धारा की बात कर रहे हैं वह क्‍या कर रही है। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि अजित जी की ये मुख्‍य धारा है क्‍या। वे कहते हैं कि जिस अखबार को, कहानी को, किताब को और कविता को वे लोग (मैं यहां जानबूझ कर उन कुछ का नाम दे कर विषय से भटकना नहीं चाहता) पढ़ते हैं या उन्‍हें पढ़ने की सलाह दी जाती है उनके लिये तो वही मुख्‍य धारा। आपको मुख्‍य धारा में आना है तो उन्‍हीं की पसंद का लिखना होगा वरना आप भी कूड़ा कचरा। उनके हिसाब से जो कुछ इन महानुभावों द्वारा नहीं पढ़ा जा रहा वह सब कूड़ा कबाड़ा। अब उनके हिसाब से विदेशों को छोड़ भी दें तो यहां पूरे देश में भी कूड़ा कबाड़ा ही लिखा जा रहा है। क्‍योंकि उसे इन महानुभावों द्वारा पढ़ा नहीं जाता। बलिहारी है आपकी मुख्‍य धारा की जिसने साहित्‍य से पाठक को तो बिलकुल गायब ही कर दिया है। अब सारा लेखन, सारे अखबार, किताबें, लेखक, सब गया पानी में मुख्‍य धारा के चक्‍कर में। &lt;br /&gt;अजित राय ने बीस बरस के दौरान मेरा लिखा कुछ भी नहीं पढ़ा होगा लेकिन वे मुझे लेखक ही नहीं मानते, क्‍योंकि मैं मुख्‍य धारा में आने के लिए कभी छटपटाया नहीं या किसी द्वारे पर मैंने मत्‍था नहीं टेका। बेचारा सूरज और उसका लेखन। &lt;br /&gt;ये बात अलग है कि अजित जी स्‍वयं अपने अर्थ पक्ष के लिए यत्र तत्र सर्वत्र नजर आयेंगे। &lt;br /&gt;दूसरी बात कि यह आने वाला लम्‍बा समय तय करता है कि फलां युग अंधकारमय था या स्‍वर्णयुग। हम में से कोई भी कम से कम अपने वर्तमान काल का प्रवक्‍ता नहीं होता। अगर होता है तो बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में होता है। &lt;br /&gt;तीसरी बात वे बार बार विदेशों में भेजे जाने वाले कूड़े कचरे की बात करते हैं लेकिन ये नहीं बताते कि ये कचरा आखिर है क्‍या। जहां तक मेरी जानकारी है वे भी अब तक जितनी बार विदेश हो आये हैं किसी न किसी कचरा कोटे से ही जुगाड़ करके गये हैं। &lt;br /&gt;पूरे के पूरे वक्‍त को नकार देना बेहद घातक सोच है। जो लोग व्‍यक्तिगत स्‍तर पर या संस्‍थाओं के ज़रिये विदेशों में सचमुच काम कर रहे हैं और अकेले के बल पर हिन्‍दी के चिराग़ जलाये हुए हैं यह उनकी सरासर तौहीन है। &lt;br /&gt;तो मेरे हे पत्रकार मित्र, इस तरह से कभी भी सबको लपेटे में लेते हुए हवा में लाठियां न भांजें। काम करने वाले अपना काम करते रहते हैं और उन्‍हें आपके किसी प्रमाणपत्र की जरूरत नहीं। &lt;br /&gt;ये वक्‍त अपने आप तय कर लेगा कि कचरा या अंधकार किधर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कुछ बातें तेजेन्‍द्र के लेख पर। तेजेन्‍द्र को भी हड़बड़ी में प्रवासी साहित्‍य का स्‍वर्ण युग जैसे जुमलों से बचना चाहिये था। हमें ये मानने में कोई हिचक नहीं है कि विदेशों में इस समय जो साहित्‍य लिखा जा रहा है वह ध्‍यान मांगता है और उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती और कोई उसे कमतर आंक भी नहीं रहा। कई पत्रिकाओं ने इधर प्रवासी साहित्‍य अंक निकाले हैं और इंटरनेट के ज़रिये इस समय विदेशों से स्‍तरीय पत्रिकाएं और साहित्‍य हम तक पहुंच रहा है। बाहर लोग अपनी सीमाओं, सामर्थ्‍य और हैसियत के अनुसार काम कर ही रहे हैं और कई मायनों में बेहतर कर रहे हैं। &lt;br /&gt;पाठक देखना चाहें तो hi.wikipedia.org पर जा कर देखें जहां रामचरित मानस से ले कर हनुमान चालीसा और कम्‍ब रामायण से ले कर जयशंकर प्रसाद का सारा साहित्‍य आपको एक क्लिक पर मिल जायेगा या प्रेमचंद की सारी रचनाएं मिल जायेंगी। गद्यकोश या कविता कोश जैसे स्‍तरीय काम विदेशी धरती से ही हो रहे हैं। bhagavad-gita.org पर आपको संस्‍कृत सहित सोलह भाषाओं में भगवद गीता के सभी 702 श्‍लोकों के अत्‍यंत मनोरम स्‍वर में किये गये पाठ मिल जायेंगे। इंटरनेट पर आपको सभी भारतीय भाषाओं के शब्‍दकोश मिल जायेंगे। &lt;br /&gt;इतने बड़े पैमाने पर ये सब कार्य विदेशों में बैठे हमारे भाई बंधु ही कर रहे हैं। उनके जुनून को मेरा विनम्र प्रणाम है।  &lt;br /&gt;लेकिन इस बात से भी हमें इनकार नहीं करना चाहिये कि विदेश में रचा जा रहा साहित्‍य और साहित्‍यकार इस समय अपने काम की तरफ उतना ध्‍यान न दे कर पहचान के प्रति ज्‍यादा उत्‍सुक है और कोशिश भी करता दीखता है। इसके लिए उनके मन में एक तरह की छटपटाहट है कि उसे बस, आज ही भारत में लिखे जा रहे साहित्‍य की बराबरी में खडे होने दिया जाये।  &lt;br /&gt;मैं विदेशों में रहने और काम करने वाले कई रचनाकारों को जानता हूं। वे जब भी भारत आते हैं तो इस बात का पुख्‍ता इंतज़ाम करके चलते हैं कि महीने दो महीने के उनके दौरे में अलग अलग शहरों में उनके दो चार रचना पाठ, पुस्‍तकों के लोकार्पण, व्‍याख्‍यान और सम्‍मान ज़रूर हों। चर्चा तो हो ही और तथाकथित मुख्‍य धारा के साथ मुलाकात भी। रेडियो और टीवी पर उनकी उपस्थिति दर्ज की जाये। ये बात भी कई बार तकलीफ़ देती ही है। &lt;br /&gt;मैं इस बात को दोहराना चाहता हूं और इससे किसी को भी इनकार नहीं है कि इधर के बरसों में विदेशों में रचे जा रहे विपुल साहित्‍य ने हमारा ध्‍यान अपनी ओर खींचा है और अपनी उपस्थिति दर्ज़ करायी है। हम वहां लिखे जा रहे साहित्‍य के प्रति आश्‍वस्‍त हैं लेकिन एक बात जो मुझे हमेशा परेशान करती है कि जिस विदेशी ज़मीं पर हमारी ही मिट्टी के अंग्रेज़ी लेखक सलमान रश्‍दी, झुम्‍पा लाहिरी, विक्रम सेठ, वी एस नायपॉल और इतर रचनाकार विश्‍व स्‍तरीय साहित्‍य दे रहे हैं, तो हिन्‍दी में एक भी रचनाकार उस स्‍तर की सोच का क्‍यों नहीं दिखायी देता। &lt;br /&gt;और आखि़र में एक बात और। बीए में अर्थशास्‍त्र पढ़ते हुए एक सिद्धांत हमें पढ़ाया गया था कि बुरी मुद्रा अच्‍छी मुद्रा को चलन से बाहर कर देती है। मतलब ये कि अगर आपकी जेब में दस रुपये का पुराना नोट हो और आपके हाथ में दस रुपये का नया नोट आये तो आप जेब में रखे पुराने नोट की जगह नया नोट रख लेंगे और जेब वाला पुराना नोट सर्कुलेशलन में डाल देंगे। आज जीवन के हर क्षेत्र में यही हो रहा है। सब कुछ जो अच्‍छा है, स्‍तरीय है, मननीय है, वह चलन से बाहर है। कभी स्‍वेच्‍छा से, कभी मजबूरी में और कभी हालात के चलते। आज हमारे आस पास जो कुछ भी चलन में है, वह औसत है, बुरा है और कचरा है। हम उसे ढो रहे हैं क्‍योंकि बेहतर के विकल्‍प हमने खुद ही चलन से बाहर कर दिये हैं।&lt;br /&gt;हम देखें कि ऐसा क्‍यों हो रहा है और कब तक हम ऐसा होने देंगे। &lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-5260459178404101811?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/5260459178404101811/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=5260459178404101811&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5260459178404101811'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5260459178404101811'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='प्रवासी साहित्‍य का अंधकार युग या स्‍वर्ण युग'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-5072391195039020970</id><published>2009-09-29T00:20:00.000-07:00</published><updated>2009-09-29T00:25:11.471-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='संस्‍मरण्'/><title type='text'>धीरेन्द्र अस्थाना : मेरा सबसे पुराना साहित्यिक सहयात्री</title><content type='html'>धीरेन्द्र अस्थाना को मैं पिछले तीस इकतीस बरस (यह संस्मरण 2005 में लिखा गया था) से जानता हूं या कम से कम जानने का दावा तो कर ही सकता हूं। 1973 के आस पास वह मुजफ्फरनगर से नया नया देहरादून आया था और देहरादून के उस वक्त के बेहद सक्रिय साहित्यिक माहौल में अपने लिए जगह तलाश रहा था। वहां पर तब सुभाष पंत, सुरेश उनियाल, अवधेश, ब्रह्मदेव, शशि प्रभा शास्त्री आदि खूब सक्रिय थे। उस वक्त हम सबके मिलने का ठिया हुआ करता था ओल्ड कनाट प्लेस में वेनगार्ड प्रेस। वहां सबके सम्पर्क सूत्र थे देहरादून के एकमात्र रजिस्टर्ड कवि, सलाहकार, संपादक, यारों के यार, सब लिखने वालों के लिए चाय, बीड़ी, सिगरेट, दारू और उधार का जुग़ाड़ करने वाले, सब मित्रों की रचनाओं के पहले पाठक और श्रोता और सबके लिए मिलन स्थली के स्थायी ठीये वैनगार्ड प्रेस के कर्ता धर्ता और वेनगार्ड नाम के उस वक्त के भारत के एकमात्र द्विभाषिक अखबार के संपादक, प्रूफरीडर, कम्पोजीटर, क्लर्क, एकांउटेंट यानी ऑल इन वन सुखवीर विश्वकर्मा उर्फ कविजी।&lt;br /&gt;मैं कवि जी की शागिर्दी में कविताएं लिखना सीख रहा था और किसी बड़ी रचना के बाहर आने का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। ये बात अलग थी कि मैं उस वक्त के चलन के हिसाब से उनके पास अतुकांत कविता ले कर जाता था और वे कुछ ही मिनटों में मेरी किसी भी अतुकांत कविता को 16 मात्रा वाली तुकांत कविता में बदल डालते थे और हाथों हाथ कम्पोजीटर को आवाज दे कर वेनगार्ड के कम्पोज हो रहे अंक में छापने के लिए दे भी देते थे। ये मेरे साथ ही नहीं, सभी मित्रों की कविताओं के साथ होता था। तो इन्हीं कविजी के यहां धीरेन्द्र अस्थाना से मेरा परिचय हुआ। बेहद दुबला पतला सा लड़का, बमुश्किल सत्रह बरस की उम्र, चेहरे पर उग आने को बेताब बेतरतीब सी दाढ़ी और मुंह पर ढेर से मुंहासे। मोटे फ्रेम में जैसे बहुत पीछे से झांकती आंखें। धीरेन्द्र अस्थाना के हाथ में उन दिनों कविताओं की एक डायरी और मुड़ा हुआ दिनमान हुआ करते थे और अगर हाल ही में उसकी कोई रचना छपी होती थी तो उसकी एक कॉपी भी।&lt;br /&gt;धीरेन्द्र अस्थाना तब लम्बे लम्बे डग भरते हुए चला करता था। कपड़े उसके बेहद मामूली होते थे और अगर सर्दियां हुईं तो एक मोटा सा कोट पहने होता था वह। तब वह बारहवीं की परीक्षा दे चुका था और मैं मार्निंग कॉलेज से बीए कर रहा था और दिन भर की एक टुच्ची सी नौकरी से चिपका हुआ था। हमारी अक्सर मुलाकात हो जाती। कविजी के पास दिन भर आने जाने वालों का जमावड़ा लगा रहता था और कोई भी कहीं से भी घूमता घामता वहां दिन में कम से कम एक बार जरूर ही पहुंच जाता था। बाहर से आने वाले साहित्यकार भी वहीं मिल जाते। हम सब का तो वह स्थायी ठीया था ही। देहरादून में आने के बाद भी धीरेन्द्र अस्थाना की कुछेक रचनाएं छपी थीं और वह साहित्यिक गोष्ठियों में कविताएं सुनाने लगा था। तब वह एक भीषण दौर से गुज़र रहा था और अपने लिए राह तलाश रहा था कि उसे किस किस्म के साहित्य से जुड़ना है। उसके सामने कई संकट थे। आर्थिक तो थे ही, घर पर वह अपने पिता द्वारा फालतू करार दिया गया था और वहां उसकी कोई पूछ नहीं थी। छ: भाई बहनों में सबसे बड़ा धीरेन्द्र अपने घर में विद्रोही करार दिया गया था। उसकी अपने पिता से बिल्कुल नहीं पटती थी और उसे अक्सर घर पर पिता से पिटना पड़ता या मां को पिटने से बचाना पड़ता। अपने बाप की निगाह में वह एक आवारा, निट्ठला और अराजक आदमी था जिसे ढंग से अपनी जिंदगी जीने का भी हक नहीं था। इन सारी बातों की वजह से वह घर जाना टालता। &lt;br /&gt;धीरेन्द्र उन दिनों देहरादून के एक उपनगर प्रेम नगर में रहता था। वहां तक बस में जाने के आठ आने लगते थे और धीरेन्द्र को दिन भर की सारी गतिविधियों से बचा कर ये आठ आने अपने पास रखने ही पड़ते थे। इस आखिरी अट्ठनी के खर्च हो जाने का मतलब आठ किलोमीटर पैदल चलना होता था। तब प्रेम नगर के लिए आखिरी बस शायद सात बीस पर जाया करती थी। जब तक रोडवेज की बस थी तो धीरेन्द्र कोशिश करता, उस बस को लेने की लेकिन जब आठ सीटर विक्रम शुरू हुए और रात देर तक चलने भी लगे तो धीरेन्द्र वापिस घर जाने में आलस भी करने लगा था। घर नाम की जगह का यह आतंक धीरेन्द्र की बाद की कई कहानियों में देखा जा सकता है। घर से उसके तने हुए संबंधों का सबसे बड़ा प्रमाण ये था कि उसकी सारी चिट्ठी पत्री उसके दोस्त की दुकान जुनेजा जनरल स्टोस, प्रेम नगर के पते पर आती थी।&lt;br /&gt;वह तब अक्सर आर्थिक संकट में रहा करता था। मनोवैज्ञानिक और मानसिक स्तर पर वह अकेला और निरीह जान पड़ता था लेकिन फिर भी वह कुछ कर गुजरने के जोश से लबरेज था। तब तक कुछ उसकी प्रेम कहानियां पंजाब केसरी के मंगलवार को छपने वाले रंगीन पन्नों पर छपने लगीं थीं और उनके एवज में उसे सैकड़ों की तादाद में पंजाब और यूपी के कोने कोने से जवान पाठिकाओं के प्रेम पगे खत आने लगे थे। अक्सर उसकी कहानी को पहला पुरस्कार मिल जाता और साथ में बीस रुपये की राशि भी। उन दिनों वह खूब पढ़ रहा था लेकिन पूरा दिन गुजारने लायक कुछ भी न होने के कारण वह लगभग बेकार सा सारा सारा दिन इधर उधर घूमता फिरता रहता। उसे नौकरी की बेहद जरूरत थी। &lt;br /&gt;तब तक धीरेन्द्र बीड़ी और कभी कभार शराब पीने लगा था। रात को दोस्तों के पास देहरादून में ही रह जाता। उसकी शामें अक्सर कविजी, देशबंधु, अवधेश वगैरह के साथ गुजरने लगीं थीं। इन लोगों के साथ शाम गुजारने का मतलब एक ही होता था शराब। यह शराब कच्ची वाली भी हो सकती थी, राजपुर में तिब्बतियों के ठीये पर बिकने वाली छांग भी या मच्छी बाजार के ठेके पर खड़े खड़े पी जाने वाली ठर्रा भी। &lt;br /&gt;तब तक देशबंधु से धीरेन्द्र की गहरी छनने लगी थी। देशबंधु के पास एक नौकरी थी, साइकिल थी, बीड़ी के बंडल थे और रहने के लिए सरकारी क्वार्टर था, यानी सीमित अर्थों में अय्याशी के सारे साधन। देशबंधु को फिल्में देखने का बहुत शौक था और उसे कम्पनी देने के लिए मिल गया था धीरेन्द्र। दोनों को कभी भी कहीं भी एक साथ देखा जा सकता था। &lt;br /&gt;एक बार देशबंधु का जन्म दिन था और सारे दोस्त वेनगार्ड के पास ही के एक रेस्तरां में उसका इंतजार कर रहे थे कि वह आये तो चाय पानी हो और उसे जन्म दिन की बधाई दी जाये। ये बात दो दिन पहले ही तय हो चुकी थी। हम सब उसका इंतजार कर रहे थे कि तभी कहीं से घूमते घामते नवीन नौटियाल वहां आ पहुंचा। जब उसे पता चला कि हम देशबंधु का इंतजार कर रहे हैं तो उसने रहस्योद्घाटन किया कि देशबंधु को आज ही 100 रुपये साइकिल एडवांस मिला है और वह तो धीरेन्द्र वगैरह के साथ कच्ची शराब पीने राजपुर गया हुआ है। लम्बा प्रोग्राम है वहां पर। &lt;br /&gt;आज बेशक देशबंधु इस दुनिया में नहीं है, उसकी रहस्यमय मौत को बीस बरस से भी ज्यादा गुजर चुके हैं लेकिन धीरेन्द्र उसे आज भी उसी शिद्दत से याद करता है। उसकी कुछ कहानियां भी हैं शायद धीरेन्द्र के पास जिन्हें वह तरतीब देना चाहता है। शायद कभी ये काम हो भी जाये। &lt;br /&gt;उन्हीं दिनों धीरेन्द्र ने एक चुतियापा कर डाला था। कविजी जिस वकील की प्रेस और वेनगार्ड अखबार में काम करते थे, उसके लौंडेबाजी के किस्सों को लेकर धीरेन्द्र ने एक लम्बी कहानी लिखी थी और उस पर अच्छा खासा हंगामा मचा था।  &lt;br /&gt;उधर पंजाब केसरी में छपने वाली कहानियों पर आने वाले प्रेम पत्र नुमा खतों की तादाद बढ़ती जा रही थी और धीरेन्द्र के बाकायदा कुछेक प्रेम प्रसंग चलने लगे थे। उसे अलग अलग शहरों की लड़कियां मनुहार भरे खत लिख कर अपने शहर बुलातीं। उनके शहर जाना तो दूर, धीरेन्द्र के लिए उनके खतों के जवाब देने के लिए पोस्टकार्ड खरीदने तक के पैसे नहीं होते थे। तब तक घर के हालात धीरेन्द्र के पूरी तरह खिलाफ हो चुके थे। वह कई कई घर न जाता। नतीजा ये हुआ कि उसे घर से ही निकाल दिया गया। धीरेन्द्र भटकता हुआ खाली हाथ कभी कानपुर तो कभी लखनऊ घूमता रहा। जब कानपुर में था तो एक बार पैसों का जुगाड़ करने के तरीके के रूप में कामतानाथ जी ने कहा कि कल पहली मई है। रात को कुछ लिख लेना और सुबह रेडियो स्टेशन पर रिकार्ड करवा आयेंगे। धीरेन्द्र ने मई दिवस की महत्ता पर लेख लिखा और सुबह वह आकाशवाणी में रिकार्ड भी हुआ। वहां से मिले चैक को कामतानाथ जी के रसूख से कैश कराया गया और छक कर दारू पी गयी।&lt;br /&gt;लखनऊ वह कवि कौशल किशोर के घर पर रहा। कौशल किशोर नौकरी पर चला जाता और धीरेन्द्र सारा दिन घर पर पड़ा रहता। रात को एक साथ कहीं खाने का जुगाड़ करते दोनों। एक बार कौशल सारा दिन और सारी रात घर नहीं आया। धीरेन्द्र का भूख के मारे बुरा हाल। जेब में फूटी कौड़ी नहीं। कमरे में इधर उधर तलाश किया कि कहीं रेजगारी ही पड़ी मिल जाये तो काम बने। संयोग से भगवान की तस्वीर के सामने पड़ी हुई चवन्नी मिल गयी। धीरेन्द्र लपक कर बाहर गया और फुटपाथ पर दो रोटी और दाल खायी। पेट तो भर गया उस वक्त लेकिन पता नहीं क्या था उस चवन्नी की रोटी दाल में कि धीरेन्द्र का पेट हमेशा हमेशा के लिए खराब हो गया और आज तीस बरस बीत जाने पर और दुनिया भर के इलाज करवाने के बाद भी आज तक उसका पेट ठीक नहीं हो पाया है।  &lt;br /&gt;1974 में मैं जब देहरादून छोड़ कर अपनी नौकरी के सिलसिले में हैदराबाद गया तब तक बेशक धीरेन्द्र ने कहानी के क्षेत्र में कोई कमाल नहीं किया था लेकिन उसकी गति ठीक ठाक चल रही थी। मैं अभी भी लिखना शुरू नहीं कर पाया था। धीरेन्द्र बीच बीच में छिटपुट नौकरियां करता रहा। पहले 1970 नाम के अखबार में और फिर वेनगार्ड में ही। तब तक उसने डीएवी कॉलेज में बीए में एडमिशन ले लिया था। फीस के पैसों का कोई नियमित जुगाड़ नहीं था लेकिन इसका जिम्मा तब तक दिल्ली जा चुके सुरेश उनियाल ने और देहरादून में देशबंधु ने उठाया। बाकी कमी धीरेन्द्र खुद मंचों पर गीत गा कर कुछ पैसे कमा कर पूरी कर लिया करता था। एक ज़माने में धीरेन्द्र बहुत अच्छा  गायक हुआ करता था जिसके अवशेष अभी भी उसके गले में मौजूद हैं। तब तक छात्र आंदोलन की गतिविधियों में धीरेन्द्र बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेने लगा था और अब उसके पास मार्क्सवाद पर किताबें नजर आने लगी थी। &lt;br /&gt;यह बात उल्लेखनीय है कि देहरादून में एसएफआई की नींव उसी ने रखी थी। वह कोर्स के अलावा इधर उधर का साहित्य खूब पढ़ने लगा था। धीरेन्द्र बेहद बोल्ड तरीके से शानदार भाषण देने लगा था इसलिए उसे आगे आने में कोई दिक्कत नहीं आयी थी। &lt;br /&gt;जब 1975 में एमर्जेंसी लगी तो उस वक्त तक धीरेन्द्र एसएफआई की स्थानीय यूनिट का फाउंडर अध्यक्ष बन चुका था और सारा दिन डीएवी कॉलेज में मंडराता, और दिन भर यूनियनबाजी करता नज़र आता। वह फायर ब्रांड किस्म का लीडर बनने की राह पर चल रहा था। उसने थोड़ी तरक्की कर ली थी और बीड़ी से ऊपर उठ कर चार मीनार तक आ गया था। &lt;br /&gt;इन्हीं दिनों उसने एक और लघु उपन्यास लिख मारा जो उस वक्त की युवा पीढ़ी को ले कर कुछ सवाल उठाता था। धीरेन्द्र के एक क्लास फेलो के पिता जज या किसी ऐसे ही पद पर थे और तय हुआ वे इसका लोकार्पण करेंगे। उपन्यास वेनगार्ड प्रेस में ही छप रहा थ। जब धीरेन्द्र के सहपाठी ने वह उपन्यास पढ़ा तो उसने अपने पिता को बताया कि इसमें तो आग ही आग है। नतीजा यह हुआ कि रातों रात उपन्यास की छपी अनछपी सभी प्रतियां उठवा ली गयीं। वह उपन्यास फिर कभी नहीं छपा। बाद में इसे संक्षिप्त करके धीरेन्द्र ने लम्बी कहानी युद्धरत आदमी के नाम से छपवाया। &lt;br /&gt;जब एमर्जेंसी लगी तो तय था एसएफआइ का सबसे जुझारू नेता होने के नाते धीरेन्द्र पर भी गाज गिरती ही। उसे कई लोगों की सलाह पर अंडरग्राउंड होना पड़ा और एक बार फिर वह खाली हाथ दर बदर हुआ। इस बार वह कलकत्ता और कोटा में छिपता रहा।  &lt;br /&gt;1976 में सारिका में उसकी आयाम कहानी छपी। कहानी कई पाठकों को समझ ही नहीं आयी थी। ऐसे पाठकों में से एक थी बंबई की रहने वाली ललिता बिष्ट। उन दिनों वह अपने अल्मोड़ा में अपने गांव में गयी हुई थी और उसने वहीं यह कहानी पढ़ी थी। उसने अपनी जिज्ञासाओं को सामने रख कर धीरेन्द्र को खत लिखा जिसका उसे जवाब मिला। कुछ और सवाल और कुछ और जवाब। सिलसिला चल निकला। शायद धीरेन्द्र अपने आप में ऐसा अकेला लेखक रहा होगा जो एक अनजान, युवा पाठिका के पत्र पा कर उनके जवाब में कुछ भली और अच्छी लगने वाली प्रेम पगी बातें लिखने के बजाये लम्बे लम्बे खतों में ललिता को मार्क्सवाद की बारीकियां समझा रहा था। उस वक्त धीरेन्द्र की उम्र मात्र बीस इक्कीस बरस थी और ललिता उम्र में उससे छ: महीने बड़ी थी। शायद उसी मार्क्सवाद का असर रहा होगा या उससे बचने की चाहत, 1978 के जून की 13 तारीख सुबह सुबह ललिता बिष्ट अपना घर बार हमेशा के लिए छोड़ कर धीरेन्द्र के घर प्रेमनगर आ धमकी। धीरेन्द्र उस वक्त सो रहा था। ललिता ने बताया मैं घर छोड़ आयी हूं। धीरेन्द्र को काटो तो खून नहीं। जहां अपने रहने और एक कप चाय का ठिकाना न हो, वहां एक अनजान और जिंदगी में पहली बार रू ब रू चेहरा दिखा रही घर छोड़ कर हाथ में अटैची लिये चली आ रही ललिता बिष्ट नाम की इस छुटकी सी लड़की का क्या करे। न हाथ में नौकरी और न जेब में दो वक्त के खाने के पैसे। लेकिन शायद चीजें इसी रूप में होनी थीं।&lt;br /&gt;धीरेन्द्र ललिता को ले कर देहरादून आया। यार दोस्तों से सलाह की। आखिर वह एसएफआई का फाउंडर प्रेसिडेंट था। आनन फानन में सब कुछ तय हो गया। मदद के लिए सैकड़ों हाथ और सैकड़ों रुपये जुट गये और दोनों की शादी हो गयी। कन्यादान देशबंधु ने किया और वर पक्ष की तरफ से सारे यार दोस्त शामिल हुए। हनीमून मनाया गया चक्खू मोहल्ले में देशबंधु के छोटे से कमरे में। दोनों को कमरे में छोड़ कर देशबंधु नाइट शो में दिग्विजय थियेटर में फिल्म देखने चला गया। &lt;br /&gt;बाद में दो तीन दिन बाद दोनों राजपुर रोड पर भीमसेन त्यागी जी के घर गये। अभी ये लोग खाना खा ही रहे थे कि दिल्ली से त्यागी जी के लिए फोन आ गया कि उनके कथाकार मित्र सुदर्शन चोपड़ा की मृत्यु हो गयी है। त्यागी जी को सपत्नीक निकलना पड़ा। कहा उन्होंने - लो संभालो घर अब दो चार दिन के लिए और खूब मनाओ हनीमून। &lt;br /&gt;तीन दिन बाद जब त्यागीजी वापिस लौटे तो साथ में लाये थे धीरेन्द्र के लिए राजकमल प्रकाशन की नौकरी का प्रस्ताव। इससे अच्छी खबर क्या हो सकती थी धीरेन्द्र के लिए। जैसे ललिता अपने लिए पूरे इंतजाम करके ही चली थी। और इस तरह से धीरेन्द्र दिल्ली चला आया। ललिता को अपनी मां के पास अमानत की तरह छोड़ कर कि सब कुछ ठीक होते ही वह ललिता को दिल्ली ले जायेगा। &lt;br /&gt;धीरेन्द्र किस्मत का धनी निकला कि न उसे सिर्फ राजकमल की नौकरी मिली बल्कि ऑफिस के ठीक पीछे वाली गली में गेस्ट हाउस (जहां इस समय राजकमल प्रकाशन का कार्यालय है) में रहने की जगह भी। और क्या चाहिये था उसे। नौकरी चल निकली। धीरेन्द्र ने मैनेजमेंट की उम्मीदों से कहीं अच्छा काम करके दिखाया। जो नौकरी तीन सौ रुपये से शुरू हुई थी, जल्दी ही सात सौ रुपये की हो गयी। शीला संधू जी पगार वाले दिन धीरेन्द्र को अलग से सबकी नजर बचा कर सौ पचास रुपये पकड़ा देतीं। &lt;br /&gt;धीरेन्द्र के पास जब पैसे आने लगे तो उसने ललिता को दिल्ली लाने की योजना बनायी। दो तीन बार बनी बनायी योजना खटाई में पड़ गयी। एकाध बार ललिता बीमार हो गयी या कोई और कारण रहा। एक बार ऐसा हुआ कि देहरादून से अवधेश आ गया। दोनों ने तय किया कि एकाध दिन बाद दोनों एक साथ देहरादून जायेंगे। इस बीच रात के वक्त दारू कांड का प्रोग्राम बन गया और दोनों रात के वक्त यूपी बार्डर पर पीने चले गये। देर रात तक पीते रहे। धीरेन्द्र को पता ही नहीं चला कि वह पीते पीते कब सो गया। जब उसकी नींद खुली तो सुबह के नौ बज रहे थे। वह एक ढाबे नुमा होटल के बाहर चारपाई पर रात भर सोया रहा था। अवधेश का कहीं पता नहीं था। जेब में से पैसे गायब थे और गेस्ट हाउस की चाबी भी साथ में गायब। धीरेन्द्र घबराया। गेस्ट हाउस का मामला। ऑफिस के हिसाब से तो वह वह छुट्टी ले कर देहरादून गया हुआ है और इधर चाबी गायब। जेब में वापिस जाने लायक पैसे भी नहीं। होटल वाले से पूछा तो उसने बताया कि आपके साथ जो ठिगना सा आदमी था, वह रात को चाबी ले गया था। अब धीरेन्द्र ने उस होटल वाले से दो रुपये उधार लिये और किसी तरह वापिस गेस्ट हाउस पहुंचा। देखा तो वहां पर अवधेश महाराज जी आराम से लम्बी तान कर सो रहे हैं। धीरेन्द्र जब बिगड़ा तो अवधेश का जवाब था अब रात को तुम्हें इतने नशे में उठा कर कैसे लाता और जेब में पैसे भी कैसे छोड़ता। पैसे और चाबी मैं इसीलिए ले आया था और तुम्हारे लिए चारपाई का इंतजाम कर आया था। बल्कि होटल वाले से कह भी आया था कि तुम्हें बस के पैसे दे दे। &lt;br /&gt;खैर, उस दिन तो नहीं लेकिन बाद में ललिता दिल्ली आयी और बाकायदा धीरेन्द्र का घर बसा। अपनी कमाई से धीरेन्द्र का अपना पहला घर। धीरेन्द्र अपने काम को ले कर शुरू से ही बहुत मेहनती है। वहां भी उसने मेहनत की। अब दिल्ली थी तो तय था दिल्ली का साहित्यिक माहौल भी साथ में था। आस पास ढेर सारे दोस्त थे, लेखक थे, पत्रिकाएं थीं, संपादक थे, लिखने और छपने के ज्यादा मौके थे, प्रकाशक थे, चुनौतियां थीं, डर थे, महानगर का आतंक था, नाटक थे, फिल्में थीं, लड़ाइयां थीं, लड़ने की हिम्मत थी, तरक्की के मौके थे, चुतियापे भी थे और कोरे आश्वासन भी। निश्चित ही आर्थिक संकट भी थे और अनिश्चितता की सिर पर लटकती तलवार भी थी। और थे बीच बीच में शराब के दौर। लेकिन इन सब के बीच में था अपने घर का सुकून। ललिता का साथ और एक टिमटिमाती सी उम्मीद कि बेहतर दिन बस, आने ही वाले हैं। &lt;br /&gt;ललिता की बात चली है तो उसी की बात सही। धीरेन्द्र को धीरेन्द्र बनाने में और धीरेन्द्र बनाये रखने में ललिता का बहुत बड़ा हाथ है। उसने धीरेन्द्र का हर हाल में साथ दिया है। उसे मानसिक बल तो दिया ही है, उसकी हर तरह की ज्यादतियां भी सही हैं। घर को अच्छी तरह से चलाते रहने के लिए उसने खुद कई तरह के काम किये हैं। ट्यूशनें पढ़ाई हैं, अनुवाद किये हैं और कई दूसरे काम किये हैं। धीरेन्द्र खुद यह महसूस करता है कि वह जब भी कमजोर पड़ा है, किसी यार दोस्त ने नहीं, बल्कि ललिता ने ही उसे सहारा दिया है और उसे कई बार बेहद विकट स्थितियों से निकाला है। कई बार ललिता मजाक में कहती है कि उसके तीन बेटे हैं जिनका उसे ख्याल रखना पड़ता है। दो अपने और एक सास का। और ये सास वाला बेटा कुछ ज्यादा ही बिगड़ा हुआ है और ज्यादा ध्यान मांगता है।  &lt;br /&gt;राजकमल प्रकाशन में धीरेन्द्र का काम और लिखना ठीक ठाक चल रहा था। नये नये दोस्त बन रहे थे और पुराने दोस्त अपनी औकात दिखा रहे थे। तभी एक हंगामा हुआ और सब कुछ उलटा पुलटा हो गया। धीरेन्द्र की एक कहानी चार किस्तों में छपी रविवार साप्ताहिक में। अब जहां इतने दोस्त बन रहे थे तो राजकमल में ही धीरेन्द्र की तरक्की से जलने वाले दुश्मन भी बन ही रहे थे। सच तो ये था कि ये कहानी राजकमल प्रकाशन के अंदरूनी माहौल को ले कर ही लिखी गयी थी। किसी सगे दुश्मन ने इस कहानी आदमीखोर की चारों किस्तों की फाइल शीला जी की मेज पर पहुंचा दी। &lt;br /&gt;तय है धीरेन्द की पहली ही नौकरी पर उसी दिन पूर्ण विराम लग गया। लेकिन राधाकृष्ण प्रकाशन में ज्यादा वेतन वाली दूसरी दूसरी बेहतर नौकरी धीरेन्द्र का इंतजार कर रही थी। फौरन धीरेन्द्र ने वह नौकरी लपकी। अलबत्ता, राजकमल प्रकाशन के गेस्ट हाउस जैसी सुभीते और मुफ्त की जगह हाथ से जाती रही। &lt;br /&gt;उन दिनों कन्हैया लाल नंदन जी की एक किताब छप रही थी जिसके प्रूफ धीरेन्द्र को पढ़ने के लिए थे। वह एक अच्छा प्रूफ रीडर माना जाता था और इस तरीके से कुछ अतिरिक्त कमाई किया करता था। इसी किताब के सिलसिले में उसकी नंदन जी से मुलाकातें हुईं और दिनमान के दफ्तर के चक्कर लगे। जब भी धीरेन्द्र 10 दरियागंज स्थित दिनमान के ऑफिस जाता तो बलराम गाना शुरू कर देता - दीवारो दर को गौर से पहचान लीजिये। इस अंजुमन में आपको आना है बार बार। पहले तो धीरेन्द्र न समझ पाता कि माजरा क्या है लेकिन जब उसे टाइम्स ऑफ इंडिया के खूबसूरत लैटरपैड पर छपा दिनमान में नौकरी का पत्र मिला तो उसे समझ आया कि ये रहस्य था बलराम के गाने के पीछे। &lt;br /&gt;दिनमान की नौकरी ने धीरेन्द्र को पत्रकारिता के, मेहनत के, क्वालिटी के, डेडलाइन के और अपने आप पर भरोसा करने के गुर सिखाये। चाहे अखबार हो या पत्रिका, जो सीखना चाहे, उसे लिए खुले मैदान की तरह होती है। ये आप पर है कि कितना सीख कर आपकी तसल्ली हो जाती है। धीरेन्द्र ने पत्रकारिता के सारे गुर वहीं सीखे। दिनमान जैसी पत्रिका में काम करने का मतलब एक से एक वरिष्ठ रचनाकारों, पत्रकारों की रचनाओं के पहले पाठ से गुजरना और उसे पत्रिका के उपलब्ध पन्नों के हिसाब से कतर ब्योंत करके फिट करना। एक तरफ डैड लाइन होती है तो दूसरी तरफ सीमित जगह। रचना बड़ी भी हो सकती है और बड़े और सम्मानित संपादक और साहित्यकार की भी। तलवार की धार पर चलने का काम शायद यही होता है। जरा सी चूक और नौकरी पर भी बात आ सकती है। &lt;br /&gt;दिनमान में धीरेन्द्र की नौकरी चली पांच बरस। नये संपादक सतीश झा से उसकी पटरी नहीं बैठी और उसने इस्तीफा दे दिया। इस नौकरी के बाद वह दिल्ली से प्रकाशित होने जा रहे हिन्दी के पहले साप्ताहिक अखबार चौथी दुनिया का मुख्य उप संपादक बना। ललिता अब तक बड़े बेटे की मां बन चुकी थी।   &lt;br /&gt;अब तक धीरेन्द्र बेदिल दिल्ली के मिजाज़ को अच्छी तरह से पहचान चुका था। दिल्ली में धीरेन्द्र की पहली नौकरी 3 बरस 4 महीने, दूसरी नौकरी 8 महीने और ये तीसरी नौकरी 5 बरस कुछ महीने चली। अब तक उसकी कुछेक किताबें आ चुकी थीं और उसकी कहानियो की एक खास तरह की खनक लिये भाषा की वजह से नोटिस लिया जाने लगा था। अपनी कहानियों और किताबों की वजह से देश भर के लेखकों और पत्रिकाओं के संपादकों से उसका परिचय हो चुका था। दिनमान के दिनों के दौरान बने संबंध भी बहुत थे। इसलिए जब पता चला कि संतोष भारतीय चौथी दुनिया निकाल रहे हैं तो धीरेन्द्र उनके पास नौकरी के लिए गया। वे उसे पहले रविवार में छाप चुके थे। नये सिरे से परिचय की जरूरत नहीं थी। उसे पहले ही दिन से रख लिया गया। &lt;br /&gt;चौथी दुनिया ने धीरेन्द्र के भीतर के पत्रकार को और निखारा। उसने कई महत्त्वपूर्ण फीचर किये। लेकिन जब चौथी दुनिया बंद हुआ तो धीरेन्द्र एक बार फिर सड़क पर था। हालांकि अब तो उसका खुद का घर था, बेशक उसकी जेब में पैसे नहीं थे। होते भी कैसे। उसकी कोई भी नौकरी इतनी लम्बी नहीं चली थी कि पीएफ वगैरह जुड़ पाते। अब तक यह होता आया था कि धीरेन्द्र अपने संस्थान, अपने संस्थान के मालिक वगैरह को ही अपनी कहानियों का पात्र बना कर नौकरियों से हाथ धोता रहा था, पता नहीं कैसे हुआ कि चौथी दुनिया बंद होने के बाद जब धीरेन्द्र एक बार फिर बेरोजगार हुआ तो बौखला गया। एक बार फिर उसे सारा जमाना दुश्मन नजर आने लगा। इस बार धीरेन्द्र को लगा कि नहीं, ये साली दिल्ली ही ऐसी है, बेमुरव्वत और मतलबी, सो इस बार उसके उपन्यास का निशाना बने दिल्ली के सारे के सारे साहित्यकार, हम प्याला और हमनिवाला दोस्त, दुश्मन और नजदीकी लोग। वार बहुत भारी था हालांकि दिल्ली का कसूर इतना साफ और बड़ा नहीं था कि उसे इतनी बड़ी सज़ा दी जाती। गुज़र क्यों नहीं जाता उपन्यास ने पूरी दिल्ली को ही कटघरे में खड़ा कर दिया था। इस उपन्यास ने साहित्यिक हलकों में खूब हलचल मचायी। इस उपन्यास ने धीरेन्द्र की नज़र से अपने आपको देखने के लिए सबके लिए आइने का काम किया।&lt;br /&gt;हर बार की तरह धीरेन्द्र की 9 महीने की यह बेरोजगारी भी अपने साथ अच्छी खबर ले कर आयी। इस बार की नौकरी मुंबई में थी और उसे शुरू करनी थी जनसत्ता के मुंबई संस्करण की नगर पत्रिका सबरंग। अब तक यह पत्रिका रविवार के दिन रंगीन पन्नों के रूप में ही छप रही थी। उसे विधिवत नगर पत्रिका का आकार दिये जाने से पहले धीरेन्द्र ने खूब होम वर्क किया। शहर में लिखने वालों और लिखने की संभावना वालों की नब्ज देखी और धमाकेदार शुरुआत की। उसके संपादन में जनसत्ता के जो पहले रवीवारीय अठपन्ने छपे, उसमें सीमोन द' बोउआ की किताब द सेकेण्ड सेक्स में से ही सारी सामग्री ली गयी थी। यह एक नयी तरह की शुरुआत थी। कोई भी अखबार अपने रविवार के पन्नों पर इस तरह की सामग्री परोसने का आदी नहीं था और बंबई के हिन्दी के पाठक तो रविवार की असलाई सुबह इस तरह की सामग्री के बारे में सोच भी नहीं सकते थे। ये दस्तक थी एक नयी नगर पत्रिका के शुरू होने की। &lt;br /&gt;जब सबरंग विधिवत छपना शुरू हुआ तो इस 32 पेजी पत्रिका ने मुंबई में इतिहास रचा। सात आठ हजार से शुरू करते हुए इसकी प्रतियों की संख्या साठ हजार तक पहुंची। लगभग दस बरस तक छपे सबरंग के 520 अंक तो छपे ही होंगे। इस दौरान इसने कई विशेषांक निकाले। कवर स्टोरीज दीं। 2000 से अधिक कविताएं, 700 से अधिक कहानियां, कॉलम, और इतर सामग्री छापी। सैकड़ों ऐसे लेखक, व्यंग्यकार, कवि, कहानीकार, कॉलम लेखक आदि तैयार किये जिनके छपने का दायरा सबरंग से शुरू हो कर अखिल भारतीय स्तर तक गया। ऐसे भी लेखक रहे जो सबरंग में ही छपे और उसके बंद होते ही उनका लेखन भी बंद हो गया। सबरंग के पन्नों के लिए तब हर घर में रविवार की सुबह छीना झपटी होती थी।&lt;br /&gt;  धीरेन्द्र ने सबरंग को स्टार बना दिया और बदले में सबरंग ने लगातार दस बरस तक धीरेन्द्र अस्थाना, फीचर एडिटर को स्टार बनाये रखा। उसका फोन हर समय व्यस्त रहता था। उसके छोटे से केबिन में अमूमन उसके सामने की इकलौती कुर्सी पर एक मेहमान बैठा होता था और कम से कम दो आदमी बैठने के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे होते थे। वह दो बजे ऑफिस आता था। तब तक उसके लिए सैकड़ों फोन आ चुके होते थे। जब वह शाम को साढ़े छ: बजे के करीब ऑफिस ने निकलता था तो उसकी शाम बिक चुकी होती थी। यह शाम किसी फाइव स्टार में भी हो सकती थी या किसी अच्छे क्लब में भी। वह सचमुच स्टार था। वह फोन पर ही कोई भी काम करवा सकता था। उसके एक फोन पर उसी दिन बुक कराया गया किसी भी ट्रेन का टिकट कन्फर्म हो सकता था। वह बाहर से आने वाले किसी भी लेखक मित्र के लिए गाड़ी, होटल, अच्छे खाने और दारू का इंतजाम कर सकता था। वह किसी को भी छोटा मोटा सम्मान दिलवा सकता था, आर्थिक मदद दिलवा सकता था, विज्ञापन दिलवा सकता था, नौकरी के लिए सिफारिश कर सकता था। उसे कहीं भी बुलवाया जाना हो तो गाड़ी उसे लेने और घर तक छोड़ने आती थी। उसके सब जगह सम्पर्क थे और वह कोई भी काम सिर्फ और सिर्फ फोन करके करवा सकता था। शायद ही कभी उसे अकेला देखा गया हो। हमेशा उसके आगे पीछे झोला उठाने वाले होते। किसी भी आयोजन में धीरेन्द्र के आस पास मंडराने का मतलब ही दारू की शर्तिया गारंटी होती थी।&lt;br /&gt;ऐसा नहीं था कि धीरेन्द्र को पता न हो कि ये सारा मजमा, भीड़, लल्लो चप्पो, खिलाना पिलाना, शराब, सुविधाएं, उपहार, गाड़ी सब उसे क्यों दिये जा रहे थे। दरअसल धीरेन्द्र जानता था कि जब तक सबरंग है और उसके पास छापने के लिए हर रविवार 32 अदद रंगीन पन्ने हैं, ये सब यूं ही चलने वाला है। जब लोग कीमत अदा करने के लिए तैयार हैं तो वह क्यों न वसूले। और ये सब पत्रकार और संपादक धीरेन्द्र अस्थाना कर रहा था। इन सारे पचड़ों में कहानीकार धीरेन्द्र अस्थाना नहीं था। वैसे भी कहानीकार और पत्रकार धीरेन्द्र अस्थाना दो अलग अलग चेहरे हैं। कहानीकार लो प्रोफाइल और पत्रकार एक अलग ही तरह की छवि लिये हुए। &lt;br /&gt;दरअसल सबरंग के दिनों में एक तरह से वह अपने अभावों भरे बचपन का बदला ले रहा था। वह कीमत वसूल कर रहा था। सत्ता सुख भोग रहा था। उसने बहुत अभाव देखे थे। भूख, अपमान, अभाव, तंगी क्या होते हैं, वह जानता था और फिर उन दिनों को जीना नहीं चाहता था। लोग उससे खेल रहे थे और वह सबको चूतिया बना रहा था। बेशक वह अपनी सेहत गर्क कर रहा था, बेइंतहां दारू पी रहा था, बढ़िया चिकन खा रहा था, रोज रात बारह बजे के बाद नशे में धुत्त घर पहुंच रहा था लेकिन उसके पास अपनी इन सारी हरकतों को जस्टीफाई करने के तर्क थे। &lt;br /&gt;तब धीरेन्द्र की शराबनोशी का यह आलम था कि लोग बाग धीरेन्द्र अस्थाना को दारू अंदर अस्थाना कहने लगे थे और राजेन्द्र यादव जी ने एक बार हंस के संपादकीय में जिक्र आने पर यहां तक लिख दिया था कि धीरेन्द्र अस्थाना भी मोहन राकेश की तरह अपनी शाम की दारू का जुगाड़ करना जानता है।&lt;br /&gt;लेकिन हमेशा चांदनी रात नहीं रहती और हमेशा हमारे कंधों पर खूबसूरत पंख नहीं लगे होते जो हमेशा हमेशा हमें हवा में ही उड़ाते रहें।&lt;br /&gt;जनसत्ता और सबरंग बंद हुए और हर वक्त घनघनाने वाला धीरेन्द्र अस्थाना के घर का फोन एक दम शांत हो गया। बिछुड़े सभी बारी बारी वाला मामला हुआ और मुंबई की भाषा में कहें तो धीरेन्द्र को रातों रात भुला दिया गया।&lt;br /&gt;दिल्ली में जागरण गुप में अपनी नई नौकरी में जाने तक धीरेन्द्र 8 महीने की एक और बेरोजगारी झेल चुका था। यह वक्त था उसके आत्म मंथन का और इस सच्चाई को स्वीकार करने का कि जब तक आपके पास गुड़ होता है तब तक ही चींटे आते हैं। इस बेरोजगारी ने धीरेन्द्र को एक बार फिर से इतनी विचलित कर दिया था कि उसने इन सारी चीजों को सिलसिलेवार अपनी लम्बी और महत्वपूर्ण कहानी नींद से बाहर में बखूबी बयान किया है। इस कहानी का पाठ धीरेन्द्र से सबसे पहले हमारे घर किया था और कहानी सुनाये जाने के पूरे अरसे के दौरान मैं उस दर्द को बखूबी पकड़ पा रहा था जिससे हो कर वह इन दिनों गुजरा था। &lt;br /&gt;जब धीरेन्द्र जागरण ग्रुप ज्वाइन करने दिल्ली जा रहा था तो स्टेशन पर मेरे और कवि मित्र मनोज शर्मा के अलावा कोई नहीं था। आज शहर छोड़ कर जा रहा था दस बरस तक लगातार शिद्दत से अपनी मौजूदगी दर्ज कराने वाला एक कहानीकार, दोस्त, संपादक, सुख दुख का साथी, जिसने कितनों को नौकरी दिलवायी, काम दिलवाया, जिनके काम किये लेकिन सब कुछ यहीं रह गया था और जब फ्रंटियर मेल ने मुंबई सेंट्रल स्टेशन छोड़ा तो उसका सब कुछ यहीं छूट गया था। जिस तरह वह दस बरस पहले एक नयी नौकरी को ले कर होने वाले असमंजस के साथ महानगर मुंबई आया था, उसी तरह के असमंजस ले कर वह जागरण की नयी नौकरी में जा रहा था। &lt;br /&gt;दिल्ली वापसी भी धीरेन्द्र को रास नहीं आयी थी। बेशक अच्छी नौकरी थी अब उसके पास, चैलेंजिंग काम था, नयी पत्रिका थी, अच्छा समूह था, मोबाइल था, सुविधाएं थीं, देखा भाला शहर था, लेकिन इस बार वह अकेला था। सारे दोस्त तो वह गुजर क्यों नहीं जाता के जरिये खो चुका था। धीरेन्द्र ने कई दोस्तों के फोन मिलाये थे लेकिन अच्छा हुआ तुम आ गये। मिलते हैं कभी से बात कभी भी आगे नहीं बढ़ी। ये एक और आत्म मंथन को दौर था जिसने धीरेन्द्र को एक बार फिर से विचलित किया और उसे और अकेला किया। &lt;br /&gt;एक बार फिर नौकरी बदली और धीरेन्द्र एक बार फिर मुंबई में है पिछले डेढ बरस से। इस बार और बेहतर नौकरी है उसके पास। सुविधाएं और हैसियत भी पहले से बेहतर। यह शोफर ड्रिवन गाड़ी से आता जाता है। लेकिन इस बार उसने कोई रिस्क नहीं लिया है। पता नहीं, अब भी उसके आस पास काम मांगने वालों का, या दोस्तों का जमावड़ा होता है या नहीं। शायद एक बात यह भी है कि अब सब कुछ छापना या न छापना अकेले धीरेन्द्र के हाथ में नहीं, फिर भी धीरेन्द्र हर शाम अपने घर पर ही गुजारता है। पीता अब भी है लेकिन अपने पैसों से और घर पर ही और अमूमल अकेले। वह पहले भी कभी कहीं नहीं जाता था, अब तो किसी भी साहित्यिक आयोजन में बिल्कुल भी नहीं जाता। &lt;br /&gt;अब कुछ और छिटपुट और बातें धीरेन्द्र के बारे में&lt;br /&gt;• उसे भाषण देना बिल्कुल नहीं आता। एक वक्त था जब उसने बीए के दौरान अपने फायर ब्रांड भाषणों से खूब आग उगली थी लेकिन बाद में उसे कभी भी मंच से कुछ कहने किसी ने नहीं सुना। बेशक लोग बाग उसका सम्मान करने के नीयत से अपने आमंत्रण पत्र में उसका नाम छाप दें और उसे मंच पर भी बुला लें लेकिन उससे कुछ बुलवा पाना असंभव।&lt;br /&gt;• मुझे याद है नागा बाबा के निधन पर एसएनडीटी विश्वविद्यालय में एक शोक सभा का आयोजन किया गया था। उसमें सभी लोग अपने अपने तरीके से बाबा को याद कर रहे थे। धीरेन्द्र को नागा बाबा का बहुत स्नेह मिलता रहा है। सादतपुर में तो वे पड़ोसी ही रहे थे। जब धीरेन्द्र से कुछ कहने के लिए कहा गया तो उसने शायद अपनी इधर की जिंदगी का सबसे लम्बा भाषण दिया होगा। उसने भर्रायी हुई आवाज में कहा -  नागा बाबा थे, नागा बाबा हैं और नागा बाबा रहेंगे। इतना कह कर वह अपनी सीट पर वापिस आ गया था।&lt;br /&gt;• एक बार मैं धीरेन्द्र के पास बैठा अपनी डिजिटल डायरी में से कोई फोन नम्बर देख रहा था तो धीरेन्द्र ने पूछा कि इसमें और क्या क्या सुविधाएं हैं तो मैंने बताया कि दो सौ साल का कैलेंडर है, कैलकुलेटर है, दुनिया भर के देशों की घड़ी है वगैर वगैरह। धीरेन्द्र ने तब अपने जन्म दिन का वार पूछा तो मैंने देख कर बता दिया। धीरेन्द्र ने तुरंत ललिता को फोन करके बताया। तब धीरेन्द्र ने पूछा कि क्या इससे पता चल सकता है कि मैं 1974 से शुरू करते हुए रोजाना कम से कम एक क्वार्टर के हिसाब से कितनी शराब पी चुका होऊंगा। मैंने हिसाब लगा कर बता दिया तो धीरेन्द्र ने ललिता को दोबारा फोन करके बताया कि अब तक वो इतनी बोतलें शराब पी चुका है। फिर उसने मुझसे पूछा कि अगर हर र्क्वाटर की कीमत औसतन चालीस रुपये लगायी जाये तो कितने की शराब पी होगी। मैंने गिनकर बता दिया तो उसने एक बार फिर ललिता को फोन करके बताया। ललिता ने शायद उस तरफ से यही कहा होगा कि अगर ये सारे पैसे तुम शराब में न उड़ाते तो तुम्हारे पास फलां फलां जैसा घर होता, क्योंकि धीरेन्द्र ने यहां से कहा था कि पागल है तू। शराब के हिस्से के पैसे शराब में ही खर्च होते हैं। हर आदमी अगर शराब न पी कर घर बनाने लगे तो उस घर में बैठ कर करेगा क्या। मैं उम्मीद कर रहा था धीरेन्द्र से कि वह अगला सवाल ये पूछेगा कि जरा बताना कि इस सारी दारू में से मैंने अपने पैसों कि कितनी दारू पी है। न उसने पूछा और न मैंने हिसाब ही लगाया।&lt;br /&gt;• धीरेन्द्र की जिंदगी का ग्राफ देखना बहुत आसान है। उसकी जिंदगी का कच्चा चिट्ठा उसकी कहानियां हैं। उसकी जिंदगी के सारे उतार चढ़ाव, अच्छी बुरी घटनाएं, हादसे, प्रेम, बेरोजगारियां, दूसरों की (अपनी कम) बदतमीजियां सब उसकी कहानियों में जस के जस आये है।&lt;br /&gt;• धीरेन्द्र व्यक्ति और लेखक के रूप में खुद को बेहद प्यार करता है इसलिए उसे अपनी कहानियों के लिए विषय तलाशने बहुत दूर नहीं जाना पड़ता। उसके सभी प्रेम प्रसंग उसकी कहानियों में देखे जा सकते हैं। चूंकि धीरेन्द्र ने गिनी चुनी प्रेम कहानियां ही लिखी हैं, इसलिए उसके प्रेम प्रसंग भी उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। लेकिन मजेदार बात ये रही कि उसके सभी प्रेम प्रसंगों की खबर ललिता को बराबर रही और ललिता ने इस बात का ख्याल रखा कि बात कहीं भी हद से आगे न बढ़े। एक आध बार तो ललिता धीरेन्द्र के प्रेम में पागल लड़की के घर तक जा पहुंची थी कि देखो तुम धीरेन्द्र की जिंदगी में आना चाहो तो बेशक आओ लेकिन इन दोनों बच्चों को संभालने की जिम्मेवारी भी तुम्हारी। भला ये जवाब सुन कर कौन लड़की अपने आपको आगे लाती।&lt;br /&gt;• राजेन्द्र यादव जी अक्सर धीरेन्द्र के प्रेम प्रसंगों को ले कर ललिता से मजाक में कहते हैं कि धीरेन्द्र के पत्र और पुत्र तुम्हें कई लड़कियों के यहां मिल जायेंगे।&lt;br /&gt;• धीरेन्द्र कहानियों को एक ही ड्राफ्ट में लिखता है। घर पर या कहीं बाहर जा कर लेकिन एक बार लिख लेने के बाद उसमें कोई बदलाव नहीं करता। पहला ड्राफ्ट ही आखिरी ड्राफ्ट होता है उसका।&lt;br /&gt;• धीरेन्द्र अपने घर से बहुत शिद्दत से जुड़ा हुआ है। वह टूटे हुए घर से निकल कर आया था, अब टूटे हुए घर के बारे में सोचना भी नहीं चाहता।&lt;br /&gt;•      पता नहीं धीरेन्द्र के इस दावे में कितना सच है कि वह घर परिवार की कीमत पर नहीं पीता। उसके जितने भी यार दोस्त, साथी कहानीकार दारू की वजह से मरे, उन्होंने घर की कीमत पर पी।&lt;br /&gt;•      धीरेन्द्र अपने जन्म दिन (25 दिसम्बर) को ले कर बहुत सेंसिटिव है। वह कई दिन पहले से इस दिन के लिए योजनाएं बनाता है और सुबह से ही फोन के पास बैठ जाता है। उसकी डायरी में सिर्फ एक ही नाम के आगे जन्म दिन लिखा हुआ है और वह नाम है धीरेन्द्र अस्थाना।&lt;br /&gt;•      धीरेन्द्र को यात्राओं से बहुत डर लगता है। सुबह उठना उसके लिए लगभग नामुमिकन है। वह ये दोनों काम ही टालता है। वह किस्मत का धनी है कि उसे हमेशा ही दोपहर से शुरू होने वाली नौकरी मिली। एकाध बार ऐसा हुआ कि उसे किसी काम से मुंबई शहर (वह मीरारोड नाम के 40 किमी दूर उपनगर में रहता है) में सुबह ही पहुंचने की जरूरत पड़ी तो वह रात मुंबई में होटल में ही रुका।&lt;br /&gt;•      धीरेन्द्र बहुत संवेदनशील है और उसे खुश करना और साथ ही नाराज़ करना बहुत आसान है। वह बच्चों की तरह बहलाया जा सकता है और वह बच्चों की तरह रूठ भी सकता है।&lt;br /&gt;•      धीरेन्द्र किसी की भी बात पर विश्वास कर लेता है और बाद में इसका नुक्सान भी उठाता है। &lt;br /&gt; &lt;br /&gt;तो ये है धीरेन्द्र अस्थाना, जिसे मैं बहुत कम जानता हूं। हमारी हमप्याला वाली दोस्ती बहुत कम रही है। हम आपस में अपनी बेहद निजी जिदंगी कभी शेयर नहीं करते। हम बहुत कम मिलते हैं, फोन भी नहीं करते अक्सर। बेशक हर बार तय करते हैं कि पुरानी दोस्ती के नाम पर ही सही, हमें अक्सर मिलना चाहिये। हम एक दूसरे की रचनाएं कम ही पढ़ते हैं और अगर पढ़ते हैं तो उस पर एक दूसरे के मुंह पर रिएक्ट नहीं करते। पिछले तीस पैंतीस बरस से हमारे इसी तरह की पारिवारिक दोस्ती है। हम दोनों की पत्नियां हम दोनों की तुलना में अच्छी मित्र हैं। लेकिन फिर भी कहीं लेकिन एक बात है जो हम दोनों को पिछले तीस इकतीस बरस से जोड़े हुए है वो ये है कि हम दोनों आपस में किसी भी स्वार्थ से जुड़े हुए नहीं हैं और कभी भी हम दोनों ने एक दूसरे को कोई काम नहीं कहा, न नाराज हुए और न ही एक दूसरे से किसी किस्म की उम्मीद ही रखते हैं। &lt;br /&gt;यही हमारे इस संबंध का आधार है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-5072391195039020970?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/5072391195039020970/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=5072391195039020970&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5072391195039020970'/><link rel='self' 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type='html'>बुकर प्राइज़ की शुरुआत लगभग 40 बरस पहले हुई थी। एक बरस छोड़ कर दिया जाने वाला ये सम्मान अब तक सात भारतीय लेखकों की कृतियों पर भी दिया जा चुका है। सम्मान के लिए पात्र होने के लिए किताब के साथ स्तरीय होने के अलावा बस, एक ही शर्त जुड़ी होती है कि उसका अंग्रेज़ी अनुवाद उपलब्ध हो।&lt;br /&gt;साहित्य की किसी भी विधा से चुने गये एक अध्यक्ष और दो सदस्यों वाली बुकर प्राइज़ चयन समिति दुनिया भर के विभिन्न शहरों में बैठकें करती है और पहले दौर में 15 किताबों की सूची शार्टलिस्ट करती है। ये सूची सार्वजनिक नहीं की जाती। &lt;br /&gt;चयन के दूसरे चरण में छ: पुस्तकें चुनी जाती हैं। इस सूची को सार्वजनिक किया जाता है। बाकी काम फिल्मों के सबसे बड़े अंतर्राष्ट्रीय सम्मान ऑस्कर की तर्ज पर होता है और पूरी दुनिया में फैले पाठक तब छ: में से एक किताब का चयन करते हैं। &lt;br /&gt;बुकर प्राइज़ के लिए चुनी गयी किताब के साथ बहुत बड़ी पुरस्कार राशि तो जुड़ी हुई है ही, नाम, सम्मान और कई भाषाओं में कृति के अनुवाद की असीम संभावनाएं और करोड़ों पाठकों तक सीधी पहुंच के रास्ते इसी सम्मान से खुलते हैं। शॉर्टलिस्ट किये गये 6 लेखक भी खासा नाम और नावां कमाते हैं और उनके ऑडियो, विडियो और प्रिंट मीडिया में प्रकाशित इंटरव्यू मीडिया और पाठक जगत में जगह पाते हैं। उनकी किताबों की बिक्री भी बढ़ती ही है।&lt;br /&gt;बेशक हमारा पन्द्रह बरस पुराना इंदु शर्मा कथा सम्मान बुकर प्राइज़ की तुलना में अभी काफी पीछे है लेकिन अगर आपके पास तीन बातें हों तो आपको सफलता की सीढ़ियां चढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। ये तीन चीज़ें हैं ड्रीम, डिज़ायर एंड विज़न यानि सपना, उसे पूरा करने की अदम्य इच्छा और आकाश का-सा फैलाव लिये विज़न।&lt;br /&gt;तो कथा यूके के कर्ता-धर्ता तेजेन्‍द्र शर्मा अपने इन्हीं तीन गुणों के आधार पर एक दिन दुनिया भर में दिये जाने वाले साहित्यिक पुरस्कारों की पांत में कथा यूके सम्मानों को बुकर प्राइज़ के आस पास देखना चाहते हैं। बेशक दोनों सम्मानों के स्वरूप में और दायरे में जमीन आसमान का फर्क है लेकिन सपना तो वही होता है ना जो हमें सोने न दे, न कि वह जो हम नींद में देखते हैं। तेजेन्‍द्र का यही सपना इन सम्मानों को बंबई के एयर इंडिया ऑडिटोरियम से ले कर लंदन के हाउस ऑफ लार्ड्स तक ले गया है। बेशक अब तक का ये सफर इतना आसान कभी नहीं रहा है लेकिन एक कहावत है ना कि पानी के जहाज सबसे ज्यादा सुरक्षित बंदरगाह पर होते हैं लेकिन वे बंदरगाह पर ठहरे रहने के लिए बने नहीं होते। तो यही बुकर प्राइज़ की बराबरी वाला सपना भी वे एक दिन पूरा करके दिखायेंगे। अपने सभी सपनों को पूरा करने की अपनी कूवत, नीयत और हिम्मत के साथ तेजेन्‍द्र अपने इस सपने को भी पूरा कर ले जायेंगे। &lt;br /&gt;कथा यूके के सम्मानों को वे आज उस मुकाम तक तो पहुंचा ही चुके हैं कि हर बरस जब अप्रैल के आस पास इन पुरस्कारों की घोषणा होती है तो उससे काफी पहले से देश भर में हर स्तर उस बरस की चयनित किताब को ले कर कयास भिड़ाये जाने लगते हैं और नाम उछाले जाने लगते हैं। ईष्ट मित्र, प्रशंसक, साथी रचनाकार, सभी तो बेसब्री से इन सम्मानों की घोषणा की राह देख रहे होते हैं उन दिनों। &lt;br /&gt;एक बात और है। बुकर प्राइज़ की तरह न तो पिछले पन्‍द्रह बरसों से कथा यूके के निर्णायक मंडल के नाम घोषित किये गये हैं और न ही अंतिम 6 की सूची में आयी किताबों का नाम ही सार्वजनिक किया जाता है। इसके अलावा, कथा यूके सम्मानों के चयन का आधार लेखक नहीं, किताब होती है और इसका सबसे बड़ा सुबूत यही है कि अब तक दिये गये पन्‍द्रह में कम से कम 5 सम्मान लेखक या लेखिका की पहली कृति पर दिये गये हैं। बेशक तेजेन्द्र को और कई बार कथा यूके के भारतीय प्रतिनिधि के नाते मुझे भी सबसे ज्यादा इसी सवाल का जवाब देना पड़ता है। अक्सर और ज्यादातर हमसे पहला प्रश्न निर्णायक मंडल में शामिल विद्वानों के नामों का ले कर ही होता है। इस सवाल का जवाब तेजेन्‍द्र हमेशा यही दिया करते हैं कि पहला सच ये है कि साहित्य अकादमी में हर वर्ष चयन समिति के नाम सबको पता होते हैं और दूसरा सच हर बरस ये होता है कि पुरस्कारों की घोषणा से पहले पूरे देश को मालूम रहता है कि इस बरस किस भाषा में ये सम्मान किसकी झोली में डाला जाने वाला है। साहित्य अकादमी में यही दोनों सच कई बरसों से दोहराये जा रहे हैं। इसके बाद साहित्य अकादमी के काम करने के ढंग की पारदर्शिता, विश्वसनीयता और निष्पक्षता पर कुछ भी कहना शेष नहीं रह जाता। &lt;br /&gt;तेजेन्द्र आगे कहते हैं कि अगर हम निर्णायक मंडल की घोषणा नहीं करते तो कम से कम किसी भी तरह की सिफारिश या पक्षपात के आरोप से तो बचे ही रहते हैं, साथ ही इस आशंका से भी तो बचे रहते हैं कि घोषित किये जाने से पहले सम्मान के बारे में किसी को भी नहीं पता होता। और यही हमारे सम्मानों की पारदर्शिता, विश्वसनीयता, निष्पक्षता और ईमानदारी का प्रमाण है।&lt;br /&gt;तेजेन्‍द्र अकूत मानसिक और शारीरिक ऊर्जा के भंडार हैं और कथा यूके के लिए हमेशा कुछ न कुछ बेहतर सोचने और करने में लगे ही रहते हैं। कथा यूके उनके लिए जीवन का आधार है, मानसिक बल है और जीवन धारा है। यही उनकी जीवन शक्ति है। उनके मन में कथा यूके के लिए कितना सम्मान है इस बात को इस किस्से से समझा जा सकता है। &lt;br /&gt;शायद 2003 या 2004 में किसी मामूली सी तकनीकी गलती के कारण उनकी नौकरी पर बन आयी थी और उन्हें जबरन लम्बी छुट्टी पर घर पर बिठा दिया गया था। एक तरह का निलम्बन। &lt;br /&gt;कथा यूके का आयोजन सिर पर था और सारी तैयारियां न केवल धन और समय मांगती थीं, ठंडे दिमाग से सोचने समझने और कुछ करने के लिए असीम मानसिक शांति की भी मांग करती थीं। बेरोजगार रहने और आर्थिक रूप से बेहाल रहने के बावजूद वे पूरी मुस्तैदी से सारी तैयारियों में लगे रहे और आयोजन बहुत सफल रहा। पूरे अरसे के दौरान उनके चेहरे पर कहीं शिकन तक नहीं थी। सम्मानित रचनाकार बहुत खुश हो कर वापिस लौटे। &lt;br /&gt;मैं उस बार शायद दो हफ्ते के लिए उनका मेहमान रहा। पहले हफ्ते तो उन्होंने यही कहा कि आयोजन के लिए छुट्टी ली है लेकिन दूसरे हफ्ते वे बाकायदा बैग ले कर ड्यूटी के लिए निकलते रहे और शाम के वक्त वापिस आते रहे। मुझे भारत आने के बहुत दिनों बाद पता चला कि वे उन दिनों नौकरी से बाहर थे, पगार नहीं मिल रही थी उन्हें और उन्होंने फिर भी किसी तरह न केवल मेरे आने जाने का टिकट जुटाया था बल्कि मेरे और परिवार के लिए हमेशा की तरह उपहार भी दिये थे। मुझे ये भी बहुत देर से पता चला था कि उनकी नौकरी न रहने की खबर उनके परिवार को भी नहीं थी। बेशक हम दोनों ने आपस में आज तक इस बात का जिक्र नहीं किया है लेकिन निश्चित ही अपनी व्यक्तिगत परेशानियों की काली छाया तेजेन्द्र कथा यूके के पूरे आयोजन पर नहीं पड़ने देना चाहते थे। शायद उस वर्ष के सम्मानित लेखक को आज तक ये बात पता न हो कि उनके लंदन प्रवास के पूरे अरसे के दौरान जिस तरह तेजेन्द्र हँसते खिलखिलाते उनकी आवाभगत में लगे रहे थे, दरअसल खुद कितने परेशान चल रहे थे।&lt;br /&gt;अपने खराब स्वास्थ्य, नौकरी पर एक के बाद एक आते संकट, किसी को भी तोड़ देने की हद तक बिगड़ चुकी पारिवारिक स्थितियों और बिलकुल अलग थलग पड़ जाने के मारक अनुभवों के बावजूद तेजेन्द्र हिम्मत नहीं हारते और एकला चलो रे की तर्ज पर न केवल पिछले दस बरस से इंगलैंड में कथा यूके की मशाल जलाये हुए हैं, उन्होंने वहां कहानी पाठ, कहानी कार्यशाला, गीत संगीत के कार्यक्रमों, नाटकों और भारत से पधारने वाले अमूमन सभी लेखकों की स्थानीय समुदायों से मुलाकात जैसे कई सार्थक सिलसिले शुरू किये हैं और इन सब प्रयासों के बेहतर उन्हें परिणाम भी मिले ही हैं। वे 10 बरस पहले जब लंदन गये थे तो वहां के हिन्दी रचनाकारों की इक्का दुक्का किताबें ही छपी थीं लेकिन ये तेजेन्द्र और उनकी कथा यूके की गतिविधियों और प्रेरणा का ही कमाल है कि इस अरसे में कई विधाओं में हिन्दी में तीस से भी अधिक किताबें न केवल आ चुकी हैं बल्कि पुरस्कृत भी हो चुकी हैं। इंगलैंडवासी रवनाकारों की दस पुस्तकों को तो इस अरसे में कथा यूके के पद्मानंद साहित्य सम्मानों से ही नवाजा जा चुका है।&lt;br /&gt;इतने बड़े आयोजन के लिए धन जुटाना कोई आसान काम नहीं होता। सम्मानित रचनाकार और यदि साथ में सम्मान प्रदान करने के लिए कोई वरिष्ठ लेखक भारत से ही जा रहा हो तो उसके लिए भी भारत से लंदन की वापसी टिकट, वीज़ा शुल्क, हफ्ते भर होटल में ठहराना, एयरपोर्ट पर रिसीव करना और छोड़ना, खाने पीने की व्यवस्था, घुमाना फिराना, उनके सम्मान में गोष्ठियां आयोजित करना, गीतांजलि बहुभाषीय समाज के सम्मान के लिए उन्हें बरमिंघम ले जाना, उन्हें व्यक्तिगत उपहार आदि दे कर सम्मानित करना, इन सबके लिए विदेशी मुदा में ढेर सारे धन, धैर्य, समय और स्रोतों की ज़रूरत होती है। ये सब तो है ही, भारतीय प्रतिनिधि का बिल्ला लगाये ये बंदा भी हर बरस लंदन जा धमकता है यानी एक और अदद बंदे पर यहां गिनाये गये सारे खर्चे! &lt;br /&gt;इसके अलावा, शील्ड है, मानपत्र है, स्मारिका के लिए भाग दौड़ है, उसका प्रकाशन है, स्मारिका भारत से ले जाने की व्यवस्था है, दोशाला है, आयोजन स्थल का किराया है, जलपान है, निमंत्रण पत्र तथा स्मारिका के प्रकाशन और वितरण की व्यवस्था है, आयोजन के लिए हफ्ते भर की छुट्टी है, सारे आयोजन के लिए भाग दौड़ है, हाउस ऑफ लार्ड्स की औपचारिकताएं हैं। ये सारे काम तेजेन्द्र और अकेले तेजेन्द्र को करने होते हैं और वे पिछले दस बरस से बखूबी कर रहे हैं। अगले दो आयोजनों के लायक धन हमेशा वे अपनी जेब से एहतिआतन बचाये रखते हैं। &lt;br /&gt;स्मारिका के लिए विज्ञापन जुटाना शायद किसी भी देश में सबसे मुश्किल काम माना जाता है लेकिन वे अपने अकेले के बलबूते पर इस काम को भी लंदन में सरअंजाम दे ही रहे हैं। वे स्मारिका के लिए विज्ञापन मांगने में कोई शर्म महसूस नहीं करते। उनका कहना है कि मैं एक पराये देश में हिन्दी का माहौल बनाने में और भारत के एक हिन्दी के लेखक को विदेश में सम्मान दिलाने और यहां हिन्दी के पाठक तैयार करने की मुहिम पर अकेले के दम पर लगा हुआ हूं, सरकार करोड़ों रुपये खर्च करके हिन्दी को यूएनओ में ले जाने के प्रस्ताव तक पास नहीं करवा पाती और कथा यूके अपने पुरस्कारों के लिए हाउस ऑफ लार्ड्स तक जा पहुंची है तो इतनी मदद तो सबको करनी ही चाहिये। इसके अलावा किसी भी भारतीय भाषा की सर्वोत्तम कृति के लिए लंदन में और वह भी हाउस ऑफ लार्ड्स में हर बरस दिया जाने वाला ये इकलौता सम्मान है तो इस सम्मान समारोह के अद्भुत पलों का साक्षी बनने के लिए जितने भी उदार और मेहरबान लोगों और संस्थाओं को जोड़ा जा सके, उतना बेहतर।&lt;br /&gt;पिछले तीन बरस से लंदन में तेज को अपनी संस्था की गतिविधियों को नये और सार्थक आयाम देने के लिए एक नया हमसफ़र मिला है। ये हमसफ़र कथा यूके की सारी गतिविधियों में बराबरी से शरीक तो होता ही है, इसके लिए धन जुटाने, नये प्रोजेक्ट शुरू करने और चल रहे कामों को और नयी ऊंचाइयों तक ले जाने की तेजेन्द्र् की कोशिशों में लगातार मानसिक और आत्मिक बल देता है। ये हमसफ़र उन्हें मिला है यूके की सरकार में काउंसिलर ज़किया ज़ुबैरी के रूप में। वे खुद बेहतरीन रचनाकार हैं और घनघोर पाठक हैं। भारत में पली बढ़ी, कराची में ब्याही और पिछले कई बरसों से लंदन में रह रहीं ज़किया जी संगीत, साहित्य और इतर विधाओं के ज़रिये हिन्दी-उर्दू के बीच नज़दीकियां लाने के मकसद से एशियन कम्यूनिटी आर्ट्स नाम की संस्था चलाती हैं। कथा यूके के साथ मिल कर उन्होंने पिछले चार बरसों में साहित्य और संगीत की दिशा में कई अहम काम किये हैं। &lt;br /&gt;दोनों संस्थाओं की ईमानदार कोशिशों को इसी बात से समझा जा सकता है कि 26/11 के मुंबई हादसे के बाद उन्होंने लंदन में हिन्दी में लिखने वाले भारतीय कहानीकारों और उर्दू में लिखने वाले पाकिस्तान के लेखकों को एक ही मंच से पेश किया। मकसद यही दिखाना था कि साहित्य या अदब किसी भी तरह की सीमाओं से या मनमुटावों से बंधा नहीं होता और साहित्य ही है जो इन्सान को बेहतरी की राह पर ले जाने का काम कर सकता है। ज़किया ज़ुबैरी कथा यूके के लिए और कथा यूके के जरिये हिन्दी के लिए जो कुछ भी कर रही हैं, उसके लिए फ्रेंड, फिलास्फर एंड गाइड जैसा जुमला भी छोटा पड़ता है।&lt;br /&gt;1995 में शायद जुलाई या अगस्त में जब पहला इंदु शर्मा कथा सम्मान बंबई के एयर इंडिया के भव्य ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया था तो उसने कई इतिहास रच दिये थे। डॉक्टर धर्मवीर भारती को कई बरसों बाद बंबईवासियों ने मंच से बोलते और गीतांजलिश्री को उनके कहानी संग्रह अनुगूंज के लिए पहले इंदु शर्मा कथा सम्मान से सम्मानित करते देखा था। ये भी बंबई में पहली बार हो रहा था कि थियेटर का कोई मंजा हुआ कलाकार मंच से पुरस्कृत रचनाकार की कहानी का सधी हुई आवाज़ में पाठ कर रहा था। पूरे आयोजन की रूपरेखा न केवल बहुत सोच समझ कर बनायी गयी थी बल्कि आगे आने वाले बरसों के लिए इंदु शर्मा कथा सम्मान आयोजन एक मानंदड की तरह देखे और याद किये जाने लगे थे। ये आलम हो चला था कि हर बरस बंबई वासी वार्षिक इंदु शर्मा कथा सम्मान आयोजन की राह देखा करते थे। समय की पाबंदी, मंच के साथ कोई समझौता नहीं, व्यापक मीडिया कवरेज, हर मेहमान को निमंत्रण पत्र भेजने के अलावा फोन करके आमंत्रित करने की परम्परा तेजेन्द्रॉ ने ही डाली थी। और ये परम्परा बिना किसी व्यवधान के तब तक चलती रही जब तेजेन्द्रि को कुछ कारणों से भारत को ही विदा कहनी पड़ी। लेकिन तब उन्हें नहीं पता था कि संभावनाओं, उम्मीदों और कुछ कर दिखाने का एक और बड़ा और विस्तृत आकाश लंदन में उनकी राह देख रहा है।&lt;br /&gt;लंदन तेजेन्द्र के लिए कई मायनों में लकी सिद्ध हुआ है। बेशक व्यक्तिगत स्तर पर कुछ घाटे के सौदे उनके हिस्से में आये हैं। इन घाटे के सौदों के लिए वे अपने सितारों को ही दोष दे कर चुप रह जाना पसंद करते हैं लेकिन ये तो जग जाहिर है कि वहां जा कर कथा सम्मान अंतर्राष्ट्रीय हुआ है, उसका नाम, प्रतिष्ठा और दायरा बढ़ा है बेशक उससे उम्मीदें भी बढ़ गयी हैं। ये लंदन जाने के कारण ही हुआ है कि कथा यूके सम्मान मुंबई के एयर इंडिया ऑडिटोरियम से चल कर हाउस ऑफ लार्ड्स की दहलीज लांघ पाये हैं और ये तेजेन्द्र के लिए, कथा यूके सम्मानों के लिए, हिन्दी के लिए और हम सब के लिए एक बहुत बड़ी छलांग है। कुछ ही कदमों में चांद छू लेने की सी छलांग। ऐसी ही कुछ और छलांगें हैं जो उनकी योजनाओं में हैं और वे इनके जरिये आकाश तक जाना चाहते हैं। आप उन पलों की कल्पना ही कर सकते हैं जब सात समंदर पार इंगलैंड की धरती पर हिन्दी की अपनी श्रेष्ठ किताब के लिए भारत से वहां गया हमारा लेखक सम्मानित हो रहा होता है। ये सम्मान तब सिर्फ उस लेखक का नहीं हो रहा होता, हिन्दी और पूरी भारतीय अस्मिता का सम्मान हो रहा होता है। अपने अकेले के बलबूते पर वहां तक पहुंचने की हिम्मत और जज्बा तेजेन्द्र में ही है।&lt;br /&gt;कथा यूके को लेकर तेजेन्द्र इतने पोज़ेसिव और संवेदनशील हैं कि उसे और नयी ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए हर वक्त जुटे रहते हैं। एक आयोजन खत्म हुआ नहीं होता कि वे अगले आयोजन की तैयारियों में जुट जाना चाहते हैं। उनका बस चले तो एक सफल आयोजन की प्रेस रिलीज़ भेजने के साथ ही उसी लिफाफे में अगले सम्मान के लिए नामांकन मांगने के लिए अनुरोध भेज दें। (कथा यूके के सम्मानों के चयन प्रक्रिया का एक हिस्सा ये भी है कि हर वर्ष देश भर में लेखकों, संपादकों, प्रकाशकों, मित्रों और सुधि समीक्षकों को पत्र भेज कर उनसे पिछले तीन वर्ष के दौरान छपी, पाठकों और समीक्षकों द्वारा सराही और पसंद की गयी तीन किताबों की सिफारिश करने का अनुरोध किया जाता है।)&lt;br /&gt;वे समय के इतने पाबंद हैं कि आयोजन के लिए पूरे बरस का खाका एक बरस पहले से बना कर रख लेते हैं और उसके हिसाब से चलने का न केवल खुद प्रयास करते हैं बल्कि मुझ पर लगातार ये दबाव रहता है कि उनके शेड्यूल का पूरा पालन हो। परफैक्शन तो हर काम में उन्हें इतना चाहिये कि पिछले दस बरस से कथा यूके के जुड़ा रहने और अपनी सामर्थ्य भर काम करने और उसमें कई नये आयाम जोड़ने के बावजूद मैं आज तक उनके परफैक्शन लेवल तक नहीं पहुंच पाया हूं। कहीं ज़रा सी चूक हुई नहीं कि साहब का मूड ऑफ। तब उन्हें मनाने की कोई तरकीब काम नहीं आयेगी। हां, बिना शर्त माफीनामा दाखिल करने से कुछ बात बन सकती है।&lt;br /&gt;मुझे कथा यूके से जुड़े दसेक बरस तो हो ही गये होंगे। भारत में पांचों सम्मान समारोहों का तथा लंदन में एक तरह से 6 सम्मान समारोहों का साक्षी रहा हूं मैं। कथा यूके के काम करने के तरीकों को लेकर हम दोनों में गहरे मतभेद हैं, लेकिन हम दोनों ही अपनी-अपनी जिद की ढपली बजाते हुए अपने अपने तरीके से काम करते ही रहते हैं क्योंकि तेजेन्द्र की तरह मेरा भी ये मानना है कि ये सम्मान एक लेखक द्वारा अपनी दिवंगत लेखिका पत्नी की स्मृति में किसी तीसरे लेखक की श्रेष्ठ कृति को दिये जाने की एक ईमानदार कोशिश है और इसे जितना बेहतर, पारदर्शी, निष्पक्ष और स्तरीय बनाया जा सके, उतना ही अच्छा। और इस ईमानदार कोशिश में अगर मेरे अनगढ़ हाथों का थोड़ा-सा सहारा मिल रहा है तो ये मेरा सौभाग्य है। &lt;br /&gt;तेजेन्द्र से मेरी दोस्ती उतनी ही पुरानी है। पारिवारिक दोस्ती। हम दोनों के कई दुख भी सांझे हैं और सुख भी। बेशक जब हम इंदु शर्मा कथा सम्मान में पहली बार 1995 में मिले थे, उससे पहले भी एक दूसरे की रचनाओं से परिचित थे ही लेकिन मैं तब हाल ही में अहमदाबाद में 6 बरस गुजार कर वापिस आया था और एक तरह से बंबई के लेखन जगत के लिए अजनबी ही था। सिर्फ धीरेन्द्र अस्थाना से ही पच्चीस बरस पुराना दोस्ताना था। तेजेन्द्र से परिचय जिस तेजी से दोस्ती में बदला, उसे देख कर कई दोस्तों को रश्क होता है। साल भर पहले मेरे भीषण एक्सीडेंट के समय जिस तरह से तेजेन्द्र ने मेरे परिवार को मानसिक सहारा दिया, वह एक मिसाल है हमारी दोस्ती की। &lt;br /&gt;मेरा पहला उपन्यास हादसों के बीच बेशक उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया था लेकिन मेरे दूसरे उपन्यास देस बिराना के वे घनघोर प्रशंसक हैं। इसका बर्ल्ब भी तेजेन्द्र ने ही लिखा है और इसका लोकार्पण भी लंदन में ही कथा यूके के सम्मान समारोह में ही हुआ था। इस उपन्यास के लंदन वाले अंश के लिए मैंने जितना होम वर्क किया है या जानकारी जुटायी है, उसमें तेजेन्द्र का बहुत बड़ा हाथ है। तब मैं पहली बार लंदन गया था और लगातार पन्द्रह दिन अपने उपन्यास के चऱित्रों के साथ एक तरह से भटकता रहा था। उससे पहले और बाद में भी मैं उनसे अपने उपन्यास के लिए जानकारी लेता रहा था।   &lt;br /&gt;कई लोगों की राय में तेजेन्द्र अपने आप में एक चलती फिरती संस्था हैं जो कई मोर्चों पर एक साथ जूझते रहते हैं। इसमें कोई शक नहीं। सवेरे साढ़े चार या पांच बजे से उनकी जो दिनचर्या शुरू होती है, रात ग्यारह बजे से पहले खत्म नहीं होती। दिन भर में वे पूरी दुनिया में बसे दोस्तों से, परिचितों से, संपादकों से, लेखक मित्रों से, भारत में अपनी मां से, बहनों से फोन या चैट से या ईमेल से सम्पर्क कर लेते हैं। एकाध ग़ज़ल या कविता लिख लेते हैं, कहानी पर काम कर लेते हैं और बढ़िया खाना भी बना लेते हैं। लम्बे फोन करना उनका प्रिय शगल है। नौकरी भी कर आते हैं इस बीच। &lt;br /&gt;बस, एक ही व्यवधान होता है उनकी पूरी दिनचर्या में। अगर कहीं आप गाड़ी चला रहे हों और तेजेन्द्र आपके साथ वाली सीट पर बैठे हों तो उन्हें खर्राटे वाली नींद में जाने में सिर्फ 15 सेकेंड लगते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-5409609123146203959?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/5409609123146203959/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=5409609123146203959&amp;isPopup=true' title='3 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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जवाब'/><title type='text'>दिल्‍ली पूछे चार सवाल</title><content type='html'>जब भी दिल्ली जाता हूं, दिल्ली मुझसे हर बार वही चार सवाल पूछती है &lt;br /&gt;- कब आये&lt;br /&gt;- कहां ठहरे हैं&lt;br /&gt;- किस किस से मिले और &lt;br /&gt;- कब जायेंगे। &lt;br /&gt;      &lt;br /&gt;        बात शुरू से शुरू करता हूं। मैं दिल्ली  में 78 से 81 तक लगातार रहा। तब बेशक लिखना शुरू नहीं हुआ था लेकिन मेरे ही शहर के वरिष्ठ कथाकार और मेरे बड़े भाई की तरह मुझसे स्‍नेह रखने वाले सारिका के उप संपादक सुरेश उनियाल की वजह से दिल्ली  के साहित्य जगत में उठने बैठने का लाइसेंस मिला हुआ था और उनके सभी मित्र मेरे भी मित्र बन गये थे। उन्हीं  के साथ मंडी हाउस में श्रीराम सेंटर, मोहन सिंह प्लेस और दूसरे साहित्यिक ठीयों पर जाने के मौके मिलते थे। उनकी और उस समय के सबसे मशहूर, दिलदार और ठहाकेबाज दोस्त कलाकार हरि प्रकाश त्यागी की सोहबत में हंस के दफ्तर में एंट्री मिली थी। इन्हीं  दोनों की सोहबत में कई वरिष्ठ रचनाकारों के साथ बैठने और तरल गरल के कई मौके मिले थे। &lt;br /&gt;     तब दिल्ली छूट गयी लेकिन आना जाना और मित्रों से मिलना लगातार बना रहा। लेकिन छठे छमाहे चेहरे दिखाने वालों को भला कौन याद रखता है। दिल्ली  मेरा चेहरा भूलने लगी थी। किसी को नाम याद रहा था तो किसी को चेहरा। वैसे भी मैं न तो लेखक था और न पार्टीबाज। लेखकों की बिरादरी में बैठने वाला एक बाहरी आदमी ही तो था। &lt;br /&gt;     मेरा लिखना बहुत देर से यानी लगभग 35 बरस की उम्र में 1987 के आस पास शुरू हुआ। स्थायी रूप से दिल्ली छोड़ने के छ: बरस बाद। साल में एवरेज दो कहानियां दिल्ली की पत्रिकाओं में ही छपती रहीं। बेशक 1991 में वर्तमान साहित्य में अपनी अश्लीलतम कहानी उर्फ़ चंदरकला के प्रकाशन के साथ ही मैं धमाका कर चुका था लेकिन दिल्ली को पता नहीं था कि इस कहानी का लेखक वही छोकरा है जो मोहन सिंह प्‍लेस में चुपचाप सबकी बातें सुनता रहता था। लेकिन जब भी दिल्ली जाता तो दिल्ली मुझसे सौजन्यवश ये चारों सवाल जरूर पूछती थी। बेशक न मेरा नाम जानती हो न काम।&lt;br /&gt;     वक्त  ने करवट ली। मैंने कुछ और काम किये। पिछले बीस बरस से कर ही रहा हूं और साल में औसतन दो बार दिल्ली जाता ही हूं। चार्ली चैप्लिन की आत्म कथा का अनुवाद, चार्ल्स डार्विन की आत्म कथा का अनुवाद, एनिमल फार्म का अनुवाद, ऐन फ्रैंक की डायरी का अनुवाद, गुजराती से कुछ महत्व पूर्ण किताबों के अनुवाद। इनके अलावा मेरी खुद की कई किताबें जो दिल्ली ने ही छापीं। देस बिराना उपन्यांस अगर मैंने अंग्रेजी में लिखा होता तो विषय, चयन और ट्रीटमेंट की वज़ह से बुकर प्राइज तो पहली ही बार में झटक लाता।&lt;br /&gt;      मेरा संकट ये रहा कि दिल्ली हमेशा मुझे आधा अधूरा जानने का नाटक करती रही। किसी को नाम पता है तो किसी को चेहरा याद है। काम से तो दिल्ली मुझे जानती नहीं क्यों कि मुझे पढ़ा ही नहीं गया। मिलने पर भेंट में मैं किताबें दे नहीं पाया, गाहे बगाहे फोन मैं करता नहीं रहा और होली दीवाली पर कार्ड मैंने भेजे नहीं। कुसूर मेरा भी तो है।&lt;br /&gt;      इस बीच दिल्ली  भी बहुत बदल चुकी है। नयी पत्रिकाएं, नये लेखक, नये पत्रकार, नये संपादक। पुराने तो अपनी अपनी जगह हैं ही सही। नहीं बदले तो बस दिल्लीं के ये चार सवाल। हर बार मुझसे पूछे ही जाते हैं। न कम न ज्यादा। भले ही ये सवाल दिल्ली अकेले मिलने पर पूछे या दिल्ली में रोज़ाना होने वाले एक सौ सैंतीस साहि‍त्यिक आयोजनों में मिलने पर बारी बारी से। &lt;br /&gt;    देखने में ये चार सवाल सौजन्य वश पूछे जाने वाले आम सवाल लगते हैं लेकिन हैं नहीं। इन चार सवालों में जितने गहरे अर्थ छुपे हैं, उनसे मेरा सारा इतिहास, भूगोल, अतीत, वर्तमान और भविष्य जान लिया जाता है। हो सकता है, दिल्ली बाहर से आने वाले सब लेखकों से यही सवाल पूछती हो। &lt;br /&gt;     मुलाहजा फर्माइये। सवाल नम्बर एक। साधारण सवाल है और इसका साधारण ही उत्तर होता है। लेकिन जब बताता हूं कि चार दिन हो गये आये हुए तो दिल्ली के तेवर बदल जाते हैं, हुंअ, चार दिन हो गये आये हुए और जनाब आज दर्शन दे रहे हैं। जब मैं बताता हूं कि आज ही सुबह आया तो तेवर बदल जाते हैं- आते ही निकल पड़े दिल्ली फतह करने। &lt;br /&gt;     दूसरा सवाल - कहां ठहरे हैं। मतलब कोई ढंग का ठौर ठिकाना है या स्टेशन के क्लॉक रूम में ही सामान रखा है इस उम्मीद में कि दिल्‍ली से हो मुलाकात और सामान ले कर पहुंच जायें सीधे उसके घर। इसीलिए दिल्ली पहले पू्छ लेती है कि कहां ठहरे हैं। ठहरे भी हैं या नहीं का जवाब भी इसी सवाल में छुपा रहता है। &lt;br /&gt;     सवाल नम्बर तीन - किस किस से मिले। ये बहुत गहरा सवाल है। इसके जवाब में आदमी चारों खाने चित्त हो जाता है। इसी इकलौते सवाल के जवाब में दिल्ली मेरी सारी पोल खोल देती है। एकदम नंगा कर देने जैसी हालत।&lt;br /&gt;दरअसल दिल्ली में बहुत सारे मठ हैं। शिवाले हैं। स्तूप हैं। मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारे हैं। दिल्लीं सल्तनत तो है ही। फिर जागीरें हैं, इलाके हैं। वजीर हैं, दरबारी हैं, बांदियां हैं। जी हुजूर हैं और सलाम साब हैं। सबके अपने अपने रिसाले हैं और इलाके हैं। दरबारी हैं और चिलमची उठाने धरने वाले हैं। खबरची और लठैत हैं।&lt;br /&gt;     इस सवाल के जवाब में अपन से चूक हुई नहीं कि गयी भैंस पानी में। जब मुझसे पूछा जाता है कि किस किस से मिले मैं बता दूं कि फलां मठ से हो कर आ रहा हूं और अलां वजीर के पास जा रहा हूं तो मेरी तो हो गयी ना छुट्टी। दिल्ली में और कुछ हो न हो, इस बात का बहुत आदर किया जाता है कि कोई भी किसी के इलाके में घुसपैठ नहीं करता। सबकी सल्तनत सलामत रहती है। ये तो मेरे जैसे बाहरी लोग ही होते हैं कि अपनी पांडुलिपियों, अप्रकाशित कहानियों और कविताओं का गट्ठर उठाये उठाये एक दरबार से दूसरे दरबार में हाज़िरी बजाते नज़र आते हैं। ये सवाल इसीलिए पूछती है दिल्ली ताकि पता तो चले, बंदा किस खेमे का है। और फिर दिल्ली के पास देने को हमेशा बहुत कुछ होता है। सम्मान, पुरस्कार, जूरी की सदस्‍यता, किसी ऊंची समिति में जगह, विदेश यात्रा, फैलोशिप, लेक्चररशिप, रीडरशिप, प्रोफेसरशिप, संपादक का पद, दुनिया भर के विश्वविद्यालयों में पद या तैनाती, पत्रकार का पद, ब्यूरो चीफ का पद, अलां पद और फलां पद। यानी दिल्ली हर समय क्रिसमस के बाबा सांता क्लाज की भूमिका में रहती है और उसकी झोली इफरात में इन सारी चीज़ों से हर वक्त भरी ही रहती है। अब ये चीज़ें हर ऐरे गैरे नत्थू  खैरे को फ्री फंड में तो नहीं दी जा सकती ना। बेशक किसी न किसी भोंदूमल और गेंदाराम को तो देनी ही हैं।&lt;br /&gt;    तो दिल्ली इस तीसरे सवाल के जरिये पहले से जान लेना चाहती है कि ये जो छठे छमाहे चेहरा दिखाने वाला जो दाढ़ीजार है, वह है किस खेमे का। कहीं ऐसा न हो कि माल गलत आदमी के हाथ पड़ जाये। दिल्ली की काबलियत को सलाम करने को जी चाहता है। सिर्फ चार सवाल और सामने वाला आदमी अपना सबकुछ उगल चुका होता है। &lt;br /&gt;      अब आखिरी सवाल का भेद भी जान लीजिये। बड़े भोलेपन से पूछती है दिल्ली – कब तक रहेंगे। आप उतने ही भोलेपन से बतायेंगे कि परसों तक हूं। परसों देर रात की फ्लाइट है। तो दिल्ली बेहद अफसोस के साथ भेद खोलती है – अरे, क्या बताऊं, मैं आज ही रात एक जरूरी काम से रांची (ये जगह फाफामऊ या गंज बसौदा भी हो सकती है।) जा रहा हूं। मजबूरी है। आपके लिए गोष्ठी करना चाहता था। सोच रहा था कुछ दोस्तों को बुला लेता, इस बहाने आपको सुनने सुनाने का मौका मिल जाता, अब, खैर, अगली बार आना तो... ज़रा पहले खबर कर दी होती तो...इस बार ही..। अब मैं कहूं कि मैं पंद्रह दिन हूं दिल्ली में तो दिल्ली  तुरंत इत्मीनान से कहेगी- अरे, फिर क्या, कई बार मुलाकात हो जायेगी तब तो। और यकीन मानिये, मैं अगले पंद्रह दिन तक क्या पंद्रह बरस भी दिल्‍ली में दिल्ली को खोजता रहूं, दिल्ली नज़र नहीं आयेगी। यही दिल्‍ली की खासियत है। सवाल दिल्ली के और जवाब मेरे। सारे भेद खुल गये, राज़दार ना रहा। &lt;br /&gt;    अब दिल्ली जाने से बहुत डरता हूं। दिल्ली से नहीं, दिल्ली के इन सवालों से। लेखक बनने और सचमुच कुछ कर दिखाने के बाद भी मैं दिल्‍ली में जा कर तय नहीं कर पाता कि मैं किस मठ का हूं या किस दरबार में जा कर मुझे सलाम करना चाहिये। कई बार सोचता हूं कि लेखक भी हूं या नहीं। &lt;br /&gt;      वजह वही है कि दिल्ली हर जगह और हर शिवाले में मुझसे यही चार सवाल पूछती है और मेरे ही जवाबों से ये कह कर मेरी छुट्टी कर देती है। अब मैं दिल्ली जाता भी हूं तो डरते डरते किसी एक ही दिल्ली वासी से मिलता हूं और अपना पूरा वक्त उसी के साथ बिताता हूं। तब मैं एक ही दिल्ली के चार सवालों के जवाब दे कर बच जाता हूं। अब मैं भी थोड़ा सयाना हो गया हूं क्योंकि मुझे इन सवालों के भेद पता चल गये हैं। &lt;br /&gt;    मैंने इस बीस बरसों में दिल्ली से कुछ नहीं मांगा। बिन मांगे तो क्या देगी दिल्ली। दिल्ली ने कभी नहीं कहा कि आये हो तो चलो तुम्हारे सम्मान में कहानी पाठ रख लेते हैं या दो चार दोस्तों को घर पर बुला लेते हैं। शाम एक साथ गुज़ारेंगे। दिल्ली ने कभी नहीं कहा कि तुमने इतनी महत्वपूर्ण किताबों के अनुवाद किये हैं, चलो एकाध जमावड़ा ही इस बहाने कर लेते हैं। सम्मान वगैरह तो दूर की बात है, दिल्ली ने शायद ही कभी खत लिख कर मेरी किसी रचना के लिए मुझे बधाई दी हो। दिल्ली ये जान कर हैरान होगी कि 1978 से दिल्ली से लगातार नाता बनाये रखने के बावजूद इकतीस बरस बाद मैंने इस बार पहली बार प्रेस क्लब भीतर से देखा। वहां मुझे एक प्रकाशक मित्र (निश्चित रूप से मेरे प्रकाशक नहीं। अपना प्रकाशक तो वैसे भी मित्र नहीं हो सकता।) ले कर गये थे। &lt;br /&gt;    दिल्ली हर बार बहुत तपाक से मिलती है। न मिलने पर नाराज़ भी होती है। लेकिन क्या करे। मज़बूर है अपने ये चार सवाल पूछने के लिए। न पूछे तो करे क्या। आखिर जात तो पूछनी ही पड़ती है ना सामने वाले की। अब हर ऐरे गैरे..     &lt;br /&gt;     एक बात जरूर बतानी है दिल्ली को मुझे। अगर कभी नहीं पूछे ये चार सवाल इन सारे बरसों में किसी ने तो एक ही आदमी ने। उसने हमेशा यही कहा कि अगर मैं दफ्तर में हूं तो तुम मिलने जरूर आओ। मैं जब भी उनसे मिला तो उन्होंने सिर्फ एक ही सवाल पूछा - शाम को क्या  कर रहे हो। और अगर मेरी शाम खाली नहीं भी रही हो तो उनके साथ शाम बिताने का न्यौता मैं कभी भी ठुकरा नहीं पाया। बेशक अब कई बरसों से उनके पास भी नहीं नहीं जा पाया हूं। &lt;br /&gt;    मेरा इशारा राजेन्द्र यादव की तरफ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-5329858232899247840?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/5329858232899247840/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=5329858232899247840&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5329858232899247840'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5329858232899247840'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/08/blog-post_16.html' title='दिल्‍ली पूछे चार सवाल'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-6222183119952623027</id><published>2009-08-12T22:03:00.000-07:00</published><updated>2009-08-12T22:07:21.105-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='खब्‍बू दिवस'/><title type='text'>खब्‍बू दिवस</title><content type='html'>आज एक बार फिर आपसे खब्‍बू दिवस यानी लेफ्ट हैंडर्स डे पर बात कर रहा हूं। पिछले बरस इसी दिन आपसे खब्‍बुओं के बारे में ढेर सारी बातें शेयर की थीं। आज कुछ और बातें।&lt;br /&gt;        पिछले दिनों कुछ ब्‍लागर्स मेरे घर आये थे तो खब्‍बुओं की दास्‍तान चली और सबने अपने अपने खब्‍बू अनुभव सुनाये। कुछ मित्र हैरान थे कि हम अपने ही खब्‍बू साथियों के बारे में कितना कम जानते हैं। उनकी तकलीफें, जरूरतें, उनकी सुविधाएं और उनकी परेशानियां हम हमेशा अनदेखी कर जाते हैं।&lt;br /&gt;      कल जयपुर से मेरे मित्र प्रेम चंद गांधी का फोन आया था। वे राजस्‍थान में रहने वाले किसी खब्‍बू लेखक के बारे में जानना चाह रहे थे। सचमुच हमारे पास इस बात के कोई आंकड़े नहीं हैं कि कितने हिन्‍दी लेखक वामपंथी विचार धारा के होते हुए भी दायें हाथ से लिखते हैं और कितने नरम वादी होते हुए भी बायें हाथ्‍ा से लेखनी चलाते हैं। किसी के पास अगर खब्‍बू लेखकों के आंकड़े हों तो जरूर शेयर करें। अगर आप खुद खब्‍बू लेखक हैं तो भी बतायें। &lt;br /&gt;       चलिये आपको खब्‍बू संसार की एक मनोरजंक यात्रा कराते हैं-  &lt;br /&gt;       ये अमरीकी राष्‍ट्रपति खब्‍बू थे - James A. Garfield (1831-1881) बीसवें, Herbert Hoover, (1874-1964) इकतीसवें, Harry S. Truman, (1884-1972) तेतीसवें, Gerald Ford, (1913-2006) अड़तीसवें, Ronald Reagan, (1911-2004) चालीसवें, George H.W. Bush, (1924-) इकतालीसवें, Bill Clinton, (1946- ) बयालीसवें।&lt;br /&gt;      ज्‍यादातर खब्‍बू ड्राइवर पहली ही बार में ड्राइविंग टैस्‍ट पास कर लेते हैं।&lt;br /&gt;      गुजरात में ही आपको सबसे ज्‍यादा खब्‍बू डाक्‍टर मिलेंगे। गुजरात में आपको कई पति पत्‍नी दोनों ही खब्‍बू मिल जायेंगे।&lt;br /&gt;      गुजरात में मैंने देखा कि कक्षाओं में कम से कम पांच सीटें ऐसी होती हैं जिन पर खब्‍बू बैठ सकें।  &lt;br /&gt;      दुनिया भर के खब्‍बुओं को एक मंच पर लाने के लिए एक वेबसाइट है lefthandersday.com &lt;br /&gt;      इस साइट पर कोई भी खब्‍बू सदस्‍य फ्री में सदस्‍य बन सकता है।  &lt;br /&gt;      ये साइट तरह तरह की प्रतियोगिताएं, सर्वेक्षण्‍ा आदि आयोजित करती है। &lt;br /&gt;      खब्‍बुओं की जरूरतें बेशक वही होती हैं जो सज्‍जुओं की होती हैं लेकिन उनके हाथ की करामात अलग होती है। ढेरों चीजें हैं जो हम रोजाना इस्‍तेमाल करते हैं' कैंची, कटर, रसोई का सामान, कीबोर्ड, गिटार, माउस यानि सब कुछ। ऐसे में कोई दुकान भी तो होगी जो इनका ख्‍याल रखे और सबकुछ खब्‍बुओं को ही बेचे। &lt;br /&gt;      ये दुकान है - http://www.anythinglefthanded.co.uk वहां सिर्फ और सिर्फ खब्‍बुओं द्वारा इस्‍तेमाल की जाने वाली चीजें मिलती हैं।&lt;br /&gt;      अक्‍सर जुड़वा बच्‍चों में से एक खब्‍बू होता है। &lt;br /&gt;      हकलाना और डाइलेक्सिया जैसे रोग खब्‍बुओं के हिस्‍से में ज्‍यादा आते हैं क्‍योंकि उन्‍हें ठोक पीट कर सज्‍जू बनाने की कोशिश्‍ों सबसे ज्‍यादा होती हैं।  &lt;br /&gt;      खब्‍बू बेशक हर क्षेत्र कला, खेल, लेखन और संगीत में उत्‍कृष्‍ट होते हैं लेकिन वे आम तौर पर हॉकी खिलाड़ी नहीं होते। क्‍यों का जवाब आप खुद सोचें। &lt;br /&gt;      तो आज खब्‍बू दिवस पर सभी खब्‍बुओं को प्‍यार भरा सलाम &lt;br /&gt;सूरज&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-6222183119952623027?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/6222183119952623027/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=6222183119952623027&amp;isPopup=true' title='5 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/6222183119952623027'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/6222183119952623027'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='खब्‍बू दिवस'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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है। एक बार नहीं, कर्इ बार। &lt;br /&gt;एक तरह से वहीं रहते हुए लिखना शुरू हुआ था और पहला कहानी संग्रह वहीं रहते हुए आया था। तभी गुजरात साहित्य अकादमी बनी थी और आस पास और कोई कहानीकार न पा कर उन्होंने पहला साहित्य अकादमी सम्मान मुझे ही थमा दिया था। तब शहर में आने वाले अमूमन सभी साहित्याकारों के सम्मान में साहित्यिक जमावड़े मुझ छड़े के घर पर ही होते थे। हम यार दोस्त तो आपस में मिल कर धमाल मचाते ही थे। &lt;br /&gt;शायद तब दो एक बातें मेरे पक्ष में थीं। एक तो उम्र तब चालीस से कम थी और मैं साहित्य का ककहरा सीख रहा था। अहमदाबाद जाते समय मेरे पास कुल जमा तीन कहानियों की जमा पूंजी थी। हंस में यह जादू नहीं टूटना चाहिये और धर्मयुग में अधूरी तस्वीर तब छपी ही थीं। वर्तमान साहित्य में उर्फ चंदरकला अहमदाबाद में रहते हुए ही आयी थी और मैं रातों रात उस वक्त का सबसे विवादास्पद लेखक बन चुका था। इस तरह से गुजरात ने मुझे बहुत कुछ‍ दिया था और जब मैं वहां से लौटा था तो बेशक कहानियां ज्यादा नहीं थीं मेरे पास लेकिन अगले दस बरस के लेखन के लायक कच्चा माल मेरे पास था और मैं उसी की पुडि़या बना बना कर लिखता छपता रहा। मैं दूसरी बार मुंबई में 1995 से 2005 तक रहा और नौकरी के चक्कर में बेहद व्यस्त रहने के बावजूद मेरी मूल, अनूदित और संपादित 17 किताबें आयीं। &lt;br /&gt;लेकिन सच कहूं तो पुणे यानी पुण्य नगरी में पचास महीने बिता कर जाने के बाद भी मैं लगभग खाली हाथ ही वापिस जा रहा हूं। एक भी कहानी नहीं लिखी। बस, चार्ली चैप्लिन और चार्ल्स डार्विन के अनुवाद ही हो पाये। बेशक पढ़ा खूब और फिल्में भी खूब देखीं लेकिन मैं पुणे में कुछ नया लिखने, दोस्त बनाने, पुणे के भीतर उतरने और बहुत कुछ जानने आया था। हो ही नहीं पाया। मेरी झोली ही फटी निकली। अगर बाद में मेल मुलाकात के न्यौते आये भी तो मेरा अहं आड़े आ गया और नुक्सान में मैं ही रहा। मेरी बहुत अच्छी  दोस्त सुनीता इस बात को ले कर आज तक मुझसे नाराज़ है कि मैं खुद आगे बढ़ कर मौके के अनुरूप अपने आपको प्रस्तुत क्यों नहीं कर पाता। ये अलग बहस का मुद्दा है।  &lt;br /&gt;हां, इस दौरान ब्लागों और इंटरनेट के जरिये एक बहुत बड़े पाठक वर्ग से जुड़ने का सुख मिला और एक नयी दुनिया से रू ब रू हुआ। &lt;br /&gt;बेशक कुछ बातों का संतोष भी है कि मैं अपने ऑफिस में बेहतर तरीके से हिन्दी और साहित्य के लिए कुछ कर पाया। बैंकिंग महाविद्यालय में कहानी पाठ, नाटक, प्रेम चंद की 125वीं जयंती पर कई आयोजन, बैंकिंग विषयों पर राष्ट्रीय स्तर के 6 सेमिनार और 1000 से भी ज्यादा बैंकरों को कम्‍प्‍यूटर, अनुवाद और अब यूनिकोड का प्रशिक्षण संतोष देने वाले प्रसंग हैं। कहानी पाठ की परम्परा शायद बैंकिंग जगत में मैंने ही शुरू की हो। सूर्यबाला, सुधा अरोड़ा, जगदम्बा प्रसाद दीक्षित, शेखर जोशी, गोविंद मिश्र, मनहर चौहान, आबिद सुरती, ओमा शर्मा, दामोदर खड़से, रजनी गुप्त, अल्पना मिश्र और वंदना राग सरीखे कहानीकारों ने हमारे यहां कहानी पाठ करके अगर बैंकरों का दिल जीता तो राजेन्द्र यादव और वेद राही ने भी अपनी उपस्थिति से महाविद्यालय को गरिमा प्रदन की। &lt;br /&gt;तो विदा पुणे नगरी, आना जाना तो लगा रहेगा लेकिन ये कचोट जरूर रहेगी कि जो कुछ सोच कर आया था, दिया नहीं तुमने मुझे। &lt;br /&gt;फिर सही।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-6481739518600156477?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/6481739518600156477/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=6481739518600156477&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/6481739518600156477'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/6481739518600156477'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/07/blog-post.html' title='लौटना मुंबई नगरी....'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-71628827802448107</id><published>2009-06-08T21:20:00.000-07:00</published><updated>2009-06-08T21:25:37.093-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रसंगवश'/><title type='text'>कितना अच्‍छा दिन</title><content type='html'>सुबह सुहानी है। मौसम मीठा मीठा सा तराना छेड़े हुए है। आज का दिन हमारे लिए खास है। बड़ा बेटा अपनी पहली नौकरी पर गया है। नागपुर से बीटेक और आइआइएम, लखनऊ से एमबीए करने के बाद। मेरे खराब स्‍वास्‍थ्‍य के बावजूद मेरी हिम्‍मत बढ़ाने के लिए उसने मुझे अपने पैंट कमीज प्रेस करने के लिए दिये जो मैंने खुशी खुशी कर दिये। मुझे टाई की नॉट लगाने के लिए दी। मैंने लगा दी।  &lt;br /&gt;कई बरस पहले के दिन याद आ गये। बीस बरस पहले भी उसे स्‍कूल भेजने के दिन हम इतने ही उत्‍साह में थे। उसे तैयार कर रहे थे। तब बरसात हो रही थी और बेटा चिल्‍ला रहा था - जल्‍दी करो रेन कोट पहनाओ नहीं तो बरसात रुक जायेगी और रेनकोट पहनना बेकार हो जायेगा। आज भी बेशक मौसम वैसा ही है लेकिन बरसात नहीं है। शहर बेशक वही है। तब बंबई था अब मुंबई हो गया है। &lt;br /&gt;वक्‍त कितनी तेजी से करवट बदलता है। पता ही नहीं चलता कब हम बूढ़े हो गये और बच्‍चे बड़े। कई बार हम बूढ़े होने से इनकार भी कर देते हैं। बस या राह में कोई अंकल कहे या मराठी या गुजराती में वढील यानी बुजुर्ग कहे तो नाराज हो जाते हैं। दिल्‍ली यात्रा में एक बस में इस बार कंडक्‍टर ने मेरी सफेद दाढ़ी देख कर मुझसे कहा कि सीनियर सिटीजन की सीट पर जो आदमी बैठा है उसे उठा कर आप बैठ जाओ लेकिन मैंने तकलीफ के बावजूद इनकार कर दिया कि सीनियर सिटीजन का हक मांगने लायक तो नहीं ही हुआ। खड़ा रहा। तब कंडक्‍टर खुद उठ कर उस आदमी तक गया और मेरे लिए सीट खाली करायी। तब बैठा।&lt;br /&gt;      एक और मजेदार किस्‍सा हुआ। मेरी एक मित्र है - फोन वाली मित्र। कभी मिले नहीं। मिलेंगे भी नहीं, पता नहीं। अक्‍सर बातें करते हैं। पढ़ाती है। अक्‍सर मेरी सलाह लेती रहती है और अपने सुख दुख बांटती है। उसे कुछ काम की सलाह दी होगी तो बेहद खुश थी। कहने लगी कि सूरज तुम्‍हें कुछ देना चाहती हूं - मना मत करना। मैं हैरान, फोन पर भला क्‍या देगी। उसने फोन पर किस करने की आवाज निकाली और कहा - ये स्‍वीट किस मेरी तरफ से। मैं हँसने लगा। बोली - हँसे क्‍यों। मैंने जवाब दिया कि मैं अट्ठावन बरस की उम्र में फोन पर इश्‍क लड़ा रहा हूं और पप्पियां पा रहा हूं। मेरे पिता जी जब इस उम्र में थे तो पेंशन का हिसाब लगाते रहते थे, तब उनके चार बच्‍चों की शादी हो चुकी थी और उनके चार पांच पोते पोती थे। ये बात 1985 की है और वे ये सब करने की सोच भी नहीं सकते थे। हम न केवल कर रहे हैं बल्कि ये उम्‍मीद भी करते हैं कि अभी तो ये सब चलते रहना है।&lt;br /&gt;      हमें पता है कि बेटा कभी कभार पी लेता है या सिगरेट के कश ले लेता है। छ: बरस हास्‍टलों में रहा और जिस तरह के माहौल में, अकेलेपन में और पढ़ाई के तनावों में रहा हम समझ सकते हैं कि कई बार इन चीजों से बचना मुश्किल होता है। लेकिन उसने जब भी पी, मम्‍मी को फोन पर बता दिया कि आज थोड़ी सी ली है। हमें खबर रहती है। अब मैं उसे किस मुंह से मना करूं जब कि मैं खुद ये सारी हरकतें बीस बरस की उम्र से पहले शुरू कर चुका था।&lt;br /&gt;       वह बी टैक करके आया था और उसका घर पर पहला दिन था। हम बातें कर रहे थे और उसकी बहुत इच्‍छा थी कि मेरे साथ पहली बार बीयर पीये। वह घंटों से जद्दो जहद कर रहा था लेकिन कह नहीं पा रहा था। शायद नागपुर से तय करके आया था कि पीयेगा लेकिन कहे कैसे। तभी मैंने उससे कहा कि बेटे अब तुम ग्रेजुएट हो गये हो इस हिसाब से मेरे दोस्‍त हुए। हम अब बराबरी से बात कर सकते हैं। चलो बेटे तुम्‍हारे ग्रेजुएशन की खुशी में हम दोनों आज एक साथ बीयर पीयेंगे।&lt;br /&gt;       आप समझ नहीं सकते उसे इस बात से कितनी राहत मिली कि मैं अपने इस एक ही वाक्‍य से उसकी दुनिया में शामिल हो पाया और उसे अपनी दुनिया में ले आया।&lt;br /&gt;       उसी ने तब ये बात बतायी थी कि वह मुझसे बीयर पीने के लिए कहने के लिए दो दिन से कहना चाह रहा था। डर भी रहा था कि मैं पता नहीं कैसे रिएक्‍ट करूं। बेशक अब वह एमबीए हो कर आ गया है, आज पहला दिन है उसके जॉब का लेकिन हम दोनों ने दोबारा नहीं पी है एक साथ। जरूरत ही नहीं हुई। &lt;br /&gt;       कभी मेरे पिता ने भी मेरा संकोच इसी तरह से दूर किया था और मेरी तरफ दोस्‍ती का हाथ बढ़ाया था। मैं अपनी नौकरी के सिलसिले में 22 बरस की उम्र में घर से 2000 मील दूर हैदराबाद में तीन बरस तक रहा था और दोस्‍तों के साथ कभी कभार बैठने लगा था। तभी घर लौटने पर एक बार मेरे पिता ने कहा था कि अगर नहीं पीते हो तो बहुत अच्‍छी बात है और अगर पीते हो तो हमारी कम्‍पनी में पी सकते हो। हम तुम्‍हें अच्‍छी कम्‍पनी देंगे। तय था कि कभी उनके साथ बैठ कर पी जायेगी तो पूरे अनुशासित तरीके से और लिमिट में ही पी जायेगी। हम बाप बेटे (मैं और मेरे पिता) आज भी एक साथ बैठ कर पीते हैं लेकिन सारी मर्यादाओं में रहते हुए।&lt;br /&gt;     मैं नहीं चाहूंगा कि ये परम्‍परा आगे भी जारी रहे लेकिन आने वाले वक्‍त के बारे में कौन कह सकता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-71628827802448107?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/71628827802448107/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=71628827802448107&amp;isPopup=true' title='8 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/71628827802448107'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/71628827802448107'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/06/blog-post.html' title='कितना अच्‍छा दिन'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-99761764984888498</id><published>2009-05-22T04:59:00.001-07:00</published><updated>2009-05-22T05:01:59.852-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बचपन'/><title type='text'>कठपुतली का खेल</title><content type='html'>पिछले कुछ दिनों अस्पताल में रहना पड़ा तो पहले भी कई बार देखी फिल्म साउंड ऑफ म्यूजिक अपने लैपटॉप पर देख रहा था। फिल्म में एक दृश्य है जिसमें बच्चे घर पर ही अपने मेहमानों को कठपुतली का खेल दिखाते हैं। इस दृश्य को देख कर अपने बचपन के दिन याद आ गये जब हमें अक्सर अपने मोहल्लों में ही न केवल कठपुतली के खेल देखने को मिल जाते थे बल्कि कई बार दो-चार पैसे में बायोस्कोप दिखाने वाले भी आते रहते थे। संगीत और गीत ऐसे सभी खेलों का अनिवार्य हिस्सा हुआ करता था। कई बार इन खेलों में विश्वसनीयता भरने के लिए पात्रों के अनुरूप कोई कहानी भी सुनायी जाती थी। बायोस्कोप वाले ये पुराना फिल्मी गीत जरूर गाते थे - देखो देखो देखो, बायोस्कोप देखो, दिल्ली का कुतुब मीनार देखो, लखनऊ का मीना बाजार देखो। एक लाइन शायद मोटी-सी धोबन के लिए भी हुआ करती थी।&lt;br /&gt;वे सारे दिन हवा हो गये। &lt;br /&gt;ये सारी चीजें हमारी स्मृतियों के साथ ही दफन हो जायेंगी। हो सकता है हमसे पहले वाली पीढ़ी के पास अपने-अपने बचपन की स्मृतियों का इनसे अलग कोई अनमोल खज़ाना हो। वह भी हम तक या हमारी बाद की पीढ़ी तक कहां पहुंचा है।&lt;br /&gt;हमारा बचपन लकड़ी और मिट्टी के खिलौने से ही खेलते बीता है। गुल्ली डंडा, चकरी, कंचे, लट्टू, गेंद तड़ी, लुका-छिपी, पतंग उड़ाना और लूटना, आइस-पाइस, पुराने कपड़ों से जोड़-तोड़ कर बनायी गयी गेंद और कुछ ऐसे खेल जिनमें कुछ भी पल्ले से लगता नहीं था। हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा हो जाये। पेड़ों पर चढ़ना तो सबके हिस्से में आता ही था, दूसरों के बगीचों में फल पकने का इंतज़ार भला कौन कर पाता था। अगर आसपास तालाब हुआ तो तैराकी की ट्रेनिंग तो सेंत-मेंत में ही मिल जाया करती थी। किराये की साइकिल की दुकानें हर मौहल्ले में हुआ करती थीं जहां दो आने में घंटा भर चलाने के लिए छोटी साइकिल किराये पर मिल जाया करती थी।&lt;br /&gt;वे दिन भी हवा हुए।&lt;br /&gt;दस-पन्दह बरस पहले तक बच्चों के हाथ में चाहे जैसे भी हों, खिलौने नज़र आ जाते थे। इलैक्ट्रानिक या बैटरी से चलने वाले। फिर वीडियो गेम का वक्त आया। यानी ऐसे खेल जो आप मशीन से ही खेलते हैं, अकेले खेलते हैं और घर बैठे खेलते हैं। &lt;br /&gt;वे दिन भी गये। &lt;br /&gt;वक्त बीतने के साथ-साथ मिल-जुल कर खेलने वाले खेल कम होते गये। हमारी कॉलोनी में बच्चे बेशक शाम के वक्त एक साथ खेलते और शोर करते नज़र आते हैं लेकिन वे बेहद संयत और अनुशासित तरीके से खेल रहे होते हैं।&lt;br /&gt;आजकल के बच्चे खेलों के मामले में और अकेले हो गये हैं। वे मोबाइल पर या पीसी पर गेम खेलते नज़र आते हैं जिनमें सारे रोमांच तो होते हैं, बस नहीं होती तो खेल भावना या खुद खेलने का अहसास। मोबाइल ने तो सबको इतना अकेला कर दिया है कि सोच कर ही डर लगता है।&lt;br /&gt;बच्चे या तो मोबाइल पर गेम खेल रहे होते हैं या फिर ईयर फोन कानों में ठूंसे अपनी अपनी पसंद का संगीत सुनते नज़र आते हैं। आपस में संवाद की तो गुंजाइश ही नहीं रही है। सब कुछ एसएमएस के जरिये। जब संवाद नहीं होगा तो झगड़े भी नहीं होंगे और जब झगड़े नहीं होंगे तो सहनशक्ति कैसे बढ़ेगी, त्याग की भावना कहां से आयेगी। लेने के अलावा देने के सुख का कैसे पता चलेगा। रूठने मनाने की रस्में कैसे अदा होंगी।&lt;br /&gt;हमें याद आता है हमारे खेल न सिर्फ खेल होते थे, बल्कि जीवन के कई जरूरी पाठ सीखने के मैदान भी होते थे। कितने तो झगड़े होते थे। कई बार सिर फुट्टौवल की नौबत आ जाती थी और मां-बापों को बीच में आना पड़ता &lt;br /&gt;था। मज़े की बात ये होती थी कि बच्चों के झगड़ों में बड़ों के बीच नाराज़गी महीनों चलती थी लेकिन बच्चे अगली सुबह फिर वही एक होते थे और गलबहियां डाले वही मस्ती कर रहे होते थे।&lt;br /&gt;रामलीला हमारे बचपन का अनिवार्य हिस्सा हुआ करती थी। रामलीला बेशक दस बजे शुरू होती हो, साढ़े आठ बजते ही हम झुंड के झुंड बच्चे अपनी अपनी दरी और शॉल वगैरह ले कर सबसे आगे बैठने के चक्कर में निकल पड़ते थे और आखिरी सीन के बाद ही लौटते थे। घर वापिस आने की यात्रा भी बेहद रोमांच भरी होती थी। कई लोग बाहर सड़कों पर अपनी चारपाइयों पर सोये नज़र आते थे तो उन्हें चारपाइयों समेत उठा कर दूसरी जगह ले जा कर छोड़ आना हमारा प्रिय शगल होता था। गर्मियों की रातों में तो हम ये काम बहुत मज़े से करते थे। &lt;br /&gt;हमारे बच्चे इस बात पर विश्वास नहीं करेंगे कि हम खुद इसी तरह पूरे बचपन गली-मुहल्ले में या छतों पर चारपाइयां डाल कर सोते रहे हैं। गर्मियों में रात आने से पहले आँगन में या छतों पर पानी का छिड़काव करना ज़रूरी काम हुआ करता था। &lt;br /&gt;वे दिन भी हवा हुए।&lt;br /&gt;मेरे बच्चे अब बड़े हो चले। मुंबई महानगर में रहे हैं और कॉलोनियों में ही रहते आये हैं तो लकड़ी और मिट्टी के खिलौने, गुल्ली डंडा, चकरी, कंचे, लट्टू, गेंद तड़ी वगैरह उन्हें झोपड़पट्टी के बच्चों वाले खेल लगते रहे। ये चीज़ें अब मिलती भी नहीं। पेड़ों पर चढ़ना उन्हें आता नहीं, ट्यूशनों के चक्कर में कभी भी स्विमिंग सीखने के लिए समय नहीं निकाल पाये। कभी पतंग उड़ाने का मूड हुआ भी तो बिल्डिंग का वाचमैन छत की चाबी ही नहीं देता। हर बार रह जाता है। हां, साइकिल जरूर चला लेते हैं। मुंबई में आपको हर कालोनी में न चलायी जा रही साइकिलों की अच्छी खासी कब्रगाह जरूर नज़र आ जायेगी। हम उस दो आने की किराये की साइकिल पर घंटे भर में पूरे शहर का चक्कर लगा आते थे, अब बच्चे साइकिल ले कर बाहर सड़क पर जाने के बारे में सोच ही नहीं सकते। ट्रैफिक इतना कि आदमी सही सलामत सड़क पार कर ले तो बहुत बड़ी बात है। &lt;br /&gt;कुछ बरस हुए, छोटे बेटे का लट्टू खेलने का मन हुआ। किसी दोस्त को खेलते देख कर आया होगा। यकीन मानिये, बाजार में रंगीन और लाइट वाले प्लास्टिक के लट्टू तो बहुत थे लेकिन रस्‍सी लपेट का हथेली पर भी खेला जा सकने वाले लकड़ी के लट्टू की खोज ने मुझे नाकों चने चबवा दिये। हम खिलौनों की कम से कम पचास दुकानों पर तो गये ही होंगे। कई दिन के बाद मिला लट्टू झोपड़पट्टी की एक दुकान में लेकिन तब तक बच्चे का लट्टू खेलने की इच्छा ही मर चुकी थी।  &lt;br /&gt;वे लट्टू भी हवा हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-99761764984888498?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/99761764984888498/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=99761764984888498&amp;isPopup=true' title='4 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/99761764984888498'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/99761764984888498'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/05/blog-post_22.html' title='कठपुतली का खेल'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-5435563996828941312</id><published>2009-05-12T06:48:00.000-07:00</published><updated>2009-05-12T06:57:22.922-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रसंगवश'/><title type='text'>बहुत निराश हुआ चालीस बरस बाद अपने स्‍कूल जा कर</title><content type='html'>बहुत बरसों से ये इच्‍छा थी कि अगली बार जब भी अपने शहर देहरादून  जाऊं, उस गांधी स्‍कूल में जरूर जाऊं जहां से मैंने 1968 में हाईस्‍कूल पास किया था। बेशक 1974 में नौकरियों के चक्‍कर में हमेशा के लिए मैंने अपना शहर छोड़ दिया था और उसके बाद भी कुछ बरस तक वहां रहा था, छठे छमाहे वहां जाने के बावजूद स्‍कूल के अंदर कभी जाना नहीं हो पाया था। कभी स्‍कूल बंद होता था तो कभी मेरे पास ही टाइम का टोटा होता था। &lt;br /&gt;मैं कभी बहुत अच्‍छा विद्यार्थी नहीं रहा था। उस समय के चलन के हिसाब से हम सब बच्‍चे मास्‍टरों की वज‍ह बेवजह मार खाते ही बड़े होते रहे और अगली कक्षाओं में जाते रहे। लेकिन कुछ था जो इतने बरसों से मुझे हॉंट कर रहा था कि उस सारे माहौल को एक बार फिर महसूस करना है जहां से निकल कर मैं यहाँ तक पहुंचा हूं। बेशक कोई बहुत बड़ा तीर नहीं मार पाया साहित्‍य या नौकरी में या जीवन में लेकिन जो भी बना हूं, नींव पड़ने का सिलसिला तो उसी स्‍कूल में शुरू हुआ था।&lt;br /&gt;कुछ खट्टी मीठी यादें थीं जो ताज़ा कर लेना चाहता था और भले की कुछ देर के लिए ही सही, उस पुराने माहौल में वक्‍त गुज़ारना चाहता था।&lt;br /&gt;इस बार तय कर लिया था कि जाना ही है। मैंने कन्‍फर्म करने के लिहाज से प्रधानाचार्य का नाम पता किया था और उन्‍हें खत डाला था कि इस तरह मैं एक पूर्व विद्यार्थी के नाते स्‍कूल आना और बच्‍चों से मिलना बतियाना चाहता हूं। जाने से पन्‍द्रह बीस रोज पहले उप प्रधानाचार्य का फोन भी आ गया था और उन्‍होंने इस बात पर बहुत खुशी जाहिर की थी। कहा था कि पहुंचने पर मैं उन्‍हें सूचित कर दूं।&lt;br /&gt;तय दिन की सुबह तक मेरे पास कोई जानकारी नहीं थी कि मुझे कितने बजे पहुंचना है वहां। मजबूरन इंटरनेट से बीएसएनएल की मदद से प्रिंसिपल के घर का नम्‍बर खोजा और उन्‍हें याद दिलाया कि मैंने उन्‍हें आने के बारे में खत लिखा था। थोड़ी देर माथापच्‍ची करने पर उन्‍हें याद आ गया। बोले कभी भी चले आओ। मैं हैरान हुआ, मैंने अपने पत्र में लिखा भी था और उप प्रधानाचार्य को फोन पर भी बताया था कि मैं बच्‍चों के बीच कुछ वक्‍त गुज़ारना चाहता हूं।&lt;br /&gt;खैर, पुस्‍तकालय के‍ लिए और छोटी कक्षाओं के बच्‍चों के लिए भेंट स्‍वरूप देने के लिए खरीदी गयी किताबों का बैग संभाले में जब स्‍कूल के गेट पर पहुंचा तो याद आया कि दो मिनट की देरी हो जाने पर भी ये गेट हमारे लिए किस तरह से बंद हो जाया करता था और प्रार्थना की सारी औपचारिकताएं निपट जाने के बाद ही खुलता था और दो बेंत मार खाने के बाद ही हमें अंदर आने दिया जाता था।&lt;br /&gt;गेट लावारिस सा खुला हुआ था। किसी ने नहीं रोका मुझे।&lt;br /&gt;प्रिंसिपल का कमरा भी गेट की तरह लावारिस तरीके से खुला था और भीतर बाहर कोई नहीं था। तब हम इस बात की कल्‍पना भी नहीं कर सकते थे। वैसे तो पूरा स्‍कूल ही मातमी तरीके से उजड़ा हुआ लग रहा था और साफ पता चल रहा था कि लापरवाही का साम्राज्‍य है। प्रिंसिपल के कमरे के दोनों तरफ दीवार पर बने दो ब्‍लैक बोर्ड अभी भी थे। याद करता हूं कितने बरसों तक मैंने बायें वाले बोर्ड पर अख़बार से देख कर समाचार लिखे होंगे। गैरी सोबर्स के एक ओवर में छ: छक्‍के लगाने का समाचार इस बोर्ड पर मैंने ही लिखा था।&lt;br /&gt;तब हमारा स्‍कूल सप्‍ताह के छ: दिनों के हिसाब से छ: दलों में बंटा हुआ होता था। नाम याद करने की कोशिश करता हूं: नालंदा, विक्रमशिला, सांची, उत्‍तराखंड, वैशाली और .. बाकी एक नाम याद नहीं आ रहा। जिस दल का दिन हो, वह दायीं तरफ वाले बोर्ड पर अपने दल के पदाधिकारियों के नाम लिखता था और पूरे दिन अनुशासन और सफाई का काम संभालता था। स्‍कूल की सारी गतिविधियां दलों के बीच होती थीं। मैं जिस दल में भी रहा, बोर्ड पर खूब सजा कर लिखने की जिम्‍मेवारी मेरी हुआ करती थी। अब दोनों बोर्ड साफ थे। पता नहीं कब से कुछ भी न लिखा गया हो।&lt;br /&gt;लाइब्रेरी की तरफ मुड़ा तो वहीं स्‍टाफ रूम नज़र आया। पांच सात जन बैठे हुए थे। मेज के सिरे पर बैठे सज्‍जन ही प्रधानाचार्य होंगे, ये सोच के मैंने प्रणाम किया और अपना परिचय दिया। उन्‍होंने पहचाना और भीतर आने का इशारा किया। संयोग से उनके साथ वाली सीट पर मेरे परिचित हिन्‍दी अध्‍यापक बैठे हुए थे। वे उठ खड़े हुए और दो चार मिनट में मेरी सारी उप‍लब्धियां गिना डालीं।&lt;br /&gt;परिचय का दौर शुरू हुआ। पता चला कि इस समय कुल आठ अध्‍यापक हैं और करीब 300 विद्यार्थी। बाकी पार्ट टाइम। जबकि स्‍कूल में अब सीबीएससी सेलेबस पढ़ाया जाता है। मैं हैरान हुआ, उस वक्‍त हमारा स्‍कूल शहर का सबसे बढि़या स्‍कूल माना जाता था और वहां प्रवेश पा लेना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। तब पन्‍द्रह सौ विद्यार्थी और तीस पैंतीस अध्‍यापक तो रहे ही होंगे। सहस्रधारा नाम की वार्षिक पत्रिका भी निकलती थी जो हमें रिजल्‍ट के साथ दी जाती थी। &lt;br /&gt;मैं डाउन मेमोरी लेन उतर चुका था और हर विषय के अध्‍यापक का नाम और उनके पढ़ाने के तरीके के बारे में बता रहा था। कितना कुछ तो था जो याद आ रहा था। स्‍टाफ रूम में जितने भी लोग बैठे थे, वे हमारे वक्‍त के कुछ अध्‍यापकों के साथ काम कर चुके थे। प्रिंसिपल भी। सब हैरान थे कि चालीस बरस बीत जाने के बाद भी मुझे सब कुछ जस का तस याद है। अब उन्‍हें मैं कैसे बताता कि हर लेखक के पास स्‍मृतियों का ऐसा खज़ाना होता है कि वह चाह कर भी नहीं भूल पाता। वह उसकी पूंजी होती है और वही लेखन के लिए कच्‍चा माल।&lt;br /&gt;मैंने स्‍कूल का एक चक्‍कर लगाने की इच्‍छा व्‍यक्‍त की। हिन्‍दी अध्‍यापक और प्रिंसिपल साथ चले। सबसे पहले लाइब्रेरी। हमारे वक्‍त मंगला प्रसाद पंत हुआ करते थे लाइब्रेरियन। उन्‍हें गुज़रे सदियां बीत गयीं। अगला झटका मेरा इंतज़ार कर रहा था। लगा कि चालीस बरस से किताबों की अलमारियां खुली ही नहीं हैं। तालों में सदियों  से बंद पुरानी किताबें न पढ़े जाने की अपनी हालत पर आंसू बहा रही थीं। स्‍कूल चल रहा था। न लाइब्रेरियन थे वहां न कोई बच्‍चा।&lt;br /&gt;अगला क्‍लास रूम। एक और झटका बारहवीं क्‍लास के कमरे में। देखा बारहवीं के बच्‍चे अब स्‍टूल पर बैठ कर पढ़ते हैं। मुझे याद आता है हम इसी स्‍कूल में दूसरी तीसरी में भी बेंच पर बैठा करते थे। दसवीं तक आते आते तो सबको छोटी छोटी कुर्सियों पर बैठना होता था। &lt;br /&gt;एक और झटका। जिस कमरे में हम पांचवीं कक्षा में बैठते थे, वहां अब पहली, तीसरी और पांचवीं की कक्षाएं एक साथ चल रही थीं। तीन कोनों में तीन कक्षाएं। पन्‍द्रह बीस बच्‍चे। मैं बेहद उदास हो गया। ये क्‍या हो गया है मेरे शानदार स्‍कूल को कि स्‍कूल के आधे से ज्‍यादा कमरों में ताले लगे हुए हैं और तीन कक्षाओं के बच्‍चे एक ही कमरे में पढ़ रहे हैं। मैंने बैग से बच्‍चों के लिए लायी सारी किताबें निकालीं और हैड मिस्‍ट्रेस को देते हुए कहा - ये बच्‍चों में बांट देना। वह हैरानी से मेरा चेहरा देखने लगी। मैंने हँसते हुए बताया कि इसी कमरे में पैंतालीस साल पहले मैंने पांचवीं कक्षा की पढ़ाई की थी। हैड मास्‍टर राम किशन की लातें खाते हुए। उन्‍हीं दिनों की याद में।&lt;br /&gt;प्रिंसिपल अपना रोना रो रहे थे कि कोई सहयोग नहीं करता। फंड्स की कमी रहती है। ये कमी और वो कमी। सब बकवास। असली समस्‍या है कि अब हिन्‍दी स्‍कूलों में कोई अपने बच्‍चे भेजना ही नहीं चाहता। आप जितनी भी कोशिश कर लें, आपके हिस्‍से में वे ही बच्‍चे आयेंगे जिनके मॉं बाप महंगे स्‍कूलों की फीस एफोर्ड नहीं कर सकते।&lt;br /&gt;हम पूरे उजाड़ स्‍कूल का चक्‍कर लगा कर वापिस आ गये था। कुछ कमरों से पढ़ाने की आवाज़ें आ रही थीं लेकिन न तो प्रिंसिपल ने ऐसा कोई संकेत दिया और न ही मेरी ही इच्‍छा हुई कि मैं बच्‍चों से बात करूं। कितना तो होमवर्क करके आया था। सोचा था कि पूरे स्‍कूल के बच्‍चों और मास्‍टरों को सभा कक्ष में इकट्ठा किया जायेगा जैसा कि हमारे वक्‍त होता था और मैं बच्‍चों को अपने पुराने दिन याद करते हुए ये बताऊंगा और वो बताऊंगा। उन्‍हें स्‍कूली किताबों के अलावा भी कुछ पढ़ने की सलाह दूंगा और प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने के बारे में बताऊंगा। सब धरा रह गया। जबकि हिन्‍दी अध्‍यापक मेरे लेखन के बारे में अच्‍छी तरह जानते थे और मैं अपना परिचय पहले भेज चुका था। ये श्रीमान नौ बरस तक नौकरी से विदआउट पे रह कर मुंबई में गीतकार बनने के चक्‍कर में एडि़यां रगड़ते रहे। एक गीत लिखने का काम नहीं मिला। जुगाड़ करके दसेक किताबें छपवा ली हैं। अब ये जनाब पैगम्‍बर हो गये हैं और इसी नाम से नयी किताब आयी है इनकी। उपदेश देते हैं। किताब में तो घोषणा है ही और बता भी रहे हैं कि मानवता के भले के लिए उन्‍होंने जो किताब लिखी है, अगले दो हज़ार साल तक ऐसी‍ किताब नहीं लिखी जायेगी और दो हज़ार साल बाद आगे की किताब लिखने के लिए वे खुद जनम लेंगे। शायद स्‍कूल में बच्‍चे कम होने का कारण ये अध्‍यापक भी हों। &lt;br /&gt;चाय पीने की इच्‍छा ही नहीं हुई। प्रिंसिपल को अपनी एक किताब भेंट की और स्‍कूल से बाहर आ गया हूं। लाइब्रेरी को देने के लिए जो किताबें लाया था, वापिस ले जा रहा हूं। जानता हूं, बच्‍चों तक कभी नहीं पहुंचेगी।&lt;br /&gt;जिस कॉलेज से मार्निंग क्‍लासेस से बीए किया था, वहां भी आने के बारे में मैंने खत लिखा था और वहां से लिखित न्‍यौता भी आ गया था, लेकिन अब मैं कहीं नहीं जाना चाहता। &lt;br /&gt;अतीत की एक ही यात्रा काफी है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-5435563996828941312?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/5435563996828941312/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=5435563996828941312&amp;isPopup=true' title='6 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5435563996828941312'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5435563996828941312'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/05/blog-post.html' title='बहुत निराश हुआ चालीस बरस बाद अपने स्‍कूल जा कर'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-7917163428019515224</id><published>2009-03-11T19:23:00.000-07:00</published><updated>2009-03-11T19:26:16.293-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रसंगवश'/><title type='text'>युवा पुत्र की अकाल मौत से उपजे शून्‍य में घुटता परिवार</title><content type='html'>बेंगलूर में रहने वाले मेरे मित्र के जवान बेटे की पिछले बरस नवम्‍बर में रात के वक्‍त एक सड़क दुर्घटना में मृत्‍यु हो गयी थी। बेचारा डेढ़ घंटे तक सड़क पर घायल पड़ा रहा। मां परेशान हाल मोबाइल से उससे बात करने की कोशिश कर रही थी। तभी वहां से गुज़र रहे किसी मोटर साइकिल सवार ने उसके बजते मोबाइल की आवाज सुनी। वह रुका और उसका मोबाइल अटैंड किया। उसी व्‍यक्ति ने तब बताया कि आपका बेटा तो यहां बेहोश पड़ा हुआ है। मोटर साइकिल अलग पड़ी हुई है। माता पिता लपके उसकी बतायी जगह पर। तब तक वह भला आदमी एक दो लोगों की मदद से उसे पास के अस्‍पताल तक ले जा चुका था। वे उसके बताये अस्‍पताल की तरफ मुड़े। &lt;br /&gt;बच्‍चा अभी भी बेहोश था और उसके सिर पर पीछे की तरफ से खून बह रहा था। रात ग्‍यारह बजे से लगभग बारह बजे तक अपनी तरफ से उसे होश में लाने, खून देने और इलाज शुरू करने की नाकाम को‍शिशें करने के बाद अस्‍पताल के स्‍टाफ ने हाथ खड़े कर दिये और उसे किसी बड़े अस्‍पताल ले जाने के लिए कह दिया। दूसरे बड़े अस्‍पताल में भी यही हुआ कि वे न तो लगातार बहता खून रोक पाये और न ही खून चढ़ा ही पाये हालांकि मेरे मित्र लगातार डाक्‍टरों को बताते रहे कि उनका ब्‍लड ग्रुप और बेटे का ब्‍लड ग्रुप एक ही है। डॉक्‍टर बार बार अंदरूनी चोटों की बात करते रहे और यही कहते रहे कि हम नब्‍ज ही नहीं पकड़ पर रहे हैं। &lt;br /&gt;रात लगभग सवा एक बजे डॉक्‍टरों ने हाथ खड़े कर दिये और एक होनहार नौजवान अस्‍पताल में और डॉक्‍टरों की देखरेख में होने के बावजूद दम तोड़ गया। &lt;br /&gt;जो लोग उसे अस्‍पताल ले कर गये थे उन्‍हीं में से एक ने बाद में बताया था कि उसने लड़के की मोटर साइकिल को डिवाइडर से टकराते और उसे गिरते देखा था और उसने उसी के मोबाइल से एम्‍बुलेंस के लिए 102 पर फोन भी किया था। लेकिन लगभग सवा घंटे तक कोई भी मदद उस तक नहीं पहुंच पायी थी। जिस जगह दुर्घटना हुई थी, वह बेंगलूर के अंतर्राष्‍ट्रीय हवाई अड्डे पर जाने वाली सड़क पर है लेकिन किसी ने भी रुक कर उसकी मदद नहीं की। वह चश्‍मदीद गवाह इस संभावना से भी इनकार नहीं करता कि शायद उसे किसी तेज चलते वाहन ने टक्‍कर मारी हो। &lt;br /&gt;मेरे मित्र और उनका परिवार हक्‍का बक्‍का है और समझ नहीं पा रहा कि ये सब कैसे हो गया और वे कुछ भी नहीं कर पाये। वे दोनों अस्‍पतालों में डॉक्‍टरों के आगे हाथ जोड़ते, गिड़गिड़ाते रहे और ढंग से इलाज शुरू तक नहीं किया गया। सिर से बहते खून को रोकने के लिए भी कुछ नहीं किया गया।&lt;br /&gt;शाश्‍वत मिश्र होनहार लड़का था और नौकरी करते हुए एमबीए कर रहा था। मात्र बाईस बरस की उम्र। बहुत सारे शून्‍य छोड़ गया है वह अपने पीछे। ये स्‍थायी सवाल तो हर बार की तरह है ही कि लोग बाग़ रोज़ाना सड़कों किसी वजह से दुर्घटनाग्रस्‍त हो गये लोगों की मदद करने में अब भी आगे नहीं आते। एंबुलेंस के लिए फोन किये जाने के बावजूद डेढ़ घंटे तक वह नहीं आती। डॉक्‍टर इस तरह के एमर्जेंसी मामलों में भी रूटीन तरीके से ही काम करते हैं और घायल की जान बचाने की कोशिश नहीं करते। मैं खुद पिछले अट्ठाईस बरस से मुंबई में देख रहा हूं कि लोकल ट्रेनों से होने वाली अलग अलग दुर्घटनाओं में घायल होने वाले सैकड़ों लोग स्‍टेशनों पर ही घंटों पड़े रहते हैं और उनमें से ज्‍यादातर इलाज के इंतजार में दम तोड़ देते हैं। &lt;br /&gt;मेरे मित्र को कुछ और सवाल परेशान कर रहे हैं। ये सब हुआ कैसे। कहीं किसी ने .. लेकिन किसी भी आशंका या संभावना के लिए पुलिस को पक्‍का गवाह चाहिये।&lt;br /&gt;मेरे दोस्‍त की एक और परेशानी है और वे कुछ भी तय नहीं कर पा रहे। जिस कम्‍पनी में शाश्‍वत काम पर लगा था, वहां के नियमों के अनुसार सभी कर्मचारियों की बीमा कराया जाता है। अब मेरे मित्र का संकट ये है कि बीमे में मिली इतनी बड़ी रकम का करें क्‍या। बेटे की जान की कीमत में मिली ये रकम उन्‍हें परेशान किये हुए है। वे शाश्‍वत के पिछले स्‍कूलों और कॉलेज में उसकी याद में स्‍कॉलरशिप शुरू करना चाहते हैं, अपने भूले बिसरे गांव में बच्‍चों के लिए कुछ करना चाहते हैं लेकिन बीमे की रकम निश्चित रूप से ज्‍यादा है और इस तरह की स्‍कालरशिप में पूरी राशि खर्च नहीं होगी। ये रकम उन्‍हें लगातार दबाव में रखे हुए है। वे कुछ करना चाहते हैं लेकिन तय नहीं कर पा रहे कि कैसे क्रिएटिव तरीके से इस राशि का सदुपयोग करें। &lt;br /&gt;मुझे विश्‍वास है मेरे ब्‍लॉगर मित्र आगे आयेंगे और उन्‍हें कोई राह सुझायेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-7917163428019515224?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/7917163428019515224/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=7917163428019515224&amp;isPopup=true' title='9 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7917163428019515224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/7917163428019515224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='युवा पुत्र की अकाल मौत से उपजे शून्‍य में घुटता परिवार'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-6060715714550385137</id><published>2009-02-19T02:49:00.000-08:00</published><updated>2009-02-19T02:56:17.237-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='दाढ़ी प्रसंग'/><title type='text'>न सारे जीनियस दाढ़ी रखते हैं और न सारे दाढ़ी वाले जीनियस होते हैं</title><content type='html'>पिछले दिनों जनवरी 2009 के नया ज्ञानोदय के संपादकीय में श्री कालिया जी ने दाढ़ी, मीडियाकर और जीनियस को ले कर कुछ रोचक और कुछ अरोचक टिप्पाणियां की थीं। खुद दाढ़ी वाला होने के नाते मेरा ये फर्ज बनता था कि दाढ़ी और दाढ़ीजारों के पक्ष में कुछ कहूं। उन तक मेरी बात तो समय पर पहुंच गयी थी लेकिन फरवरी अंक में मेरी बात ढूंढे नज़र नहीं आयी। तो वही पत्र अविकल यहां पेश है।&lt;br /&gt;आदरणीय कालिया जी&lt;br /&gt;जनवरी संपादकीय में आपने एक ही पत्थर से तीन निशाने साध लिये हैं। मीडियाकर, जीनियस और दाढ़़ी वाले। आपने तीनों वर्गों में आपसी रिश्ते को भी उजागर करने की कोशिश की है और ये भी फतवा दे डाला है कि दाढ़ी चाहे जीनियस दिखने की चाह में मीडियाकर रखे या खास दिखने की चाह‍ में जीनियस, मूलत: आलसी होता है। &lt;br /&gt;मैं नहीं जानता कि ये संपादकीय लिखते समय आपके सामने कौन से मीडियाकर, जीनियस या दाढ़ी वाले रहे होंगे, लेकिन संयोग से दाढ़ी वाला मैं भी हूं (जीनियस होने का कोई मुगालता नहीं) और इस वर्ग की सच्चाई शायद बेहतर ज्यादा जानता हूं। &lt;br /&gt;सिर्फ आलस ही तो नहीं होता दाढ़ी रखने का कारण और न जीनियस या खास लगने की चाह ही आदमी को दाढ़ी रखने के लिए उकसाती है। बहुत कुछ होता है हर दाढ़ी के पीछे। हर दाढ़ी वाले के पीछे। कहा और अनकहा। कई बार असफल प्रेम भी या जीवन में और कोई असफलता भी। (छठे सातवें दशक की फिल्मों में देखिये या गाइड में देव आनंद।)&lt;br /&gt;पहली बात तो दाढ़ी रखने के पक्ष में ये कि दाढ़ी रखने का फैसला उस उम्र में ही ले लिया जाता है जब दाढ़ी और मुहांसे एक साथ आने शुरू होते हैं। एक तो सत्रह अट्ठारह बरस में उन मुहांसों को छुपाने की चाह और रोज़ाना नाज़ुक और कोमल चेहरे पर उस्तरा फेरने से बचने की कोशिश ही आम तौर पर दाढ़ी बढ़ाने का फैसला करने में मदद करती है। बेशक अलग दिखने की चाह भी रहती ही है लेकिन जीनियस या खास लगने की कोशिश तो बिल्कुमल भी नहीं होती उस वक्त। हां, अगर कोई गर्ल फ्रेंड बन गयी हो उस वक्त तक‍ और कहीं भूले से दाढ़ी की तारीफ भी कर दे तो फिर कहना ही क्या। तब उस कच्ची और हर तरह के सपनों से भरी नाजुक उम्र में आप कहां तय कर पाते हैं कि खास तरह का साहित्यकार या पत्रकार या बुद्धि‍जीवी बनना है आगे चलकर कि दाढ़ी रख लें तो मदद मिलेगी या खास नज़र आने में मदद करेगी दाढ़ी।&lt;br /&gt;एक बात और। जो उस उम्र में दाढ़ी रखने का फैसला कर लेते हैं फिर जिंदगी भर उसे निभाहते भी हैं। आपने कभी नहीं देखा होगा कि कोई आदमी तीस या पैंतीस बरस की उम्र में दाढ़ी रखने का फैसला करे और आजीवन रखे भी रहे। जबकि शुरू से ही दाढ़ी रखने वाले जब तक हो सके, इसे प्यार से निभाहते भी हैं और दाढ़ी की कद्र करना भी जानते हैं। &lt;br /&gt;तब ये आपके व्यक्तित्व का अनिवार्य हिस्सा बन चुकी होती है। आप चाहें तो भी इससे अलग नहीं हो सकते। हो ही नहीं सकते। मेरी मां शुरू के दस पन्द्रह बरस मेरे पीछे पड़ी रही कि मैं दाढ़ी हटा दूं लेकिन जब मैं सिर्फ मां की खुशी के लिए कभी दाढ़ी साफ करवा भी लेता था तो मां यही कहती थी कि तू दाढ़ी में ही ठीक लगता है। रख ले।&lt;br /&gt;दाढ़ी रखना कहीं भी आलस का प्रतीक नहीं। दाढ़ी रखने वाले सौ में से मुश्किल से दो लोग आलस के कारण दाढ़ी रखते होंगे। दुनिया भर में दाढ़ी रखने का प्रचलन है। सदियों से। अलग अलग तरह की दाढ़ी। जितने दाढ़ी वाले उतनी तरह की दाढ़ी। पूरी आबादी में से सात प्रतिशत लोग दाढ़ी रखते हैं। अलग अलग कारणों से और ये दाढ़ी रखने वाले सारे लोग न तो जीनियस हैं और न मीडियाकर। (पता नहीं क्या सोचकर हमारे देवताओं की तस्वीरों में कुछ देवताओं को क्लीन शेव दिखाया जाता है और कुछ को मुच्छड़, अलबत्ता सारे ऋषि मुनि अनिवार्य रूप से दाढ़ी वाले होते हैं। हमारे राम और कृष्ण क्लीन शेव वाले और यीशु मसीह दाढ़ी वाले। रावण और दुर्योधन मूछों वाले।)&lt;br /&gt;दाढ़ी रखना महंगा सौदा है। आप महीने भर में जितना समय और धन अपनी शेव कराने में खर्च करते होंगे उससे ज्यादा समय और धन दाढ़ी खुरचवाने में, ट्रिमिंग कराने में और उसकी साज सज्जा  करने में खर्च करना पड़ता है हमें। कुछ नाम गिनाऊं। गुलज़ार साहब की दाढ़ी यूं ही बरसों से सिर्फ चार दिन वाली दाढ़ी नहीं लगती। आप अज्ञेय जी को देखें, ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, काशीनाथ सिंह, आलोक धन्वा, ज्ञानेन्द्र पति, प्रेम पाल शर्मा और ओमा शर्मा, सत्य नारायण, अरुण प्रकाश, सूरज प्रकाश, अर्नेस्ट हेमिंग्वे, श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, यासेर आराफात, फिदेल कास्त्रो , वीरेन्द्र  जैन, निराला, रवीन्द्र  नाथ टैगोर, तोलस्तोय, बहुत लम्बी सूची है और पूरी सूची देना न तो संभव है न जरूरी, किसी की भी दाढ़ी देखें, उसे करीने से सजाया संवारा गया है। अब तो बच्चन सीनियर भी कुछ अलग दिखने की चाह में अध दाढ़ी वाले हो गये है़ं। &lt;br /&gt;आप दाढ़ी रखने के मामले में आलस कर ही नहीं सकते। हां, बाबा रामदेव और बापू आसाराम जरूर दाढ़ी पर उतना समय या धन नहीं लगाते होंगे जितना हमारे ओशो लगाते थे। उनकी दाढ़ी करीने से रखी गयी और भव्य लगती थी। श्री श्री श्री रविशंकर की दाढ़ी भी ओशो की धुन पर बनायी गयी रिमेक लगती है। &lt;br /&gt;तो कालिया जी, मेरा ये ख्याल ही है कि कभी न कभी आपने भी किसी के कहने पर दाढ़ी रखी भी होगी और किसी के कहने पर हटायी भी होगी। आपके पुराने फोटो एलबम गवाह होंगे। &lt;br /&gt;अब हमारी तो रह गयी, जो नहीं रख पाये वे जाने। &lt;br /&gt;सादर&lt;br /&gt; सूरज प्रकाश&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-6060715714550385137?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/6060715714550385137/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=6060715714550385137&amp;isPopup=true' title='20 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/6060715714550385137'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/6060715714550385137'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='न सारे जीनियस दाढ़ी रखते हैं और न सारे दाढ़ी वाले जीनियस होते हैं'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-5157363887973819455</id><published>2009-01-05T21:44:00.000-08:00</published><updated>2009-01-05T21:50:24.282-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्‍मृति'/><title type='text'>कथाकार लवलीन नहीं रहीं</title><content type='html'>&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/SWLw_K9dhMI/AAAAAAAAAPI/VCFsQ8XOCkk/s1600-h/lavleen.jpg"&gt;&lt;img style="float:left; margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 182px; height: 200px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/SWLw_K9dhMI/AAAAAAAAAPI/VCFsQ8XOCkk/s200/lavleen.jpg" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5288053880550950082" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अभी थोड़ी देर पहले जयपुर से दुखद खबर मिली कि कथाकार लवलीन नहीं रहीं. वे मेरी बेहद प्रिय कथाकार और मित्र थीं. कई बार उनकी तकलीफों को देख कर मन व्याकुल हो जाया करता था लेकिन उनकी जिजीविषा देख कर यह आश्वासन भी रहता था कि ये लड़की अपनी जिंदगी खींच ले जायेगी. अपनी पूरी जिंदगी उसने मनों के हिसाब से गोलियां और दूसरी दवायें खायीं और टनों के हिसाब से मानसिक और शारीरिक तकलीफें झेलीं. हजारों के हिसाब से दोस्त बनाये और उतने ही उसके दुश्मन भी रहे होंगे. मेरा उससे लम्बा पत्र व्यवहार था. धर्मयुग में शहर में अकेली लड़की के एक दिन गुजारने को ले कर उसकी एक कहानी छपी थी 1994 के आसपास. मुझे बेहद पसंद थी वह कहानी. तब से उससे खतो किताबत चलती रही. वह दो बार हमारी मुंबई में हमारी पारिवारिक मेहमान रही. एक बार जब लवलीन विजय वर्मा कथा सम्मांन लेने के लिए मुंबई आयी थी तो भी हमारी मेहमान थी. तब मैं, धीरेन्द्र् अस्थाना, उसकी पत्नी ललिता, कवि मनोज शर्मा और उसकी पत्नी लवलीन के साथ गोराई बीच पर घूमने गये थे और पूरा दिन समंदर के किनारे बिताया था. खूब बातें की थीं, धमाल मचाया था और ढेर सारी बीयर पी थी. जब बीयर खत्म हो गयी थी तो हम जिस दुकान नुमा घर के आगे बैठे थे तो वहां और बीयर लेने के लिए गये तो पता चला कि और बीयर नहीं है लेकिन दुकानदार ने हमारा मस्ती भरा व्यवहार देख कर अपनी तरफ से शराब की नन्हीं वाली बोतलें भेंट की थीं. अगली बार जब लवलीन हमारे घर ठहरी थी तो मेरी पत्नी मधु ने उसका साक्षात्कार लिया था जो किसी पत्रिका में छपा था और  http://www.abhivyakti-hindi.org/snibandh/sakshatkar/lovleen.htm पर भी पढ़ा जा सकता है. &lt;br /&gt;जब मैं लवलीन के घर जयपुर गया था तो उसने और उसके पति और बिटिया ने जितनी आत्मीयता से मेरा ख्याल रखा था उसे मैं भूल नहीं सकता. बीमार होने के बावजूद वह मुझे लेने के लिए स्टेशन पर आयी थी और ढेर सारी बातें करती रही थी. कभी कभार हम फोन पर बात कर लिया करते थे. वह अपनी खराब सेहत को ले कर हमेशा तनाव में रहती और बताती कि उसका भी वही हाल होना है जो उसकी मां और भाई का हुआ था यानि बेवक्त मौत. उसे समझाने के लिए मेरे पास कभी भी माफिक शब्द नहीं होते थे क्योंकि जिस तरह की कठिन जिंदगी वो जी रही थी, सहानुभूति के कोई भी शब्द बेमानी होते. &lt;br /&gt;वह अपनी खराब मानसिक और शारीरिक हालत के बावजूद कई मोर्चों पर लगातार डटी रहती थी. बिटिया के कैरियर को संवारने की योजनाएं बनाती रहती थी. लिखती रहती थी और सबसे जूझती रहती थी. लगातार सिगरेट पीना, नशे के उपाय करना उसकी जरूरत बन चुके थे और उसकी इन लतों ने उसे खासी बदनामी दिलायी. पर क्या करती वह. उसके हिस्से  में जितने दुख लिखे थे उन्हें  भोगने के लिए  उसे कुछ तो चाहिये था जो उसे अपने आप को भूलने में भी मदद करे और तकलीफों से पार पाने की हिम्मत भी दे. &lt;br /&gt;उसे मेरा उपन्यास देस बिराना बहुत पसंद था लेकिन उसने ये भी कहा था - सूरज ख्याल रखना, तुमने अपना बेहतरीन इस उपन्यास में उड़ेल दिया है. कहीं ऐसा न हो कि बाद में कुछ कहने के लिए बचे ही ना. तुमने सच कहा था लवलीन, उस किताब के बाद मेरे पास कहने के लिए कुछ भी तो नहीं रहा है. लिखना ही बंद हो चुका है. लेकिन लवलीन, मैं फिर लिखूंगा और तुम्हारे लम्बे संघर्ष से प्रेरणा ले कर लिखूंगा. तुम्हारी याद को बनाये रखने के लिए जरूर लिखूंगा. &lt;br /&gt;सूरज&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/3725913520567987009-5157363887973819455?l=kathaakar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://kathaakar.blogspot.com/feeds/5157363887973819455/comments/default' title='टिप्पणियाँ भेजें'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=3725913520567987009&amp;postID=5157363887973819455&amp;isPopup=true' title='14 टिप्पणियाँ'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5157363887973819455'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/3725913520567987009/posts/default/5157363887973819455'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://kathaakar.blogspot.com/2009/01/blog-post.html' title='कथाकार लवलीन नहीं रहीं'/><author><name>कथाकार</name><uri>http://www.blogger.com/profile/05339019992752440339</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/Snv9VpVnzTI/AAAAAAAAAVw/oxPvYJCQDHI/S220/Image006.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/SWLw_K9dhMI/AAAAAAAAAPI/VCFsQ8XOCkk/s72-c/lavleen.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-3725913520567987009.post-2621858150194795344</id><published>2008-12-30T20:58:00.000-08:00</published><updated>2008-12-30T21:15:26.124-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='प्रसंगवश'/><title type='text'>मैंने पढ़ी किताबें - 2008 में</title><content type='html'>मैंने पढ़ी किताबें और देखीं फिल्में  &lt;br /&gt;यहां मैं 2008 के दौरान पढ़ी गयी उन किताबों की फेहरिस्त दे रहा हूं जो मैंने खरीदीं या किसी न किसी बहाने मुझ तक पहुंचीं। कुछ किताबें पुस्तकालय से ले कर भी पढ़ी होंगी लेकिन उनके नाम अभी याद नहीं आ रहे। ऐसी किताबें भी 25 तो रही ही होंगी। मेरे दोस्ती पूछ सकते हैं कि 366 दिन में इतनी ज्यादा किताबें कैसे पढ़ी जा सकती हैं भला। इसकी दो वजहें रहीं। एक्सीडेंट के कारण चार महीने तक बिस्तर पर रहा और ठीक हो जाने के बाद भी ऑफिस और घर की 4 किमी की दूरी नापने के अलावा कहीं ज्यादा दूर तक नहीं गया। सिर्फ पढ़ता रहा और बेहतरीन फिल्में देखता रहा। कुछ किताबों के नाम याद नहीं आ रहे। ये किताबें दिल्ली में अस्पताल में पढीं थीं। पहले सोचा था कि फिल्मों  की तरह इन किताबों को भी अपनी पसंद के हिसाब से एक से पांच तक स्टार दूंगा लेकिन उसमें सारे दोस्तों के नाराज हो जाने का खतरा था, इसलिए सिर्फ नाम दे रहा हूं। मेरे पास अभी भी 50 किताबें तो होंगी जो अभी पढ़ी जानी हैं। उनका जिक्र अगली बार।&lt;br /&gt;देखी गयी कुछ यादगार फिल्मों  के नाम भी दे रहा हूं। ज्यादातर‍ फिल्में घर पर देखीं हैं।&lt;br /&gt;1.  मोहब्बत का पेड़  प्रिया आनंद  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;2.  अंधेरा समुद्र  परितोष चक्रवर्ती कहानी संग्रह&lt;br /&gt;3.  अन्या  से अनन्या   प्रभा खेतान         आत्म कथा&lt;br /&gt;4.  अपवित्र आख्यान अब्दुल बिस्मिल्लाह  उपन्यास &lt;br /&gt;5.  आइने सपने और वसंत सेना रवि बुले कहानी संग्रह&lt;br /&gt;6.  आखिरी अढाई दिन  मीना कुमारी की जीवनी जीवनी&lt;br /&gt;7.  इच्छायें           कुमार अम्बुंज  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;8.  इस जंगल में  दामोदर खडसे कहानी संग्रह&lt;br /&gt;9.  उड़ान          जितेन ठाकुर उपन्यास &lt;br /&gt;10.  उधर के लोग  अजय नावरिया उपन्यास&lt;br /&gt;11.  उषा वर्मा की कहानियां कारावास           कहानी संग्रह&lt;br /&gt;12.  उषा राजे सक्सेना की कहानियां  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;13.  ओ इजा  शंभु नाथ सती उपन्यास&lt;br /&gt;14.  कठपुतलियां  मनीषा कुलश्रेष्ठ  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;15.  कागजी़ बुर्ज          मीरा कांत    कहानी संग्रह&lt;br /&gt;16.  कागजी है पैरहन इस्मत चुगताई  आत्म कथा&lt;br /&gt;17.  काशी का अस्सी   काशी नाथ सिंह &lt;br /&gt;18.  किस्सा  कोहेनूर पंखुरी सिन्हा  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;19.  कुइंया जान  नासिरा शर्मा  उपन्यास &lt;br /&gt;20.  कोई मेरा अपना सुषमा जगमोहन  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;21.  कोहरे में कैद रंग गोविंद मिश्र  उपन्यास &lt;br /&gt;22.  कौन कुटिल हम जानी प्रेम जनमेजय व्यंग्‍य &lt;br /&gt;23.  खारा पानी  पाकिस्तानी लेखक  उपन्यास&lt;br /&gt;24.  गुडि़या भीतर गुडि़या मैत्रेयी पुष्पा  आत्म कथा&lt;br /&gt;25.  गुलमेंहदी की झाडि़यां  तरुण भटनागर कहानी संग्रह&lt;br /&gt;26.  गेशे जम्पा    नीरजा माधव उपन्यास &lt;br /&gt;27.  घर बेघर           कमल कुमार  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;28.  चिडि़या फिर नहीं चहकी आलोक मेहता  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;29.  छावनी में बेघर  अल्पना  मिश्र कहानी संग्रह&lt;br /&gt;30.  जंगल का जादू तिल तिल प्रत्यक्षा  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;31.  कहानी संग्रह जया जादवानी कहानी संग्रह&lt;br /&gt;32.  जानकी पुल  प्रभात रंजन  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;33.  तिनका तिनके पास अनामिका          उपन्यास &lt;br /&gt;34.  तूती की आवाज  ह्रषिकेश सुलभ कहानी संग्रह&lt;br /&gt;35.  दस द्वारे का पींजरा  अनामिका           उपन्यास &lt;br /&gt;36.  दावानल  नवीन जोशी  उपन्यास &lt;br /&gt;37.  देवी नगारानी की किताब  कविता &lt;br /&gt;38.  धुनों की यात्रा पंकज राग          अध्ययन &lt;br /&gt;39.  धूल  पौधों पर गोविंद मिश्र          उपन्यास &lt;br /&gt;40.  नाम में क्या  रखा है हरि भटनागर  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;41.  उपन्यास     नीलाक्षी सिंह  उपन्यास&lt;br /&gt;42.  नूर जहीर  बड़ उरैये    उपन्यास&lt;br /&gt;43.  पंकज मित्र  हुडुकलुल्लुा  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;44.  फालतू के लोग राजेन्द्र राजन कहानी संग्रह&lt;br /&gt;45.  फूलों का बाड़ा मो आरिफ  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;46.  फ्रिज में औरत  मुशर्रफ़ आलम जौकी  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;47.  बहत्त र मील अशोक बटकर (मराठी) उपन्यास &lt;br /&gt;48.  बूढ़ा चांद    शर्मिला बोहरा  जालान कहानी संग्रह&lt;br /&gt;49.  बॉस की पार्टी  संजय कुंदन  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;50.  ब्रजेश शुक्ला  मंडी           उपन्यास&lt;br /&gt;51.  भया कबीर उदास  उषा प्रियंवदा   उपन्यास &lt;br /&gt;52.  भारतीय कहानियां ज्ञानपीठ          कहानी संग्रह&lt;br /&gt;53.  भूलना  चंदन पांडेय  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;54.  मधु कांकरियां सेज पर संस्कृाति उपन्यास&lt;br /&gt;55.  मीना कुमारी की शायरी   शायरी&lt;br /&gt;56.  मेरे हिस्से  का शहर सुधीर विद्यार्थी  संस्मरण &lt;br /&gt;57.  यत्र तत्र सर्वत्र शरद जोशी &lt;br /&gt;58.  ये मेरी गज़लें  अहमद फ़राज़ शायरी&lt;br /&gt;59.  रघू रेहन पर काशी नाथ सिंह उपन्यास &lt;br /&gt;60.  राग विराग  संतोष चौबे  उपन्यास &lt;br /&gt;61.  रेत          भगवान दास मोरवाल उपन्यास &lt;br /&gt;62.  वह आदमी           फ़ज़ल ताबिश उपन्यास &lt;br /&gt;63.  वहीं रुक जाते नरेन्द्र नागदेव  &lt;br /&gt;64.  शराबी की सूक्तियां  कृष्ण  कल्पित कविता &lt;br /&gt;65.  संगम            अंजना संधीर  &lt;br /&gt;66.  सीढि़यां, मां और उसका देवता भगवान दास मोरवाल  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;67.  सूरज नंगा है प्रेम जनमेजय  व्यंग्य &lt;br /&gt;68.  सोफिया तोलस्तोया की डायरी  रचना समय अंक डायरी&lt;br /&gt;69.   प्रियदर्शन  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;70.   गोरीनाथ  कहानी संग्रह&lt;br /&gt;71.   अशोक अग्रवाल यात्रा संस्मरण &lt;br /&gt;72.   रूप सिंह चंदेल  उपन्यास&lt;br /&gt;73.   मनोज रूपड़ा उपन्यास&lt;br /&gt;74.  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After the rehearsal Ingmar Bergman&lt;br /&gt;2.  Benhur &lt;br /&gt;3.  Black diamond &lt;br /&gt;4.  Carry on spying &lt;br /&gt;5.  Casino royale  &lt;br /&gt;6.  Come September &lt;br /&gt;7.  Confidentially yours &lt;br /&gt;8.  डोर  &lt;br /&gt;9.  GiGi &lt;br /&gt;10.  La double vie &lt;br /&gt;11.  Le eclisse &lt;br /&gt;12.  Lolita &lt;br /&gt;13.  North by north west Alfred Hitchcock&lt;br /&gt;14.  Old man and  the sea &lt;br /&gt;15.  On golden pond &lt;br /&gt;16.  Persona Ingmar Bergman&lt;br /&gt;17.  Phantom of liberty &lt;br /&gt;18.  Piano teacher &lt;br /&gt;19.  Private ryan &lt;br /&gt;20.  Promised land &lt;br /&gt;21.  Sweet November &lt;br /&gt;22.  The  men of  honour &lt;br /&gt;23.  The outsider &lt;br /&gt;24.  To kill a mocking bird &lt;br /&gt;25.  Virdiana &lt;br /&gt;26.  War and peace &lt;br /&gt;27.  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margin:0 10px 10px 0;cursor:pointer; cursor:hand;width: 200px; height: 134px;" src="http://2.bp.blogspot.com/_V9Gp4MyagA0/STecKBqofmI/AAAAAAAAAMU/2xdWWytJMok/s200/F1030026.JPG" border="0" alt=""id="BLOGGER_PHOTO_ID_5275857184547700322" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                &lt;br /&gt;बात शायद १९९९ के मुंबई फि़ल्म फेस्टिवल की है। तब तक उसका मुंबई से स्थायी रूप से मोहभंग नही हुआ था और वह अपनी रोजी रोटी मुंबई में ही कमा खा रहा था। उन दिनों मेरा ऑफिस मुंबई में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर में हुआ करता था और फि़ल्म फेस्टिवल के सीज़न टिकट मेरे ऑफिस के रास्ते में ही यशवंत राव चौहान हॉल में मिलने वाले थे। हमने तय किया कि किसी शनिवार को वहां जाकर लेते आएंगे। काउंटर पर जो अंग्रेजीदां लड़की बैठी थी, उसने फार्म उसकी तरफ बढ़ाया और अंग्रेजी में ही कहा कि इसे भर दीजिए और साथ में दो फोटोग्राफ दे दीजिए। उसने अपनी सदाबहार स्टाइल में कहा कि मुझे अंग्रेजी नहीं आती। ये सुनते ही वह लड़की झटके से अपनी कुर्सी से खड़ी हो गई। उसका मुंह खुला का खुला रह गया। उसे कुछ सूझा ही नहीं कि क्या कहे। उसके सामने फैशनेबल कपड़े पहने एक खूबसूरत नौजवान खड़ा है जो फि़ल्म फेस्टिवल देखने की चाह रखता है और जब उसे इसके लिए फार्म भरने के लिए कहा जाता है तो बताता है कि उसे अंग्रेजी नहीं आती। उसने बट, हाउ जैसे कुछ शब्दों के सहारे जानना चाहा कि फिर आप ये फि़ल्में! तब हमारे नौजवान दोस्त ने उस लड़की से कहा था कि अंग्रेजी क्या, किसी भी भाषा की फि़ल्‍में देखने के लिए अंग्रेजी जानने की ज़रूरत नहीं होती। &lt;br /&gt;यह खूबसूरत नौजवान था मनोज रूपड़ा। उसे सचमुच अंग्रेजी बोलना, पढ़ना या लिखना आज भी नहीं आता, लेकिन मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि उसने जितनी संख्या में अंग्रेजी की और दुनिया भर की दूसरी भाषाओं की फि़ल्में देखी होंगी, शायद ही किसी हिंदी कहानीकार ने देखी होंगी। और मैं यह शर्त भी बद सकता हूं कि जिस अधिकार और आत्‍मविश्वास के साथ वह दुनिया की किसी भी भाषा की फि़ल्म के क्राफ्ट, शिल्प, कैमरावर्क, स्क्रिप्ट और दूसरे तकनीकी पक्षों पर बात कर सकता है, शायद ही कोई और समकालीन कहानीकार कर सकता है। उसने पहली संगमन गोष्‍ठी में आज से पंद्रह बरस पहले समांतर फि़ल्मों पर कोई तीस पेज का गंभीर लेख पढ़कर सुनाया था। &lt;br /&gt; अब जब फि़ल्मों की बात चल रही है तो पहले यही बात पूरी कर ली जाए। अभी पिछले दिनों पुणे में इंटरनेशनल फि़ल्म  फेस्टिवल सम्पन्‍न हुआ। मैंने मनोज को इसके बारे में बताया तो उसने तुरंत अपने फोटो भेज दिए कि उसके लिए भी सीज़न टिकट बुक करवा रखूं। वह पूरे हफ्ते के लिए आएगा। इसी फेस्टिवल के लिए दिल्ली से मेरे बहुत पुराने दोस्त और कथाकार सुरेश उनियाल भी आ रहे थे। पुणे में ही स्थायी रूप से बस चुके विश्व सिनेमा पर अथॅारिटी समझे जाने वाले हमारे दोस्त मनमोहन चड्ढा तो थे ही। हमने एक साथ खूब फि़ल्में देखीं, खूब धमाल किया और देखी गई और न देखी गई फि़ल्मों पर खूब बहस भी की। इसी फेस्टिवल में हमने एक ऐसी फि़ल्म देखी, जिसके बारे में मैंने मनोज से ही सुना था और इसके बारे में इंटरनेट से और जानकारी खंगाली थी। (मनोज यह फि़ल्म पहले देख चुका था और उसका आगामी उपन्‍यास भी इसी फि़ल्म से गहरा ताल्लुक रखता है।) यह फि़ल्म थी १९२७ में प्रदर्शित हुई फिट्ज़ लैंग की मेट्रोपॉलिस।। ढाई घंटे की यह मूक फि़ल्म कई मायनों में अद्भुत थी और अपने वक्त से बहुत आगे की बात कहती थी। पूंजी और श्रम के बीच के टकराव, आदमी को पूरी तरह से निचोड़कर रख देने वाली दैत्या कार मशीनें, आदमी और मशीन की लड़ाई, डबल रोल, रोबो की कल्पना और उसके ज़रिए हमशक्‍ल नेगेटिव पात्र का सृजन, कल्पनातीत स्‍पेशल इफेक्‍टृस  वग़ैरह फि़ल्म निर्देशक आज से अस्सी साल पहले परदे पर साकार कर चुका था। इस फेस्टिवल में हमने जितनी फि़ल्में देखीं, उनमें मादाम बावेरी और मैट्रोपोलिस सबसे अच्छी रहीं।  &lt;br /&gt; फि़ल्मों  का चस्का मनोज को दुर्ग के दिनों से है। उन दिनों वह दुर्ग में प्रगतिशील लेखक संघ का अध्यक्ष हुआ करता था। मध्‍य प्रदेश में उन दिनों तक एक सिलसिला चला करता था महत्व  फलां फलां। इसके अंतर्गत रचनाकारों पर केन्द्रित कार्यक्रम आयोजित किए जाते थे। भीष्म साहनी आदि पर हो चुके थे और दुर्ग में ‘महत्‍व नामवर सिंह’ के आयोजन की रूपरेखा बनायी गई थी। इस काम के लिए एक लाख का बजट था। बताया गया कि कोई व्यापारी धन देगा। स्थानीय इकाई के अध्‍यक्ष होने के नाते मनोज ने इसका विरोध किया और कहा कि मजदूर विरोधी पूंजीपति के पैसे से इस कार्यक्रम को वे नहीं होने देंगे। इसके बजाए कम खर्चे पर कोई फि़ल्‍म आधारित कार्यक्रम रखा जाए। संस्था में दो गुट बन गए। ज़्रयादातर सदस्य ‘महत्व नामवर सिंह’ के पक्ष में। मनोज ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया और अकेले अपने बलबूते पर फि़ल्म आधारित कार्यक्रम की तैयारियां की। फि़ल्मों पर बात करने और कुछ चुनींदा फि़ल्में दिखाने के लिए प्रख्यात फि़ल्म हस्ती सतीश बहादुर को आमंत्रित किया गया। संयोग ऐसा बना कि आयोजन में भाग लेने के लिए कोई भी नहीं आया। बेशक सतीशजी अपने तामझाम के साथ वहां पहुंच गए थे।  &lt;br /&gt; निराश कर देने वाले ऐसे मुश्किल पलों में भी कुछ सुंदर, कुछ शिव छुपा हुआ था। मनोज अकेले ही पूरे अरसे तक सतीश बहादुर से फि़ल्मों की बारीकियों का गंभीर अध्ययन करता रहा। उनके द्वारा लाई गईं दुर्लभ फि़ल्मों का इकलौता दर्शक बना रहा और उन पर बात करता रहा। बेशक बीच-बीच में दो चार लोग आते जाते रहे होंगे, लेकिन कुल मिलाकर ये पूरा सिलसिला वन टू वन ही रहा। शायद सतीशजी को भी न पहले न बाद में इस जैसा समर्पित विद्यार्थी कभी मिला होगा। उन्हीं  की सिफारिश पर बाद में मनोज ने पटना में प्रकाश झा की पंद्रह दिवसीय कार्यशाला में सक्रिय भागीदारी की और फि़ल्म की भाषा को और गहराई से पढ़ा। बाद में ‘महत्व नामवर सिंह’ भी हुआ जिसमें मनोज नहीं गया, बेशक नामवरजी उसके बारे में पूछताछ करते रहे। &lt;br /&gt; मनोज पर यह बात सिर्फ़ फि़ल्मों  के बारे में ही लागू नहीं होती। वह मध्य प्रदेश की लोक कलाओं और लोक कलाकारों से भी नज़दीकी से जुड़ा रहा है और उन पर भी पूरे अधि‍कार के साथ बात कर सकता है। वह नाचा के महान कलाकार मदन निषाद का मुरीद है और उन्हें दुनिया के किसी भी कलाकार की तुलना में श्रेष्ठ मानता है। उसे इस बात का भी बेहद अफसोस है कि मदन निषाद की कला उनके साथ ही ख़त्म हो गई है। न केवल लोक कलाओं से बल्कि नाटक से भी उसका नाता रहा है और उसने देवेन्द्र् राज अंकुर के निर्देशन में नाटकों में काम भी किया है। &lt;br /&gt; मनोज के यही स्कूल रहे हैं जहां बेशक अंग्रेजी नहीं पढ़ाई जाती थी, लेकिन जीवन के सारे असली पाठ मनोज ने इन्हीं पाठशालाओं से सीखे हैं। वाचिक परंपरा कह लें या चीज़ों को देखने परखने की गहरी दृष्टि और लगन, मनोज ने स्कूली पढ़ाई की कमी इसी तरह पूरी की है। मनोज ने पढ़ा भी ख़ूब है। जो कुछ हिन्दीं के ज़रिए उस तक पहुंचा, उसने उसे आत्मसात किया है। अब ये बात अलग है कि एक्ट्रा ट्यूटोरियल के नाम पर मनोज ने कुछ बदमाशियां, कुछ हरमज़दगियां और कुछ आउट ऑफ़ कोर्स की चीज़ें भी सीखीं और इफरात में सीखीं। ये बातें भी मनोज के सम्पूंर्ण व्यक्तित्व का अभिन्न हिस्सा हैं। बेशक सामने वाले को हवा भी नहीं लगती कि ये सामने गैलिस वाली पैंट और अजीब सी कमीज़ पहने या परदे के कपड़े की पैंट और उस पर सुर्ख लाल कमीज पहने भोला सा लड़का खड़ा है, जो किसी भी परिचित या अपरिचित व्यक्ति से बात तक करने में संकोच करता है, और मुश्किल से ही सामने वाले से संवाद स्थापित कर पाता है, दरअसल खेला खाया है और जीवन के हर तरह के अनुभव ले चुका असली इंसान है। &lt;br /&gt; लेकिन एक बात है। जब अनुभव लेने की बात आती है या जीवन के किन्हीं दुर्लभ पलों का आनंद लेने की बात आती है तो मनोज के सामने बस वही पल होते हैं। उसमें लेखक के रूप में उस अनुभव से गुज़रने की ललक कहीं नहीं मिलती कि घर जाकर इस अनुभव को एक धांसू कहानी में ढालना है। मनोज की इसी बात पर मैं जी जान से फि़दा हूं। उसका कहना है कि जो लोग हर वक्त लेखक बने रहते हैं, न तो जीवन का आनंद ले पाते हैं और न ही स्थायी किस्म का लेखन ही कर पाते हैं। भोगा हुआ सबकुछ कहानी का कच्चा माल नहीं होना चाहिए। कुछ ऐसा भी हो जिसमें आपने भरपूर आनंद लिया हो। उसे लिखने का कोई मतलब नहीं होता। लेखक को बहुत कुछ पाठक पर भी छोड़ देना चाहिए और सबकुछ जस का तस उसके सामने नहीं परोस देना चाहिए कि अख़बार की ख़बर और कहानी में फ़र्क किया ही न जा सके। यही वजह है कि उसकी कोई भी कहानी-पता है कल क्या हुआ मार्का नहीं है। मनोज यह भी मानता है कि कभी भी पाठक को कम  करके मत आंको। वह भी लेखक के समाज का ही बाशिंदा है और हो सकता है लेखक से ज्यादा संवेदनशील हो और च़ीजों को बेहतर तरीके से जानता हो। &lt;br /&gt; एक बार मनोज देर रात मुंबई में वीटी स्टेशन के पास मटरगश्ती कर रहा था। उसका सामना वहीं चौराहे पर बैठे कुछ आवारा छोकरों के साथ हो गया। वे लड़के दीन दुनिया से ठुकराये गए थे और उन्होंने अपने आप को नशे की दुनिया के हवाले कर रखा था। मनोज भी रोमांच के चक्कर में उनमें जा बैठा और जल्द ही उनके साथ घुल मिल गया। अब मनोज एक दूसरी ही दुनिया में था। वह कई घंटे उनके साथ रहा और उनके बीच में से ही एक बनकर रहा। वहीं पर उन बच्चों  के बारे में रोंगटे खड़े कर देने वाले कई सच उसके सामने आए लेकिन मुझे नहीं लगता कि उसने मेरे या अपने अभिन्न  मित्र आनंद हर्षुल के अलावा किसी और से ये अनुभव बांटे हों या इस पर कुछ लिखा हो। &lt;br /&gt;लेखन और आनंद या जि़न्दगी को भरपूर जीना उसके लिए अलग अलग चीज़ें हैं और उनमें कोई घालमेल नहीं। मैं कितने ही ऐसे रचनाकारों को जानता हूं जिन्हों ने रात को घटी घटना पर सुबह सुबह ही कहानी लिखकर पहली ही डाक से किसी प्रिय संपादक के पास रवाना भी कर दी। यह बात दीगर है कि इस तरह की रचना कितनी देर के लिए और किस तरह प्रभाव छोड़ती है।    &lt;br /&gt; मनोज ने कार्ल मार्क्स और दूसरा विश्व साहित्य भट्ठी के आगे बैठे हुए कढ़ाई में दूध औंटाते हुए पढ़ा है। मुझे नहीं पता कि किन वजहों से उसकी स्कूली पढ़ाई छूटी होगी, लेकिन एक बात तय है कि मनोज ने गोर्की की तरह जो कुछ जीवन की पाठशालाओं में सीखा है, हमारे देश के किसी स्कूल की न हैसियत थी और न है कि उसे वह सबकुछ सिखा सकता जो उसने स्कूल से बाहर रहकर सीखा है। यही उसके जीवन की असली पाठशालाएं है। &lt;br /&gt; मनोज जब छठी कक्षा में ही था तो उसे जुए की लत लग गयी। दोस्तों  के साथ चितपट नाम का जुआ खेलना मनोज को बहुत भाता था। एक दिन इसी चक्कर में शहर के गांधी चोराहे पर मनोज चार दोस्तों के साथ जुआ खेल रहा था तभी एक लड़के के पिता वहां आ पहुंचे। तब मनोज की जो पिटाई हुई, उसकी टीस वह आज भी याद करता है। जुआ तो हमेशा के लिए छूटा ही, स्कूल भी तभी छूट गया था। &lt;br /&gt; एक और बार मनोज बुरी तरह से पिटते-पिटते बचा। दुर्ग में एक व्यापारी हैं जिनका शराब बनाने का कारखाना है। उनका सचिव था रमा शंकर तिवारी जो जनवादी लेखक संघ का पदाधिकारी था और मनोज का दोस्त। था। एक बार व्यापारी के यहां कोई पारिवारिक आयोजन था जिसमें सभी २५०० मज़दूरों को खाना खिलाना था। दारू का इंतज़ाम तो उनकी तरफ से था ही। तिवारीजी ने यारी-दोस्ती में खाना खिलाने का ठेका मनोज को दिलवा दिया। मनोज ने मज़दूरों की खान-पान की आदतों और उससे पहले पिलाई जाने वाली मुफ्त की शराब को देखते हुए २५०० की बजाये ३५०० लोगों के खाने का इंतज़ाम किया। ५०० मज़दूरों की पहली पंगत खाना खाने बैठी और जितना भी खाना तैयार था, सारा का सारा खा गयी। अब अगली पंगत बैठने के लिए तैयार लेकिन खाना भी नहीं और खाना तैयार करने के लिए सामान भी नहीं। हंगामा मच गया। मज़दूर शराब तो वैसे ही पिये हुए थे, तोड़-फोड़ पर उतर आये। मज़दूरों ने रसोई वाले हिस्सेी में हल्ला बोल दिया। सारे कारीगर प्राण बचाते भागे। पहले तो मनोज भी भागा लेकिन उसे लगा कि उसके भागने से कहीं हालत और न बिगड़ जायें, उसने सबको शांत करते हुए उन पांच छ: सौ मज़दूरों के जमावड़े के सामने माइक के जरिये भाषण देना शुरू कर दिया। मनोज साफ झूठ बोल गया और कहा कि ग़लती खाना बनाने वाले ठेकेदार की नहीं है। ठेकेदार को तो सामान दिया गया था और सिर्फ़ खाना तैयार करके खिलाने का काम सौंपा गया था। अब मज़दूरों का गुस्सा उस व्यापारी पर। उनके खिलाफ नारेबाज़ी होने लगी, नेता लोग आये और कारखाने में हड़ताल की घोषणा हो गयी। जब उस व्यापारी को पता चला कि एक तो मनोज ने सबको खाना नहीं खिलाया और ऊपर से झूठ बोलकर मज़दूरों को उनके खिलाफ भड़का कर हड़ताल भी करवा दी है तो रात को मनोज की पेशी हुई। मनोज ने साफ-साफ कह दिया कि जितने के लिए कहा गया था उससे ज्‍यादा खाना अगर सदियों से भूखे आपके ५०० मज़दूर खा गये तो मैं क्या करूं। अब मज़दूरों के हाथों पिटने से बचने के लिए कुछ तो करना ही था। जो भी सूझा मैंने बोल दिया। &lt;br /&gt; मनोज से मेरी पहली मुलाक़ात १९९२ में कानपुर में पहले संगमन के मौके पर हुई थी। बेशक वह मौका मेरे लिए एक हादसे की तरह था। कुछ ही दिनों पहले मैं ‘वर्तमान साहित्‍य’ में अपनी विवादास्‍पद कहानी ‘उर्फ़ चंदरकला’ की वजह से सारे ज़माने की दुश्‍मनी मोल ले चुका था। कहानी सबसे ज़ेहन में ताजा थी। अब हुआ यह कि पहले संगमन के पहले सत्र का संचालन राजेन्द्र राव कर रहे थे। अध्यक्षता राजेन्द्र यादव कर रहे थे और मेरी यही वाली कहानी वे लौटा चुके थे। राजेन्द्र  राव ने आव देखा न ताव, सत्र की शुरुआत में ही इस कहानी पर पिल पड़े। मुझे ही सबसे पहले बोलने के लिए आमंत्रित भी कर लिया। वे मुझे सबसे पहले बोलने के लिए आमंत्रित करने वाले हैं, यह मुझे पता नहीं था। किसी भी आयोजन में जाने का ये मेरा पहला ही मौका था। इस हिसाब से मैं सबसे पहली बार ही मिल रहा था। कुल जमा चार-पांच कहानियों की ही पूंजी थी मेरी। नर्वस मैं पहले से था, बाक़ी रही सही कसर रावजी ने पूरी कर दी। इस तरह की धज्जियां उखाड़ने वाली ओपनिंग से मैं गड़बड़ा गया और पता नहीं क्या-क्या बोलने लगा। दो चार मिनट तक बक-बक करने के बाद मैं बैठ गया। ये संगमन की शुरुआत थी जो मैंने बहुत ही बोदे ढंग से की थी। वहीं पर मैं अपनी कथाकार मित्र सुमति अय्यर से पहली और आखि़री बार मिला थ
